निबंध - जीवन परिचय क्रांतिकारी अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ



अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का जन्म 22 अक्टूबर सन् 1900 ई. को शाहजहाँपुर के एक सम्पन्न पठान खानदान में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री शफीक उल्ला खाँ था। उनका खानदान कदैल खैल के नाम से प्रसिद्ध था। उनके पिता रईस जमींदार थे। अशफ़ाक़ उल्ला खाँ चार भाई थे तथा वे सबसे छोटे थे। उनसे बडे़ तीन भाई श्री सफी उल्ला खाँ, श्री रियासत उल्ला खाँ, श्री शहनशाह उल्ला खाँ थे। अशफ़ाक़ सबसे छोटे होने के कारण परिवार में सभी के लाड़ले थे। घर में उन्हें प्यार से सभी 'अच्छू' बुलाया करते थे। "लड़कपन से ही आप बड़ी मस्तानी तबियत के थे। नदी 'खन्नौत' में तैरना, घोडे़ की सवारी और भाई की बन्दूक से शिकार खेलना इन्हें बहुत प्रिय था। लड़कपन से ही देश की धुन समा गयी थी। आन्दोलन से दिलचस्पी रखते, उसे जानने समझने की कोशिश करते थे। उनका झुकाव विशेष तौर पर क्रांतिकारी आन्दोलन की ओर था।" शाहजहाँपुर के मिशन स्कूल में पढ़ने के समय ही अशफ़ाक़ की भेंट पं. रामप्रसाद बिस्मिल से हुई थी। "मूल रूप में आपके (अशफ़ाक़) पूर्वज अफगानिस्तान के थे जो लगभग 300 साल पहले भारत में आ गए थे। अशफ़ाक़ के परिवार में कई जज और मजिस्ट्रेट हुए थे। जमींदार घराना था। अंग्रेज सरकार में उनके कई खानदानी अहम पदों पर भी थे। आपके बडे़ भाई पं रामप्रसाद बिस्मिल के सहपाठी थे। यौवन आते ही जवानी ने मुल्क परस्ती का रंग दिखाना शुरू कर दिया। क्रांति की ओर कदम बढ़ाने के कारण आपकी पढ़ाई बिलकुल खत्म हो गई और देश सेवा के लिए सभी कामों को छोड़ दिया।" अशफ़ाक़ उल्ला खाँ बिस्मिल जी से बहुत प्रभावित थे तथा उनसे मित्रता कर क्रांतिकारी मार्ग पर अग्रसर होना चाहते थे। "गोरे रंग का हंसता झूमता, हट्टा-कट्टा सुन्दर सा यह नौजवान श्री बिस्मिल के साथ 1921 के आन्दोलन में स्कूल छोड़कर मैदान में कूद पड़ा। अनेक जिलों के गाँवों में पैदल घूम कर जनता को आज़ादी की जंग में शामिल होने का संदेश सुनाया।"

अशफ़ाक़ जब स्कूल में थे, तभी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को उन्होंने देखा था। क्रांति की ओर अशफ़ाक़ का झुकाव होने के कारण उन्होंने भी क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना चाहा। जब पं. रामप्रसाद बिस्मिल मैनपुरी षडयंत्र केस में आम माफी की घोषणा के पश्चात् शाहजहाँपुर आए तब वे आर्य समाज भवन शाहजहाँपुर में रहने लगे थे। बिस्मिल जी उस समय उत्तर भारत के शीर्षस्थ क्रांतिकारी थे। उनके पासबडे़-बडे़ क्रांतिकारी "देश को आज़ाद कराने के लिए क्रांति की नई रूपरेखा तैयार करते थे। उन दिनों शाहजहाँपुर में खन्नौत नदी के किनारे एक सभा के अन्त में बिस्मिल जी ने शेर पढ़ा-
बहे, बहरे फना में, जल्द, या खा लाश बिस्मिल की,
कि भूखी मछलियाँ हैं, जौहरे शमशीर कातिल की ।


