ब्राह्मण : विद्वान, शिक्षा का कार्य करने वाला, निपुण पुरोहित एवं कर्मकाण्डी, यज्ञ तथा पूजा-पाठ करने वाले को ब्राह्मण वर्ण में रखा गया है। इन्हें छूट है कि वे वैश्य एवं क्षत्रिय के भी कार्य कर सकते हैं। शिक्षा, अध्यापन और पौरोहित्य इनके मुख्य कार्य हैं तथा विशिष्ट परिस्थिति में ये हथियार उठाने में भी संकोच नहीं करते और कृषि का कार्य भी अपने हाथों में ले सकते हैं। इन्हें केवल वैश्य और शूद्र के कार्य करना वर्जित है। इन्हें अपने कार्य के अतिरिक्त कृषि का कार्य करने में संकोच नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण विवाह अपने वर्ण के अतिरिक्त क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ग में भी कर सकते हैं, किन्तु पहला विवाह अपने वर्ण में ही करना आवश्यक है।
वैश्य : वैश्य का मुख्य कार्य व्यापार एवं कृषि है, परन्तु विशेष परिस्थिति में इनके लिए हथियार उठाना वर्जित नहीं है। (मनुस्मृति में वर्णित) तदोपरान्त दूसरे वर्ण की जातियों में विवाह करने में कोई बंदिश नहीं है। वे क्षत्रिय और वैश्य वंश में विवाह कर सकते हैं। (मनुस्मृति के अनुसार)
शूद्र : इस वर्ण का कार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य द्वारा बताए गए कार्यों को करना तथा कृषि एवं अन्य कार्य, जो उपर्युक्त तीनों वर्णों द्वारा बताए गए हैं, उन्हें सम्पन्न करना और अपनी जीविका के कार्य करना है। ये अपने वर्ण में ही विवाह कर सकते हैं।
विभिन्न जातियों के कर्तव्य (कर्म) मनुस्मृति के अनुसार निर्धारित हैं। शस्त्र चलाना क्षत्रियों का कार्य है, परन्तु ब्राह्मण और वैश्य जब धर्म पर आपत्ति आए तो उनके लिए शस्त्र उठाना वर्जित नहीं है। महाभारत में वर्णित है कि—
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममिदं जगत्।
ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम्॥
(भृगु ऋषि ने महर्षि भारद्वाज के प्रश्न के उत्तर में कहा कि सृष्टि के प्रारम्भ में वर्ण भिन्न-भिन्न नहीं थे। ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण सभी का नाम ब्राह्मण था।)
वज्रसूच्युपनिषद् में जिज्ञासु शिष्य अपने गुरु से पूछता है कि क्या कोई जाति से ब्राह्मण होता है? इसका उत्तर देते हुए ऋषिवर ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मणों की कोई जाति नहीं है। अनेक महर्षि अन्य जातियों से उत्पन्न हुए हैं।
सभी धर्मग्रन्थों को देखने से यही स्पष्ट होता है कि ईश्वर के शरीर के चारों अंगों से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई है। इसका तात्पर्य यह है कि समूचा आर्य-जगत ईश्वरस्वरूप था, जिसे कर्मों के आधार पर चार वर्णों में बाँटा गया, ताकि समाज का कार्य सुचारु रूप से चलता रहे।
आगे चलकर चारों वर्णों के बनाए जाने के बाद आर्य-जगत ने यह अनुभव किया कि सामूहिक शासन उचित नहीं है। इसलिए समूह ने अपना प्रतिनिधि शासक बनाने का विचार किया। समूह द्वारा निर्णय लेने के बाद प्रतिनिधियों ने क्षत्रिय को राजा बनाया। यह क्षत्रिय सूर्य और उसकी पत्नी सरण्यु से उत्पन्न आर्य संतान मनु था, जिसे प्रथम राजा बनाया गया। उसका राज्याभिषेक वायु नामक ऋषि ने किया।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 18वें अध्याय के 41, 42, 43 और 44वें श्लोकों में इस वर्ण-व्यवस्था के बारे में विस्तृत वर्णन किया है, जो इस प्रकार है—
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं। (41)
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
अन्तःकरण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहन करना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना तथा परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना—ये सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। (42)
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार—ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सभी वर्णों की सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है। (44)
क्षत्रिय
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध से न भागना, दान देना और स्वाभिमान—ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। (43)
ऋग्वेद में क्षत्रिय के कर्म, गुण और स्वभाव के विषय में लिखा है—
धृतव्रता क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहदिना अध्वं रणभर्याश्रियः।
अग्निर्होता ऋतसापो अदुहो सो असृजन् वृत्रतये॥
क्षत्रिय नियमों का पालक, यज्ञ करने वाला, शत्रुओं का संहारक, युद्ध में धैर्यवान तथा युद्ध-क्रियाओं का ज्ञाता होता है।
क्षतात् किल त्रायत इत्युग्रः,
क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः। (कालिदास)
अर्थात् विनाश या हानि से रक्षा करने के अर्थ में यह "क्षत्रिय" शब्द सारे भुवनों में प्रसिद्ध है।
नियमों का पालन करने वाला, सत्य के अनुसार चलने वाला, शूरवीर, कुशल प्रशासक, दृढ़संकल्पी, अद्भुत संगठनकर्ता, शरणागत की रक्षा करने वाला, दूरदर्शी, चरित्रवान, युद्ध में न डरने वाला तथा अपने गुणों के कारण दूसरों पर प्रभाव डालने वाला एवं प्रजापालक व्यक्ति क्षत्रिय वर्ण में रखा गया है। यह गीता के 18वें अध्याय के 43वें श्लोक में वर्णित है—
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव—ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
क्षत्रिय शब्दार्थ के अनुसार वह दूसरों को आश्रय, संरक्षण एवं सुरक्षा देने वाला होता है। क्षत्रिय अपने वर्ण के अतिरिक्त वैश्य एवं शूद्र वर्ण में विवाह कर सकते हैं। परन्तु पहले अपने वर्ण में तथा बाद में दूसरे वर्ण में विवाह करना इनके लिए वर्जित नहीं है। (मनुस्मृति के अनुसार)
वेदों में क्षत्रियों के लिए लिखा है— "क्षतात् त्रायते इति क्षत्रियः", अर्थात् जो वर्ग कमजोरों की सहायता करे और रक्षा करे, वह क्षत्रिय है। उस काल में क्षत्रियों के नियम थे—असहाय की रक्षा करना, देशद्रोहियों को दण्ड देना, इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना, वृद्धों और विद्वानों की सेवा करना, धैर्यवान होना, युद्ध से न डरना, यज्ञ करना और दान देना।
राजपूत : राजपूत शब्द का प्रचलन मुस्लिम काल में हुआ। जैसे भारत के लिए "हिन्दुस्तान" शब्द तथा सनातन धर्म के लिए "हिन्दू धर्म" शब्द प्रचलित हुआ, उसी प्रकार क्षत्रियों के लिए "राजपूत" शब्द प्रयोग में आने लगा।
राजपूत शब्द "राजपुत्र" का अपभ्रंश है। कहीं-कहीं इसे "रजपूत" भी कहा गया है। "रज" का अर्थ मिट्टी या धरती है, इसलिए इन्हें धरतीपुत्र भी कहा जाता है। परन्तु राजपूत शब्द अधिक प्रचलित हुआ।
राजपुत्र का शब्दार्थ है—राजा का पुत्र। धीरे-धीरे राजाओं के पुत्रों और उनके परिवारों की संख्या बढ़ने लगी और उन सभी को राजपुत्र कहा जाने लगा। कालान्तर में यही शब्द राजपूत में परिवर्तित हो गया।
पुराने समय में राजपुत्र शब्द जातिवाचक नहीं था, अपितु परिवारवाचक था और राजकुमारों या राजवंशियों का सूचक था। क्योंकि प्राचीनकाल में सम्पूर्ण भारतवर्ष क्षत्रियों के अधीन था और राजकुमारों तथा राजवंशियों के लिए राजपुत्र शब्द का प्रयोग होता था।
प्राचीन लेखकों—कौटिल्य, कालिदास तथा बाणभट्ट—ने अपनी रचनाओं में राजवंशियों के लिए राजपुत्र शब्द का प्रयोग किया है। यही राजपुत्र धीरे-धीरे राजपूत शब्द के रूप में परिवर्तित हो गया और चूँकि ये सभी क्षत्रिय थे, अतः क्षत्रियों के लिए राजपूत शब्द प्रयोग में आने लगा।
राजपूत शब्द का प्रयोग महमूद गजनवी के समय तक नहीं मिलता। उसके साथ अलबेरूनी भारत आया था, जो बड़ा विद्वान था। उसने अरबी में अनेक पुस्तकें लिखीं तथा भारत की विद्याओं, धर्मों और रीति-रिवाजों का अध्ययन किया। उसने अपने ग्रन्थों में क्षत्रियों का वर्णन किया है, परन्तु कहीं भी राजपूत या राजपुत्र शब्द का प्रयोग नहीं किया।
मोहम्मद गौरी के समय तथा अलबेरूनी की मृत्यु (1048 ई.) के बाद राजवंशियों को राजपूत नाम से संबोधित किया जाने लगा। धीरे-धीरे यह शब्द, जो पहले वंशसूचक था, जातिसूचक बन गया और क्षत्रियों के लिए राजपूत शब्द का प्रयोग होने लगा।
अब क्षत्रियों और राजपूतों को एक ही नाम तथा जाति से जाना जाता है। अतः क्षत्रिय ही राजपूत और राजपूत ही क्षत्रिय है।
क्षत्रियों का ऐतिहासिक महत्व
भारत में वर्ण-व्यवस्था की शुरुआत के पहले से ही क्षत्रियों के अस्तित्व की जानकारी उपलब्ध है। ऋग्वेद में अनेकों स्थानों पर "क्षत्र" एवं "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद में "क्षत्रिय" शब्द का प्रयोग शासक वर्ग के व्यक्तित्व का सूचक है। यहाँ "क्षत्र" का प्रयोग प्रायः शूरता एवं वीरता के अर्थ में हुआ है, जिसका अभिप्राय लोगों की रक्षा करना तथा गरीबों को संरक्षण देना था। यहाँ क्षत्रिय शब्द का प्रयोग राजा के लिए किया गया है। अतः समाज में क्षत्रियों का एक समूह बन गया, जिसने शौर्य, वीरता और भूस्वामी के रूप में अपना आधिपत्य स्थापित किया और शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
उत्तर वैदिक काल तक क्षत्रियों को राजकुल से संबंधित मान लिया गया। इस वर्ग के व्यक्ति युद्ध-कौशल और प्रशासनिक योग्यता में अग्रणी माने जाने लगे। यह समय क्षत्रियों के उत्कर्ष का समय था। इस काल में क्षत्रियों को वंशानुगत अधिकार मिल गया था तथा वे शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भी बन गए थे। इस प्रकार राजा, जो क्षत्रिय होता था, वह राज्य और धर्म दोनों पर प्रभावी हुआ। पुरोहितों पर राजा का इतना प्रभाव पड़ा कि वे राजा का गुणगान करने लगे तथा उन्हें महिमामंडित करने के लिए दैवी गुणों से अलंकृत किया और उन्हें देवत्व प्रदान किया तथा अपनी शक्ति के प्रभाव से राजा को अदण्डनीय घोषित किया गया।
राजपद एवं राजा की प्रतिष्ठा के साथ क्षत्रियों की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि क्षत्रिय से श्रेष्ठ कोई नहीं है। ब्राह्मण का स्थान उसके बाद आता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य-शक्ति से सम्पन्न क्षत्रिय, जो ब्राह्मणों के रक्षक और पालक हैं, सामाजिक क्षेत्र में श्रेष्ठ स्वीकार किए गए। ब्राह्मण की श्रेष्ठता का आधार उनका बौद्धिक एवं दार्शनिक होना था। इसका ह्रास हुआ और क्षत्रिय इन क्षेत्रों में भी अग्रणी हुए। राजा जनक, प्रवाहण जाबालि, अश्वपति, कैकेय और काशी नरेश अजातशत्रु ऐसे शासक थे, जिनसे शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करने ब्राह्मण आते थे। पौरोहित्य, याज्ञिक क्रियाओं तथा दार्शनिक गवेषणाओं में भी क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दी। इन परिस्थितियों में क्षत्रियों ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को अस्वीकार किया। महाभारत में तो यहाँ तक कहा गया कि ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण ये "क्षत्रिय" कहे गए। इस प्रकार क्षत्रियों ने शस्त्र और शास्त्र दोनों के ज्ञाता होकर अपनी श्रेष्ठता स्थापित की।
इस पूर्ण भू-भारत के चप्पे-चप्पे को अपने रक्त से सींचने वाले क्षत्रिय वंश के पूर्वज ही तो थे। इनकी कितनी सुन्दर समाज-व्यवस्था, कितनी आदर्श परिवार-व्यवस्था, कितनी निष्कपट राज-व्यवस्था, कितनी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और कितनी ऊँची धर्म-व्यवस्था थी। आज भी क्षत्रिय वंश और भारत को उन व्यवस्थाओं पर गर्व है। ये व्यवस्थाएँ क्षत्रिय वंश द्वारा निर्मित, रक्षित और संचालित थीं। इसके उपरान्त विश्व-साहित्य के अनुपम ग्रन्थ महाभारत और रामायण इसी काल में निर्मित हुए। गीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी वंश की कहानी कहता है, जिसका मूल्यांकन आज का विद्वान न कर सका है और न कर सकता है। इन दोनों ग्रन्थों में क्षत्रिय वंश के पूर्वजों की गौरवगाथाएँ और महिमा का वर्णन है, जिन्होंने विश्व-विजय की थी और इस भूखण्ड के चक्रवर्ती सम्राट रहे थे। महाभारत का युद्ध दो भाइयों के परिवार का साधारण गृह-युद्ध नहीं था। वह धर्म और अधर्म का युद्ध था, जो क्षात्रधर्म के औचित्य और स्वरूप को स्थिर रखने का उदाहरण था।
परम ब्रह्म परमात्मा के रूप में जिस भगवान कृष्ण की भक्ति का भागवत में वर्णन किया गया है, वे 16 कलाओं से परिपूर्ण भगवान कृष्ण भी तो हमारे पूर्वज थे। यह जाति अति आदर्शवान, उच्च, निर्भीक और अद्वितीय है। वह अधर्म, अन्याय, अत्याचार, असत्य और उत्पीड़न के सामने झुकना या नतमस्तक होना नहीं जानती तथा वह पराजय व पतन को भी विजय और उल्लास में बदलना जानती है। रघुवंशियों की गौरवगाथा और उज्ज्वल महिमा का वर्णन रघुवंश में दिया गया है। इसे पढ़ने पर मन आनन्दित और आत्मा पुलकित हो उठती है।
परम श्रद्धेय अयोध्यापति श्रीराम रघुवंशी भी तो हमारे पूर्वज थे। उनके गौरव व बड़प्पन की तुलना संसार में किसी से नहीं की जा सकती। यही नहीं, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रवर्तक तथा अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले क्षत्रिय पुत्र भगवान बुद्ध और क्षत्रिय पुत्र महावीर ही तो थे, जिन्होंने उस समय देश को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। अतः इस वसुन्धरा में क्षत्रिय जाति को छोड़कर कोई अन्य जाति विद्यमान नहीं है, जिसके पीछे इतना साहित्यिक बल, प्रेरणा के स्रोत तथा जिसकी गौरवमयी गरिमा एवं शौर्य का वर्णन इतने व्यापक और प्रभावपूर्ण ढंग से हुआ हो। अपने सम्मान और कुल-गौरव की रक्षा के लिए वीरांगनाओं ने अग्नि-स्नान (जौहर) और धारा (तलवार) स्नान किया है। मैं यह मानने के लिए कभी तैयार नहीं हूँ कि जिस जाति और वंश के पास इतनी अमूल्य तथा अटूट साहित्यिक निधि हो, वह स्वयं अपने ऊपर गर्व नहीं कर सकती।
सतयुग का इतिहास हमें वैदिक वाङ्मय के रूप में देखने को मिलता है। वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में तत्कालीन जीवन-दर्शन, समाज-व्यवस्था आदि का सांगोपांग चित्रण मिलता है। त्रेता और द्वापर युगों के इतिहास पर समस्त पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत उसी इतिहास के दो अमूल्य ग्रन्थ हैं। महाभारत काल के पूर्व का हजारों वर्षों का इतिहास क्षत्रिय इतिहास मात्र है। महाभारत काल के पश्चात् लगभग डेढ़ हजार वर्ष का इतिहास भारतीय इतिहास की दृष्टि से अंधकार का युग कहा जा सकता है, पर यह बताने में हमें तनिक भी संकोच नहीं है कि उस समय का समस्त भारत और आस-पास के प्रदेशों पर क्षत्रियों का सार्वभौम प्रभुत्व था।
मौर्यकाल का इतिहास तिथिवार और क्रमवार उपलब्ध है। मौर्यकाल से लेकर मुसलमानों के आक्रमण तक भारत की क्षत्रिय जाति सार्वभौम प्रभुत्व-सम्पन्न जाति रही है। इस्लामी प्रभुत्व के समय में भी जौहर और शाका करके जीवित रहने वाली, मर-मरकर पुनः जीवित होने वाली क्षत्रिय जाति का इतिहास हिन्दू भारत का इतिहास है। अतः मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संसार के प्राचीनतम सभ्य देश भारत के इतिहास में से क्षत्रिय इतिहास निकाल देने के उपरान्त कुछ भी नहीं बचता। अतः दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि मूलतः क्षत्रियों का इतिहास ही भारत का इतिहास है।
इस प्रकार महान और व्यापक हिन्दू संस्कृति के अन्तर्गत क्षत्रियों (राजपूतों) की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति रही है। यह विशिष्ट संस्कृति कालान्तर में विशिष्ट आचार-विचार, विशिष्ट भाषा, विशिष्ट साहित्य, विशिष्ट इतिहास, विशिष्ट कला-कौशल, विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्थाओं के कारण और भी सबल बनी है।
अतः राजपूत एक ऐसा वंश है, जिसके स्वयं के राज-नियम, राज-विधान तथा शासन-प्रणाली सभ्य संसार के इतिहास में सबसे अधिक समय तक प्रचलित रहे हैं तथा सबसे अधिक कल्याणकारी और सफल सिद्ध हुए हैं। बीच-बीच में कुछ राजाओं द्वारा अपने अलग नियम तथा प्रजा के अमंगलकारी कार्यों के कारण पूरे क्षत्रिय वंश को बुरा नहीं कहा जा सकता। जहाँ राजपूतों ने एक ओर भारतीय संस्कृति की रक्षा की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी स्वयं की विशिष्ट संस्कृति का निर्माण किया। यह विशिष्ट राजपूत संस्कृति आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिलक्षित होती है।
यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि सभी क्षत्रिय शासक निरंकुश नहीं थे, बल्कि इनके समय में शिक्षा, कला, संगीत और संस्कृति की अद्भुत उन्नति हुई थी। कई तो स्वयं इसके पारखी भी थे तथा अनेक गरीबों के मित्र एवं संरक्षक थे। वे उन्हें सहायता एवं भोजन देते थे। इनमें महाराज हर्ष सबसे अग्रणी थे। वे बैस क्षत्रिय ही तो थे और अपनी बहन से माँगकर कपड़े पहनते थे।
बैसवाड़े में गंगा तट पर बहुत से महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिनकी खुदाई कर हम अपने प्राचीन इतिहास को उजागर कर सकते हैं। यहाँ समय-समय पर प्राचीन तथा पुरातात्त्विक महत्व की वस्तुएँ, सिक्के, बर्तन और हथियार मिलते रहते हैं, जिससे हमारी प्राचीन सभ्यता का ज्ञान होता है। बैसवाड़ा का गंगा तटीय इलाका इन प्राचीन एवं पुरातात्त्विक वस्तुओं की खान है।
निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि कितने लाख वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने इस वर्ण-व्यवस्था को अपनाकर सामाजिक जीवन में एक महत्त्वशाली अनुशासन की व्यवस्था की थी। अतएव अतीत के उस सुदूर प्रभात में भी मानवता के लालन-पालन और उसके लौकिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष के लिए यदि कोई वर्ण उत्तरदायी था, तो वह वर्ण मुख्य रूप से क्षत्रिय ही था और यदि कोई जाति तथा व्यक्ति उत्तरदायी था, तो वह क्षत्रिय ही था।
पौराणिक काल के जम्बूद्वीप पर एकछत्र राज की यदि किसी जाति ने स्थापना की, तो वह एकमात्र क्षत्रिय ही थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पृथ्वी को वर्तमान आकार और स्वरूप देने वाले तथा इसका दोहन कर समस्त जीवनोपयोगी सामग्री उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति क्षत्रिय राजा पृथु ही थे। हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण तक तथा प्रशान्त महासागर से लेकर ईरान के अति पश्चिमी भाग तक के भू-खण्ड के अतिरिक्त पूर्वी भाग और असम पर भी क्षत्रियों का ही शासन था। यहाँ तक कि देवासुर संग्राम में देवताओं ने क्षत्रियों का तेज, क्षात्र-शक्ति और अन्तर्दृष्टि देखकर ही उनसे सहायता प्राप्त की।
एक ओर क्षत्रियों द्वारा रक्षित शान्ति के समय वेदों की रचना हुई तथा सार्वभौमिक सिद्धान्तों के प्रणेता उपनिषदों के अधिकांश आचार्य क्षत्रिय ही थे। कोई आज बता सकता है कि संसार में वह कौन-सी जाति है, जिसमें अवतरित मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भारत के आधे से अधिक नर-नारी परमेश्वर के रूप में उपासना करते हैं? तथा कोई बता सकता है कि वह कौन-सी जाति है, जिसमें पुरुषोत्तम योगीराज भगवान कृष्ण अवतरित हुए हैं? क्या कोई बता सकता है कि वह कौन-सी जाति थी, जिसके काल में वाल्मीकि रामायण, महाभारत एवं गीता की रचना हुई? क्या कोई बता सकता है कि सर्वप्रथम शान्ति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर किस जाति के थे? इन सब प्रश्नों का उत्तर है—"क्षत्रिय"।
जिस समय संसार की अन्य जातियाँ अपने पैरों पर लड़खड़ाते हुए उठने का प्रयास कर रही थीं, उस समय भारतवर्ष में क्षत्रिय महान साम्राज्यों के अधिष्ठाता थे। वे साहित्य, कला, वैभव, ऐश्वर्य, सुख और शान्ति के जन्मदाता थे। स्वर्णयुगीन भारत, ज्ञानगुरु भारत और विश्व-विजयी भारत के शासक क्षत्रिय ही तो थे। विदेशी आक्रमणकारी यवन, शक, हूण और कुषाण जातियों को क्षत्रियों के बाहुबल के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। यह क्षत्रिय ही तो थे, जिन्होंने इन आक्रमणकारी जातियों के अस्तित्व तक को भारत में आज ऐतिहासिक खोज बना दिया है। हम उन पूर्वजों को कैसे भुला सकते हैं, जिन्होंने देश भर में शौर्य और तेज के बल से प्रबल राज्यों का निर्माण कर इतिहास में राजपूत काल को अमर कर दिया।
इसके बाद इस्लाम धर्म का प्रबल तूफान उठा और भारत की प्राचीन संस्कृतियों, सुव्यवस्थित साम्राज्यों तथा दीर्घकालीन व्यवस्थाओं को एक के बाद एक करके धराशायी कर दिया। भारत में इन आक्रमणकारियों का सामना मुख्य रूप से क्षत्रियों को ही करना पड़ा। साम्राज्य नष्ट हुए, जातियाँ समाप्त हुईं, स्वतंत्रता विलुप्त हुई, पर संघर्ष बन्द नहीं हुआ।
क्या कोई इतिहासकार बता सकता है कि राजपूतों के अतिरिक्त संसार में कोई अन्य जाति हुई है, जिसने धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए सैकड़ों शाके किए हों? क्या राजपूत नारियों के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसी नारियाँ संसार में हुई हैं, जिन्होंने हँसते-हँसते जौहर कर प्राणों की आहुति दी हो तथा धारा (तलवार) स्नान किया हो? इसका उदाहरण इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलेगा।
इस्लाम धर्म का प्रभाव सैकड़ों वर्षों तक क्षत्रियों से टकराकर निस्तेज होकर स्वतः शान्त हो गया। कितने आश्चर्य की बात है कि क्षत्रिय राज्यों के पश्चात् स्थापित होने वाला मुस्लिम राज्य, क्षत्रिय राज्यों से पहले ही समाप्त हो गया।
महात्मा बुद्ध के प्रभाव से अधिकांश क्षत्रियों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अहिंसा पर विश्वास करने लगे। अशोक महान एक शक्तिशाली राजा के रूप में उदित हुए। उसके बाद महाराजा हर्षवर्धन, जो कि एक बैस क्षत्रिय राजा थे, शीलादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए और एक चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रतिष्ठित हुए। जिनका शासन नर्मदा के उत्तर से नेपाल तक तथा अफगानिस्तान और ईरान से लेकर पूर्व में असम तक था और जिसके सम्मुख कोई भी राजा सिर नहीं उठा सकता था।
उन्होंने भी अन्त में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। साथ ही अधिकतर क्षत्रिय जाति ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और इनके बाद कोई प्रभावशाली उत्तराधिकारी न होने के कारण उनका राज्य छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया।
बौद्ध धर्म समाज की शाश्वत आवश्यकता तथा सुरक्षा के लिए अनुपयोगी सिद्ध हुआ। उसने राष्ट्र की स्वाभाविक क्षात्र-शक्ति को निस्तेज, पंगु और सिद्धान्तहीन बना दिया। वह राष्ट्र पर बाहरी आक्रमणों के समय असफल सिद्ध होने लगा।
अतएव क्षत्रियों ने क्षात्रधर्म के प्रतिपादक वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की, परन्तु शक्तिशाली केन्द्रीय शासन के अभाव में राजपूत राजा आपस में युद्ध करते-करते छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गए। जिसका लाभ मुस्लिम काल में मुस्लिम आक्रान्ताओं को मिला और क्षत्रिय अपनी शक्ति को क्षीण करते रहे तथा अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहे। वे भगवान कृष्ण के उपदेशों का पालन करते रहे, परन्तु संघर्ष को कभी विराम नहीं दिया।
भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वास्तव में धर्मयुद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कर्तव्य क्षत्रिय के लिए और कुछ नहीं—
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥
और यदि धर्मयुद्ध तथा संग्राम को क्षत्रिय नहीं करता, तो वह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप का भागी होता है—
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