खांसी की आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा



खांसी की समस्या प्रायः हर मौसम में होने की सम्भावना होती है किंतु ठंड में अधि‍क होती है।  यह कई अन्य बीमारियों की जड़ भी हो सकती है। अगर खांसी का उपचार समय पर नहीं किया गया तो यह कई बीमारियां दे सकती हैं। यदि उपचार के बाद भी खांसी जल्दी ठीक न हो तो इसे मामूली बिल्कुल न समझें। आयुर्वेद में खांसी को कास रोग भी कहा जाता है। खांसी होने ये पहले रोगी को गले में खरखरापन, खराश, खुजली आदि होती है और गले में कुछ भरा हुआ-सा महसूस होता है। कभी-कभी मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है।

खांसी की आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा

खांसी के प्रकार
  1.  कफज खांसी : कफ के कारण होने वाली खांसी में कफ बहुत निकलता है। इसमें जरा-सा खांसते ही कफ आसानी से निकल आता है। कफज खांसी के लक्षणों में गले व मुंह का कफ से बार-बार भर जाना, सिर में भारीपन व दर्द होना, शरीर में भारीपन व आलस्य, मुंह का स्वाद खराब होना, भोजन में अरुचि और भूख में कमी के साथ ही गले में खराश व खुजली और खांसने पर बार-बार गाढ़ा व चीठा कफ निकलना शामिल है।
  2. क्षतज खांसी : यह खांसी वात, पित्त, कफ, तीनों कारणों से होती है और तीनों से अधिक गंभीर भी। अधि‍क भोग-विलास (मैथुन) करने, भारी-भरकम बोझा उठाने, बहुत ज्यादा चलने, लड़ाई-झगड़ा करते रहने और बलपूर्वक किसी वस्तु की गति को रोकने आदि से रूक्ष शरीर वाले व्यक्ति के गले में घाव हो जाते हैं और खांसी हो जाती है।इस तरह की खांसी में पहले सूखी खांसी होती है, फिर रक्त के साथ कफ निकलता है।
  3. क्षयज खांसी : यह खांसी क्षतज खांसी से भी अधिक गंभीर, तकलीफदेह और हानिकारक होती है। गलत खानपान, बहुत अधि‍क भोग-विलास, घृणा और शोक के के कारण शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है और इनके कारण कफ के साथ खांसी हो जाती है। इस तरह की खांसी में शरीर में दर्द, बुखार, गर्माहट होती है और कभी-कभी कमजोरी भी हो जाती है। ऐसे में सूखी खांसी चलती है, खांसी के साथ पस और खून के साथ बलगम निकलता है। क्षयज खांसी विशेष तौर से टीबी यानि (तपेदिक) रोग की प्रारंभिक अवस्था हो सकती है, इसलिए इसे अनदेखा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।
  4. पित्तज खांसी : पित्त के कारण होने वाली खांसी में कफ निकलता है, जो कि पीले रंग का कड़वा होता है। वमन द्वारा पीला व कड़वा पित्त निकलना, मुंह से गर्म बफारे निकलना, गले, छाती व पेट में जलन होना, मुंह सूखना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना, प्यास लगती रहना, शरीर में गर्माहट या जलने का अनुभव होना और खांसी चलना, पित्तज खांसी के प्रमुख लक्षण हैं।
  5. वातज खांसी : वात के कारण होने वाली खांसी में कफ सूख जाता है, इसलिए इसमें कफ बहुत कम निकलता है या निकलता ही नहीं है। कफ न निकल पाने के कारण, खांसी लगातार और तेजी से आती है, ताकि कफ निकल जाए। इस तरह की खांसी में पेट, पसली, आंतों, छाती, कनपटी, गले और सिर में दर्द भी होने लगता है।
एलोपैथिक चिकित्सा के अनुसार निम्न कारणों से होती है-
  1. प्लूरा के रोग, प्लूरिसी, एमपायमा आदि रोग होने से खांसी होती है।
  2. फुफ्फुस के रोग, जैसे तपेदिक (टीबी), निमोनिया, ट्रॉपिकल एओसिनोफीलिया आदि से खांसी होती है।
  3. श्वसन नली के ऊपरी भाग में टांसिलाइटिस, लेरिन्जाइटिस, फेरिन्जाइटिस, सायनस का संक्रमण, ट्रेकियाइटिस तथा यूव्यूला का लम्बा हो जाना आदि से खांसी होती है।
  4. श्वसनी (ब्रोंकाई) में ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकियेक्टेसिस आदि होने से खांसी होती है।
खांसी की आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा
  1. अगर आप खांसी से परेशान हैं तो अदरक का जूस पीएं। इसमें शहद मिला कर आप इसका और ज्यादा फायदा उठा सकते हैं।
  2. अगर खांसी के साथ बलगम भी है तो आधा चम्मच काली मिर्च को देसी घी के साथ मिलाकर खाएं। आराम मिलेगा।
  3. अडूसा के पत्तों के रस (6 मि.ली.) को शहद (4मि.ली.) में मिलाकर पीने से भी खांसी और गले की खराश से राहत मिलती है।
  4. अदरक के रस में तुलसी मिलाएं और इसका सेवन करें। इसमें शहद भी मिलाया जा सकता है।
  5. अदरक को छोटे टुकड़ों में काटें और उसमें नमक मिलाएं। इसे खा लें। इसके रस से आपका गला खुल जाएगा और नमक से कीटाणु मर जाएंगे।
  6. अनार का रस भी खांसी से राहत दिलाता है। लेकिन इसके लिए आपको सिर्फ अनार का नहीं, इसमें जरा सा पिपली पाउडर और अदरक भी डालना होगा।
  7. अनार के जूस में थोडा अदरक और पिपली का पाउडर डालने से खांसी को आराम मिलता है।
  8. अपनी चाय में अदरक, तुलसी, काली मिर्च मिला कर चाय का सेवन कीजिए। इन तीनों तत्वों के सेवन से खांसी-जुकाम में काफी राहत मिलती है।
  9. अलसी के बीजों को मोटा होने तक उबालें और उसमें नीबू का रस और शहद भी मिलाएं और इसका सेवन करें। जुकाम और खांसी से आराम मिलेगा।
  10. आंवला खांसी के लिए काफी असरकारी माना जाता है। आंवला में विटामिन-सी होता है, जो ब्लड सरकुलेश को बेहतर बनाता है। अपने खाने में आंवला शामिल कर आप एंटी-ऑक्सीडेंट्स का सोर्स बढ़ा सकते हैं। यह आपकी इम्यूनिटी को मजबूत करेगा।
  11. आंवला में प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी पाया जाता है जो खून के संचार को बेहतर करता है और इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी होते हैं जो आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा करता है।
  12. आधा चम्मच शहद में एक चुटकी इलायची और कुछ नीबू का जूस डालें। इस मिश्रण को दिन में दो से तीन बार लें। यह घरेलू नुस्खा खांसी की रामबाण दवा साबित हो सकता है।
  13. खांसी की अंग्रेजी दवा तो बहुत से लोग लेते हैं, लेकिन उसे लेने से नींद आने लगती है और उसके साइड इफेक्ट भी बहुत हैं। इसकी जगह आप हल्दी वाला दूध ले सकते हैं। हल्दी वाले दूध एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इसके अलावा हल्दी में एंटी वायरल और एंटी बैक्टीरियल गुण भी होते हैं, जो संक्रमण से लड़ने में मददगार होते हैं। तो खांसी की दवा के तौर पर आप हल्दी वाले दूध का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  14. खांसी की असरकारी दवा के तौर पर आप गर्म पानी और नमक का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आप गर्म पानी में चुटकी भर नमक डालकर उससे गरारे कर सकते हैं। ऐसा करने से आपको खांसी से हुए गले के दर्द से राहत मिलेगी।
  15. खांसी के साथ अक्सर बलगम भी हो जाती है। यह बेचैनी और दर्द पैदा करती है। इससे बचने के लिए आप काली मिर्च को देसी घी में मिलकार ले सकते हैं। राहत महसूस होगी।
  16. गर्म पानी में चुटकी भर नमक मिला कर गरारे करने से खांसी-जुकाम के दौरान काफी राहत मिलती है। इससे गले को राहत मिलती है और खांसी से भी आराम मिलता है। यह भी काफी पुराना नुस्खा है।
  17. गले में खराश या ड्राई कफ होने पर अदरक के पेस्ट में गुड़ और घी मिलाकर खाएं।
  18. जितना हो सके गर्म पानी पिएं। आपके गले में जमा कफ खुलेगा और आप सुधार महसूस करेंगे।
  19. जुकाम और खांसी के उपचार के लिए आप गेहूं की भूसी का भी प्रयोग कर सकते हैं। 10 ग्राम गेहूं की भूसी, पांच लौंग और कुछ नमक लेकर पानी में मिलाकर इसे उबाल लें और इसका काढ़ा बनाएं। इसका एक कप काढ़ा पीने से आपको तुरंत आराम मिलेगा। हालांकि जुकाम आमतौर पर हल्का-फुल्का ही होता है जिसके लक्षण एक हफ्ते या इससे कम समय के लिए रहते हैं। गेंहू की भूसी का प्रयोग करने से आपको तकलीफ से निजात मिलेगी।
  20. जैसा कि हम बता चुके हैं अदरक और नमक दोनों ही खांसी में गले के दर्द से राहत दिलाते हैं। तो अगर दोनों को एकसाथ खाया जाए तो यह और भी फायदेमंद साबित होंगी। आपको करना बस यह है कि अदरक के टुकड़ों पर नमक लगा कर खाना है।
  21. तुलसी के साथ शहद हर दो घंटे में खाएं। कफ से छुटकारा मिलेगा।
  22. नहाते समय शरीर पर नमक रगड़ने से भी जुकाम या नाक बहना बंद हो जाता है।
  23. नाक बह रही हो तो काली मिर्च, अदरक, तुलसी को शहद में मिलाकर दिन में तीन बार लें। नाक बहना रुक जाएगा।
  24. बचपन में सर्दियों में नानी-दादी घर के बच्चों को सर्दी के मौसम में रोज हल्दी वाला दूध पीने के लिए देती थी। हल्दी वाला दूध जुकाम में काफी फायदेमंद होता है क्योंकि हल्दी में एंटीआक्सीडेंट्स होते हैं जो कीटाणुओं से हमारी रक्षा करते हैं। रात को सोने से पहले इसे पीने से तेजी से आराम पहुचता है. हल्दी में एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल प्रॉपर्टीज मौजूद रहती है जो की इन्फेक्शन से लडती है. इसकी एंटी इंफ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज सर्दी, खांसी और जुकाम के लक्षणों में आराम पहुंचाती है।
  25. ब्रैंडी तो पहले ही शरीर गर्म करने के लिए जानी जाती है। इसके साथ शहद मिक्स करने से जुकाम पर काफी असर होगा।
  26. लगभग 2 कप पानी में अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े और कुछ इमली की कुछ पत्तियां डालें और तब तक उबालें जब तक कि ये एक कप न रह जाए। इसमें 4 चम्मच शक्कर ड़ालकर धीमी आंच पर कुछ देर और उबालें, फिर ठंडा होने दें। ठंडा होने पर इसमें 10 बूंद नीबू रस की डाल दें। हर तीन घंटे में इस सिरप का एक बार सेवन करने से खांसी छू-मंतर हो जाती है।
  27. लहसुन को घी में भून लें और गर्म-गर्म ही खा लें। यह स्वाद में खराब हो सकता है लेकिन स्वास्थ्य के लिए एकदम शानदार है।
  28. लहसुन भी खांसी से राहत दिलाने में कारगर है। इसके लिए आपको लहसुन को घी में भून कर गर्मागरम खाना होगा।
  29. खांसी से परेशान हैं तो गर्म पानी पिएं। यह गले में जमे कफ को कम करने में मदद करेगा।
  30. समान मात्रा में शहद और कच्चे प्याज का रस (लगभग एक चम्मच) मिलाकर 3 से 4 घंटे के लिये किसी अंधेरे स्थान पर रख दें और बाद में इसका सेवन करें। यह खांसी की दवाई के रूप में सटीक कार्यकरता है।
  31. खांसी-जुकाम में गाजर का जूस काफी फायदेमंद होता है लेकिन बर्फ के साथ इसका सेवन न करें।
  32. सूप, चाय, गर्म पानी का सेवन करें और ठंडा पानी, मसालेदार खाना आदि से परहेज करें।


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बाबा नागार्जुन की काव्य-यात्रा एवं काव्य-भूमि





नागार्जुन की काव्य-यात्रा

प्रख्यात कवि-कथाकार के रूप में चर्चित नागार्जुन का पूरा नाम श्री वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' 'नागार्जुन' है। 1911 ई. की ज्येष्ठ पूर्णिमा को जन्मे नागार्जुन का मूल निवास स्थान तरौनी, जिला दरभंगा, बिहार है। उन्होंने परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार स्वभाव से आवेगशील, लेकिन गंभीर भी थे। ये राजनीति और जनता के मुक्ति-संघर्षों में सक्रिय एवं रचनात्मक हिस्सेदारी के प्रति सजग थे। हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली, संस्कृत और बँगला में भी आपने उपयोगी काव्य-रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। संस्कृत और मैथिली में ये 'यात्री' नाम से कविताएँ लिखते थे।

कालिदास और नागार्जुन, दोनों महाकवि इस देश के अद्भुत घुमक्कड़ कवि हैं। तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी-बड़ी कई झीलें देखकर दोनों यात्री कवियों ने निज के ही उन्माद-गीत लिखे हैं। प्रकृति के कवि या तो जीवन से क्षेत्रन्यास ले लेते हैं या व्यक्तिवाद के हित में ललित लोकायतन बनाकर जन-जीवन से ही दूर हो जाते हैं। 'सोज़े वतन' के प्रेमचंद और नागार्जुन किसान भारतवर्ष के ऐसे अनूठे रचनाकार हैं, जो व्यापक और ठोस दबी हुई दूब का रूपक बन चुके हैं। मैथिली काव्य-संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी कविता के लिए मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'मैथिलीशरण गुप्त' सम्मान तथा संपूर्ण साहित्य-साधना के लिए उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 'भारत-भारती' पुरस्कार एवं बिहार सरकार के शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया।

नागार्जुन की कविताओं को पढ़-सुनकर कोई भी सहज ही आज़ादी के आर-पार के भारतीय जन-इतिहास से परिचित हो सकता है। ये इस देश के मनुष्यों की संपूर्ण गतिविधियों में शरीक रचनाएँ हैं। एक ऐसे रचनाकार की रचनाएँ, जो हमेशा अपने समय, उस समय के बीच घटती राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक घटनाओं तथा हादसों के रू-ब-रू खड़ा है। उनकी नज़र से कोई चीज़ छूटती नहीं।

युगधारा— 'युगधारा' नागार्जुन जी का पहला काव्य-संकलन है। 'निराला' जी की 'अनामिका' जिस तरह आधुनिक कविता का श्रेष्ठतम संकलन है, उसी तरह नागार्जुन जी की 'युगधारा' पक्षधर कविता का आधार निर्मित करने वाला विशिष्ट संकलन रहा है। निराला और नागार्जुन, दोनों किसान और नारी की मुक्ति की प्रगतिशील भूमिका पर ज़ोर देने वाले महाकवि हैं। दोनों महाकवियों ने देश के 'तुच्छ से तुच्छ जन' की जीवनी पर कहानी, काव्य-रूपक और गीत लिखे हैं। दोनों महाकवि कभी साधारण जनों से अलहदा नहीं हुए।

प्रकाशचन्द्र गुप्त ने 'युगधारा' संग्रह के संबंध में लिखा है कि— "नागार्जुन नई पीढ़ी के कवियों में अपना विशेष स्थान रखते हैं। 'नागार्जुन' और 'सुमन' के समान कवियों का विकास हिन्दी कविता के भविष्य का निर्णायक होगा। नागार्जुन दो शैलियों में कविता करते रहे हैं। एक शैली संस्कृत की पदावली से मोह रखती है, दूसरी में वे जन-गीतों की परंपरा अपनाते हैं। 'युगधारा' में पहली श्रेणी की कविताएँ ही अधिक हैं, किन्तु दोनों शैलियों के बीच कोई सुस्पष्ट रेखा भी नहीं है।