बिस्मिल जी के व्यक्तित्व से प्रभावित अशफ़ाक़ उल्ला खां अपने स्कूली पढ़ाई के दौरान बिस्मिल जी से मिले भी परंतु बिस्मिल जी ने उन्हें नजर अंदाज कर दिया। बिस्मिल जी यह सोचते थे कि एक कट्टर मुसलमान युवक मेरे संपर्क में क्यों आना चाहता है? बिस्मिल जी कट्टर आर्यसमाजी थे। वहीं अशफ़ाक़ इस्लाम के पक्के पाबंद। बचपन में अशफ़ाक़ को उनके अध्यापक ने एक पुस्तक जो क्रांतिकारियों के जीवन के सम्बन्ध में थी, दी। उन्होंने उसे पढ़कर क्रांतिकारी आंदोलन को समझा। उनके अंदर देश भक्ति की भावना उत्पन्न हुई । "बिस्मिल के सम्पर्क में आते ही अशफ़ाक़ के अंदर का वतन परस्त खुलकर सामने आ गया और जल्दी ही उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से बिस्मिल के मन में जगह बना ली और वे अंग्रेज सरकार की नजरों में बिस्मिल के 'लेफ्टीनेंट' के रूप में पहचाने जाने लगे।" असहयोग आंदोलन में अशफ़ाक़ ने बिस्मिल जी के साथ प्राणपण से योगदान दिया था परंतु जब आंदोलन रुका, तब अशफ़ाक़ को गहरा धक्का लगा तत्पश्चात् अशफ़ाक़ ने बिस्मिल जी की ही भाँति ही क्रांति के पथ पर सक्रियता से कदम बढ़ाये। क्रांतिकारी इतिहास में अशफ़ाक़ का योगदान अभूतपुर्व है। बिस्मिल जी और अशफ़ाक़ की मित्रता इतनी गहरी थी कि सबको आश्चर्य होता था। इस जोड़ी ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भी उतना समर्पण दिखाया जितना इनकी मित्रता में था। क्रांतिकारी दल में अशफ़ाक़ को 'कुँवर जी' के नाम से पुकारते थे। असहयोग आंदोलन के समय से ही पुलिस अशफ़ाक़ के पीछे पड़ी थी। बिस्मिल जी के मित्र तथा सहयोगी होने के कारण पुलिस की नजरें इन पर बनी रहती थी। काकोरी षड्यंत्र में भाग लेने के पश्चात् अशफ़ाक़ फरार हो गये थे। 26 सितम्बर 1925 ई. में इनके नाम का वारण्ट भी निकला पर श्रीअशफ़ाक़ हाथ न आए। श्री अशफ़ाक़ पुलिस को चकमा देकर छिपे रहे। श्री अशफ़ाक़ को उनके मित्रों ने सलाह दी कि वे छुपकर अफगानिस्तान चले जायें लेकिन श्री अशफ़ाक़ ने इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि 'उनका काम देश में है, बाहर जाकर आराम करना उनका काम नहीं है।' अन्त में 8 सितम्बर, 1926 ई. को देहली में रहने वाले एक महान हिन्दी साहित्यिक, लौह लेखनी के धनी की विशेष दया से पुलिस ने उन्हें दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया। उधर शचीन्द्र नाथ बख्शी भागलपुर में गिरफ्तार हो गये। गिरफ्तारी के पश्चात् ब्रिटिश सरकार के गुर्गों ने अर्थात् पुलिस ने उन्हें मजहबी बातें कर देशद्रोही सिद्ध करने की कोशिश की, पर ब्रिटिश सरकार इसमें सफल न हो सकी। "काकोरी मुकदमें के इन्चार्ज तसद्दुक हुसैन डिप्टी सुपरिंटेंण्डेंट सी.आई.डी इम्पीरियल ब्रांच ने उनसे मिलकर कहा, "देखो अशफ़ाक़ तुम से हमारे कुछ खानदानी ताल्लुकात हैं। हम और तुम दोनों मुसलमान हैं। काफिर रामप्रसाद आर्यसमाजी है। हमारे मजहब का जानी दुश्मन है। वह मुल्क में हिन्दू राज कायम करना चाहता है, तुम पढ़े-लिखे समझदार हो, तुम्हें काफिर का साथ देकर मजहब को नुकसान न पहुँचाना चाहिए। पुलिस को सब मालूम हो चुका है। यह तो तुम्हें इतने दिनों मुकदमा चलने से मालूम ही हो चुका होगा। मेरा कहना मानकर जो कुछ बातें हो, वह साफ-साफ कह दो। उस काफिर रामप्रसाद की दोस्ती में अपने को तबाह न करो। गुस्से से श्री अशफ़ाक़ का चेहरा तमतमा उठा। आँखे लाल हो गयी। तेज सांस लेते हुए डपट कर उन्होंने कहा 'बस कीजिये जनाब! बहुत हो गया। मैं आपके मुँह से ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता। आइन्दा इनका दोहराना आपके हक में अच्छा न साबित होगा। पण्डित जी सच्चे हिन्दुस्तानी हैं। वे सबके लिये एक हुकुम देने वाली पंचायती सरकार हिन्दोस्तान में कायम करना चाहते हैं। मुल्क की गुलामी को तबाह करना चाहते हैं। वे किसी फिरकेवार सल्तनत के हामी नहीं है उन्हें तो ऐसी सल्तनत से दिली नफरत है और जैसा आप कहते हैं, वह भी बात सही होती तो भी मैं पण्डित जी का साथ जरूर देता। मेरी नजर में गैर मुल्क के रहने वालों की गुलामी से अपने मुल्क के रहने वाले भाईयों की मातहती कहीं ज्यादा बेहतर है।' खान साहब के होश गुम हो गये, अपना सा मुँह लेकर वे लौट गये।" पहली बार जब श्री अशफ़ाक़ का मजिस्ट्रेट सैयद अईनुद्दीन से सामना हुआ तो श्री अशफ़ाक़ ने उनसे प्रश्न पूछा कि 'मजिस्ट्रेट साहब आप मुझे पहचानते हैं? मैंने तो कई बार आपके दर्शन किये हैं। मजिस्ट्रेट साहब ने आश्चर्यजनक तरीके से पूछा, "आपने मुझे देखा! कब और कहाँ? हँसकर श्री अशफ़ाक़ ने उत्तर दिया, जबसे आपकी अदालत में काकोरी का मुकदमा शुरू हुआ है, तबसे मैं कई बार राजपूतानी वेश में आकर मुकदमा देखा करता था। अशफ़ाक़ उल्ला खाँ और शचीन्द्र नाथ बख्शी पर काकोरी रेल डकैती का पूरक मुकदमा चलाया गया। अदालत ने श्री अशफ़ाक़ को पं. रामप्रसाद बिस्मिल का लेफ्टीनेंट ठहराया और फाँसी की सजा सुनायी गयी। फैसला सुनने के पश्चात् श्री अशफ़ाक़ ने जज साहब का शुक्रिया अदा किया तथा अदालत से कहा कि 'इससे कम सजा मेरे लिये बाय-से तौहीन (अपमान जनक) है।" फैसले के दिन वे बसन्ती रंग के पहनावे में अदालत पहुँचे थे। अदालत के फैसले के पश्चात् उन्हें फैजाबाद जेल की काल कोठरी में रखा गया। श्री अशफ़ाक़ को "फाँसी के एक दिन पहले कुछ दोस्त मिलने गये। आज श्री अशफ़ाक़ को अपने कपड़े पहनने को मिल गए थे। उन्होंने नहा-धोकर बड़ी सफाई के साथ इन कपड़ों को पहना था। लोगों ने उन्हें बहुत ही खुश पाया। हँसते हुए उन्होंने अपने दोस्तों से कहा, "सुबह मेरी शादी है। कहो, दूल्हे में कोई फर्क तो नहीं पाते हो? यह कहकर वह बड़ी जोर से हँस पड़े। दोस्तों के होंठों पर भी मुस्कुराहट आ गयी, पर उनके दिल को उसी वक्त मालूम हुआ जैसे किसी ने बड़ी बेदर्दी के साथ मसल दिया हो। सुबह फाँसी पर चढ़ने वाला इस मस्ताने ढंग से हंसकर बातें कर रहा है, हंस रहा है, यह उसके लिये तो मुमकिन था पर उसके सच्चे दोस्तों के लिये उसका साथ देना बहुत मुश्किल था।" अशफ़ाक़ अपनी सजा के विरूद्ध माफी की प्रार्थना भी नहीं करना चाहते थे अपितु वे उन जुर्मों को भी स्वीकार कर रहे थे जो उन्होंने नहीं किए थे जिससे वे बिस्मिल जी को बचा सकते परन्तु ऐसा हो न सका। श्री अशफ़ाक़ से इसी विषय में जब कृपा शंकर हजेला जो उनके वकील थे पूछा कि 'ऐसा क्यों कर रहे हो।' तब श्री अशफ़ाक़ ने उत्तर दिया कि 'बिस्मिल हमारे नेता हैं हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते। उनका जिन्दा रहना देश की भलाई के लिये बहुत जरूरी है। बिस्मिल हमसे ज्यादा दिलो दिमाग तथा हौसलारखते हैं। जब काकोरी केस के चारों फाँसी की सजा प्राप्त अभियुक्तों की सजा कम करने हेतु अपीलें की जा रहीं थी तब उसी दौरान श्री अशफ़ाक़ के बड़े भाई रियासत उल्ला खां श्री गणेश शंकर विद्यार्थी से कानपुर में मिले। विद्यार्थी जी उस समय अत्यधिक बीमार थे, श्री अशफ़ाक़ की सजा के विषय में सुनकर बेहद दुःखी हुए। विद्यार्थी जी ने श्री अशफ़ाक़ के बड़े भाई को सलाह दी कि वकील कृपा शंकर हजेला से सरकार को तार दिलवा दीजिये, प्रिवी कौंसिल में अपील करेंगे। विद्यार्थी जी ने अपने आदमी के माध्यम से 1200/- रूपये मुकदमे के खर्च के लिये श्री रियासत उल्ला खां के पास शाहजहाँपुर भिजवाये लेकिन श्री रियासत उल्ला खां मुकदमे की फ़ीस जमा कर चुके थे अतः उन्होंने विद्ध्यार्थी जी के रूपये वापिस भिजवाने के साथ-साथ उन्हें धन्यवाद दिया। श्री अशफ़ाक़ ने अपने वकील कृपा शंकर हजेला से कहा कि "हजेला साहब मैं चाहता हूँ कि फाँसी के दिन यानी 19 दिसम्बर 1927 की सुबह को आप जेल में फाँसी के वक्त मेरे सामने मौजूद हों और देखें कि अशफ़ाक़ किस जाँनिसारी से फाँसी के फन्दे को चूमता है।"
अशफ़ाक़ उल्ला खां ने फैजाबाद जेल की काल कोठरी से एक पत्र अपनी माँ के नाम 13 दिसम्बर को लिखा तथा 16 दिसम्बर को एक पत्र अपने साथी क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ बख्शी की बड़ी बहन नलिनी को भी लिखा था। श्री अशफ़ाक़ उन्हें (नलिनी) को अपनी बहन मानते थे। नलिनी भी क्रान्तिकारी थीं। 'बनारस बम काण्ड में गिरफ्तार हुई थीं। वे बंगाल तथा उत्तर प्रदेश के क्रान्तिकारियों के मध्य कड़ी का काम करती थीं। उन्होंने तीन वर्ष का कारावास भी भोगा था। "19 दिसम्बर, 1927 को प्रातः 6 बजे वे (अशफ़ाक़) फैज़ाबाद जेल में फाँसी घर की ओर चल दिये। सुंदर घुंघराले लम्बे बाल पीछे की ओर लटक रहे थे। साफ सुथरे कुर्ते के ऊपर 'कुरान शरीफ' का बस्ता लटक रहा था और जुबान से 'कुरान' की आयतें पढ़ी जा रही थीं। सीढ़ियाँ चढ़कर फांसी के फन्दे के पा पहुँचे। रस्सी को चूम कर उन्होंने कहा, "मेरे हाथ कभी इन्सानी खून से नहीं रंगे गए जो इल्जाम मेरे ऊपर लगाया है वह गलत है। मेरा इन्साफ खुदा के यहाँ होगा।" फन्दा ले में पढ़ा। श्री अशफ़ाक़ ने शेर पढ़ा -
तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से।
चल दिये सूये अदम जिंदाने - फैजाबाद से।।
फना है सबके लिये हम कुछ पे नहीं मौकूफ।
बका है एक फकत जात किब्रिया के लिये।।

इशारा हुआ। जल्लाद ने हत्था खींचा था। श्री अशफ़ाक़ का शरीर रस्सी में झूल गया।" बहुत मुश्किल से श्री अशफ़ाक़ का शरीर शाहजहाँपुर ले जाने की आज्ञा मिली। "ट्रेन से उनका शरीर फैजाबाद से शाहजहाँपुर लाया गया। लखनऊ स्टेशन पर गणेश शंकर विद्यार्थी जी सहित भारी जनसमूह ने डिब्बे में रखे उनके शव पर श्रद्धासुमन अर्पित किए और उनकी लाश को डिब्बे से उतार कर फोटो खिंचवाया गया। इसके बाद शाहजहाँपुर में उनके घर के सामने वाले मुहल्ले के बगीचे (अब अशफ़ाक़ नगर) में दफन कर दिए गए। हजारों अश्रुपूरित नेत्रों ने भारत माँ के उस बेटे को श्रद्धाँजलि दी जो हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश देकर मादरे वतन की आजादी की खातिर फाँसी के तख्ते पर झूल गया।" "श्री अशफ़ाक़ एक जिंदा दिल शायर थे। 'हसरत' के नाम से शायरी लिखते थे। उनकी कुछ चीज नीचे दे रहे हैं-
यूं ही लिखा था किसमत में चमन पैराये आलम ने,
कि फस्ले गुल में गुलशन छूट कर है कैद जिन्दा की।
तनहाइये गुर्बत से मायूस न हो 'हसरत'
कब तक खबर न लेंगे याराने वतन तेरी।
बर्जुमें आरजू पै जिस कदर चाहे सजा दे लें,
मुझे खुद ख्वाहिशे ताजीर है मुल्जिम हूँ इकरारी।
कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रखदे कोई जरा सी, खाके वतन कफन में।।
ऐ पुख्ताकार-उल्फत, हुशियार! डिग न जाना,
मेराज आशंका है इस दार औ, रसन में,
सैयाद जुल्म पेशा आया है जब से 'हसरत'
हैं बुलबुले कफस में जागो जगन चमन में।
न कोई इंग्लिश, न कोई जर्मन,
न कोई रशियन, न कोई तुर्की।
मिटाने वाले हैं अपने हिन्दी,
जो आज हमको मिटा रहे हैं।।
जिसे फना वह समझ रहे हैं,
बका का राज इसमें मजमिर।
नहीं मिटाने से मिट सकेंगे,
वह लाख हमको मिटा रहे हैं।
खामोश 'हसरत' खामोश 'हसरत'
अगर है जज्बा वतन का दिल में।
सजा को पहुचेंगे अपनी बेशक।
जो आज हमको सता रहे हैं।।
बुजदिलों ही को सदा मौत से डरते देखा,
गोकि सौ बार उन्हें रोज ही मरते देखा।
मौत से वीर को हमने नहीं डरते देखा।
तख्तये मौत पे भी खेल को करते देखा।
मौत एक बार जब आना है तो डरना क्या है।
हम सदा खेल ही समझा किये मारना क्या है।।
वतन हमेशा रहे शाद काम और आजाद।
हमारी क्या है अगर हम रहे, रहे न रहे।।

फाँसी के पहले उन्होंने देश के नाम यह सन्देश दिया था:-
'भारतमाता के रंग-मंच पर हम अपना पार्ट अदा कर चुके। गलत या सही हमने जो कुछ किया, आजादी हासिल करने की भावना से प्रेरित होकर किया। हमारे अपने हमारी निंदा करें या प्रशंसा, पर हमारे दुश्मनों तक को हमारे साहस और वीरताकी प्रशंसा करनी पड़ी है। लोग कहते हैं, हम मुल्क में आतंक फैलाना चाहते थे, यह गलत है। इतने लम्बे अर्से तक मुकदमा चला, हममें से बहुत से बहुत दिनों इस मौके पर आजाद रहे और आज भी कुछ आजाद है, फिर भी हमने या हमारे किसी साथी ने किसी, अपने नुकसान पहुँचाने वाले पर गोली नहीं चलाई। हमारा यह उद्देश्य नहीं था। हम तो आजादी हासिल करने के लिये मुल्क में क्रांति कराना चाहते थे।

