राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं चरित्र-निर्माण का संगठन है। देश के लगभग सभी राज्यों और जिलों में इसकी हजारों शाखाओं के माध्यम से नियमित रूप से कार्य संचालित होता है। वर्तमान में संघ की लगभग 58,967 से अधिक शाखाएँ समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
किसी भी राष्ट्र और समाज की वास्तविक शक्ति ऐसे व्यक्तियों में निहित होती है जो देशभक्त, अनुशासित, चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ और निःस्वार्थ भाव से समाज के लिए कार्य करते हों। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे ही व्यक्तित्वों के निर्माण और संगठन का कार्य करता है। संघ का उद्देश्य केवल स्वयं एक संगठन के रूप में विकसित होना नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण समाज को संगठित, जागरूक और राष्ट्रहित के लिए समर्पित बनाना है।
संघ का विश्वास है कि जब समाज का प्रत्येक वर्ग आपसी समरसता, सहयोग और राष्ट्रभाव से जुड़ता है, तभी एक सशक्त, स्वावलंबी और गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। इसी लक्ष्य को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निरंतर समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है।
हमारे सामाजिक जीवन में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राष्ट्रीय महत्व के प्रसंग आते हैं, जो समाज को प्रेरणा, ऊर्जा और दिशा प्रदान करते हैं। परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) ने समाज में जिन गुणों की आवश्यकता अनुभव की, उन्हीं के अनुरूप संघ के उत्सवों की योजना बनाई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा मनाया जाने वाला प्रत्येक उत्सव किसी न किसी विशेष जीवन-मूल्य और राष्ट्रीय गुण का संदेश देता है।
गुरु पूर्णिमा आत्मनिवेदन, श्रद्धा और समर्पण भाव का प्रतीक है। रक्षाबंधन सामाजिक समरसता, समानता तथा पारस्परिक आत्मीयता का संदेश देता है। वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्य दिवस तथा विजयादशमी उत्सव विजिगीषु वृत्ति, पुरुषार्थ, राष्ट्रभाव, आत्मगौरव तथा विजय-संकल्प को जागृत करते हैं। ये उत्सव पराभूत मानसिकता को दूर कर आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। वहीं मकर संक्रांति सम्यक परिवर्तन, संगठन, सद्भाव और सही दिशा में सामाजिक जागरण का संदेश देती है।
उत्सवों का उद्देश्य केवल परंपरा का निर्वाह करना नहीं है, बल्कि आत्मकेंद्रित स्वभाव को बदलकर समाजबोध, कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध का निर्माण करना है। इन आयोजनों के माध्यम से स्वयंसेवकों को एक-दूसरे को निकट से समझने, आत्मीय संबंध विकसित करने तथा संगठनात्मक संस्कारों को सुदृढ़ करने का अवसर प्राप्त होता है।
उत्सव समाज के समक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार, कार्य एवं उद्देश्य का सकारात्मक परिचय भी प्रस्तुत करते हैं। इनके माध्यम से समाज में एक अच्छा संदेश जाता है तथा राष्ट्रहित में कार्य करने वाले नए व्यक्तियों को संगठन से जोड़ने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त होता है। इन उत्सवों का आयोजन सादगी, अनुशासन और आत्मीयता के साथ किया जाता है तथा सभी स्वयंसेवकों और अतिथियों की समुचित व्यवस्था की जाती है।
सम्पूर्ण समाज को संगठित करने के अपने ध्येय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख रूप से छह उत्सव मनाता है— वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयादशमी तथा मकर संक्रांति।
1. वर्ष प्रतिपदा
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय कालगणना के अनुसार नववर्ष का प्रथम दिवस है। यह भारतीय संस्कृति, परम्परा और नवचेतना का प्रतीक पर्व माना जाता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज का स्थापना दिवस भी इसी तिथि को मनाया जाता है। सम्राट विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में इसी दिन से विक्रमी संवत् का प्रारम्भ माना जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए यह दिवस विशेष महत्व रखता है, क्योंकि संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए संघ में वर्ष प्रतिपदा केवल नववर्ष के रूप में ही नहीं, बल्कि संस्थापक स्मरण एवं राष्ट्रचेतना के पर्व के रूप में भी मनाई जाती है।
इस अवसर पर स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष एकत्र होकर आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं तथा उनके राष्ट्रनिर्माण के आदर्शों का स्मरण करते हैं। इस दिन स्वयंसेवकों से पूर्ण गणवेश, समयपालन तथा अनुशासन का विशेष ध्यान रखने की अपेक्षा की जाती है।
वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर नववर्ष समारोह, पथ-संचलन, गोष्ठियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सामाजिक मिलन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके माध्यम से समाज में भारतीय नववर्ष के प्रति जागरूकता, सांस्कृतिक गौरव तथा राष्ट्रभाव का प्रसार किया जाता है।
2. हिन्दू साम्राज्य दिवस
ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, विक्रम संवत् 1731 (1674 ई.) को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। इसी ऐतिहासिक अवसर पर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का उद्घोष हुआ, जिसने उस समय समाज में व्याप्त इस हीन भावना को समाप्त किया कि हिन्दू स्वयं अपना स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य स्थापित नहीं कर सकते। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सीमित साधनों, विपरीत परिस्थितियों और अनेक चुनौतियों के बीच अपने अद्वितीय साहस, संगठन क्षमता, दूरदर्शिता तथा राष्ट्रनिष्ठा के बल पर एक आदर्श शासन की स्थापना की।
शिवाजी महाराज ने अपने जीवन और कार्यों से यह सिद्ध किया कि हिन्दू समाज पराक्रमी, स्वाभिमानी, संगठित तथा सफल शासन चलाने में पूर्णतः सक्षम है। उनका जीवन राष्ट्रभक्ति, आत्मगौरव, संगठन शक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और पुरुषार्थ का प्रेरणादायी उदाहरण है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा हिन्दू साम्राज्य दिवस मनाने का उद्देश्य समाज में आत्मविश्वास, स्वाभिमान और नेतृत्व क्षमता का जागरण करना है। यह उत्सव स्वयंसेवकों और समाज को यह प्रेरणा देता है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति और सामर्थ्य विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने, विकसित करने और राष्ट्रहित में उपयोग करने की है।
हिन्दू साम्राज्य दिवस हमें छत्रपति शिवाजी महाराज के आदर्शों का स्मरण कराते हुए यह संदेश देता है कि संगठित समाज, दृढ़ संकल्प, उच्च चरित्र और राष्ट्रभक्ति के बल पर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति समाज और राष्ट्र के नेतृत्व में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है।
3. श्री गुरु पूर्णिमा
श्री गुरु पूर्णिमा का उत्सव आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। गुरु ही ज्ञान, संस्कार, मार्गदर्शन और जीवन के आदर्शों का स्रोत होता है। महर्षि वेदव्यास ने भारतीय ज्ञान परम्परा को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया तथा वेद, पुराण, महाभारत और ब्रह्मसूत्र जैसे महान ग्रंथों की रचना एवं संकलन कर राष्ट्र जीवन के श्रेष्ठतम आदर्शों को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। इसी कारण उन्हें ‘जगतगुरु’ के रूप में सम्मानित किया जाता है और उनके सम्मान में यह पर्व ‘व्यास पूर्णिमा’ के रूप में भी मनाया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भगवा ध्वज को गुरु का स्थान प्रदान किया गया है। भगवा ध्वज त्याग, तपस्या, समर्पण, शौर्य, पवित्रता और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है। यह स्वयंसेवकों को राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रेरक संदेश देता है। व्यक्ति सीमित हो सकता है, परन्तु आदर्श शाश्वत होते हैं; इसलिए संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरु स्वीकार किया है।
इस अवसर पर स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं तथा गुरुदक्षिणा अर्पित करते हैं। गुरुदक्षिणा किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्रकार्य के प्रति अपनी श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण की अभिव्यक्ति है। इसी गुरुदक्षिणा के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध संगठनात्मक एवं सामाजिक कार्यों का संचालन होता है।
गुरु पूर्णिमा का यह उत्सव स्वयंसेवकों में विनम्रता, आत्मचिंतन, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की भावना को सुदृढ़ करता है तथा उन्हें अपने जीवन को उच्च आदर्शों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा प्रदान करता है।
4. रक्षाबंधन
रक्षाबंधन का उत्सव श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व प्रेम, विश्वास, आत्मीयता, सुरक्षा और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। सामान्यतः यह भाई-बहन के स्नेह और संरक्षण के पवित्र बंधन के रूप में जाना जाता है, किन्तु इसका व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व भी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रक्षाबंधन का उत्सव समाज में व्याप्त जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य प्रकार के भेदभावों को समाप्त कर समरस, संगठित और आत्मीय समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है। यह उत्सव प्रत्येक व्यक्ति को यह स्मरण कराता है कि हम सभी एक ही समाज और राष्ट्र के अंग हैं तथा एक-दूसरे की सुरक्षा, सम्मान और सहयोग के लिए उत्तरदायी हैं।
धार्मिक ग्रंथों में भी रक्षासूत्र के महत्व का उल्लेख मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार प्राचीन काल में ऋषि-मुनि, राजाओं, यजमानों तथा समाज के अन्य लोगों के हाथों में मंगलकामना के साथ रक्षासूत्र बाँधते थे। यह केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि कर्तव्य, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में इस अवसर पर स्वयंसेवक सर्वप्रथम परम वंदनीय भगवा ध्वज को रक्षासूत्र अर्पित कर यह संकल्प लेते हैं कि जिस समाज, संस्कृति और राष्ट्र का यह ध्वज प्रतीक है, उसकी रक्षा, उन्नति और गौरव के लिए वे सदैव समर्पित रहेंगे। इसके पश्चात स्वयंसेवक एक-दूसरे को तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को रक्षासूत्र बाँधकर सामाजिक समरसता, आत्मीयता और राष्ट्रीय एकता का संदेश देते हैं।
रक्षाबंधन का यह उत्सव परस्पर सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व, संगठन शक्ति और राष्ट्रभाव को सुदृढ़ करने वाला पर्व है। यह हमें केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार मानने और उसकी रक्षा तथा उन्नति के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है।
5. विजयादशमी
विजयादशमी का उत्सव आश्विन शुक्ल दशमी के दिन मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर तथा न्याय की अन्याय पर विजय का प्रतीक माना जाता है। यह उत्सव हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में साहस, पुरुषार्थ, संगठन और विजय की भावना का संदेश देता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी पावन दिन सन् 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई थी। इसलिए यह दिवस संघ का स्थापना दिवस भी है और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रेरणा का अवसर माना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने समाज की विविध शक्तियों को संगठित कर अत्याचारी एवं शक्तिशाली रावण पर विजय प्राप्त की थी। यह घटना हमें सिखाती है कि संगठित समाज, दृढ़ संकल्प और धर्मनिष्ठ नेतृत्व के बल पर कितनी भी बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। इसी प्रकार देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की स्मृति में भी यह पर्व शक्ति की उपासना और विजय के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विजयादशमी के माध्यम से समाज में विजय की आकांक्षा, आत्मविश्वास, संगठन शक्ति और राष्ट्रभक्ति का जागरण करना चाहता है। इस अवसर पर स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में एकत्र होते हैं तथा विभिन्न स्थानों पर उत्सव, पथ-संचलन और सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पथ-संचलन के माध्यम से संघ के स्वयंसेवकों का अनुशासन, संगठन, एकरूपता और राष्ट्रसेवा का भाव समाज के समक्ष प्रकट होता है।
विजयादशमी का यह उत्सव स्वयंसेवकों को यह प्रेरणा देता है कि संगठित शक्ति, अनुशासन और समर्पण के आधार पर समाज एवं राष्ट्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है तथा राष्ट्र को वैभव और गौरव के शिखर तक पहुँचाया जा सकता है।
6. मकर संक्रांति
मकर संक्रांति का उत्सव भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है। अधिकांश पर्व जहाँ चंद्र मास की गणना पर आधारित होते हैं, वहीं मकर संक्रांति सौर गणना के अनुसार मनाया जाने वाला पर्व है। यह सामान्यतः प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तथा दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन प्रारम्भ करता है। उत्तरायण का काल शुभ, मंगलकारी और प्रगतिशील माना गया है। इस दिन से दिन बड़े होने लगते हैं, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन, नई ऊर्जा और नवीन उत्साह का प्रतीक है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस उत्सव को सामाजिक समरसता, संगठन और आत्मीयता के पर्व के रूप में मनाता है। मकर संक्रांति पर बनने वाली खिचड़ी विभिन्न प्रकार के अन्न और दालों के समन्वय का प्रतीक है। यह हमें संदेश देती है कि समाज में विविधताएँ होते हुए भी सभी एक सूत्र में बंधकर एक सशक्त और संगठित समाज का निर्माण कर सकते हैं।
इसी प्रकार इस अवसर पर तिल और गुड़ का सेवन एवं वितरण किया जाता है। गुड़ की मिठास और सबको जोड़कर रखने की उसकी विशेषता हमें समाज में प्रेम, आत्मीयता और एकता का भाव विकसित करने की प्रेरणा देती है। तिल स्नेह, सद्भाव और मधुर व्यवहार का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यह पर्व हमें परस्पर कटुता मिटाकर प्रेम, सहयोग और सद्भाव के साथ जीवन जीने का संदेश देता है।
मकर संक्रांति का उत्सव सामाजिक समरसता, संगठन शक्ति, पारस्परिक सहयोग तथा राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने का अवसर है। यह हमें समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने, भेदभाव मिटाने तथा एक सशक्त, संगठित और समरस राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है।
इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध उत्सव केवल पर्व-मनाने की परंपरा भर नहीं हैं, बल्कि वे स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण, संगठन सुदृढ़ीकरण तथा समाज जागरण के प्रभावी माध्यम हैं। इन उत्सवों के माध्यम से स्वयंसेवकों में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, समरसता, आत्मगौरव, संगठन शक्ति एवं सेवा-भाव जैसे गुणों का विकास होता है। साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को संघ के कार्यों से परिचित होने तथा उनसे जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है।
उत्सवों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना का प्रसार करता है। इन आयोजनों से प्रेरित होकर अनेक व्यक्ति संघ के कार्य से जुड़ते हैं और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाते हैं। संघ के स्वयंसेवक भारतीय संस्कृति, परम्पराओं और राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करते हुए एक संगठित, समरस, सशक्त और आत्मविश्वासी समाज के निर्माण में अपना योगदान देते हैं।
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