ये कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय हो चुकी हैं। इन्हें एक स्थान पर एकत्र पाकर पाठक कृतज्ञ होंगे। नागार्जुन ने जन-ज्वाला को अपने काव्य का आभूषण बनाया है। उनकी रचनाएँ जन-संघर्षों को बल देती हैं। हमें आशा है कि इस संग्रह का हिन्दी में अभूतपूर्व स्वागत होगा और नागार्जुन की वाणी की शक्ति दिन-दूनी, रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी कविता और जनता की अभिलाषाओं-आकांक्षाओं दोनों के लिए यह शुभ होगा।"

'रवि ठाकुर' कविता में नागार्जुन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर से यह आशीष माँगते हैं— "मन मेरा स्थिर हो। नहीं लौटूँ, चिर चलूँ, कैसा भी तिमिर हो। प्रलोभन में पड़कर बदलूँ नहीं रुख।" यही आज तक की प्रगतिशील कविता की उद्बोधन-दृष्टि रही है। 'पक्षधर' कविता और 'युगधारा' आज की कविता का पर्यायवाची दस्तावेज़ बन चुके हैं। हिन्दी में 'युगधारा' और नागार्जुन मानवीय इतिहास के आधार-स्तंभ हैं। हिन्दी की जातीय चेतना यूरोप, एशिया, अमेरिका या अफ्रीका अर्थात तीसरी दुनिया की जनता के सर्वाधिकार की कविता है। नागार्जुन अपराजेय किसान-कवि हैं। 'युगधारा' उसी जनकवि का प्रथम संकलन है।

"इस संकलन में आई रचनाओं के संबंध में कुछ सूचनाएँ अति आवश्यक हैं— सन् 1943 तक कवि 'यात्री' नाम से लिखते रहे। 'रवि ठाकुर' और 'बादल को घिरते देखा है' रचनाओं के साथ रचयिता का यही नाम छपा था। उसके बाद 'यात्री' का नाम हमें मैथिली साहित्य में कवि और कथाकार के रूप में अब भी प्राप्त होता है। 'नागार्जुन' का नाम हिन्दी-जगत में और 'यात्री' का नाम मैथिली-जगत में प्रख्यात है— दोनों वास्तव में एक ही व्यक्ति की अभिधाएँ हैं।"

प्रत्यक्ष राजनीति की वामपक्षी प्रवृत्तियों ने नागार्जुन को जनसाधारण से संयुक्त कर दिया, फिर वे आसान से आसान भाषा में लिखने लगे। फिर भी मुक्तछंद और अतुकांत शैलियों को उन्होंने तिलांजलि नहीं दी। दोहा, चौपाई, रोला, छप्पय, नचारी, सोहर और पद्यबद्ध कथक शैली— अभिव्यक्ति के लिए वे कोई भी लोकप्रिय छंद अपनाने को तैयार रहते हैं। खेद की बात है कि इस प्रकार की कोई रचना इस संकलन में प्रकाशित नहीं है।

शोषित और पीड़ित वर्गों के प्रति कवि की सहानुभूति कृत्रिम नहीं है। उनका जन्म नितांत दरिद्र कुल में हुआ। गरीबी के कारण उन्होंने स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा। मूर्ख रह जाने की विभीषिका ने संस्कृत पढ़ने के विकल्प को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आज भी उनका कोई निश्चित काम नहीं है। मानो फटीचरी ही नागार्जुन की जीवन-सहचरी रही हो। अपनी मैथिली रचनाओं के कुछ रूपांतर वे इस संकलन में डालना चाहते थे, परंतु पुस्तक का कलेवर अधिक न फूलाने के हमारे मनोभाव को जानकर कवि इस ओर से निर्लिप्त हो गए। दूसरे संकलन में उनकी मैथिली रचनाओं के रूपांतर पर्याप्त मात्रा में संकलित हैं।

इस संकलन की कोई भी रचना अप्रकाशित नहीं है। समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं ने इन्हें छापा है। इनमें से कुछ रचनाएँ बार-बार पूरी की पूरी उद्धृत की जाती रही हैं ('बादल को घिरते देखा है', 'रवि ठाकुर' आदि)। गांधी जी की हत्या के अगले ही दिन प्रकाशित 'तर्पण' को अठारह पत्र-पत्रिकाओं ने स्वयं छापा था, जबकि 'शपथ' को ग्यारह पत्र-पत्रिकाओं ने पूर्णतः या अंशतः प्रकाशित किया था। सांप्रदायिकता के विरुद्ध कवि की यह उद्दीप्त ललकार बिहार सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकी थी। गांधी जी की मृत्यु के संबंध में नागार्जुन की चार रचनाएँ— 'तर्पण', 'मत क्षमा करो', 'गोडसे' और 'शपथ'— प्रकाशित हुई थीं।

इस संग्रह की प्रारम्भिक कविता 'जन-वंदना' में उन्होंने आम जन-जीवन का गुणगान करते हुए यह उद्घोषित करना चाहा है कि जनता में असीम शक्तियाँ निवास करती हैं, जिन्हें पहचानने की आवश्यकता है—

"हे कोटिशीर्ष, हे कोटिबाहु, हे कोटिचरण!
युग की लक्ष्मी, भव की विभूति कर रही तुम्हारा
स्वयं वरण।
तुम महिमामंडित परम्पराओं के वाहन,
तुम साधारण, तुम निर्विशेष।"

'भिक्षुणी' कविता में नारी-जीवन के अन्तर्द्वन्द्व को बड़ी सहजता लेकिन मार्मिकता के साथ नागार्जुन ने प्रस्तुत किया है। बौद्ध धर्म के प्रभाव से परिपूर्ण इस कविता में उन्होंने तत्कालीन परिवेश और महिलाओं की स्थिति का तार्किक वर्णन किया है। वे लिखते हैं—

"बैठ गई भिक्षुणी टेककर घुटने,
तीन बार उसने
सादर प्रणाम किया
झुक-झुक अमिताभ को।
फिर उठ खड़ी हुई, चारों ओर देखा,
हतप्रभ-सी, मानो शिशिर-शशिलेखा।"

इसी क्रम में आपकी 'पाषाणी' कविता का उल्लेख मिलता है, जहाँ महर्षि गौतम के श्राप से अभिशप्त उनकी पत्नी अहिल्या का कारुणिक वर्णन मिलता है—

"गौतम-दार, अहल्या मेरा नाम,
यहीं-कहीं होंगे मुनि भी, हे राम!
दिया उन्होंने मुझको यह अभिशाप—
'परनर-दूषित, पुंश्चली, तेरी देह
हो जाए निस्पंद, कुलिश-पाषाण!'"

नागार्जुन की कविता 'चन्दना' एक प्रकार की कथात्मक कविता का उदाहरण प्रस्तुत करती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नारी की दयनीय स्थिति, नारी के उत्थान के प्रति प्रयास तथा सामान्य और संभ्रांत वर्ग के भाव— यही विशेषताएँ इस कविता को ऊँचा उठाती हैं। बच्चों के क्रय-विक्रय, दास-प्रथा और बाल-श्रम जैसी कुप्रथाओं का चित्रण इस कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है। यहाँ एक अन्य समस्या भी दृष्टिगत होती है कि महिलाएँ ही महिलाओं की सबसे बड़ी शत्रु साबित होती हैं। चन्दना के पालन-पोषण को लेकर धनावह सेठ बड़े उत्साहित और आशावान हैं। वह उसे अपनी पुत्री-सदृश देखते हैं, लेकिन सेठानी को इसमें छल और भावी आशंका दिखाई देती है—

"ऊँट का आरोही
ले गया लड़की को
हाट में बेचने।
सबल, स्वस्थ, सुन्दर, फुर्तीले, स्वामिभक्त
बिकते थे जहाँ हजारों दास-दासीजन।
सुस्मित, प्रियदर्शन
आठ-नौ बरस की
कुमारी बसुमति।
देखते ही उसको तत्क्षण खरीद लिया
धनावह सेठ ने मुँह-माँगे दाम पर,
ले जाकर घर में सेठानी को सौंप दिया।"

खिचड़ी विप्लव देखा हमने

प्रस्तुत संग्रह में उनकी आठवें दशक में लिखी कविताएँ संकलित हैं। यह आठवाँ दशक हमारे देश के इतिहास में व्यापक हलचलों, आंदोलनों, टकरावों, सत्ता-परिवर्तनों, दमन, जुर्म और उनके प्रतिरोधों के महत्त्वपूर्ण वर्षों का काल रहा है। इस सबका नागार्जुन से बेहतर गवाह कौन हो सकता है, क्योंकि वे स्वयं इस सबके बीच रहे। इन कविताओं में यह सम्पूर्ण इतिहास एक नए रचनात्मक तेवर में मूर्त हुआ है। ये कविताएँ स्वयं में भारतीय जन-मन में हो रही सुगबुगाहट का दस्तावेज भी हैं, तो आंदोलन की ललकार भी; संघर्ष के बीच की लय और ताल भी हैं, तो स्थापित व्यवस्था पर आक्रमण भी; और साथ ही विकल्प के रूप में उभरती राजनीति से मोहभंग भी। लेकिन इससे भी बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये कविताएँ आम शोषित, पीड़ित और उपेक्षित जन-गण के पक्ष में लिखी गई हैं— वस्तु और रूप, सब कुछ का चुनाव उसी के तहत हुआ है।

"नागार्जुन संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए— जयप्रकाश नारायण और रेणु के साथ। लालू यादव से उनकी प्रगाढ़ता उसी समय हुई होगी। आपातकाल में जेल गए। फिर छूट आए। संपूर्ण क्रांति से मोहभंग हुआ। मोहभंग क्यों हुआ, संपूर्ण क्रांति के समर्थक दलों का वर्ग-चरित्र क्या था— इस सबका प्रभाव नागार्जुन पर जेल में पड़ा होगा। उस दौर में लिखी कविताओं के संकलन का नाम है— 'खिचड़ी विप्लव'।"

इस संग्रह की एक प्रसिद्ध कविता 'जयप्रकाश पर पड़ी लाठियाँ लोकतंत्र की' उस समय के समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पर केन्द्रित है, जिसमें कवि ने बड़ी बेबाकी से तत्कालीन परिस्थितियों का यथार्थ वर्णन किया है—

"एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या?
बर्बरता के भोग चढ़ेगा योगी अब क्या?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की!
जयप्रकाश पर पड़ी लाठियाँ लोकतंत्र की!"

नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी कहते हैं—

"नागार्जुन का कृतित्व ही नहीं, उनका व्यक्तित्व भी कालजयी है। नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग, जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ बच्चे हैं। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है, वे सूची को और आगे बढ़ाएँगे। अपनी एक कविता में वे कालिदास से जवाब-तलब करते हैं— 'कालिदास सच-सच बतलाना...'। उनका जीवन-अनुभव व्यापक है। कबीरदास की भाँति वे अनेक परस्पर-विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय हैं। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति है। तीव्र सौन्दर्यानुभूति के रचनाकार हैं और इसीलिए गहरी घृणा तथा तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है।"

नागार्जुन की कविता उस तीन-चौथाई हिन्दुस्तान से संबंधित है, जो राष्ट्रीय उत्पादन और विकास की रीढ़ कहा जा सकता है। पर इस देश में कुछ लोग ऐसे हैं, जो पूँजी के बल पर सारे राष्ट्र के भविष्य और वर्तमान पर कुण्डली मारकर बैठ गए हैं। 'धनकुबेरों' की यह जमात भी नागार्जुन की कविताओं में अक्सर दिखाई दे जाती है। इन्हीं की बदौलत समाज में तिकड़म, शोषण, भ्रष्टाचार और प्रदर्शन का नंगा नाच होता है। धर्म और राजनीति इन्हीं के घर दूल्हा-दुल्हन की तरह ब्याहे जाते हैं।

विदिशा लायंस क्लब में उदास मन से कविता-पाठ के लिए जाते हुए रास्ते में बाबा ने कहा था— "जानते हो, ये लायंस और रोटरी क्लब क्या हैं? समाज-सेवा तो सिर्फ बहाना मात्र है। वस्तुतः ये धनपतियों और सरकारी अफसरों के विवाह-मण्डप हैं। विदेशों की चमक-दमक दिखाने के झरोखे हैं।"

नागार्जुन की कविता का प्रथम संसार यही है। गाँव-देश की धरती, वातावरण, पेड़-पौधे, रीति-रिवाज, बोल-चाल— सबसे उनका निकट का रिश्ता है। यात्री होने के बावजूद वे सबको याद रखते हैं। बाहर से जितने बौने और क्षीण से दिखते हैं, भीतर से उतने ही ऊँचे और भाव-संपन्न हैं। उनकी ऊँचाइयाँ देखनी हों तो उन्हें कविता के बीच पाना होगा। कविता ऊर्ध्वगामी है। उसे साधारण चित्त की यात्रा नहीं कहा जा सकता। इस उदारता में सारी धरती समा जाती है। छायावादी कविता अपनी ऊँचाइयों पर पहुँचते ही दिव्य हो जाती है। नागार्जुन की कविता फिर भी पार्थिव बनी रहती है। वह घनघोर लोकधर्मी है। लोक के प्रति उनकी निष्ठा इतनी प्रखर है कि कला और कलागत सौन्दर्य की दुनिया भी कभी-कभी पीछे छूट जाती है।

नागार्जुन की कविता जहाँ भी इन धनकुबेरों को देखती है, फट पड़ती है। उनका उपहास करती है, उन पर फब्तियाँ कसती है। 'यह उन्मत्त प्रदर्शन', 'पैसा चहक रहा है', 'बोला ढाकुरिया का पानी', 'प्लीज़ एक्सक्यूज़ मी' और 'करने आए हैं चहल-कदमी' जैसी कविताएँ इसी वैभव-संसार के रंग-ढंग, रीति-नीति और जीवन-शैली का उद्घाटन करती हैं।

मैथिली में भी नागार्जुन की कविताओं का 'टोन' वही है, जो हिन्दी में। उन दिनों देश आज़ाद हो चुका था और नेताओं के चरित्र भी खुलने लगे थे। सेठ-साहूकारों और महाजनों की बन आई थी। बड़े-बड़े देशी उद्योगपति और धन्नासेठ दोनों हाथों से अपना घर भरने में लग गए थे। 'रामराज' कविता में कवि ने लिखा—

"रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है,
सूरत-शक्ल वही है भैय्या, बदला केवल ढाँचा है।
नेताओं की नीयत बदली, फिर तो अपने ही हाथों
धरती माता के गालों पर कसकर पड़ा तमाचा है।"

सन् 1951 में कुछ दिनों के लिए नागार्जुन ने वर्धा की 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' में भी काम किया और अपनी आदत के मुताबिक जल्दी ही वापस लौट आए। इलाहाबाद में रहकर स्वतंत्र रूप से अनुवाद और लेखन-कार्य की कोशिश की। इस बीच नागार्जुन उपन्यासों पर भी हाथ आज़माने लगे थे। 'बलचनमा' पहले मैथिली में लिख डाला था, पर वहाँ उसका कोई बाज़ार नहीं था, इसलिए वर्षों तक पड़ा रहा। धीरे-धीरे कवि ने स्वयं उसे हिन्दी में लिखा, यह सोचते हुए कि—

"मैथिली माँ है, मगर उससे पेट नहीं भरता। हिन्दी पेट भरती है, इसीलिए उसे अपना कलेजा नोचकर चढ़ा देता हूँ।"

इन्हीं दिनों नागार्जुन ने काफ़ी बाल-साहित्य लिखा और गुजराती तथा बँगला उपन्यासों के अनुवाद की ओर बढ़े। संस्कृत के 'मेघदूत' का अनुवाद मुक्तछंद में किया, जो धारावाहिक रूप से 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में प्रकाशित हुआ। 'गीतगोविन्द' का भी अनुवाद किया। शरत्चन्द्र के उपन्यासों में 'ब्राह्मण की बेटी', 'देहाती दुनिया' तथा अन्य कई कृतियों का अनुवाद-कार्य भी किया। 

आपके दिए गए पाठ का यथावत शुद्धीकरण (केवल वर्तनी, व्याकरण, विराम-चिह्न एवं स्पष्ट त्रुटियों का सुधार) इस प्रकार है—

नागार्जुन की काव्य-भूमि

नागार्जुन का लेखन श्रमिक जनता की ओर से किया गया वह अश्वमेध है, जिसमें जड़ पुरातनता और वृद्ध-जर्जर सामंतवाद को आहुति देकर जनवादी चेतना की दिग्विजय की घोषणा की गई है। गरीब ब्राह्मण परिवार का यह औघड़ शब्दकर्मी 'ब्रह्मपिशाच' की तरह न अपनी आत्मचेतन विशिष्टता की उधेड़बुन में पड़ा है, न ही अपने को अद्वितीय और असाधारण मानते हुए पंक्ति-समर्पण की कृपालु मुद्रा ही अपना रहा है। टेलीप्रिंटर की तरह जो जनता के मनोभावों के प्रत्येक क्षण को टंकित करता रहा, जिसने अपनी व्यक्ति-पीड़ा को छिपाए रखा और लोक के सुख-दुःख को ही परम सत्य समझा, उसी का नाम नागार्जुन है।

लोक की पीड़ा और सामाजिक क्षोभ ही उसके लेखन के प्रधान अनुभव हैं। पीड़ित मानवता को शोषण और अनाचार के खिलाफ खड़ा करके वह एक प्रतिरोधक मोर्चाबंदी करता है। नकली समाजवाद और छद्म वामपंथ के उस वातावरण में वह ऐसा कैसे कर सका, इसका सबसे बड़ा कारण उसका भारतीय जनता से गहरा सम्पर्क है। सारे प्रगतिशीलों में जो कवि भारतीय जनता के चूल्हे-चौके तक पहुँचा हुआ है, वह वही है। उसको पढ़ते हुए हम अपनी जनता के सीधे सम्पर्क में आते हैं। उसकी सारी जानकारी कानों-सुनी नहीं, आँखों-देखी है। प्रतीक, उपमान और मुहावरे तक जनता से लिए गए हैं। वह किताबों के जरिए जनता को नहीं जानता। जनता के बीच रहकर अपने शब्द की परीक्षा करता है।

साहित्य और राजनीति की मोटी-मोटी किताबें पढ़कर जो लोग प्रगतिशीलता की तलाश यहाँ करेंगे, उन्हें कोफ्त भी होगी और निराशा भी। किन्तु जो ठेठ जीवन-शैली की खोज करते हुए इधर आएँगे, उनके हाथ बहुत कुछ लगेगा। वे यहाँ उत्साह और उमंग से परिपूर्ण संघर्ष भी पा सकेंगे और चाँदनी रातों को आम के बगीचों में होने वाला स्वस्थ अभिसार भी। प्रगतिशीलता अगर सिर्फ राजनीतिक दृष्टि नहीं है, तो उसकी सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा का साहित्य नागार्जुन जैसे विज्ञ लोग ही लिख सके हैं।

प्रकृति, नारी, सौन्दर्य, यौवन और प्रणय के अनुभव भी यहाँ हमें मिलते हैं। पर इसे पढ़ते हुए हमारी दृष्टि लोलुपता के अंजन से अंजित होने के बजाय स्वस्थ रस-बोध से तृप्त हो उठेगी। सौन्दर्य की एक समग्रदर्शी कवि-भावना हमारी चेतना को क्षुद्र आकर्षणों से ऊपर उठाकर भारतीय सौन्दर्य-बोध के उन उच्चतम शिखरों की ओर ले जाएगी, जहाँ रूप की ऊपरी पर्त गुण और स्वभाव की गहरी तथा बारीक छननी में छनकर सहज, संतुलित और मर्यादित हो उठती है।

नागार्जुन नए और पुराने समस्त प्रगतिशीलों में सबसे अधिक संवेदनशील लोकोन्मुख कवि रहे हैं। भारतीय आबादी के जितने स्तरों और रूपों का पता उन्हें है, उतना इस युग में शायद किसी दूसरे को नहीं। दरिद्र किन्तु ब्राह्मण परिवार के सदस्य होने के नाते अपने युग के सामंतों, जागीरदारों से लेकर मध्य जातियों और गरीबी की रेखा को परिभाषित करने वाली जातियों के सम्पर्क की भी सुविधा उन्हें मिली। काशी की विद्वान मंडली और पंडे-पुरोहितों ने उन्हें इसलिए आत्मीयता दी कि वे दरभंगा के मैथिल पं. वैद्यनाथ मिश्र हैं और परम्परागत अर्थों में साहित्याचार्य भी। इसी काशी में नागार्जुन गरीब छात्रों, विधवाओं और उन रिक्शा-इक्का वालों के भी सम्पर्क में आए, जो सामंती और पूँजीवादी समाज-व्यवस्था के शिकार रहे हैं।

यात्री एवं साहित्यकार और सबसे बड़ी बात कि एक संवेदनशील रचनाकार के नाते भी नागार्जुन का एक पाँव कस्बों में ही रहा है तथा दूसरा महानगरों में। महानगर उन्हें लुभा नहीं पाता और कस्बा उन्हें निराश नहीं करता। महानगरों में वे कनॉट प्लेस और चौरंगी के बजाय उन सीलन-भरी बस्तियों में रहते थे, जहाँ आज छोटे-मोटे दुकानदार, ट्यूशनिस्ट अध्यापक, विज्ञापन की खोज में आती-जाती रोजगार खोजती युवतियाँ, कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूर तथा कार्यालयों में माथापच्ची करने वाले बाबू रहा करते थे। नागार्जुन यहाँ एक सदस्य की हैसियत से आते-जाते रहते थे। पटना, इलाहाबाद, सागर, विदिशा या तरौनी गाँव, अथवा केदारनाथ अग्रवाल का बाँदा— सब उनके आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। घुमंतू स्वभाव ही उन्हें श्रीलंका और तिब्बत भी ले गया। वही उन्हें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक, एक अनुभव से दूसरे अनुभव तक भी ले जाता है। इसीलिए जन-जीवन की जितनी पकड़ नागार्जुन को है, उतनी केदारनाथ और त्रिलोचन को भी नहीं।

शोषित और पीड़ित वर्गों के प्रति कवि की सहानुभूति कृत्रिम नहीं है। उनका जन्म नितांत दरिद्र कुल में हुआ। गरीबी के कारण स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा। मूर्ख रह जाने की विभीषिका ने संस्कृत पढ़ने के विकल्प को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आज भी उनका कोई निश्चित काम नहीं है। फिर फटीचरी ही मानो नागार्जुन की जीवन-सहचरी है। अपनी मैथिली रचनाओं के कुछ रूपान्तर वे इस संकलन में डालना चाहते थे, परन्तु पुस्तक का कलेवर ज्यादा न फूलाने का हमारा मनोभाव जानकर कवि इस ओर से निर्लिप्त हो गए हैं। दूसरे संकलन में उनकी मैथिली रचनाओं का रूपान्तर पर्याप्त मात्रा में संकलित है।

नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी कहते हैं— "नागार्जुन का कृतित्व ही नहीं, उनका व्यक्तित्व भी कालजयी है। नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग, जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ बच्चे हैं। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है, वे सूची को और आगे बढ़ाएँगे। अपनी एक कविता में वे कालिदास से जवाब-तलब करते हैं— 'कालिदास सच-सच बतलाना....' उनका जीवन-अनुभव व्यापक है। कबीरदास की भाँति वे अनेक परस्पर-विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय हैं। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति है। तीव्र सौन्दर्यानुभूति के रचनाकार हैं और इसीलिए गहरी घृणा तथा तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि हैं। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है।"

नागार्जुन एवं उनकी कविता के संबंध में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास' में लिखा है— "प्रगतिवादी कवियों में नागार्जुन बहुचर्चित हैं। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में जैसे अनेक प्रकार के राष्ट्रगान, प्रभाती और उद्बोधन-गीत मुखर शैली में लिखे गए थे, वैसे ही स्वतंत्र भारत के विविध आंदोलनों के लिए गीत और कविताएँ नागार्जुन ने लिखी हैं। उन गानों में निष्ठा अधिक थी, इन कविताओं में व्यंग्य अधिक है, जो सटीक तुकों के प्रयोग से और पैना हो जाता है। आंदोलनों के वैविध्य और बदलते स्वरूप से कवि की आस्था में भी परिवर्तन आते गए हैं— गांधी, मार्क्स, विनोबा, जयप्रकाश अलग-अलग समयों में कवि के नायक रहे। इन आंदोलन-मूलक कविताओं के अतिरिक्त सामान्य जन-जीवन को अंकित करने वाली कुछ कोमल और कुछ तीखी रचनाएँ भी नागार्जुन ने लिखी हैं, जो एक प्रकार से आधुनिक हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का रेखांकन मानी जा सकती हैं।"

नागार्जुन की कविताओं को पढ़-सुनकर कोई भी सहज ही आज़ादी के आर-पार के भारतीय जन-इतिहास से परिचित हो सकता है। ये इस देश के मनुष्यों की सम्पूर्ण गतिविधियों में शरीक रचनाएँ हैं। एक ऐसे रचनाकार की रचनाएँ, जो हमेशा अपने समय, उस समय के बीच घटती सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक घटनाओं तथा हादसों के रू-ब-रू खड़ा है। उनकी नज़र से कोई चीज़ छूटती नहीं।

नागार्जुन मुकम्मिल कवि हैं, जीवन की समग्रता के कवि, बेहद गहरे राग के कवि हैं। आदमी और आदमीयत की उच्चतर भावनाओं के चितेरे हैं। भाषा और रचना-शिल्प के वैविध्य में भी नागार्जुन की कविता मानक कविता है। इतनी जीवंत, अनेकरूपा और व्यंजक भाषा तथा छंदों की जितनी समृद्ध दुनिया उनके काव्यलोक में है, अन्यत्र कम ही मिलेगी। आधुनिक कवियों में केवल निराला ही नागार्जुन की कवि-प्रतिभा के बरक्स अपनी छाप मन पर छोड़ते हैं। जनकवि तो वे हैं ही— जनधर्मिता की मिसाल है उनकी कविता।



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निबंध जी- 4 देश



निबंध जी- 4 देश



जी-4 (G-4) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता

जी-4 (G-4) चार प्रमुख देशों—भारत, जर्मनी, जापान और ब्राज़ील—का एक कूटनीतिक समूह है। इसका गठन मुख्य रूप से एक ही उद्देश्य के लिए किया गया है: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता प्राप्त करना। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु चारों देशों ने एक साझा घोषणा के माध्यम से एक-दूसरे की दावेदारी का पुरजोर समर्थन किया है।

यह समूह वर्ष 2004 में अस्तित्व में आया। जी-4 देशों ने संयुक्त रूप से 22 सितंबर 2004 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 59वें सत्र के आरंभ में सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए अपनी औपचारिक दावेदारी पेश की थी। इस दावेदारी को प्रस्तुत करते हुए इन देशों ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का समय आ गया है।

सुधार की आवश्यकता क्यों है?

पिछले सात दशकों में वैश्विक भू-राजनीति में व्यापक बदलाव आए हैं। वर्तमान की जटिल चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के मूल ढांचे में परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है।

  • सदस्य संख्या में वृद्धि: 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र का उद्भव मात्र 51 सदस्य देशों के साथ हुआ था, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 193 हो गई है।

  • अस्थायी सीटों का अपर्याप्त विस्तार: 1965 में सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 की गई थी, लेकिन स्थायी सदस्यों (P-5: अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) की संख्या और उनके वीटो अधिकार में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

  • 1945 के समय ये पाँच देश उस समय की महान सैन्य और आर्थिक शक्तियां थीं, लेकिन आज वैश्विक शक्ति का केंद्र बदल चुका है।

जी-4 देशों की दावेदारी का आधार (नए जोड़े गए बिंदु)

आज तकनीकी, जनसंख्या, और अर्थव्यवस्था के आकार के संदर्भ में जी-4 देश विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनकी दावेदारी के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:

  • भारत: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, सबसे बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों (UN Peacekeeping) में सबसे अधिक सैन्य योगदान देने वाले देशों में से एक है।

  • जापान और जर्मनी: ये दोनों देश संयुक्त राष्ट्र के बजट में सबसे बड़े वित्तीय योगदानकर्ताओं में शीर्ष पर आते हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं।

  • ब्राज़ील: यह लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र का सबसे बड़ा देश और अर्थव्यवस्था है, जो एक बड़े वैश्विक भू-भाग का प्रतिनिधित्व करता है।

इन देशों का तर्क है कि उन्हें सुरक्षा परिषद का स्थायी हिस्सा बनाकर ही संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका को वास्तविक, प्रासंगिक और लोकतांत्रिक बनाया जा सकता है।

जी-4 के मार्ग की प्रमुख बाधाएं और चुनौतियां

जी-4 द्वारा किए जा रहे प्रयासों के सामने कई जटिल भू-राजनीतिक समस्याएं उभर कर आई हैं:

  1. 'कॉफी क्लब' (Uniting for Consensus) का विरोध: राष्ट्रों की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा जी-4 के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी देशों ने एक समूह बनाया है जो जी-4 का कड़ा विरोध करता है:

    • चीन और दक्षिण कोरिया, जापान की सदस्यता के सख्त खिलाफ हैं।

    • इटली और स्पेन, जर्मनी की सदस्यता का विरोध करते हैं।

    • पाकिस्तान, भारत की सदस्यता के प्रबल विरोध में है।

    • अर्जेंटीना और मैक्सिको, ब्राज़ील की सदस्यता के विरुद्ध खड़े हैं।

  2. वीटो प्राप्त देशों (P-5) का रुख: वर्तमान स्थायी सदस्य (विशेषकर चीन) अपने विशेषाधिकार (Veto Power) को नए देशों के साथ साझा करने के पक्ष में नहीं हैं। अमेरिका और रूस मौखिक रूप से भारत का समर्थन तो करते हैं, लेकिन वीटो अधिकार देने को लेकर वे भी स्पष्ट रूप से सहमत नहीं हैं।

  3. अफ्रीकी प्रतिनिधित्व का मुद्दा: जी-4 के लिए एक बड़ी चुनौती अफ्रीकी संघ के 54 देशों का समर्थन जुटाना भी है। अफ्रीकी देश 'एजुलविनी सर्वसम्मति' (Ezulwini Consensus) के तहत वीटो पावर के साथ कम से कम दो स्थायी अफ्रीकी सीटों की मांग कर रहे हैं, जिस पर अभी तक पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है।

निष्कर्ष: जी-4 के सदस्य देश इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि उन्हें आज की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अनुकूल एवं सम्मानजनक स्थान मिले। हालाँकि राह में कई कूटनीतिक बाधाएं हैं, लेकिन बिना इन सुधारों के संयुक्त राष्ट्र भविष्य की वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में अक्षम साबित हो सकता है।



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कोरोना वायरस से न घबराएं, दिखाएं समझदारी, बरतें सावधानी



कोरोना वायरस के संबध में एहतियाती कदम ही सबसे बड़ा बचाव साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एडवाइजरी के मुताबिक रोजमर्रा के जीवन में हम अगर हम छोटे-छोटे काम करते हैं, तो संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाएगा।
  1. अक्सर हम अपनी नाक, मुंह और आंखों को बार-बार छूते रहते हैं, ऐसा न करें। हथेलियां कई सतहों को छूती हैं। ऐसे में उस पर वायरस होते हैं। दूषित हथेली से वायरस नाक, मुंह या आंखों के जरिए शरीर में जा सकता है।
  2. अगर आपको अस्पताल में रुकना पड़ रहा है तो कोशिश करें कि अपने खाने में दही का इस्तेमाल करें। दही में एसीडोफिलस नाम का बैक्टीरिया होता है जो कई तरह के वायरस को खत्म कर देता है।
  3. अगर आपको खांसी या जुकाम है, तो मास्क जरूर पहनें। बाहर निकलते वक्त आपके जरिए वायरस दूसरों में संक्रमित हो सकता है, इसलिए खास ख्याल रखें।
  4. अगर आपको बुखार, खांसी है या सांस लेने में परेशानी हो रही है तो तुरंत डॉक्टर से मिलें, कोशिश करें कि घर पर ही रहें। डॉक्टर से तुरंत संपर्क करने से बीमारी को शुरुआत में ही पकड़ा जा सकता है।
  5. अपने आसपास और घर की सफाई रखें। कपड़ों को अच्छी तरह से धोएं और कम से कम दो घंटे धूप में सुखाएं।
  6. अपने आसपास के लोगों के साथ कम से कम 3 फीट का फासला बनाए रखने की कोशिश करें, खासतौर से उस व्यक्ति से जिसे खांसी या जुकाम हो। जब कोई व्यक्ति खांसता है या छींकता है, तो हवा में वायरस फैल जाते हैं। अगर आप ज्यादा करीब रहेंगे तो सांस के रास्ते ये वायरस आपके शरीर में जा सकता है।
  7. अपने स्मार्टफोन को हफ्ते में एक बार डिसइंफेटिंग वाइप्स से साफ जरूर करें, ये वाइप्स फोन में ऊपरी भाग में रहने वाले सभी कीटाणुओं को खत्म कर देते हैं। हमारे हाथ में 24 घंटे रहने वाले स्मार्टफोन की स्क्रीन वायरस का बड़ा अड्डा है। स्क्रीन पर मेथिसिलिन रसिस्टेंट स्टेफाय्लोकोक्स औरीयास (एमआरएसए) नाम के जीवाणु होते हैं।
  8. अपने हाथों को कम से कम 20 सेकंड तक रगड़कर साबुन से धोएं।
  9. आइसक्रीम, कोल्डड्रिंक, बर्फ, बाजार की लस्सी, ठंडी छाछ और अन्य ठंडी वस्तुओं के सेवन से बचें।
  10. इस वायरस का आकार 400-500 माइक्रोन का है जो अन्य वायरस से बड़ा है।
  11. इस वायरस से बचाव के लिए मास्क का इस्तेमाल करें।
  12. कपूर, लौंग, इलाइची और जावित्री को पीसकर अपने साथ रखें और समय-समय पर उसे सूंघते रहें।
  13. कोरोनावायरस संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाकर रखें।
  14. गंदे हाथों से अपनी नाक और मुंह को न छुएं और न ही गंदे हाथों से कुछ खाएं।
  15. गर्म स्थान पर रहें क्योंकि यह वायरस 27 डिग्री तापमान पर मर जाता है।
  16. छींकते या खांसते वक्त नाक और मुंह को टिशू से ढंक लें और तुरंत बाद इस टिशू को डस्टबीन में फेंक दें। छींकने से निकलने वाले तरल पदार्थ में ढेरों वायरस होते हैं और ये तेजी से फैल सकते हैं।
  17. दिन में कई बार नियमित तौर पर साबुन और पानी से हाथ को कम से कम 20 सेकेंड तक धोएं, बैक्टीरिया मारने वाला अच्छा सेनेटाइजर का भी उपयोग कर सकते हैं। ऐसा करने से हाथों पर रहने वाले वायरस से छुटकारा मिल जाएगा।
  18. नमक के गर्म/गुनगुने पानी से गरारे करें, इससे वायरस फेफड़ों तक नही पहुंच पाएगा।
  19. प्रतिदिन प्राणायाम और सूर्यनमस्कार करें। इससे श्ववसन तंत्र और फेफड़े मजबूत होंगे।
  20. फ्रीज में रखी ठंडी वस्तुओं का सेवन बिल्कुल न करें।
  21. बाजार में मिलने वाले दूध से बने उत्पाद जैसे चीज, बटर, मायोनीज का सेवन न करें।
  22. बाथरूम की सफाई के वक्त शावर को जरूर साफ करें, इसे डिटॉल के पानी से धो सकते हैं। प्लास्टिक के पर्दों का प्रयोग बाथरूम में न करें। शॉवर में मैथालॉबेक्टर समेत कई कीटाणु पनपते हैं।
  23. यह वायरस धातु की सतह पर 12 घंटे, कपड़ों पर 9 घंटे, और हमारे हाथों तथा शरीर पर 10 मिनट तक जीवित रहता है।
  24. यह वायरस, खांसी, छींक, श्वास और छूने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है।
  25. रोजाना तुलसी, लौंग, अदरक और हल्दी का गर्म दूध पिएं।
  26. लोगों से हाथ न मिलाएं और गले भी न मिलें। 5 फीट की दूरी से बात करें।
  27. विटामिन-सी युक्त फलों जैसे संतरे, मौसमी और आंवला खाएं। नींबू का इस्तेमाल भी जरूर करें।
  28. विमान में क्रू सदस्यों के हाथ से खाने का सामान लेने से पहले अपने हाथ को अच्छे से साफ कर लें, हवाई यात्रा में क्रू सदस्यों से कोरोनावायरस के फैलने का डर सबसे ज्यादा है।
  29. शाकाहारी और हमेशा ताजा भोजन खाएं। मांसाहार के सेवन से बचें।
  30. सर्दी, खांसी, कफ, बुखार होने वाले व्यक्ति को डॉक्टर के पास तुरंत जाने की सलाह दें।
  31. सार्वजनिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर जाने से बचें।
  32. हर 15 मिनट में कम से कम एक घूंट गुनगुना पानी पीते रहें।


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अस्थमा की समस्या को जड़ से खत्म करते हैं घरेलू उपचार



अस्थमा आजकल एक आम बीमारी होती जा रही हैं परन्तु ये काफी गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। आज कल यह बच्चों काफी देखने को मिल रही है। जिस तरह से वातावरणीय प्रदूषण बदल रहा है, खान-पान में मिलावट आदि के चलते अस्थमा के मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही हैं। आजकल ये बीमारी बच्चों में अधिक फैल रही है।


अस्थमा क्या है?
अस्थमा को दमा भी कहते है यह श्वसन तंत्र या फेफड़ों से सम्बंधित बीमारी है। इसमें सांस की नली ब्लॉक या पतली हो जाती हैं जिसके कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण छोटी-छोटी सांस लेनी पड़ती है, छाती में कसाव जैसा महसूस होता है, सांस फूलने लगता है, खाँसी आती है आदि। ये समस्या जुखाम, कोल्ड कफ के दौरान अधिक हो जाती है क्योंकि कफ से सांस की नली और संकरी हो जाती है। सुबह या रात में अकसर खाँसी का दौरा पड़ता है। यह बीमारी किसी को भी हो सकती है। अस्थमा किस प्रकार का है, कितना गंभीर है व्यक्ति से व्यक्ति अलग हो सकता है। कुछ लोगों को इससे अधिक समस्या नहीं होती है परन्तु कुछ को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अस्थमा दो प्रकार की हो सकते है: विशिष्ट और गैर विशिष्ट, विशिष्ट प्रकार के अस्थमा के रोग में सांस लेने में समस्या एलर्जी के कारण होती है दूसरी तरफ गैर विशिष्ट अस्थमा एक्सरसाइज़, मौसम के प्रभाव या आनुवांशिक प्रवृत्ति के कारण होता है। अगर किसी को परिवार में आनुवांशिकता के तौर पर अस्थमा की बीमारी है तो इसके होने की संभावना अधिक हो जाती है। अस्थमा बीमारी का कोई इलाज नहीं है परन्तु इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।

अस्थमा होने का कारण
  1. अधिक मात्रा में जंक फूड खाने के कारण
  2. आनुवांशिकता के कारण
  3. घर में पालतू जानवर का होना
  4. घर में या उसके आसपास धूल का होना
  5. ज्यादा नमक खाने के कारण
  6. तनाव या भय के कारण
  7. धूम्रपान
  8. वायु प्रदूषण
  9. सर्दी के मौसम में अधिक ठंड होने के कारण
  10. सर्दी, फ्लू ब्रोंकाइटिस और साइनसाइटिस का संक्रमणआदि

अस्थमा के लक्षण - यह रोग अचानक से शुरू हो सकता है इसके शुरू होने के लक्षण इस प्रकार हैं:
  1. उल्टी का होना
  2. खांसी, छींक या सर्दी जैसी एलर्जी
  3. बैचेनी जैसा महसूस होना
  4. सांस लेते वक्त घरघराहट जैसी आवाज का आना
  5. सिर का भारी होना और थकावट लगना
  6. सीने में खिचाव या जकड़न का महसूस होना आदि
 घरेलू उपचार
  1. 100 ग्राम दूध में लहसुन की पांच कलियां धीमी आँच पर उबाकर इनका हर रोज दिन में दो बार सेवन करने से दमे में काफी फायदा मिलता है।
  2. 2-3 सूखे अंजीर को पीसकर रात भर पानी मे भिगोकर सुबह खाली पेट खाएं। इससे श्वास नली में जमा बलगम ढीला होकर बाहर निकलता है, स्थाई रूप से आराम प्राप्त होता है।
  3. 250 ग्राम पानी में मुट्ठी भर सहजन की पत्तियां मिलाकर उसे 5 मिनट तक उबालें। फिर ठंडा होने पर उसमें चुटकी भर नमक, काली मिर्च और नीबू रस मिलाएं, इस सूप का रोज सेवन करें लाभ मिलेगा।
  4. 4-5 लौंग को 150 ग्राम पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर गरम-गरम पी लें। रोज दो से तीन बार यह काढ़ा पीने से निश्चित रूप से लाभ मिलता है।
  5. अस्थमा और ब्रोंकाइटिस को नियंत्रित करने में तुलसी औरकरेले का रस भी काफी मददकरता है। तुलसी कीकरीब 15 पत्तियों को लेकर एक सामान्य आकार केकरेले के साथ कुचल लें और इसे अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन रात में सोने से पहले दें, शीघ्र ही फायदा होगा।
  6. अस्थमा का दौरा पड़ने पर गर्म पानी में तुलसी के 5 से 10 पत्ते मिलाएं और सेवन करें। इससे सांस लेने में आसानी होती है। इसी प्रकार तुलसी का रस, अदरक रस और शहद का समान मिश्रण प्रतिदिन एक चम्मच के हिसाब से लेना अस्थमा में आराम मिलता है।
  7. आंवला दमा रोग में बहुत लाभदायक है। एक चम्मच आंवले के रस मे दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से फेफडे़ ताकतवर बनते हैं।
  8. एक गिलास पानी में एक चम्मच लहसुन का रस मिलाएं और इसे 3 महीने तक दिन में दो बार प्रत्येक दिन लगातार दें तो अस्थमा और रक्त से जुड़े विकारों में काफी राहत मिलती है।
  9. एक चम्मच मेथीदाने को एक कप पानी में उबालें। ठंडा होने पर उसमें अदरक का एक चम्मच ताजा रस और स्वादानुसार शहद मिलाएं। सुबह-शाम नियमित रूप से इसका सेवन करने से निश्चित ही बहुत लाभ मिलता है।
  10. एक चम्मच हल्दी एक गिलास गर्म दूध में मिलाकर पीने से दमा काबू में रहता है। हल्दी के एंटीऑक्सीडेंट गुण के कारण एलर्जी भी नियंत्रण में रहती है।
  11. एक चम्मच हल्दी को दो चम्मच शहद में मिलाकर चाट लें दमा का दौरा तुरंत काबू में आ जाएगा।
  12. एक पके केले में चाकू से लंबाई में चीरा लगाकर उसमें एक चौथाई छोटा चम्मच महीन पिसी काली मिर्च भर दें। फिर उसे 2-3 घंटे बाद हल्की आँच में छिलके सहित भून लें। ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें। एक माह में ही दमें में खूब लाभ होगा।
  13. गर्म पानी में अजवाइन डालकर स्टीम लेने से भी दमे को नियंत्रित करने में राहत मिलती है।
  14. तुलसी के 10-15 पत्ते पानी से साफकर लें फिर उन पर काली मिर्च का पावडर बुरककर खाने से दमा में आराम मिलता है।
  15. तुलसी के पत्तों को अच्छी तरह से साफकर उनमें पिसी काली मिर्च डालकर खाने के साथ देने से दमा नियंत्रण में रहता है।
  16. तुलसी के पत्तों को पानी में पीसकर इसमें दो चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से दमा रोग में शीघ्र लाभ मिलता है।
  17. दमे मे खाँसी होने पर पहाडी नमक सरसों के तेल मे मिलाकर छाती पर मालिश करने से तुरंत आराम मिलता है।
  18. मेथी की पत्तियों का ताजा रस, अदरक और शहद को धीमी आंच पर कुछ देर गर्मकरके रोगी को पिलाने से अस्थमा रोग में काफी आराम मिलता है।
  19. लहसुन की दो पिसी कलियां और अदरक की गरम चाय पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। इस चाय का सुबह-शाम करना चाहिए।

विशेष : किसी भी औषधि के प्रयोग से पूर्व विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।


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भारत के संविधान के अनुच्छेद 163 अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति



मुख्यमंत्री भारतीय राज्य की कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होता है। वह राज्य विधानसभा का नेता होता है। किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति उस प्रदेश के राज्यपाल के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत की जाती है। 
संविधान के अनुच्छेद 164 यह प्रावधान करता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा। विधानसभा चुनावों में पार्टी के एक बहुमत प्राप्त नेता को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाता है। राज्यपाल के पास नाममात्र का कार्यकारी अधिकार है, लेकिन वास्तविक कार्यकारी अधिकार मुख्यमंत्री के पास है। हालांकि राज्यपाल द्वारा प्राप्त विवेकाधीन शक्तियाँ राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री की शक्ति, अधिकार, प्रभाव, प्रतिष्ठा और भूमिका को कुछ हद तक कम कर देती हैं। एक व्यक्ति जो राज्य विधानसभा का सदस्य नहीं है, उसे छह महीने के लिये मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, उस समय सीमा के भीतर उसे राज्य विधानसभा की सदस्यता ग्रहण करनी होगी, ऐसा न करने पर उसे मुख्यमंत्री पद का त्याग करना होता है। मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है और वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। राज्यपाल द्वारा उसे तब तक बर्खास्त नहीं किया जा सकता जब तक कि विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है। यदि वह विधानसभा में विश्वास मत खो देता है तो उसे त्यागपत्र दे देना चाहिये अन्यथा राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है।
राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य विधानसभा चुनाव के बाद करता है या फिर तब करता है, जब मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने के कारण या बर्ख़ास्त कर दिये जाने के कारण उसका पद रिक्त हो जाता है। यदि विधानसभा चुनाव में किसी एक ही दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त हो जाता है और उस दल का कोई निर्वाचित नेता हो, तब उसे मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करना राज्यपाल की संवैधानिक बाध्यता होती है। यदि मुख्यमंत्री अपने दल के आन्तरिक मतभेदों के कारण त्यागपत्र देता है, तो उस दल के नये निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया जाता है। चुनाव में किसी पक्ष के बहुमत प्राप्त न करने की स्थिति में या मुख्यमंत्री की बर्ख़ास्तगी की स्थिति में राज्यपाल अपने विवेक से मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और उसे नियत समय के अन्दर विधानसभा में बहुमत साबित करने का निर्देश देते है। संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।

भारत के संविधान के अंतर्गत - मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री होने की योग्यता - मुख्यमंत्री पद के लिए संविधान में कोई योग्यता निर्धारित नहीं है, जो भी व्यक्ति राज्य विधान सभा अथवा विधान परिषद की सदस्यता रखने की योग्यता रखता है वह मुख्यमंत्री बन सकता है। राज्य विधानसभा का सदस्य न होने वाला व्यक्ति भी मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि वह 6 मास के अन्तर्गत राज्य विधानसभा का सदस्य निर्वाचित हो जाये। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार किसी सजा प्राप्त व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य माना जाएगा।

मुख्यमंत्री के कर्तव्य तथा अधिकार - मुख्यमंत्री के कर्तव्य तथा अधिकार निम्नलिखित हैं–
  • वह राज्य के शासन का वास्तविक अध्यक्ष है और इस रूप में वह अपने मंत्रियों तथा संसदीय सचिवों के चयन, उनके विभागों के वितरण तथा पदमुक्ति और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों एवं महाधिवक्ता और अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए राज्यपाल को परामर्श देता है।
  • मुख्यमंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है तथा सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का पालन करता है। यदि मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य मंत्रिपरिषद की नीतियों से भिन्न मत रखता है, तो मुख्यमंत्री उसे त्यागपत्र देने के लिए कहता है या राज्यपाल उसे बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकता है।
  • यदि मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य ने किसी विषय पर अकेले निर्णय लिया है, तो राज्यपाल के कहने पर उस निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रख सकता है।
  • राज्य में असैनिक पदाधिकारियों के स्थानांतरण के आदेश मुख्यमंत्री के आदेश पर जारी किये जाते हैं तथा वह राज्य की नीति से संबंधित विषयों के सम्बन्ध में निर्णय करता है।
  • वह राज्यपाल को राज्य के प्रशासन तथा विधायन सम्बन्धी सभी प्रस्तावों की जानकारी देता है।
  • वह राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सलाह देता है।
  • वह राष्ट्रीय विकास परिषद में राज्य का प्रतिनिधित्व करता है।
  • वह (मुख्यमंत्री) एक मंत्री के रूप में किसी भी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकता है। केवल मुख्यमंत्री की सलाह के अनुसार ही राज्यपाल मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।
  • वह आवश्यकता के अनुसार कभी भी मंत्रियों और विभागों के बीच आवंटन और फेरबदल कर सकता है।
  • वह मंत्री को इस्तीफा देने के लिए कह सकता है, अगर वह (मंत्री) इस्तीफा नहीं देता है तो मुख्यमंत्री उसे बर्खास्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकते हैं।
  • वह सभी मंत्रियों का निर्देशन, मार्गदर्शन देने के साथ- साथ सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
  • अपने अनुसार अपने मंत्रिपरिषद की नियुक्ति के साथ से ही वह उसके इस्तीफा देने या मौत की स्थिति में ही पूरी मंत्रिपरिषद को भंग किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री का राज्यपाल से संबंध - भारत के संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल से संबंधित कार्य निम्न प्रकार हैं:
  • मुख्यमंत्री राज्यपाल से राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रियों की परिषद के सभी निर्णयों पर संवाद करते हैं।
  • जब कभी भी राज्यपाल प्रशासन के बारे में लिये गये निर्णयों से संबंधित कोई भी जानकारी मांगते हैं तो तब मुख्यमंत्री को उस जानकारी को राज्यपाल को प्रदान करना या करवाना होता है।
  • जब एक निर्णय कैबिनेट के विचार के बिना लिया गया है तो तब राज्यपाल मंत्रियों की परिषद के विचार के लिए पूछ सकते हैं।
  • मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में जैसे- अटॉर्नी जनरल, राज्य लोक सेवा आयोग (अध्यक्ष और सदस्य), राज्य निर्वाचन आयोग आदि के बारे में राज्यपाल के साथ सलाह मशविरा करते हैं।
  • सरकार की एक मंत्रिमंडल के रूप में अंतत: मुख्यमंत्री ही मतदाताओं के लिए जिम्मेदार होता है। हालांकि वह राज्य का मुखिया होता है लेकिन उसे राज्यपाल को प्रोत्साहित करने और चेतावनी देने के लिए मदद करने हेतु गवर्नर के साथ " सही परामर्श किया जाने वाले नियम" (सरकारिया आयोग की सिफारिश के अनुसार) का पालन करना पड़ता है।
मुख्यमंत्री का राज्य विधायिका से संबंध-
  • उसके द्वारा घोषित की गयी सभी नीतियों को सदन के पटल पर रखना होता है।
  • वह राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सिफारिश करता है।
  • वह समय- समय पर राज्य विधान सभा के सत्र के आयोजन और स्थगन के बारे में राज्यपाल को सलाह देता है।
पद विमुक्ति - सामान्यत: मुख्यमंत्री अपने पद पर तब तक बना रहता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास मत प्राप्त रहता है। अत: जैसे ही उसका विधानसभा में बहुमत समाप्त हो जाता है, उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए। यदि वह त्यागपत्र नहीं देता है, तो राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री निम्नलिखित स्थितियों में बर्खास्त किया जा सकता है–
  1. यदि राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा का अधिवेशन बुलाने तथा उसमें बहुमत सिद्ध करने की सलाह दे और यदि राज्यपाल के द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर मुख्यमंत्री विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के लिए तैयार नहीं हो, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकता है।
  2. यदि राज्यपाल अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता या राष्ट्रपति को अन्य स्रोतों यह समाधान हो जाए कि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति मुख्यमंत्री को बर्खास्त करके राज्य का शासन चलाने का निर्देश राज्यपाल को दे सकता है।
  3. जब मुख्यमंत्री के विरुद्ध राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो जाए और मुख्यमंत्री त्यागपत्र देने से इन्कार कर दे, तब राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकता है।
मंत्रिपरिषद का गठन - मंत्रिपरिषद का गठन राज्यपाल के द्वारा किया जाता है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर वह मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। मंत्रिपरिषद में सामान्यतः: उन्हीं व्यक्तियों को शामिल किया जा सकता है, जो राज्य विधानसभा या राज्य विधान परिषद के सदस्य हों, लेकिन विशेष परिस्थिति में मंत्रिपरिषद में ऐसे व्यक्तियों को भी शामिल किया जा सकता है, जो राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न हो। इस प्रकार नियुक्त किये गये मंत्रिपरिषद के सदस्य को विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य 6 माह के अन्दर बनना आवश्यक है। यदि 6 माह के अन्दर वह विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं बन जाता है, तो उसके पद ग्रहण की तिथि से 6 माह की समाप्ति पर स्वत: उसका मंत्री पद रहना समाप्त हो जाता है। परन्तु संविधान में यह व्यवस्था नहीं दी गयी है कि ऐसा व्यक्ति इस्तीफा देकर पुन: मंत्रिपरिषद का सदस्य बन सकता है या नहीं। सरकार ने इस अस्पष्ट प्रावधान का लाभ उठाते हुए उस व्यक्ति को पुन: मंत्रिपरिषद में शामिल कर लेते थे। अब 16 अगस्त, 2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए व्यवस्था दी कि विधायिका का सदस्य निर्वाचित हुए बिना कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक मंत्री पद धारण नहीं कर सकता। यदि इस व्यक्ति को छह महीने के बाद विधायिका के उसी सत्र में मंत्री पद पर दोबारा बहाल किया जाता है तो आवश्यक है कि वह चुनाव जीत कर सदन का सदस्य बने। यदि मंत्री पद पर आसीन गैर निर्वाचित व्यक्ति दिये गये छह महीने की अवधि में चुनाव जीतने में असफल रहता है और उस व्यक्ति को दुबारा मंत्री पद पर बहाल किया जाता है तो यह संविधान के 164(1) और 164(4) की योजना और भावना पर आघात होगा।

मंत्रिपरिषद का आकार - प्रारम्भ में संविधान में यह निर्धारित नहीं था कि राज्य मंत्रिपरिषद का आकार क्या होगा। इसका निर्धारण मुख्यमंत्री अपने विवेक से करता था। परन्तु 91वे संविधान संशोधन अधिनियम, 2004 के अनुसार यह निर्धारित कर दिया गया है कि राज्य मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या राज्य विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत अधिक नहीं होगी अर्थात किसी राज्य की विधानसभा सदस्य संख्या 100 है तो उस प्रदेश में मुख्यमंत्री सहित 15 मंत्री हो सकते है।मंत्रिपरिषद की पदावधि - मंत्रिपरिषद तब तक कार्यरत रहता है, जब तक मुख्यमंत्री पद पर रहता है। मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने या बर्खास्त होने से मंत्रिपरिषद का स्वत: ही विघटन हो जाता है।


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वाहन पर भारतीय तिरंगा फहराने की अनुमति कौन से व्यक्तियों को है?



 वाहन पर भारतीय तिरंगा फहराने की अनुमति कौन से व्यक्तियों को है?
भारत का राष्ट्रीय ध्वज हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज,भारत की जनता को एहसास दिलाता है कि वे एक संप्रभु देश के नागरिक है। भारत के हर व्यक्ति को अपनी कार पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं है। भारत में केवल कुछ गणमान्य व्यक्तियों को ही ऐसा करने की अनुमति है। भारतीय ध्वज संहिता, 2002 के अंतर्गत उन गणमान्य व्यक्तियों रखा गया है जो कि अपनी कारों पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकते हैं। गणमान्य व्यक्तियों की सूची इस प्रकार है-
  1. भारत के राष्ट्रपति
  2. भारत के उपराष्ट्रपति
  3. गवर्नर और लेफ्टिनेंट गवर्नर्स
  4. विदेशों में भारतीय मिशन के प्रमुख
  5. प्रधानमंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्री
  6. संघ के राज्य मंत्री और उप मंत्री
  7. राज्य का मुख्यमंत्री और राज्य और संघ शासित प्रदेशों के अन्य कैबिनेट मंत्री
  8. राज्य सरकार में राज्य मंत्री और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के उप मंत्री
  9. लोकसभा के अध्यक्ष
  10. राज्य सभा के उपाध्यक्ष
  11. लोक सभा के उपाध्यक्ष
  12. राज्यों में विधान परिषदों के अध्यक्ष
  13. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधान सभाओं के अध्यक्ष
  14. राज्यों विधान परिषदों के उपाध्यक्ष
  15. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधान सभा के उपाध्यक्ष
  16. भारत के मुख्य न्यायाधीश
  17. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश
  18. उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश
  19. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश


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घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएं



घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएँ
Ghanananda's Biography, Compositions and Literary features
घनानंद का जीवन परिचय, रचनाएँ एवं साहित्यिक विशेषताएं

जीवन परिचय (Biography)

घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार इनका जन्म संवत् 1746 में दिल्ली में हुआ था और संवत् 1817 में वृंदावन में इनका देहावसान हुआ। ये दिल्ली के रहने वाले एक कायस्थ थे तथा सम्राट मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे।

महाकवि घनानंद के विभिन्न नामों के प्रति विद्वानों में मतैक्य नहीं है। ये नाम निम्नलिखित हैं— घनानंद, आनंदघन, आनंद के घन, आनंदनिधान तथा आनंद। ये तीनों एक ही व्यक्ति के नाम हैं अथवा अलग-अलग व्यक्तियों के, यह प्रश्न विवादास्पद है। 'आनंदनिधान' नाम के लिए निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत है—

वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै,
लड़कीली बानि उर ते अरति है।
वहै गति लैन, औ बजावनि ललित बैन,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनंदनिधान प्रान-प्रीतम सुजान जू की,
सुधि सब भाँतिन सो बेसुधि करती है।।

घनानंद के समय को लेकर भी विवाद है। शिवसिंह सरोज के रचयिता शिवसिंह सेंगर के मत से घनानंद का समय संवत् 1617 है। वे 'आनंदघन' नाम को मानकर यह समय निर्धारित करते हैं। जनश्रुति एवं विद्वानों के आधार पर यह कहा जाता है कि घनानंद जी का जन्म संवत् 1746 के आसपास हुआ था। कतिपय विद्वान इनका जन्म संवत् 1715, 1630 तथा 1683 मानते हैं। आज इनका जन्म संवत् 1746 सप्रमाण स्वीकार किया गया है। अन्य तीनों जन्म-संवत् संदिग्ध माने जाते हैं।

आपका जन्म-स्थान दिल्ली अथवा उसके आसपास माना जाता है। अधिकांश विद्वान इसी मत के समर्थक हैं। कुछ विद्वान इनके जन्म-स्थान को वृंदावन एवं बुलंदशहर के निकट का क्षेत्र मानते हैं। आपका जन्म भटनागर कायस्थ परिवार में हुआ। आपकी शिक्षा का प्रारंभ फारसी भाषा से हुआ था। बचपन से ही आपकी रुचि विद्याध्ययन की ओर विशेष थी।

जनश्रुति के आधार पर आप अबुल फ़ज़ल के शिष्य माने जाते हैं। इन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं बुद्धिमत्ता के बल पर शीघ्र ही फारसी का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया था। इसके बाद आप सम्राट मुहम्मद शाह 'रंगीले' के मीर मुंशी पद पर नियुक्त हो गए। आपने अपनी आकर्षक बुद्धि एवं प्रतिभा-संपन्नता के कारण शीघ्र ही उन्नति प्राप्त कर ली और धीरे-धीरे सम्राट के 'खास कलम', अर्थात् प्राइवेट सेक्रेटरी, बन गए।

घनानंद की मृत्यु के संबंध में विद्वानों के दो मत हैं। प्रथम मत के अनुसार नादिर शाह के आक्रमण के समय मथुरा में सैनिकों द्वारा घनानंद की मृत्यु हुई; किंतु इस मत का खंडन इस आधार पर हो जाता है कि नादिर शाह द्वारा किया गया कत्लेआम दिल्ली में हुआ था, मथुरा में नहीं। दूसरे, इस आक्रमण और घनानंद की मृत्यु के समय में भी अंतर है।

द्वितीय मत अब अधिक मान्य है। इसके अनुसार संवत् 1817 (लगभग 1760 ई.) में अहमद शाह दुर्रानी ने जब दूसरी बार मथुरा में कत्लेआम किया, उसी दौरान घनानंद की मृत्यु हुई।

नोट: मूल पाठ में "अब्दुल शाह दुर्रानी" तथा "सन् 1660 ई." मुद्रित है, जबकि ऐतिहासिक रूप से प्रचलित नाम अहमद शाह दुर्रानी तथा समय 1760 ई. के आसपास माना जाता है। यदि आप केवल भाषिक शुद्धि चाहते हैं तो मूल रूप भी रखा जा सकता है।


घनानंद का वियोग-वर्णन

संयोग और वियोग प्रेम के दो छोर हैं। सच्चा प्रेमी इनके बीच अपने को पाता है। कभी वह संयोग-सुख में अपनी अनुभूति को तरोताज़ा करता है, तो कभी वियोग में अपने प्रेम की परीक्षा के दौर से गुजरता है। इसीलिए वियोग को प्रेम की कसौटी कहा गया है। जो प्रेमी इस कसौटी पर खरा उतरता है, वही सच्चा प्रेमी माना जाता है। प्रेम की सात्त्विकता और सघनता विरह में ही दिखाई देती है, जबकि संयोग प्रेम का सुखद रूप है। संयोग से प्रेमी वासना का शिकार बना रहता है, जबकि वियोग में वह वासना से ऊपर उठकर मानसिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वियोग ही प्रेमी की दृढ़ता का परिचायक होता है। वियोग ही उसकी निष्ठा एवं उत्कंठा का द्योतक होता है और वियोग ही एक प्रेमी की प्रिय के प्रति उत्कट चाह, तीव्र आकांक्षा, सुदृढ़ लालसा एवं उद्दाम आकुलता का अनुभावक होता है। घनानंद भी ऐसे ही वियोगी कवि हैं, जिनके हृदय में अपनी प्रेमिका 'सुजान' की उत्कट विरह-भावना भरी हुई है।

रीतिकालीन काव्य में बिना वियोग-श्रृंगार के संयोग का न तो पूर्ण रूपेण आस्वाद ही प्राप्त होता है और न उसके मूल्यों का अंकन किया जा सकता है। प्रेम की आध्यात्मिक परिणति वियोग-श्रृंगार द्वारा ही संभव है। विरह को काव्य की कसौटी माना जाता है। विरह एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मन शुद्ध हो जाता है, उसमें से शारीरिक वासनात्मकता समाप्त हो जाती है। प्रेम के मन से स्वार्थ-भावना नष्ट हो जाती है। वियोगी कवि की भावना पहाड़ी जलप्रपात की तरह बह निकलती है और वही काव्य का रूप धारण कर पाठक के हृदय को स्पर्श कर उसे प्रेम की रसानुभूति कराती है।

संयोग की मधुर स्मृतियाँ वियोगी के लिए बेचैन करती रहती हैं। घनानंद का वियोग उनके हृदय की पीड़ा का प्रतिफल है। उसमें पाठक के हृदय को स्पर्श करने की शक्ति है। वह अपनी सुध-बुध खो देता है। जब पाठक घनानंद का काव्य पढ़ता है, तब उसकी इतनी विशाल हृदय-बोधक रसानुभूति कराने की क्षमता का अनुभव होता है। अपनी प्रेयसी की सुधि में घनानंद स्वयं तो खो गए, परंतु साथ में पाठक को भी विरह की अनन्तोदधि में डुबो दिया। विरह के रस में डूबने का मज़ा तो घनानंद के साथ ही मिलता है।

घनानंद के काव्य में विरह की भी कोई एक दशा नहीं है। वियोगी प्रेमी सोते, उठते-बैठते और हर समय अपनी प्रेयसी को पुकार उठता है। वही बातें, जो हृदय में उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर जागते हुए नहीं मिलता, तो उसके सोते समय 'स्वप्न' में चित्र-सा गतिमान होने लगता है। घनानंद लिखते हैं कि चलो, इस बहाने मन ही बहला लें कि—

जगि सोवनि में लगिये रहे,
चाह वहै गरराय उठै रतियाँ।
भरि अंक निःसंक हियै भेटन कौं,
अभिलाष अनेक भरी छतियाँ।।

सलोनी स्याम-मूरति फिरै आगे,
कटाछैं बान से उर आन-आन लागे।।
मुकुट को लटक हिय में आय हालै,
चितवानी बंक जियरा बीच सालै।।

घनानंद के काव्य में विरह असीम हो गया है। इस दशा में विरहिणी कैसे अपने प्रियतम को पत्र लिख सकती है? ऐसी विरहिणी तो है नहीं, जो आँसुओं की स्याही में डुबो-डुबोकर पत्र लिख डाले। वह अपनी विवशता प्रकट करती है कि—

लिखै कैसे पियारे प्रेम-पाती,
लगै अँसुअन भरी हिय हूंक छाती।।

विरहिणी नायिका सोचती है कि इससे तो अच्छा होता कि नायक गुणवान न होता। कम-से-कम विरहाग्नि में वह उसे इस प्रकार याद आकर उसके हृदय को नोचता तो नहीं। पर क्या करे, उसे याद आ ही जाती है अपने—

"रावरे रूप की मोहिनी सूरत"

उसके आकर्षण का कारण भी तो यही है।

रावरे रूप की रीति अनूप,
नयो-नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिये।

नायिका बेचारी अपने प्रेमी के गुणों और रूप-स्मृति में रो रही है। उसकी मुश्किल यह है कि उसके प्रेमी का रूप उसकी आँखों से ओझल नहीं होता—

छवि को सदन, मोह-मंडित बदन-चंद,
तृषनि चखन लाल! कब धौं दिखाय हो।।

विरहिणी नायिका की निस्वार्थ प्रीति का उत्कर्ष यह है कि वह एक ओर तड़प रही है अपने प्रिय के लिए, परंतु उसके मन से प्रिय के लिए दुआ ही निकलती है कि उसका प्रिय सुख और आनंद से रहे—

घनानंद जीवन-प्रान सुजान,
तिहारिये बातनि लीजिये जू।
नित नीकै रहो, चातु कहाइ,
असीस हमारियौ लीजिये जू।।

वियोग-श्रृंगार में इस प्रकार की त्याग-भावना रीतिकाल के अन्य किसी कवि में इतने उत्कट रूप से नहीं मिलती। उसे अपने प्रेमी के सम्मान का कितना ध्यान है! वह कृष्ण को ठगिया नहीं कहती और न उन्हें कुछ बुरा-भला कहती है। विरह है तो घनानंद की विरहिणी केवल आत्म-निवेदन करती है कि इतनी निष्ठुरता क्यों अपनाई है—

पहलै अपनाय सुजान सनेह सों,
क्यों फिर तेह कै तोरिये।।

घनानंद के यहाँ विरहिणी की विचित्र दशा चित्रित की गई है—

कारी कूर कोकिला! कहाँ कौ बैर काढ़ति री,
कूक-कूक अब ही करेजौ किन कोरिली।
पैंडे परे पापी ये कलापी निसि घोस ज्यों ही,
चातक घातक त्यों ही तू ही कान फोरिली।।

आनंद के घन प्रान-जीवन सुजान बिन,
जानि कै अकेली सब घेरौ दल जोरि लै।
जौलों कहै आवन विनोद बरसावन वे,
तौलों रे ठरारे वजमारे घन घोरिलै।।

रूपासक्ति की प्रधानता

प्रेम का मूलाधार रूपासक्ति ही होता है। यही बात वियोग में पीड़ा को घना कर देती है। घनानंद के उत्कट विरह का मूल कारण यह है कि उनकी 'अलबेली सुजान' अनिंद्य सुंदरी थी। उसमें उन्हें अलौकिक सौंदर्य के दर्शन हुए थे और वे उस सौंदर्य को नित्य देखते रहना चाहते थे। कारण यह था कि वह रूप नित्य नया-नया प्रतीत होता था और उस रूप पर उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। परंतु दुर्भाग्य से वह रूप उनकी आँखों से ओझल हो गया, उन्हें फिर देखने को नहीं मिला और वे अपनी पागल रीझ (मोह-प्रेम) के हाथों बिककर रात-दिन वियोग की आग में जलते रहे—

रावरे रूप की रीति अनूप, नयो-नयो लागत ज्यौं-ज्यौं निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी, अघानि कहूँ नहि आन तिहारियै।।
एक ही जीव हुतो सु तौ वार्यो, सुजान! संकोच और सोच सहारियै।
रोकी रहे न, दहै घनानंद, बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।

घनानंद के प्रेम में रूपलिप्सा का योग तो है, परंतु साहचर्य का उतना व्यापक वर्णन नहीं मिलता, जितना सूर के काव्य में है। कृष्ण की लीलाओं को उतना स्थान नहीं दिया गया, जितना सूर ने दिया है और न यौवनकालीन क्रीड़ाओं को ही विशेष महत्त्व दिया है। घनानंद ने कृष्ण की रूप-माधुरी का वर्णन उसी मार्मिकता, तन्मयता एवं तल्लीनता के साथ किया है, जितना अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने किया है, यथा—

मोर-चन्द्रिका सिर धरें, गरें गुंज की माल।
धातु-चित्र कटि पीत पट, मोहन मदन गोपाल।।

अति कामनीय किशोर बपु, गोपीनाथ उदार।
कमल-नैन क्रीड़ा-निपुण, कान्हर गोप-कुमार।।

कमल-केलि-क्रीड़ा-कुशल, कलानाथ रसवंत।
गोवर्धन-वासी सदा, गोप-कामिनी-कंत।।

लहलहाति जीवन उदय, ब्रजमोहन अंग-अंग।
महारूप-सागर उमगि, उठति अमोघ तरंग।।

इसी प्रकार राधा के रूप-सौंदर्य का भी वर्णन किया है। घनानंद की गोपियाँ कृष्ण के रूप-लावण्य पर आकर्षित हैं तथा मुरली की पावन पंचम-ध्वनि सुनते ही पुलकित हो उठती हैं। राधा का चारुतम रूप-माधुर्य भी कृष्ण को अपनी ओर आकृष्ट करता है और राधा कृष्ण के प्रति 'सैन-नैन' चलाती हैं। राधा का रूप-वर्णन करते हुए कवि कहता है—

लाजनि लपेटी चितवनि भेद-भाव भरी,
लसति ललित लोल चख तिरछानि में।

छवि को सदन, गोरो बदन, रुचिर माल,
रस निरचुरत मीठी मृदु मुसक्यान में।

दसन-दमक फैलि हियें मोती-माल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम-पगी बतरानि में।

आनंद की निधि जगमगति छबीली बाल,
अंग-अंग अनंग-रंग ढुरि मुरजानि में।।

हृदय की मौन पुकार की अधिकता

घनानंद का विरह बौद्धिक नहीं है, वह उनके हृदय की सच्ची अनुभूति है। जहाँ विरह बौद्धिक होता है, वहाँ प्रदर्शन एवं आडंबर का आधिक्य देखा जाता है; किंतु जहाँ हृदय की अनुभूति होती है, वहाँ प्रदर्शन और आडंबर कहाँ! वहाँ तो हृदय की टीस, प्राणों की तड़पन एवं आकुलता बाहर सुनाई नहीं पड़ती, क्योंकि हृदय बोल नहीं पाता, वह मौन रहकर ही धड़कता रहता है—

अंतर-आँच उसास तचै अति, अंत उसीजै उदेग की आवस।
ज्यौं कहलाय मसोसनि ऊमस, क्यों हूँ कहूँ सुधरैं नहीं थावस।।

प्रियजन्य निष्ठुरता

घनानंद के विरह की तीव्रता एवं उत्कटता का मूल कारण यह है कि उनका प्रिय बड़ा कठोर, निर्दयी, निष्ठुर तथा विश्वासघाती है। उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है। वह इनकी दुर्दशा देखकर तनिक भी नहीं पसीजता और अब उसने जान-पहचान भी मिटा डाली है। वह निष्ठुरता एवं कठोरता का व्यवहार करके अब रात-दिन जलाता रहता है—

भए अति निठुर मिटाय पहिचानि डारी,
याही दुख हमैं जक लागी हाय-हाय है।

तुम तो निपट निरदई, गई भूमि-सुधि,
हमैं सूल-सेलनि सों क्यों हूँ न भुलाय है।।

प्रेमगत विषमता

घनानंद के विरह में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकांगी है, सम नहीं, अपितु विषम है। जो तड़पन, चीत्कार, जलन और धड़कन है, वह केवल एक ओर ही है। प्रेमी का हृदय अपनी प्रेयसी 'सुजान' के विरह में रात-दिन तड़पता रहता है, लेकिन प्रिय के हृदय में विरह की तनिक भी आग नहीं है। परंतु प्रेमी घनानंद को इसकी चिंता नहीं है कि उनका प्रिय उनके प्रति कैसा भाव रखता है। वे तो अपने प्रिय के अनन्य प्रेमी हैं—

चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनंदघन,
प्रीति-रीति विषम सु रोम-रोम रमी है।।

उपालम्भ की तीव्रता

घनानंद के विरह में उपालम्भ अत्यंत गूढ़ता एवं गंभीरता के साथ दृष्टिगोचर होता है। इस उपालम्भ में प्रेम की निष्ठा भी है, उत्कटता भी है और प्रिय की उदासीनता भी भरी हुई है। इसी कारण विरही स्वयं को दीन, हीन, दुखी एवं अनन्य प्रेमी कहता है तथा प्रिय को कपटी, विश्वासघाती और निर्मोही—

अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपौ, झिझकै कपटी जे निसाँक नहीं।।

अंग-प्रत्यंग की आकुलता

घनानंद के विरह में आँख, कान, हृदय, प्राण आदि अंग-प्रत्यंगों की अत्यधिक आकुलता, बेचैनी एवं दयनीय स्थिति का चित्रण हुआ है। इसका कारण यह है कि विरही घनानंद के सारे शरीर में विरह का विष फैला हुआ है। अंग-प्रत्यंग में विरह की आग लगी हुई है, जिससे उनके प्राण नित्य दहकते रहते हैं। नेत्र मदमाते होकर आँसू बहाते रहते हैं—

जिनकों नित नीके निहारति ही आँखियाँ, अब रोवति हैं।
पल-पाँवड़े पायनि सों अँसुबानि की धारनि धोवति हैं।।

प्रकृतिजन्य उद्दीपन

घनानंद की विरह-वेदना को तीव्र से तीव्रतर बनाने में प्रकृति का भी अत्यधिक हाथ रहा है। कारण यह है कि प्रकृति के ये उपादान विरही पर कहर ढाने का कार्य करते हैं। कभी पुरवैया हवा चलकर, कभी बादल घिरकर, कभी बिजली चमककर, कभी पुष्प अपनी सुगंध से और कभी कोकिला कूककर विरही को रात-दिन सताते हैं—

कारी कूर कोकिल! कहाँ कौ बैर काढ़ति री,
कूकि-कूकि अबही करेजो किन कोरि ले।।

संदेश-प्रेषणीयता

घनानंद के विरह में एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें विरही अपने विरह का संदेश बड़े अनूठे ढंग से अपने प्रिय के पास भेजता है। उसने इस दूत-कार्य के लिए ऐसे धीर-गंभीर मेघ को चुना है, जो उसी की तरह विरह की आग को अपने हृदय में छिपाए हुए है, जो उसी की तरह प्रिय के वियोग में मत्त होकर घूमता रहता है, जो दूसरों के लिए ही अपना शरीर धारण किए हुए है और जो परजन्य (बादल) कहलाता है। ऐसे धीर-गंभीर सज्जन से दूत-कार्य कराना सर्वथा उचित है—

पर काजहिं देह को धारि फिरौं, परजन्य जथारथ है दरसौ।
निधि-नीर सुधा के समान करौ, सबही विधि सज्जनता सरसौ।

घनआनंद जीवन-दायक हौ, कुछ मेरीयों पीर हियै परसौ।
कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन मो अँसुवानि हुलै बरसौ।।

सात्त्विकता एवं आध्यात्मिकता

घनानंद के विरह की अंतिम और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें तनिक भी वासना की गंध नहीं है। कहीं भी अश्लीलता नहीं है, किसी भी स्थल पर कामुकता नहीं है और कोई भी उक्ति काम-परक नहीं है। यहाँ प्रत्येक पद में सात्त्विकता है, प्रत्येक पद में प्रेम की पवित्रता है, प्रत्येक छंद में प्रेम की दिव्यता है और प्रत्येक उक्ति में कामजन्य वासना से सर्वथा परे आध्यात्मिक वंदना की शुद्धता है—

लहा छेह कहाधौं मचाय रहे, ब्रजमोहन हौ उत नींद भरे हौ।
मिली होति न भेंट, दूरे उधरौ, ठहरै ठहरानि क लाभ परे हौ।।

घनानंद छाय रहौ नित हो, हित-प्यासनि चातक ज्ञात परे हौ।।

घनानंद की विरहानुभूति में शुद्ध एवं सात्त्विक विरह की व्यंजना हुई है। इसमें हृदय की गहराई अधिक है। अपनी यथार्थता, सात्त्विकता, पवित्रता एवं आध्यात्मिकता के कारण ही घनानंद की विरहानुभूति सर्वोत्कृष्ट है और अपनी इसी सात्त्विक विरह-भावना के कारण घनानंद हिन्दी के सर्वोत्कृष्ट विरही कवि हैं।

घनानंद का अनुभूति पक्ष या भावपक्ष

घनानंद के अनुभूति पक्ष अथवा भावपक्ष का सम्यक् अनुशीलन करने के लिए उनके काव्य में यह देखना आवश्यक है कि उन्होंने विविध वस्तुओं का वर्णन कैसे किया है, विविध भावों के निरूपण में कैसा कौशल दिखाया है, विविध रसों की अभिव्यंजना में कैसी दक्षता प्रकट की है और विविध सौंदर्य-चित्रों को अंकित करने में अपनी जो कला-चातुरी व्यक्त की है, उसे निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है—

वस्तु-वर्णन

घनानंद ने ब्रज प्रदेश के प्रति अपनी गहन आस्था एवं असीम श्रद्धा व्यक्त की है। इसी कारण उन्होंने ब्रज के गाँवों, यमुना, वृंदावन आदि का अत्यंत सजीव निरूपण किया है—

जमुना तीर गाँव राजनि,
कहा कहौं गोकुल-छवि-छाजनि।।

गोकुल-छवि आँखिन हीं भावै,
रही न सकै, रस न कछु गावै।।

इसी प्रकार ब्रज के अन्य स्थानों का वर्णन करते हुए घनानंद ने सर्वाधिक वृंदावन की मंजुल छवि का निरूपण किया है—

वृंदावन-छवि कहत न आवै,
सो कैसे कहि कोऊ गावै।।

तीर-भूमि बनि रह्यौ सदावन,
जै जमुना, जै जै वृंदावन।।

इसी प्रकार घनानंद ने ब्रज के घर, गाँव, गली, गलियारे, घाट, पनघट, गोप, ग्वाल-बाल, गाय, वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन आदि का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया है।

प्रकृति-चित्रण

घनानंद ने प्रकृति के अत्यंत रमणीय चित्र अंकित किए हैं। वे सच्चे प्रकृति-प्रेमी थे और प्रकृति के साथ उनका साहचर्य भी अधिक रहा था। इसलिए उन्होंने प्रकृति के अनेक सुंदर एवं सजीव चित्र अंकित किए हैं—

घुमड़ि पराग लता-तरु भोए,
मधु-ऋतु-सौंज-समोए।।

वन बसंत बरनत मन फूल्यौ,
लता-लता झूलनि संग झूल्यौ।।

प्रकृति के आलंबन-रूप की अपेक्षा घनानंद ने प्रकृति के उद्दीपन-रूप का चित्रण अधिक सरसता एवं मार्मिकता के साथ किया है, क्योंकि उनका काव्य विरह-प्रधान है और विरह में प्रकृति प्रायः विरही जनों के भावों को उद्दीप्त करती हुई दिखाई जाती है—

लहकि-लहकि आवै ज्यौं पुरवाई पौन,
दहकि-दहकि त्यौं-त्यौं तन तावरे तवै।

बहकि-बहकि जात बदरा बिलोकें हियौ,
गहकि-गहकि गहबरनि गरै मचै।

चहकि-चहकि डारै चपला चखनि चाहैं,
कैसे घनानंद सुजान बिन ज्यौं बचै।।

भाव-निरूपण

घनानंद की कविता भावों का भंडार है, क्योंकि घनानंद ने ऐसे मार्मिक भावों का चित्रण किया है कि देखते ही बनता है और एक साधारण कवि जहाँ तक पहुँच नहीं सकता। घनानंद की इस भाव-निरूपण पद्धति पर सर्वत्र उनके गहन प्रेम की छाप है। इसी कारण उनके सभी भाव-चित्र इतने मनोरंजक एवं आकर्षक बन पड़े हैं कि पाठक एवं श्रोता उन्हें पढ़कर तथा सुनकर आनंद के सागर में डुबकियाँ लगाने लगते हैं—

नैन कहैं, सुनि रे मन! कान दै, क्यों इतनी गुन मोहि दयौ है।
सुंदर प्यारे सुजान कौ मंदिर, बावरे! तू हम ही ते भयौ है।।

लोभी तिन्हें तन कों न दिखावत, ऐसो महामद छाकि गयौ है।
कीजिए जू घनानंद! आय कै पायै परौ, यह न्याय नयौ है।।

इसी प्रकार घनानंद ने उपालम्भ के द्वारा स्मृति का चित्र अंकित करते हुए आवेग, अमर्ष, उग्रता, ग्लानि आदि भावों का बड़ा ही मार्मिक निरूपण किया है—

क्यों हँसि हेरि हर्यो हियरा, अरु क्यों हित कै चित्त चाह बढ़ाई।
काहे को बोलि सुधासने बैननि, चैननि मैन-निसैन चढ़ाई।।

सो सुधि मोहिय मैं घनानंद सालति, क्यों हूँ कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीति की पाटी, इतै पै न जानियै कौने पढ़ाई।।

रस-निरूपण

घनानंद ने मुख्यतः संयोग-श्रृंगार, वियोग-श्रृंगार एवं भक्ति-रस का निरूपण किया है। इनमें भी वे वियोग-श्रृंगार के ही कवि हैं, वियोग के अद्वितीय चितेरे हैं। उनके काव्य में वियोग-श्रृंगार का परिपक्व, मार्मिक एवं सजीव चित्रण मिलता है।

वे अपनी संजीवन-मूर्ति ‘सुजान’ के वियोग में रात-दिन व्यथित रहते हैं। सोने पर भी सो नहीं पाते, जागने पर भी चैन नहीं मिलता। विचित्र-सी पीड़ा नित्य आँखों में रह-रहकर आती है। अमृत विषतुल्य प्रतीत होता है, फूल शूल जैसे लगते हैं, चंद्रमा अंधकार उगलता हुआ जान पड़ता है, पानी अंगों को जलाता है, राग-रागिनियाँ अच्छी नहीं लगतीं, गुण दोष में बदल गए हैं और औषधियाँ भी रोग बढ़ाने वाली हो गई हैं। इस प्रकार ‘सुजान’ के मन फेर लेने से उनके दिन भी फिर गए हैं—

सुधा तें स्त्रवत विष, फूल में जगत सूल,
तम उगलत चंदा, भई नई रीति है।

जल जारै अंग, और राग कर सुर-भंग,
संपति विपति पारै, बड़ी विपरीत है।।

सहगुन गहै दोषैं, औषधि हूँ रोग पोषै,
ऐसे जान रस माहि बिरस अनीति है।

दिनन को फेर मोहिं तुम मन फेरि डार्यो,
एहो घनानंद! न जानौं कैसे बीति है।।

सौंदर्य-चित्रण

घनानंद ने रूप-सौंदर्य के अनेक मनोहारी चित्र अंकित किए हैं, जिनमें उनकी प्राणप्रिया ‘सुजान’ की विविध रूप-छवियाँ अत्यंत माधुर्य एवं गांभीर्य के साथ विद्यमान हैं। उन्होंने आँख, नाक, कान आदि अंगों का पृथक-पृथक वर्णन करने की अपेक्षा समग्र व्यक्तित्व की रमणीयता को चित्रित करने का प्रयास किया है।

स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सोहै अमावस-अंग उज्यारी।
धूम के पुंज में ज्वाल की माल-सी, पै दृग-सीतलता-सुखकारी।।

कै छवि छायौं सिंगार निहारि सुजान-तिया-तन-दिपति प्यारी।
कैसी फबी घनानंद! चोपानि सों पहिरी चुनि साँवरी सारी।।

इसी प्रकार घनानंद ने अंग-अंग में द्युति की तरंग उठने वाले पार्थिव रूप-सौंदर्य को बड़ी तन्मयता एवं तत्परता के साथ शब्दों में बाँधकर अंकित किया है।

घनानंद का अभिव्यक्ति पक्ष अथवा कला-पक्ष

किसी कवि के अभिव्यक्ति-पक्ष से तात्पर्य उसकी उस वर्णन-पद्धति से है, जिसमें वह अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। इसके लिए वह अनेक उपकरणों का सहारा लेता है तथा उनके माध्यम से अपनी अनुभूति को कलात्मक रूप प्रदान करता है। भाषा, अलंकार, गुण, वृत्ति, शब्द-शक्ति, छंद आदि सभी तत्व अभिव्यक्ति-पक्ष के अंतर्गत आते हैं।

भाषा

घनानंद ने ब्रजभाषा में अपनी सरस काव्यधारा प्रवाहित की है। उनकी ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता, एकरूपता एवं सुघड़ता के दर्शन होते हैं। वे ब्रजभाषा के अत्यंत प्रवीण कवि थे। इसी कारण उनकी भाषा भावों के अनुकूल चलने की अपूर्व शक्ति रखती है। वह नई-नई भंगिमाओं के माध्यम से भावों को प्रस्तुत करने में अत्यंत सक्षम प्रतीत होती है।

घनानंद का भाषा पर इतना अधिक अधिकार था कि वह कवि की वशवर्तिनी होकर उनके संकेत पर चलती दिखाई देती है। ऐसा जान पड़ता है कि वे ब्रजभाषा की नाड़ी पहचानते थे, उसके प्रयोगों से भली-भाँति परिचित थे और उसकी प्रत्येक क्षमता का उपयोग करना जानते थे।

उनकी भाषा साफ-सुथरी, निखरी हुई तथा भावों के निरूपण की अनंत शक्ति से युक्त है।

शब्द-शक्ति

शब्द की तीन शक्तियाँ मानी गई हैं— अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। जिन शब्दों में ये शक्तियाँ होती हैं, वे क्रमशः वाचक, लक्षक और व्यंजक कहलाते हैं।

घनानंद के काव्य में लक्षणा और व्यंजना का विशेष महत्त्व है। उन्होंने उक्ति-वैचित्र्य के लिए, भावों को गहन बनाने के लिए तथा सरसता उत्पन्न करने के लिए लाक्षणिक प्रयोगों का अधिक सहारा लिया है। इसीलिए उनका काव्य अभिधा की अपेक्षा लक्षणा और व्यंजना-प्रधान माना जाता है।

अलंकार

काव्य में अलंकारों का प्रयोग कथन में चारुता एवं भव्यता लाने के लिए किया जाता है। अलंकार भावों की तीव्रता बढ़ाते हैं तथा वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया को अधिक प्रभावपूर्ण बना देते हैं।

घनानंद के काव्य में जहाँ रस और भावों की प्रचुरता है, वहीं अलंकारों ने उन्हें और अधिक सजीवता तथा प्रभावशीलता प्रदान की है। उन्होंने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का सफल प्रयोग किया है।

गुण

काव्य के तीन प्रमुख गुण माने गए हैं— माधुर्य, ओज और प्रसाद।

  • माधुर्य — हृदय को द्रवित करने वाला।

  • ओज — चित्त में उत्साह एवं स्फूर्ति उत्पन्न करने वाला।

  • प्रसाद — सहजता से अर्थबोध कराने वाला।

घनानंद के काव्य में सर्वाधिक माधुर्य गुण की प्रधानता है, क्योंकि उन्होंने मुख्यतः विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार का चित्रण किया है—

रैन-दिना धुटिबौ करें, प्रान झरैं अखियाँ झरना सो।
प्रीतम की सुधि अंतर में कसकै, सखी! ज्यों पँसुरीन में गाँसी।।

छंद

यद्यपि काव्य का छंद से नित्य संबंध नहीं है, तथापि छंद काव्य को विशेष प्रभावशीलता प्रदान करता है। घनानंद का संपूर्ण काव्य छंदों की रस-माधुरी से ओत-प्रोत है।

उन्होंने अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग किया है, जैसे—

  • सवैया

  • कवित्त

  • त्रिलोकी

  • ताटंक

  • निसाती

  • सुमेरु

  • शोभन

  • त्रिभंगी

  • दोहा

  • चौपाई

  • घनाक्षरी पद

इनमें विशेष रूप से सवैया और कवित्त छंदों का प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है। सवैया छंद पर उनका असाधारण अधिकार था, इसलिए उन्हें सवैया का सिरताज कहा जाता है।

रीतिमुक्त स्वच्छंद काव्यधारा में घनानंद का स्थान

हिन्दी की संपूर्ण स्वच्छंद प्रेम-काव्यधारा का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि इस धारा के प्रमुख कवियों में रसखान, आलम, घनानंद, ठाकुर और बोधा के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी कवि प्रेम-काव्य के प्रमुख प्रणेता हैं और इन्होंने स्वच्छंदता के साथ प्रेमानुभूति का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। परंतु इनमें घनानंद सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, क्योंकि घनानंद के काव्य में रसखान की-सी प्रेम की अनिर्वचनीयता भी है। परंतु इन सबसे बढ़कर घनानंद में कुछ ऐसे असाधारण काव्य-सौष्ठव के दर्शन होते हैं, जो न रसखान में हैं, न आलम में, न ठाकुर में और न बोधा में।

घनानंद ने 'सुजान' को आलंबन बनाकर अपनी इस लौकिक प्रेयसी के रूप-सौंदर्य का इतना मार्मिक एवं मनोरंजक वर्णन किया है कि देखते ही बनता है। सुजान की तिरछी चितवन, धूमते कटाक्ष, रसीली हँसी, मृदु मुस्कान, अरुण होठ, कान्तिमंडित दंतावली, केशराशि, वक्रिम भौंहें, विशाल नेत्र, गर्वीली मुद्रा, उन्नत यौवन आदि पर मुग्ध घनानंद ने उसकी रूप-निकाई के अनेक संश्लिष्ट चित्र अंकित किए हैं। जहाँ उन्होंने अपनी प्रेम-विभोरता का परिचय दिया है, वहीं मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार की इस नर्तकी के प्रति ऐसा प्रणय-निवेदन किया है, जो हिन्दी-काव्य की स्थायी संपत्ति बन गया है।

घनानंद की श्रेष्ठता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उनके हृदय में सुजान के प्रति उत्कृष्ट प्रेम एवं असीम व्यामोह भरा हुआ था। उनके मन में सुजान की अक्षय रूप-राशि समाई हुई थी। इसीलिए घनानंद का काव्य प्रेम की गूढ़ता से भरा हुआ है, अतृप्ति की अनंतता से भरा हुआ है, अंतर्द्वंद्व की अलौकिकता से भरा हुआ है, वेदना की अक्षयता से भरा हुआ है और तीव्र अनुभूति की अखंडता से भरा हुआ है।

घनानंद जैसा उक्ति-वैचित्र्य अन्य कोई कवि नहीं दिखा सका। उनकी-सी लाक्षणिक मूर्तिमत्ता किसी अन्य रचनाकार में दृष्टिगोचर नहीं होती और उनका-सा प्रयोग-वैचित्र्य कहीं ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता। निःसंदेह वे प्रेम के जितने बड़े धनी थे, उतने ही भाषा के भी धनी थे और उतने ही अभिव्यंजना-कौशल के भी। इसी कारण हिन्दी काव्य की रीतिमुक्त स्वच्छंद प्रेमधारा में घनानंद का शीर्षस्थ स्थान है।

घनानंद की रचनाएँ

घनानंद द्वारा लिखित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं। सबसे पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'सुजान शतक' नामक पुस्तक में घनानंद की कविताओं का संकलन किया। इसके अतिरिक्त 'सुजानहित' तथा 'सुजान सागर' नामक संकलन भी प्रकाश में आए।

इस क्षेत्र में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा घनानंद पर किया गया शोध-कार्य अत्यंत सार्थक सिद्ध हुआ। उन्होंने घनानंद की कविताओं को संकलित कर तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं।

प्रथम 'घनानंद कवित्त' नामक संकलन था, जिसमें 502 कवित्त संग्रहित हैं। द्वितीय संकलन सन् 1945 में प्रकाशित हुआ, जिसमें कवित्त-सवैयों के अतिरिक्त घनानंद के लगभग 500 पद तथा उनकी 'वियोग-बेलि', 'यमुना-यश', 'प्रीति-पावस' तथा 'प्रेम-पत्रिका' रचनाओं का संग्रह है।

इसके पश्चात् सन् 1952 में घनानंद की अन्य 36 कृतियों का संकलन करते हुए 'घनानंद ग्रंथावली' का प्रकाशन हुआ।

काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा संवत् 2000 तक की खोज के आधार पर निम्नलिखित कृतियाँ घनानंद की मानी गई हैं—

  1. घनानंद कवित्त

  2. आनंदघन के कवित्त

  3. कवित्त

  4. स्फुट कवित्त

  5. आनंदघन जू के कवित्त

  6. सुजानहित

  7. सुजानहित प्रबंध

  8. कृपाकंद निबंध

  9. वियोग-बेला

  10. इश्कलता

  11. जमुना-यश

  12. आनंदघन जी की पदावली

  13. प्रीति-पावस

  14. सुजान-विनोद

  15. कविता-संग्रह

  16. रस-केलि-वल्ली

  17. वृंदावन-सत

निष्कर्ष

घनानंद रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छंद प्रेम-कवि माने जाते हैं। उनकी कविता में प्रेम की गहन अनुभूति, विरह की तीव्र वेदना, भाषा की मधुरता, अभिव्यक्ति की मार्मिकता तथा अनुभूति की सच्चाई का अद्भुत समन्वय मिलता है। इसीलिए उन्हें हिन्दी साहित्य में "प्रेम और विरह का सर्वाधिक मार्मिक कवि" कहा जाता है। उनकी काव्य-साधना रीतिमुक्त काव्यधारा की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाती है।



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उल्टी के लक्षण, कारण, इलाज, दवा और उपचार



उल्टी आने के कई कारण हो सकते हैं। जब कभी हमारा शरीर किसी ऐसी चीज को ग्रहण कर लेता है जो संक्रमित हो, तो ऐसे में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उसे उल्टी के माध्यम से शरीर के बाहर भेज देता है। इसके अलावा भी ज्यादा खा लेने की वजह से, ज्यादा शराब पी लेने की वजह से, एसिडिटी या फिर माइग्रेन की वजह से उल्टी की समस्या होती है। गर्भवती महिलाओं को भी उल्टी की समस्या से काफी परेशान होना पड़ता है। इसके विभिन्न कारणों में स्टोमक के भीतर ब्लीडिंग होना, इन्फेक्शन, इरिटेशन, इन्टेस्टाइन में ब्लॉकेज, बॉडी केमिकल्स और मिनरल्स कम-ज्यादा होना, बॉडी में टॉक्सिसिटी होना भी शामिल हैं।

ultee ke lakshan, kaaran, ilaaj, dava aur upachaar
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  1. उल्टी के कारण कई तरह के हो सकते हैं जिनमें फूड-पॉइजनिंग, इन्फेक्शन, ब्रेन और सेंट्रल नर्वस सिस्टम में समस्या होना या कोई सिस्टमिक डिजीज होना शामिल हैं।
  2. कई बार उल्टी होने का कारण कोई दवाई का साइड इफ़ेक्ट,कैंसर कीमोथेरेपी में उपयोग में ली गई ड्रग्स या फिर रेडिएशन थेरेपी भी हो सकती हैं।
  3. कई बार अल्कोहल, बियर, वाइन और लिक्वर केमिकल-एसीटैल्डिहाइड में बदल जाते हैं,जिसके कारण अगली सुबह जी मिचलाना जैसी फीलिंग आती हैं जिसे हैंग-ओवर कहते हैं।
  4. कुछ बीमारियों में जी घबराना और उल्टी आना आम होता है। जबकि उस समय रोगी में गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल ट्रैक्ट या स्टमक का उल्टी के लिए कोई कारण नहीं होता जैसे निमोनिया,हार्ट अटैक और सेप्सिस।
  5. कुछ वाइरल इन्फेक्शन, सर में लगी चोट, गालब्लेडर डिजीज, एपेंडीसाईटीस, माइग्रेन, ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन इन्फेक्शन, हाइड्रोसिफेलस (ब्रेन में बहुत सा फ्लूइड जमा होना,सर्जरी में उपयोग आने वाले एनेस्थिशिया के साइड इफ़ेक्ट,स्टोमक प्रोब्लम जैसे ब्लॉकेज (पाइलोरिक ओबस्ट्रेकशन,वो स्थिति जिसके कारण बच्चों में फोर्सफुल थूक बाहर आता हैं) भी उल्टी के कारण हो सकते हैं।
  6. प्रेगनेंसी के दौरान जी मिचलाना और उल्टियां लगातार होती रहती हैं। सामान्यतः शुरुआती कुछ महीनों में मोर्निंग सिकनेस होती हैं लेकिन कई बार ये पूरे 9 महीने भी चल जाती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार उल्टी के प्रकार और कारण
 उल्टी आना कोई गंभीर समस्या नहीं है, बल्कि दिनचर्या, खानपान में बदलाव के कारण भी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन आयुर्वेद में उल्टी के इन 5 प्रकारों का वर्णन मिलता है।
  1. आगंतुज : इस तरह की उल्टी बदबू, गर्भावस्था, अरूचिकर भोजन, पेट में कीड़े या किसी स्थान विशेष पर जाने से हो सकती है। इस तरह की उल्टी को आगन्तुज छर्दि भी कहते हैं।
  2. कफज : कफ के कारण होने वाली उल्टी इस श्रेणी में आती है। इसमें उल्टी का रंग सफेद और प्रकार गाढ़ा होगा। इसका स्वाद मीठा होता है। मुंह में पानी भरना, शरीर का भारी होना, बार-बार नींद आना, जैसे लक्षण इस प्रकार की उल्टी में होना स्वाभाविक हैं।
  3. त्रिदोषज : त्रिदोषज उल्टी वह होती है जो वात, पित और कफ, तीनों कारणों के चलते होती है। यह गाढ़ी, नीले रंग की या खून की हो सकती है। स्वाद में नमकीन या खट्टी हो सकती है। इसके अलावा पेट में तेज दर्द, भूख में कमी, जलन, सांस लेने में परेशानी और बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  4. पित्तज : पित्त की गर्मी के कारण होने वाली उल्टी पित्तज की श्रेणी में आती है। इस स्थिति में पीले, हरे रंग की उल्टी आती है और मुंह का स्वाद बेहद बुरा होती है। इसमें भोजन नली व गले में जलन हो सकती है। सिर घूमना, बेहोशी भी इसके लक्षणों में शामिल है।
  5. वातज : पेट में गैस से होने वाली उल्टी वातज की श्रेणी में आती है। इस तरह की उल्टी कम मात्रा में कड़वी, झाग वाली और पानी जैसी होती है। लेकिन कई बार इसके साथ सिर का दर्द, सीने में जलन, नाभि में जलन, खांसी और आवाज का खराब होना आदि समस्याएं भी होती हैं।
उल्टी रोकने के कुछ अन्य घरेलू इलाज
  1. खाने के तुरंत बाद ना सोयें।
  2. खाने के तुरंत बाद ब्रश ना करें, इससे वोमिट होने के सबसे ज्यादा चांस होते है।
  3. गुलुकोस, एलेक्ट्रोल जैसी चीज पीते रहें।
  4. जितना हो सके आराम करें।
  5. तेज सुगन्धित वाली जगह में ना बैठे, इससे जी और ज्यादा मचलाता है।
  6. बहुत हल्का एवं कम तेल मसाले वाला भोजन लें, एवं धीरे धीरे खाएं।
  7. वोमिट जैसा महसूस होने पर, एक एक घूँट पानी पीते रहें।
उल्टी रोकने के आयुर्वेदिक घरेलू इलाज
  1. अदरक पाचन-तन्त्र के लिए बहुत अच्छा होता हैं और उल्टियाँ रोकने के लिए प्राकृतिक रूप से एंटी-एमेटिक के जैसे काम करता हैं। एक चम्मच अदरक के रस और नीम्बू के रस को मिलाकर दिन में 2-4 बार लेने से उल्टियाँ होना और जी घबराना बंद हो जाता हैं। इसके अलावा अदरक के छोटे टुकड़े मुंह में रखने पर भी थोड़ी देर के लिए आराम मिलता हैं । शहद के साथ अदरक की चाय बनाकर भी ली जा सकती हैं।
  2. अदरक में पेट की हर समस्या से निपटने का इलाज होता है। इसके एक टुकड़े को कूचकर पानी में मिला लीजिए। इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर इसका सेवन कीजिए। उल्टी से तुरंत लाभ मिलेगा।
  3. उल्टी आने की स्थिति में दो चार लौंग लेकर दांतों के नीचे दबा लें और इसका रस चूसते रहें। इसका स्वाद उल्टी को तुरंत रोकने में कारगर होता है। यह मुंह की तमाम समस्याओं का भी बेहतरीन निदान है। दांतों की सेंसिटिविटी के लिए लौंग अचूक औषधि है।
  4. उल्टी जैसा जी होने पर नींबू का एक टुकड़ा मुंह में रख लें। इससे उल्टी में काफी राहत मिलती है।
  5. एक चम्मच पुदीने की पत्ती का जूस,नींबू का रस और शहद मिलाकर दिन में 3 बार पीने से भी उल्टियां कम होने लगती हैं।
  6. एप्पल साइडर विनेगर भी बेचैनी को कम करता हैं,यह डीटॉक्सीफिकेशन भी करता हैं,इसमें एंटी-माइक्रोबियल गुण होने के कारण यह फूड-पॉइजनिंग भी सही करता हैं। एक चम्मच एप्पल साइडर विनेगर और एक चम्मच शहद को पानी में मिलाकर पीने से जी घबराना और उल्टी होना कम हो सकता हैं। उल्टी होने के कारण मुंह का खराब स्वाद और गंध भी इससे कम की जा सकती हैं। आधे कप पानी में 1 चम्मच विनेगर मिलाकर पीने से मुंह खराब स्वाद और गंध के कारण बार-बार उल्टियां नहीं होती।
  7. ऐसे में इस समस्या से निपटने के लिए आपको कुछ घरेलू उपाय जरूर आजमाने चाहिए। इससे आपको उल्टी की समस्या से तुरंत आराम मिलता है।
  8. कभी भी उल्टी आने पर पुदीने की चाय बनाकर पी लीजिए या फिर केवल उसकी पत्ती को चबाइए। उल्टी से तुरंत राहत मिल जाएगी।
  9. जामुन के पेड़ की छाल का पाउडर बना ले इसे 10 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रखें,और अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर रोज 2-3 चम्मच इसे पीये। यह ब्लड शुगर को भी कम करता हैं इसलिए लोग इसे डाईबिटिज में भी पीते हैं।
  10. ताजा संतरे का जूस उल्टी में काफी लाभदायक ट्रीटमेंट है। इसके कई अन्य फायदे भी हैं। जैसे, यह शरीर में ब्लड प्रेशर के नियंत्रण के लिए भी बेहद लाभदायक है।
  11. दालचीनी भी जठर संबंधी समस्याओं को शांत करती हैं। इसे लेने से भी जी मिचलाना और उल्टी होने जैसे समस्याओं में कमी आती हैं। एक कप पानी में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर डालकर उबालें और इस पानी को पिए,इसमें शहद भी मिला सकते हैं। हालांकि ये उपाय गर्भवती महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
  12. दिन में कई बार सैंफ चबाना उल्टी में बेहद फायदेमंद है। यह मुंह के स्वाद को बदलने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। इसे खाने के बाद उल्टी से काफी राहत मिलती है।
  13. नींबू और प्याज का रस भी मिलाकर पीने से उल्टियां कम हो सकती हैं।
  14. पुदीने की चाय भी पाचन तन्त्र को संतुलित रखती हैं। यदि ताज़ी पत्तियां उपलब्ध हो तो उन्हें चबाए लेकिन यदि ना हो तो एक चम्मच सुखी पुदीने की पत्तियों को गर्म पानी में डालकर इसके चाय बनाए।
  15. पेट की एसिडिटी शांत रखने के लिए तथा खाना हजम करने के लिए इलायची भी काफी कारगर उपाय है।
  16. मीठी तुलसी की पत्तियों की खुशबू भी उल्टी को कम करती हैं। इसका जूस बनाकर एक ग्लास गर्म पानी में 2 चम्मच शहद मिलाकर पीने से उल्टी होना और जी मिचलाना कम हो जाते हैं।
  17. यदि डॉक्टर की सलाह ले चुके हो या फिर उल्टी होने का कारण समझ आ चुका हो, तो कुछ घरेलू उपायों से भी लगातार होने वाली उल्टियों को रोका जा सकता हैं।
  18. लौंग भी गैस्ट्रिक इरिटेबिलिटी को कम करती हैं, लौंग की चाय बनाई जा सकती हैं या फिर तले हुए लौंग को शहद के साथ मिलाकर भी लिया जा सकता हैं।


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गुर्दे के पथरी के रामबाण घरेलू उपाय एवं उपचार



किडनी में पथरी होना एक आम समस्या हो गई है। हमारी जिन्दगी में किडनी स्टोन गलत खानपान का नतीजा है और लगातार इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यूरिक एसिड, फास्फोरस, कैल्शियम और ऑक्जेलिक एसिड। यही सारे तत्व स्टोन बनाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। कुछ पथरी रेत के दानों की तरह बहुत छोटे आकार के होते हैं तो कुछ मटर के दाने की तरह। इसके साथ ही बहुत अधिक मात्रा में विटामिन डी के सेवन से, डिहाइड्रेशन और अनियमित डाइट की वजह से भी किडनी में स्टोन हो जाता है। आमतौर पर पथरी मूत्र के जरिये शरीर के बाहर निकल जाती है, लेकिन जो पथरी बड़ी होती है वह बहुत ही परेशान करती है। किडनी में स्टोन हो जाने पर पेट में हर वक्त दर्द बना रहता है।
घर के बुजुर्गों के पास अक्सर हर दर्द का इलाज होता है और हम लोगो ने अपने घर में बड़े बुजुर्गों जैसे कि दादा-दादी या नाना-नानी को कहते सुना होगा कि सुबह खाली पेट 3-4 गिलास पानी पीने से पेट की सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। ऐसे ही कितने घरेलू नुस्खे हमें दादी और अन्य लोगों से सुनने को मिले हैं। आज हम पेट और किडनी में पथरी के इलाज के लिए दादी मां के कुछ नुस्खे यानी ऐसे नुस्खे जानेंगे जिन्हें आप घर पर आजमा सकते हैं -
  1. 2-15 दाने बड़ी इलायची, एक चम्मच खरबूजे के बीज की गिरी और दो चम्मच मिश्री एक कप पानी में पीस-मिलाकर सुबह-शाम दो बार पीने से पथरी निकल जाती है।
  2. अजवाइन किडनी के लिए टॉनिक के रूप में काम करता है। किडनी में स्टोन के गठन को रोकने के लिए अजवाइन का इस्तेमाल मसाले के रूप में या चाय में नियमित रूप से किया जा सकता है।
  3. अनार का रस किडनी स्टोन के खिलाफ बहुत ही असरदार और सरल घरेलू उपाय है। अनार के कई स्वास्थ्य लाभ के अलावा इसके बीज और रस में खट्टेपन और कसैले गुण के कारण इसे किडनी स्टोन के लिए प्राकृतिक उपाय के रूप में माना जाता है।
  4. आंवला भी पथरी में बहुत फायदा करता है। आंवला का चूर्ण मूली के साथ खाने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।
  5. करेला बुहत कड़वा होता है और आमतौर पर लोग इसे कम पसंदकरते हैं, लेकिन किडनी स्टोन के मरीजों के लिए यह रामबाण की तरह है।करेले में मैग्नीशियम और फॉस्फोरस नामक तत्त्व होते हैं,जो पथरी को बनने से रोकते हैं। इसलिए किडनी स्टोन की समस्या पर होनेकरेले का सेवनकरना चाहिए।
  6. किडनी स्टोन को बाहर निकालने के लिए बथुआ का साग बहुत ही कारगर माना जाता है। इसके लिए आधा किलो बथुआ के साग को उबालकर छान लें। अब इसे पानी में जरा सी काली मिर्च, जीरा और हल्का सा सेंधा नमक मिलाकर दिन में चार बार पिए, किडनी स्टोन में फायदा होगा।
  7. किडनी स्टोन से छुटकारा दिलाने में अंगूर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंगूर प्राकृतिक मूत्रवर्धक के रूप में कार्य करता है, क्योंकि इसमें पोटेशियम और पानी भरपूर मात्रा में होता है। अंगूर में अलबूमीन और सोडियम क्लोराइड बहुत ही कम मात्रा में होते हैं, जिनकी वजह से इन्हें किडनी स्टोन के उपचार के लिए अच्छा माना जाता है।
  8. जीरे और चीनी को समान मात्रा में पीसकर एक-एक चम्मच ठंडे पानी से रोज तीन बार लेने से लाभ होता है और पथरी निकल जाती है।
  9. जैतून के तेल के साथ नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से किडनी स्टोन में फायदा होता है। दर्द होने पर 60 मिलीलीटर नींबू के रस में उतनी ही मात्रा में आर्गेनिक जैतून का तेल मिलाकर सेवन करने से इसके दर्द से भी आराम मिलता है। नींबू का रस और जैतून का तेल पूरे स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है और यह आसानी से उपलब्ध भी हो जाता हैं।
  10. तीन हल्की कच्ची भिंड़ी को पतली-पतली लंबी-लंबी काट लें। कांच के बर्तन में दो लीटर पानी में कटी हुई भिंड़ी ड़ालकर रात भर के लिए रख दें। सुबह भिंड़ी को उसी पानी में निचोड़कर भिंड़ी को निकाल लें। ये सारा पानी दो घंटों के अंदर-अंदर पी लें। इससे किड़नी की पथरी से छुटकारा मिलता है।
  11. तुलसी की चाय पीने से किडनी स्टोन से निजात मिलता है। तुलसी का रस लेने से पथरी को पेशाब के रास्ते निकलने में मदद मिलती है। कम से कम एक महीना तुलसी के पत्तों के रस के साथ शहद लेने से किडनी स्टोन की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। तुलसी के कुछ ताजे पत्ते रोजाना चबा भी सकते हैं, यह बहुत ही फायदेमंद है।
  12. नारियल का पानी पीने से पथरी में फायदा होता है। पथरी होने पर नारियल का पानी पीना चाहिए।
  13. पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।
  14. प्याज में स्टोन नाशक तत्त्व होते है इसका प्रयोगकर किडनी स्टोन से निजात पा सकते है। लगभग 70 ग्राम प्याज को पीसकर और उसका रस निकालकर पिए। सुबह खाली पेट प्याज के रस का नियमित सेवन करने से पथरी के छोटे-छोटे टुकड़ों में होकर निकल जाती है।
  15. मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ़ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और पानी में मिलाकर एक घोल बना लीजिए, इस घोल को पीजिए। पथरी निकल जाएगी।
  16. सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे की पथरी टूटकर बाहर निकल जाती है। आम के पत्ते छांव में सुखाकर बहुत बारीक पीस लें और आठ ग्राम रोज पानी के साथ लीजिए, फायदा होगा।
  17. स्टोन की समस्या से निपटने के लिए केले का सेवनकरना चाहिए। इसमें विटामिन बी-6 होता है। विटामिन बी-6 ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता और तोड़ता है। इसके अलावा विटामिन बी-6,विटामिन बी के अन्य विटामिन के साथ सेवनकरना किडनी स्टोन के इलाज में काफी मददगार होता है। एक शोध के मुताबिक विटामिन बी की 100 से 150 मिलीग्राम दैनिक खुराक किडनी स्टोन के उपचार में बहुत फायदेमंद है।
डिस्क्लेमर: घरेलू इलाज के अलावा डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें और जरूरी इलाज शुरू करें।


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