"जजों ने हमें निर्दय, बर्बर, मानव कलंक आदि नामों से याद किया है। हमारे शासकों की कौम के जनरल डायर ने निहत्थों पर गोलियाँ चलायी थीं और चलायी थीं स्त्री, पुरूष, बच्चे और बूढ़ों तक पर। न्याय के इन ठेकेदारों ने अपने इन भाई-बन्दों को किन विशेषणों से सम्बोधित किया है? फिर हमारे ही साथ ऐसा सलूक क्यों?हिन्दुस्तानी भाईयों! आप चाहे जिस मजहब या फिरके के मानने वाले हों, मुल्क के काम में साथ दीजिये। व्यर्थ में आपस में न लड़िए। रास्ते चाहे अलग हों, पर लक्ष्य सबका एक है सब धर्म एक ही लक्ष्य की पूर्ति के साधन है। फिर यह व्यर्थ के टण्टे-झगड़े क्यों? एक होकर आप मुल्क की नौकरशाही का सामना कीजिये और अपने मुल्क को आजाद बनाइये। मुल्क के सात करोड़ मुसलमानों में मैं पहला मुसलमान हूँ जो मुल्क की आजादी के लिये फाँसी चढ़ रहा हूँ। यह सोचकर मुझे फक्र होता है अन्त में मेरा सबको सलाम! हिन्दोस्तान आजाद हो। मेरे भाई खुश रहे!" श्री अशफ़ाक़ की यही इच्छा थी कि सभी देशवासी हिन्दू-मुसलमान का भेदभाव त्यागकर श्री अशफ़ाक़ तथा पं. रामप्रसाद बिस्मिल की भांति अंग्रेजी साम्राज्य का सामना करें।

श्री अशफ़ाक़ की फांसी के पश्चात् उनके भाई ने उनकी कब्र कच्ची बनवा दी। विद्यार्थी जी के भेजे पैसों से उनके भाई ने कब्र पुख्ता कर दी परन्तु मकबरा अभी तक न बन सका। श्री अशफ़ाक़ के बड़े भाई स्व. रियासत उल्ला खाँ ने अपने जीवन काल में संस्मरण लिखा था उसमें श्री अशफ़ाक़ का मकबरा न बन पाने पर शोक तथा विद्यार्थी जी के सहयोग का वर्णन करते हुये लिखते हैं कि, विद्यार्थी जीे ने "मुझसे कहा कि कब्र कच्ची बनवा देना। हम पुख्ता करा देंगे और उनका मकबरा हम ऐसाबनावाऐंगे कि जिसका नजीर यू.पी. में न होगी। लेकिन अफसोस कि मकबरा बनाने से पेशतर वे खुद ही शहीद हो गये लेकिन मोहनलाल सक्सेना वकील के जरिए उन्होंने 200 रूपये भेजे थे जिससे मैंने कब्र पुख्ता करा दी। मकबरा उनका आज तक न बन सका।

एक महीने के बाद उनका खत मेरे पास आया कि आप राजा मोती चन्द बनारस के पास चले जाएँ, वह 100 रूपये महावार और खाना देंगे, आप उनकी हिफाजत जान की तरह करते रहें और कोई काम न होगा लेकिन अशफ़ाक़ को शहीद हुए कुछ ही दिन गुजरे थे, मेरी माता ने मुझको जाने न दिया। मैंने गणेश शंकर जी को लिखा कि अभी ताजा जख्म हैं, वालिदा रोकती हैं। विद्यार्थी जी ने मुझको जवाब दिया "अच्छा हम दूसरा इन्तजाम करेंगे और आप कतई परेशान न हो, हम आपके खानदान की मद्द करेंगे और ख्याल करेंगे।" श्री अशफ़ाक़ ने अपनी फाँसी से एक दिन पहले एक पत्र श्री गणेश शंकर विद्यार्थी को लिखा जिसमें उन्हांेने कहा था कि 19 दिसम्बर को लखनऊ स्टेशन पर दो बजे आखिरी मुलाकात जरूर कीजियेगा और मेरे भाई तबाह व बर्बाद हो चुके हैं। मेरी क़ब्र पुख्ता बनाने का इंतजाम करें तथा मेरे परिवार का ख्याल रखें। विद्यार्थी जी ने अशफ़ाक़ की इच्छा पूरी की तथा जब तक जीवित रहे, श्री अशफ़ाक़ के भाईयों का ख्याल रखा। विद्यार्थी जी, बिस्मिल जी तथा श्री अशफ़ाक़ को बहुत चाहते थे तथा उन्होंने दोनों के ही परिवार की बहुत सहायता की।


Share:

कोई टिप्पणी नहीं: