राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 6 प्रमुख उत्सव



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं चरित्र-निर्माण का संगठन है। देश के लगभग सभी राज्यों और जिलों में इसकी हजारों शाखाओं के माध्यम से नियमित रूप से कार्य संचालित होता है। वर्तमान में संघ की लगभग 58,967 से अधिक शाखाएँ समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं।

किसी भी राष्ट्र और समाज की वास्तविक शक्ति ऐसे व्यक्तियों में निहित होती है जो देशभक्त, अनुशासित, चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ और निःस्वार्थ भाव से समाज के लिए कार्य करते हों। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे ही व्यक्तित्वों के निर्माण और संगठन का कार्य करता है। संघ का उद्देश्य केवल स्वयं एक संगठन के रूप में विकसित होना नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण समाज को संगठित, जागरूक और राष्ट्रहित के लिए समर्पित बनाना है।

संघ का विश्वास है कि जब समाज का प्रत्येक वर्ग आपसी समरसता, सहयोग और राष्ट्रभाव से जुड़ता है, तभी एक सशक्त, स्वावलंबी और गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। इसी लक्ष्य को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निरंतर समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है।

Rashtriya Swayamsevak Sangh

हमारे सामाजिक जीवन में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राष्ट्रीय महत्व के प्रसंग आते हैं, जो समाज को प्रेरणा, ऊर्जा और दिशा प्रदान करते हैं। परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) ने समाज में जिन गुणों की आवश्यकता अनुभव की, उन्हीं के अनुरूप संघ के उत्सवों की योजना बनाई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा मनाया जाने वाला प्रत्येक उत्सव किसी न किसी विशेष जीवन-मूल्य और राष्ट्रीय गुण का संदेश देता है।

गुरु पूर्णिमा आत्मनिवेदन, श्रद्धा और समर्पण भाव का प्रतीक है। रक्षाबंधन सामाजिक समरसता, समानता तथा पारस्परिक आत्मीयता का संदेश देता है। वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्य दिवस तथा विजयादशमी उत्सव विजिगीषु वृत्ति, पुरुषार्थ, राष्ट्रभाव, आत्मगौरव तथा विजय-संकल्प को जागृत करते हैं। ये उत्सव पराभूत मानसिकता को दूर कर आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। वहीं मकर संक्रांति सम्यक परिवर्तन, संगठन, सद्भाव और सही दिशा में सामाजिक जागरण का संदेश देती है।

उत्सवों का उद्देश्य केवल परंपरा का निर्वाह करना नहीं है, बल्कि आत्मकेंद्रित स्वभाव को बदलकर समाजबोध, कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध का निर्माण करना है। इन आयोजनों के माध्यम से स्वयंसेवकों को एक-दूसरे को निकट से समझने, आत्मीय संबंध विकसित करने तथा संगठनात्मक संस्कारों को सुदृढ़ करने का अवसर प्राप्त होता है।

उत्सव समाज के समक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार, कार्य एवं उद्देश्य का सकारात्मक परिचय भी प्रस्तुत करते हैं। इनके माध्यम से समाज में एक अच्छा संदेश जाता है तथा राष्ट्रहित में कार्य करने वाले नए व्यक्तियों को संगठन से जोड़ने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त होता है। इन उत्सवों का आयोजन सादगी, अनुशासन और आत्मीयता के साथ किया जाता है तथा सभी स्वयंसेवकों और अतिथियों की समुचित व्यवस्था की जाती है।

सम्पूर्ण समाज को संगठित करने के अपने ध्येय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख रूप से छह उत्सव मनाता है— वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयादशमी तथा मकर संक्रांति।

1. वर्ष प्रतिपदा

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय कालगणना के अनुसार नववर्ष का प्रथम दिवस है। यह भारतीय संस्कृति, परम्परा और नवचेतना का प्रतीक पर्व माना जाता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज का स्थापना दिवस भी इसी तिथि को मनाया जाता है। सम्राट विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में इसी दिन से विक्रमी संवत् का प्रारम्भ माना जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए यह दिवस विशेष महत्व रखता है, क्योंकि संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए संघ में वर्ष प्रतिपदा केवल नववर्ष के रूप में ही नहीं, बल्कि संस्थापक स्मरण एवं राष्ट्रचेतना के पर्व के रूप में भी मनाई जाती है।

इस अवसर पर स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष एकत्र होकर आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं तथा उनके राष्ट्रनिर्माण के आदर्शों का स्मरण करते हैं। इस दिन स्वयंसेवकों से पूर्ण गणवेश, समयपालन तथा अनुशासन का विशेष ध्यान रखने की अपेक्षा की जाती है।

वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर नववर्ष समारोह, पथ-संचलन, गोष्ठियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सामाजिक मिलन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके माध्यम से समाज में भारतीय नववर्ष के प्रति जागरूकता, सांस्कृतिक गौरव तथा राष्ट्रभाव का प्रसार किया जाता है।

rss-will-celebrate-chaitra-shukla-pratipada

2. हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, विक्रम संवत् 1731 (1674 ई.) को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। इसी ऐतिहासिक अवसर पर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का उद्घोष हुआ, जिसने उस समय समाज में व्याप्त इस हीन भावना को समाप्त किया कि हिन्दू स्वयं अपना स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य स्थापित नहीं कर सकते। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सीमित साधनों, विपरीत परिस्थितियों और अनेक चुनौतियों के बीच अपने अद्वितीय साहस, संगठन क्षमता, दूरदर्शिता तथा राष्ट्रनिष्ठा के बल पर एक आदर्श शासन की स्थापना की।

शिवाजी महाराज ने अपने जीवन और कार्यों से यह सिद्ध किया कि हिन्दू समाज पराक्रमी, स्वाभिमानी, संगठित तथा सफल शासन चलाने में पूर्णतः सक्षम है। उनका जीवन राष्ट्रभक्ति, आत्मगौरव, संगठन शक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और पुरुषार्थ का प्रेरणादायी उदाहरण है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा हिन्दू साम्राज्य दिवस मनाने का उद्देश्य समाज में आत्मविश्वास, स्वाभिमान और नेतृत्व क्षमता का जागरण करना है। यह उत्सव स्वयंसेवकों और समाज को यह प्रेरणा देता है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति और सामर्थ्य विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने, विकसित करने और राष्ट्रहित में उपयोग करने की है।

हिन्दू साम्राज्य दिवस हमें छत्रपति शिवाजी महाराज के आदर्शों का स्मरण कराते हुए यह संदेश देता है कि संगठित समाज, दृढ़ संकल्प, उच्च चरित्र और राष्ट्रभक्ति के बल पर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति समाज और राष्ट्र के नेतृत्व में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है।

3. श्री गुरु पूर्णिमा

श्री गुरु पूर्णिमा का उत्सव आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। गुरु ही ज्ञान, संस्कार, मार्गदर्शन और जीवन के आदर्शों का स्रोत होता है। महर्षि वेदव्यास ने भारतीय ज्ञान परम्परा को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया तथा वेद, पुराण, महाभारत और ब्रह्मसूत्र जैसे महान ग्रंथों की रचना एवं संकलन कर राष्ट्र जीवन के श्रेष्ठतम आदर्शों को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। इसी कारण उन्हें ‘जगतगुरु’ के रूप में सम्मानित किया जाता है और उनके सम्मान में यह पर्व ‘व्यास पूर्णिमा’ के रूप में भी मनाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भगवा ध्वज को गुरु का स्थान प्रदान किया गया है। भगवा ध्वज त्याग, तपस्या, समर्पण, शौर्य, पवित्रता और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है। यह स्वयंसेवकों को राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रेरक संदेश देता है। व्यक्ति सीमित हो सकता है, परन्तु आदर्श शाश्वत होते हैं; इसलिए संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरु स्वीकार किया है।

इस अवसर पर स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं तथा गुरुदक्षिणा अर्पित करते हैं। गुरुदक्षिणा किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्रकार्य के प्रति अपनी श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण की अभिव्यक्ति है। इसी गुरुदक्षिणा के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध संगठनात्मक एवं सामाजिक कार्यों का संचालन होता है।

गुरु पूर्णिमा का यह उत्सव स्वयंसेवकों में विनम्रता, आत्मचिंतन, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की भावना को सुदृढ़ करता है तथा उन्हें अपने जीवन को उच्च आदर्शों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा प्रदान करता है।

4. रक्षाबंधन

रक्षाबंधन का उत्सव श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व प्रेम, विश्वास, आत्मीयता, सुरक्षा और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। सामान्यतः यह भाई-बहन के स्नेह और संरक्षण के पवित्र बंधन के रूप में जाना जाता है, किन्तु इसका व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व भी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रक्षाबंधन का उत्सव समाज में व्याप्त जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य प्रकार के भेदभावों को समाप्त कर समरस, संगठित और आत्मीय समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है। यह उत्सव प्रत्येक व्यक्ति को यह स्मरण कराता है कि हम सभी एक ही समाज और राष्ट्र के अंग हैं तथा एक-दूसरे की सुरक्षा, सम्मान और सहयोग के लिए उत्तरदायी हैं।

धार्मिक ग्रंथों में भी रक्षासूत्र के महत्व का उल्लेख मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार प्राचीन काल में ऋषि-मुनि, राजाओं, यजमानों तथा समाज के अन्य लोगों के हाथों में मंगलकामना के साथ रक्षासूत्र बाँधते थे। यह केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि कर्तव्य, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में इस अवसर पर स्वयंसेवक सर्वप्रथम परम वंदनीय भगवा ध्वज को रक्षासूत्र अर्पित कर यह संकल्प लेते हैं कि जिस समाज, संस्कृति और राष्ट्र का यह ध्वज प्रतीक है, उसकी रक्षा, उन्नति और गौरव के लिए वे सदैव समर्पित रहेंगे। इसके पश्चात स्वयंसेवक एक-दूसरे को तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को रक्षासूत्र बाँधकर सामाजिक समरसता, आत्मीयता और राष्ट्रीय एकता का संदेश देते हैं।

रक्षाबंधन का यह उत्सव परस्पर सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व, संगठन शक्ति और राष्ट्रभाव को सुदृढ़ करने वाला पर्व है। यह हमें केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार मानने और उसकी रक्षा तथा उन्नति के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है।

5. विजयादशमी

विजयादशमी का उत्सव आश्विन शुक्ल दशमी के दिन मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर तथा न्याय की अन्याय पर विजय का प्रतीक माना जाता है। यह उत्सव हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में साहस, पुरुषार्थ, संगठन और विजय की भावना का संदेश देता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी पावन दिन सन् 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई थी। इसलिए यह दिवस संघ का स्थापना दिवस भी है और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रेरणा का अवसर माना जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने समाज की विविध शक्तियों को संगठित कर अत्याचारी एवं शक्तिशाली रावण पर विजय प्राप्त की थी। यह घटना हमें सिखाती है कि संगठित समाज, दृढ़ संकल्प और धर्मनिष्ठ नेतृत्व के बल पर कितनी भी बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। इसी प्रकार देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की स्मृति में भी यह पर्व शक्ति की उपासना और विजय के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विजयादशमी के माध्यम से समाज में विजय की आकांक्षा, आत्मविश्वास, संगठन शक्ति और राष्ट्रभक्ति का जागरण करना चाहता है। इस अवसर पर स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में एकत्र होते हैं तथा विभिन्न स्थानों पर उत्सव, पथ-संचलन और सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पथ-संचलन के माध्यम से संघ के स्वयंसेवकों का अनुशासन, संगठन, एकरूपता और राष्ट्रसेवा का भाव समाज के समक्ष प्रकट होता है।

विजयादशमी का यह उत्सव स्वयंसेवकों को यह प्रेरणा देता है कि संगठित शक्ति, अनुशासन और समर्पण के आधार पर समाज एवं राष्ट्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है तथा राष्ट्र को वैभव और गौरव के शिखर तक पहुँचाया जा सकता है।

rss-foundation-day-on-vijayadashmi

6. मकर संक्रांति

मकर संक्रांति का उत्सव भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है। अधिकांश पर्व जहाँ चंद्र मास की गणना पर आधारित होते हैं, वहीं मकर संक्रांति सौर गणना के अनुसार मनाया जाने वाला पर्व है। यह सामान्यतः प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तथा दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन प्रारम्भ करता है। उत्तरायण का काल शुभ, मंगलकारी और प्रगतिशील माना गया है। इस दिन से दिन बड़े होने लगते हैं, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन, नई ऊर्जा और नवीन उत्साह का प्रतीक है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस उत्सव को सामाजिक समरसता, संगठन और आत्मीयता के पर्व के रूप में मनाता है। मकर संक्रांति पर बनने वाली खिचड़ी विभिन्न प्रकार के अन्न और दालों के समन्वय का प्रतीक है। यह हमें संदेश देती है कि समाज में विविधताएँ होते हुए भी सभी एक सूत्र में बंधकर एक सशक्त और संगठित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

इसी प्रकार इस अवसर पर तिल और गुड़ का सेवन एवं वितरण किया जाता है। गुड़ की मिठास और सबको जोड़कर रखने की उसकी विशेषता हमें समाज में प्रेम, आत्मीयता और एकता का भाव विकसित करने की प्रेरणा देती है। तिल स्नेह, सद्भाव और मधुर व्यवहार का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यह पर्व हमें परस्पर कटुता मिटाकर प्रेम, सहयोग और सद्भाव के साथ जीवन जीने का संदेश देता है।

मकर संक्रांति का उत्सव सामाजिक समरसता, संगठन शक्ति, पारस्परिक सहयोग तथा राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने का अवसर है। यह हमें समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने, भेदभाव मिटाने तथा एक सशक्त, संगठित और समरस राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है।

rss-celebrated-makar-sankranti-festival


इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध उत्सव केवल पर्व-मनाने की परंपरा भर नहीं हैं, बल्कि वे स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण, संगठन सुदृढ़ीकरण तथा समाज जागरण के प्रभावी माध्यम हैं। इन उत्सवों के माध्यम से स्वयंसेवकों में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, समरसता, आत्मगौरव, संगठन शक्ति एवं सेवा-भाव जैसे गुणों का विकास होता है। साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को संघ के कार्यों से परिचित होने तथा उनसे जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है।

उत्सवों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना का प्रसार करता है। इन आयोजनों से प्रेरित होकर अनेक व्यक्ति संघ के कार्य से जुड़ते हैं और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाते हैं। संघ के स्वयंसेवक भारतीय संस्कृति, परम्पराओं और राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करते हुए एक संगठित, समरस, सशक्त और आत्मविश्वासी समाज के निर्माण में अपना योगदान देते हैं।



Share:

श्री शुकदेवजी की शंकाओं का विदेहराज जनक द्वारा समाधान



हे महाराज! मैं उन्ही के आदेश से आपकी पुरी में आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्ष का अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये।

हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान-इनमें से जो मोक्ष का साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये।

जनक जी बोले-मोक्षमार्गावलम्बी विप्र को जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयन संस्कार के बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्र का अध्ययन करने हेतु गुरू के सांनिध्य में रहना चाहिए। वहाँ वेद-वेदान्तों का अध्ययन करके दीक्षान्त, गुरूदक्षिणा देकर वापस लौटे विप्र को विवाह करके पत्नी के साथ गृहस्थी में रहना चाहिये। {गृहस्थाश्रम में रहते हुए} न्यायोपार्जित धन से सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसी से कोई आशा न रखे। पापों से मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और मन, वचन, कर्म से सदा पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जाने पर {समयानुसार} वानप्रस्थ-आश्रम में रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य-इन छहों शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्री रक्षा का भार पुत्र को सौंप देने के पश्चात्, वह धर्मात्मा सब अग्नियों का अपने में न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयों के भोग से शान्ति मिल जाने के बाद हृदय में विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होने पर चैथे आश्रम का आश्रय ले ले। विरक्त को ही संन्यास लेने का अधिकार है, अन्य किसी को नहीं- यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं-ऐसा मेरा मानना है।

Muni Shukdev and Janak

हे शुकदेवजी! वेदों में कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थ के लिये चालीस संस्कार महात्माओं ने बताये हैं। मुमुक्षु के लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रम से ही क्रमशः दूसरे आश्रम में जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनों का आदेश है।

शुकदेवजी-चित्त में वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जाने पर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमों में रहना चाहिये अथवा वनों में।

जनकजी-हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वश में नही रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्य के मन में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न कर देती है।

यदि मनुष्य के मन में भोजन, शयन, सुख और पुत्र की इच्छा बनी रहे तो वह सन्यासी होकर भी इन विकारांे के उपस्थित होने पर क्या कर पायेगा।

वसनाओं का जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नही मिटता। इसलिये उसकी शान्ति के लिये मनुष्य को क्रम से उसका त्याग करना चाहिये।

ऊँचे स्थान पर सोने वाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नही गिरता। यदि सन्यास-ग्रहण कर लेने पर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नही प्राप्त कर सकता।

जिस प्रकार चींटी वृक्ष की जड़ से चढ़कर शाखा पर चढ़ जाती है और वहाँ से फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरों से चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंका के भय से कोई पक्षी बड़ी तीव्र गति से आसमान में उड़ता है और परिणामतः थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर पहुँच जाती है।

मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरूषों के द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमों के अनुक्रम से ही इसे क्रमशः जीतने का प्रयत्न करना चाहिये।

गृहस्थ-आश्रम में रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभ में समान भाव रखता है।

जो पुरूष शास्त्र प्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तन से सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है।

हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन मुक्त हूँ मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किन्तु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नही होता।

जिस प्रकार मैं अनेक भोगों को भोगता हुआ तथा अनेक कार्यो को करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये।

ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धन में आ सकता है? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश-ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द-ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं।

आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थिति में है ब्रह्मन्! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धन में कैसे पड़ सकता है? हे द्विज! मन ही महान् सुख-दुःख का कारण है, इसी के निर्मल होने पर सब कुछ निर्मल हो जाता है।

सभी तीर्थों में घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नही हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। हे परन्तप! बन्धन तथा मोक्ष का कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्यों के बन्धन एवं मुक्ति का कारण है।

आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नही है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मन के भीतर हैं, मन की शान्ति से ही शान्ति है।

शत्रुता, मित्रता या उदासीनता के सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होने पर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभाव से ही उत्पन्न होता है।

’मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ-इस विषय में और विचार करने की आवश्यकता ही नही है। भेदबुद्धि तो संसार में आसक्त रहने पर ही होती है।

हे महाभाग! बन्धन का मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्या को दूर करने वाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरूषों को चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्या का अनुसन्धान पूर्वक अनुशीलन किया करें।

जिस प्रकार धूप के बिना छाया के सुख का अनुभव नही होता, उसी प्रकार अविद्या के बिना विद्या का अनुभव नही किया जा सकता।

गुणों में गुण, पंचभूतों में पंचभूत तथा इन्द्रियों के विषय में इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्मा का क्या दोष है।

हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षा के लिये वेदों में सब प्रकार से मर्यादा की व्यवस्था की गयी है। यदि ऐसा न होता तो नास्तिकों की भाँति सब धर्मों का नाश हो जाता। धर्म के नष्ट हो जाने पर सब नष्ट हो जायेगा और सब वर्णों की आचार-परम्परा का उल्लंघन हो जायेगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्ग पर चलने वालों का कल्याण होता है।

शुकदेवजी-हे राजन्! आपने जो बात कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह किसी प्रकार भी दूर नही होता।

हे भूपते! वेदधर्मों में हिंसा का बाहुल्य है, उस हिंसा में अनेक प्रकार के अधर्म होते हैं। {ऐसी दशा में} वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो स्पष्ट ही अनाचार है। सौत्रामणियज्ञ में तो प्रत्यक्षरूप से सुराग्रहण का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकार के व्रत बताये गये है।

सुना जाता है कि प्राचीन काल में शशबिन्दु नाम के एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी सेतु के रक्षक तथा कुमार्गगामी जनों के नियन्ता थे। उन्होने पुष्कल दक्षिणवाले अनेक यज्ञ सम्पादित किये थे।

{उन यज्ञों में} पशुओं के चर्म से विन्ध्यपर्वत के समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघों के जल बरसाने से चर्मण्वती नाम की शुभ नदी बह चली।

वे राजा भी दिवंगत हो गये, किन्तु उनकी कीर्ति भूमण्डल पर अचल हो गयी। जब इस प्रकार के धर्मों का वर्णन वेद में है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि उनमें नहीं है।

स्त्री में साथ भोग में पुरूष सुख प्राप्त करता है और उसके न मिलने पर वह बहुत दुःखी होता है तो ऐसी दशा में भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा?

जनकजी-यज्ञों में जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तव में अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोग से होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं-ऐसा शास्त्रों का निर्णय है।

जिस प्रकार {गीली} लकड़ी के संयोग से अग्नि से धुआँ निकलता है, उसके अभाव में उस अग्नि में धुआँ नही दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसा को भी आप अहिंसा की समझिये। रागीजनों द्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनों के लिये वह हिंसा नही कही गयी है।

जो कर्म राग, तथा अंहकार से रहित होकर किया जाता हो, उस कर्म को वैदिक विद्वान, मनीषीजन न किये हुए के समान ही कहते हैं।

हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थों के द्वारा यज्ञ में जो हिंसा होती है; वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकार शून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनों के लिये अहिंसा ही है।



Share:

राष्ट्रवाद मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है- महर्षि अरविन्द घोष




जीवन जीवन है, चाहे वह एक बिल्ली का हो, एक कुत्ते का या मनुष्य का। एक बिल्ली या एक आदमी में कोई अंतर नही है। अंतर का यह विचार दरअसल मनुष्य के स्वयं के लाभ के लिए एक मानवीय अवधारणा है। व्यक्तियों में सर्वथा नवीन चेतना का संचार करो, उनके अस्तित्व के समग्र रूप को बदलो, जिससे पृथ्वी पर नए जीवन का समारंभ हो सके। जिस व्यक्ति में त्याग की मात्रा जितने अंश में हो, वह व्यक्ति उतने ही अंश में पशुत्व से ऊपर है। गुण कोई किसी को सिखा नही सकता। दूसरों के गुण लेने या सीखने की भूख जब मन में जागती है, तब गुण आने आप सीख लिए जाते हैं। यदि तुम किसी का चरित्र जानना चाहते हो, उसके महान कार्य न देखो, उसके जीवन के साधारण कार्यो का सूक्ष्म निरीक्षण करो। जहां तक भारत का बात है, तो यद्यपि वह भौतिक समृद्धि से हीन है, लेकिन उसके जर्जर शरीर में आध्यात्मिकता का तेज वास करता है। जैसे सारा संसार बदल रहा है, वैसे ही अब भारत को भी बदलना चाहिए। युगो का भारत मृत नही हुआ है और न उसने अपना अंतिम सृजनात्मक संवाद उच्चारित ही किया है। वह जीवित है और उसे अब भी स्वयं अपने लिए और मानवता के लिए बहुत कुछ करना है। इसका जाग्रत होना अब आवश्यक है।

यह देश यदि पश्चिम की शक्तियों को ग्रहण करे और अपनी शक्तियों का भी विनाश नही होने दें, तो उसके भीतर से जिस संस्कृति का उदय होगा, वह अखिल विश्व के लिए कल्याणकारिणी होगी। वास्तव में वही संस्कृति विश्व की अगली संस्कृति बनेगी। राष्ट्रवाद ऐस धर्म है, जिसे तुम्हें अपने जीवन का आधार बनाना होगा। वह ईवरीय शक्ति का प्रतीक है। राष्ट्र अमर है, वह मर नही सकता, क्योकिं यह कोई भौतिक वस्तु नही है, बल्कि ईश्वरीय देन है, युग की आवश्यकता है। राष्ट्रवाद देशवासियों को एकता का संदेश देता है। यह हो सकता है कि उसके कार्य भिन्न-भिन्न हों, किन्तु मूलतः वे एक हैं। वास्तव में सच्चा और आदर्श राष्ट्रवाद वह है, जो मनुष्य-मनुष्य में, जाति-जाति में, वर्ग-वर्ग में कोई भेदभाव न रखता हो, वहां समानता ही समानता हो। राष्ट्रवाद मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है, न कि तोड़ता है। मानव, चाहे वह जिस देश, जाति या धर्म का हो, एक दूसरे का बंधु है। विश्व बंधुत्व की भावना का विकास केवल हिंदू राष्ट्रवाद में ही संभव है। राष्ट्रवाद एकता के स्वर का संवाहक है, संपूर्ण विश्व को एकत्व में बांधने का पक्षधर है।

प्रभु जिसे मुक्ति देना चाहते हैं, उसे ही राष्ट्र की भक्ति की ओर उन्मुख करते हैं। राष्ट्र की भक्ति जन-जन की आराधना है, पूजा है, वंदना है। व्यक्ति की पूजा ही तो ईश्वर की पूजा है। मनुष्य की पूजा करना भगवान की पूजा करना है। भगवान की व्याप्ति कण-कण में है, इसलिए हमें भगवान की पूजा करने के लिए मानव की पूजा करनी चाहिए। स्वदेशी वस्तुओं से ही हमारा कल्याण होगा, विदेशी से नही। हमें स्वदेश में निर्मित वस्तुओं को स्वीकार करना चाहिए, भले ही वह गुणवत्ता में विदेशी वस्तु के सामने लचर पड़ती हो। जब हम स्वदेशी की मूल भावना को आत्मसात करेंगे, तो हममें आत्मविश्वास, आत्मनिष्ठा, आत्मगौरव और आत्मश्रेष्ठता की भावनाएं आ जाऐंगी। आत्मगौरव का भाव ही अध्यात्म शिखर की ओर ले जाता है, जिससे व्यक्ति और राष्ट्र, दोनो का कल्याण होता है।


Share: