मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत दंड की प्रावधान



मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 की प्रमुख विशेषताएँ

इस विधेयक में 28 नई धाराएँ जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है। ये संशोधन मुख्यतः सड़क सुरक्षा में सुधार, परिवहन विभागों से संबंधित कार्यों के दौरान नागरिकों को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने, ग्रामीण परिवहन को सुदृढ़ बनाने, अंतिम छोर तक संपर्क (लास्ट माइल कनेक्टिविटी) सुनिश्चित करने, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन देने, स्वचालन एवं कम्प्यूटरीकरण को बढ़ावा देने तथा ऑनलाइन सेवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने पर केंद्रित हैं।

सड़क सुरक्षा, यात्रियों की सुविधा, अंतिम छोर तक परिवहन सेवाओं की उपलब्धता, सार्वजनिक परिवहन तथा ग्रामीण परिवहन को प्रोत्साहित करने के लिए राज्यों को स्टेज कैरिज एवं अनुबंध कैरिज परमिटों में छूट देने का प्रस्ताव इस विधेयक में किया गया है, जिससे देश की परिवहन व्यवस्था में सुधार लाया जा सके।

विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि राज्य सरकार एक गुणक (Multiplier) निर्धारित कर सकेगी, जो एक से कम तथा दस से अधिक नहीं होगा। यह गुणक इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रत्येक जुर्माने एवं संशोधित दंड पर लागू किया जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वे पैदल यात्रियों के लिए सार्वजनिक स्थलों तथा परिवहन के विभिन्न साधनों में गतिविधियों को विनियमित कर सकें।

ई-गवर्नेंस के माध्यम से हितधारकों को सेवाओं का अधिक प्रभावी वितरण इस विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसके अंतर्गत ऑनलाइन लर्निंग लाइसेंस जारी करना, ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता अवधि बढ़ाना तथा परिवहन लाइसेंस प्राप्त करने के लिए शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता समाप्त करना जैसी सुविधाएँ प्रस्तावित की गई हैं।

विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि यदि कोई किशोर वाहन चलाते हुए अपराध करता है, तो उसके अभिभावक अथवा वाहन-मालिक को उत्तरदायी माना जाएगा तथा किशोर के विरुद्ध किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी। साथ ही संबंधित मोटर वाहन का पंजीकरण भी निरस्त किया जा सकेगा।

नए वाहनों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल एवं पारदर्शी बनाने के लिए डीलर स्तर पर ही पंजीकरण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है तथा अस्थायी पंजीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है।

सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा यातायात नियमों के उल्लंघन को रोकने के उद्देश्य से विभिन्न अपराधों के लिए दंड की राशि में वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है। इनमें किशोरों द्वारा वाहन चलाना, शराब पीकर वाहन चलाना, बिना लाइसेंस वाहन चलाना, खतरनाक ढंग से वाहन चलाना, अत्यधिक गति से वाहन चलाना तथा निर्धारित सीमा से अधिक भार ले जाना आदि अपराध शामिल हैं।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से यातायात नियमों के उल्लंघन का पता लगाने के प्रावधानों के साथ-साथ हेलमेट पहनने संबंधी नियमों को भी अधिक कठोर बनाया गया है।

सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों की सहायता को प्रोत्साहित करने के लिए ‘सद्भावी नागरिक दिशा-निर्देश’ (Good Samaritan Guidelines) को भी विधेयक में शामिल किया गया है।

परिवहन वाहनों के लिए स्वचालित फिटनेस परीक्षण का प्रावधान भी किया गया है, जो 1 अक्टूबर, 2018 से प्रभावी होने का प्रस्ताव था। इससे परिवहन विभागों में भ्रष्टाचार कम होने तथा वाहनों की सड़क-योग्यता में सुधार होने की अपेक्षा की गई है।

सुरक्षा एवं पर्यावरण संबंधी मानकों का जानबूझकर उल्लंघन करने वालों के लिए तथा बॉडी बिल्डरों एवं स्पेयर पार्ट्स आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं।

पंजीकरण एवं लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए ‘वाहन’ एवं ‘सारथी’ जैसे डिजिटल मंचों के माध्यम से ड्राइविंग लाइसेंस तथा वाहन पंजीकरण के राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने का प्रस्ताव किया गया है। इससे पूरे देश में प्रक्रिया की समानता सुनिश्चित होगी।

वाहनों के परीक्षण एवं प्रमाणन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए परीक्षण एजेंसियों को भी इस अधिनियम के दायरे में लाया गया है।

ड्राइविंग प्रशिक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करने का भी प्रावधान किया गया है, जिससे परिवहन लाइसेंस शीघ्र जारी किए जा सकें और देश में वाणिज्यिक चालकों की कमी को दूर करने में सहायता मिले।

दिव्यांगजनों के लिए परिवहन सुविधाओं को अधिक सुगम बनाने के उद्देश्य से ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने तथा उनके उपयोग हेतु वाहनों को उपयुक्त रूप से अनुकूलित करने में विद्यमान बाधाओं को दूर करने का प्रस्ताव किया गया है।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कैबिनेट द्वारा स्वीकृत मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 को सड़क सुरक्षा एवं परिवहन क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा सुधार बताया है। उन्होंने इस संबंध में मार्गदर्शन एवं समर्थन प्रदान करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया।

उन्होंने राज्य परिवहन मंत्रियों के समूह द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना की तथा विश्वास व्यक्त किया कि संसद में इस विधेयक पर विचार किया जाएगा और सभी राजनीतिक दल जनहित में इसका समर्थन करेंगे, जिससे देश में सुरक्षित, प्रभावी एवं नागरिक-अनुकूल परिवहन व्यवस्था स्थापित की जा सके।


The Provision and Penalties under the Motor Vehicles Act 1988

मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 के अंतर्गत विभिन्न जुर्मानों में प्रस्तावित संशोधन

धाराअपराधपुराना जुर्मानाप्रस्तावित नया जुर्माना
177सामान्य अपराध₹100₹500
177Aसड़क विनियमन नियमों का उल्लंघन₹100₹500
178बिना टिकट यात्रा₹200₹500
179अधिकारियों के आदेशों की अवज्ञा₹500₹2,000
180बिना लाइसेंस व्यक्ति को वाहन चलाने देना₹1,000₹5,000
181बिना लाइसेंस वाहन चलाना₹500₹5,000
182अयोग्यता के बावजूद वाहन चलाना₹500₹10,000
182Bनिर्धारित आकार से बड़े वाहननया प्रावधान₹5,000
183निर्धारित गति सीमा से अधिक वाहन चलाना₹400एलएमवी हेतु ₹1,000 तथा मध्यम यात्री वाहन हेतु ₹2,000
184खतरनाक ढंग से वाहन चलाना₹1,000₹5,000 तक
185शराब पीकर वाहन चलाना₹2,000₹10,000
189रेसिंग अथवा स्पीड ट्रायल₹500₹5,000
192Aबिना परमिट वाहन संचालन₹5,000 तक₹10,000 तक
193एग्रीगेटर द्वारा लाइसेंस शर्तों का उल्लंघननया प्रावधान₹25,000 से ₹1,00,000
194ओवरलोडिंग₹2,000 तथा ₹1,000 प्रति अतिरिक्त टन₹20,000 तथा ₹2,000 प्रति अतिरिक्त टन
194Aयात्रियों की ओवरलोडिंग₹1,000 प्रति अतिरिक्त यात्री
194Bसीट बेल्ट का उल्लंघन₹100₹1,000
194Cदोपहिया वाहन पर ओवरलोडिंग₹100₹2,000 तथा 3 माह के लिए लाइसेंस निलंबन
194Dहेलमेट नियमों का उल्लंघन₹100₹1,000 तथा 3 माह के लिए लाइसेंस निलंबन
194Eआपातकालीन वाहनों को मार्ग न देनानया प्रावधान₹10,000
196बिना बीमा वाहन चलाना₹1,000₹2,000
199किशोर द्वारा अपराधनया प्रावधानअभिभावक/मालिक दोषी माना जाएगा; ₹25,000 जुर्माना, 3 वर्ष तक कारावास, वाहन का पंजीकरण रद्द तथा किशोर पर जेजे एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई
206दस्तावेज़ जब्त करने की शक्तिधारा 183, 184, 185, 189, 190, 194C, 194D एवं 194E के अंतर्गत ड्राइविंग लाइसेंस जब्त किया जा सकेगा
210Bनियुक्त अधिकारियों द्वारा अपराधसंबंधित धारा के अंतर्गत निर्धारित जुर्माने का दोगुना दंड

प्रमुख विशेषताएँ

  1. अधिकांश यातायात उल्लंघनों पर जुर्माने की राशि में कई गुना वृद्धि की गई।

  2. शराब पीकर वाहन चलाने, बिना लाइसेंस वाहन चलाने तथा खतरनाक ड्राइविंग पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया।

  3. हेलमेट एवं सीट बेल्ट नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई का प्रस्ताव किया गया।

  4. किशोरों द्वारा वाहन चलाने की स्थिति में अभिभावकों को भी उत्तरदायी बनाया गया।

  5. आपातकालीन वाहनों (एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड आदि) को मार्ग न देने पर विशेष दंड का प्रावधान किया गया।

  6. सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए दंड व्यवस्था को अधिक प्रभावी एवं निवारक बनाने का प्रयास किया गया।

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अंतर्गत प्रमुख अपराध एवं दंड

क्रमांकअपराधदंड / जुर्माना
1बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलानाजुर्माना एवं कारावास, दोनों का प्रावधान
2नशे की अवस्था में वाहन चलानाजुर्माना, कारावास अथवा दोनों
3खतरनाक ढंग से वाहन चलानाकारावास, जुर्माना अथवा दोनों
4निर्धारित गति सीमा से अधिक गति से वाहन चलानाआर्थिक दंड
5बिना पंजीकरण वाहन चलानाजुर्माना
6बिना बीमा वाहन चलानाजुर्माना एवं अन्य वैधानिक कार्रवाई
7बिना परमिट परिवहन वाहन का संचालनजुर्माना एवं वाहन जब्ती की कार्रवाई
8ओवरलोड वाहन चलानाआर्थिक दंड
9वाहन में निर्धारित क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठानाजुर्माना
10सीट बेल्ट का प्रयोग न करनाजुर्माना
11हेलमेट का उपयोग न करनाजुर्माना एवं लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई
12प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) न होनाजुर्माना
13वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोगजुर्माना
14ट्रैफिक संकेतों की अवहेलनाआर्थिक दंड
15लाल बत्ती पार करनाजुर्माना
16गलत दिशा में वाहन चलानाजुर्माना
17सार्वजनिक मार्ग में रेस लगानाकारावास एवं जुर्माना
18दुर्घटना के बाद सहायता न देनादंडनीय अपराध
19वाहन से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत न करनाजुर्माना
20किशोर को वाहन चलाने देनावाहन-मालिक/अभिभावक पर दंडात्मक कार्रवाई

सड़क सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण प्रावधान

1. ड्राइविंग लाइसेंस

कोई भी व्यक्ति बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के सार्वजनिक मार्ग पर मोटर वाहन नहीं चला सकता। विभिन्न श्रेणी के वाहनों के लिए पृथक लाइसेंस की व्यवस्था है।

2. वाहन पंजीकरण

प्रत्येक मोटर वाहन का सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पंजीकरण कराना अनिवार्य है। बिना पंजीकरण वाहन का संचालन विधि-विरुद्ध है।

3. बीमा

तृतीय पक्ष बीमा (Third Party Insurance) प्रत्येक मोटर वाहन के लिए अनिवार्य है। इसका उद्देश्य दुर्घटना पीड़ितों के हितों की रक्षा करना है।

4. प्रदूषण नियंत्रण

प्रत्येक वाहन के पास वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) होना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण प्रावधान है।

5. दुर्घटना की स्थिति में चालक का कर्तव्य

दुर्घटना होने पर चालक का दायित्व है कि वह—

  • घायल व्यक्ति की सहायता करे।

  • निकटतम अस्पताल तक पहुँचाने का प्रयास करे।

  • पुलिस अथवा संबंधित प्राधिकारी को सूचना दे।

  • घटनास्थल से अनुचित रूप से फरार न हो।

6. नाबालिग द्वारा वाहन संचालन

यदि कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता है अथवा दुर्घटना करता है, तो उसके अभिभावक अथवा वाहन-मालिक को भी उत्तरदायी माना जा सकता है। ऐसे मामलों में वाहन का पंजीकरण निरस्त किए जाने का भी प्रावधान है।

अधिनियम का उद्देश्य

मोटर वाहन अधिनियम का मुख्य उद्देश्य—

  • सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना,

  • दुर्घटनाओं में कमी लाना,

  • वाहन संचालन को विनियमित करना,

  • यात्रियों एवं पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करना,

  • तथा परिवहन व्यवस्था को अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी बनाना है।

इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित नियमों का पालन प्रत्येक चालक, वाहन-मालिक एवं नागरिक का वैधानिक कर्तव्य है।



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नौकासन योग विधि, लाभ और सावधानियां



नौकासन क्या है?

नौकासन पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले महत्वपूर्ण योगासनों में से एक है। इस आसन के अभ्यास के दौरान शरीर की आकृति नाव के समान दिखाई देती है, इसलिए इसे नौकासन (Naukasana) कहा जाता है। इसे नावासन के नाम से भी जाना जाता है।

इस आसन के अभ्यास में नाभि क्षेत्र पर विशेष बल पड़ता है तथा शरीर का संतुलन मुख्य रूप से नाभि के आसपास बना रहता है। नौकासन पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने के लिए अत्यंत प्रभावी योगाभ्यास माना जाता है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के साथ-साथ सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर को लाभ पहुँचाता है। इसके अनेक लाभ हैं, इसलिए प्रत्येक योग साधक को इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए।

Benefits of the Naukasana

नौकासन के लाभ (Benefits of Naukasana)

इस आसन में शरीर की आकृति नाव के समान हो जाती है, इसलिए इसे नौकासन कहा जाता है। इस आसन के दौरान शरीर का अधिकांश भार पेट के भाग पर आता है तथा शरीर के अन्य भाग ऊपर उठ जाते हैं। इससे पेट की मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं और पाचन तंत्र स्वस्थ एवं शक्तिशाली बनता है।

यह आमाशय, यकृत (लिवर), आँतों, पेडू, अग्न्याशय (पैंक्रियाज) तथा गुर्दों (किडनी) को बल प्रदान करता है। यह जठराग्नि को तीव्र करने में सहायक है तथा हृदय एवं फेफड़ों को भी सशक्त बनाता है। इससे शरीर में रक्तसंचार सुचारु रूप से होने लगता है। कमर के पीछे की ओर झुकाव के कारण उसकी शक्ति एवं लचीलापन बढ़ता है तथा कमर की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। इससे कमर-दर्द की रोकथाम होती है और तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) स्वस्थ बना रहता है। यह हर्निया की रोकथाम में भी सहायक माना जाता है।

हिंदी में नौकासन के फायदे

  • नौकासन पेट की चर्बी कम करने के लिए अत्यंत प्रभावी योगाभ्यास है। इसके नियमित अभ्यास से पेट की अतिरिक्त चर्बी कम की जा सकती है।

  • इसका नियमित अभ्यास केवल पेट की चर्बी ही नहीं घटाता, बल्कि पूरे शरीर के वजन को नियंत्रित करने में भी सहायक होता है।

  • यह किडनी को स्वस्थ रखने तथा उसके कार्यों को बेहतर बनाने में सहायता करता है।

  • नौकासन पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है तथा कब्ज, अम्लपित्त (एसिडिटी), गैस आदि समस्याओं में लाभ पहुँचाता है।

  • प्रारंभिक अभ्यास में कमर में हल्की असुविधा हो सकती है, किंतु नियमित अभ्यास से कमर मजबूत बनती है।

  • यह कब्ज को दूर करने में सहायक है तथा पाचन संबंधी एंजाइमों के स्राव को प्रोत्साहित करता है।

  • रीढ़ की हड्डी एवं मेरुदंड को लचीला बनाने में लाभकारी है।

  • हर्निया की रोकथाम में सहायक माना जाता है।

  • पूरे शरीर को सिर से पैर तक लाभ पहुँचाता है।

  • मधुमेह (डायबिटीज), मंद पाचन, शारीरिक शिथिलता तथा भूख की कमी जैसी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है।

  • फेफड़ों एवं श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाकर शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति में सहायता करता है।

  • शरीर के सभी अंगों में रक्तसंचार को बेहतर बनाता है, जिससे मांसपेशियाँ अधिक लचीली एवं सक्रिय रहती हैं।

  • यकृत (लिवर) एवं तिल्ली के विकारों में लाभ पहुँचाकर शारीरिक शक्ति बढ़ाने में सहायक है।

  • कमर एवं गर्दन के दर्द में लाभकारी माना जाता है।

Naukasana

नौकासन की विधि (Naukasana Ki Vidhi)

  1. सर्वप्रथम स्वच्छ स्थान पर चटाई या दरी बिछाकर पेट के बल लेट जाएँ।

  2. दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में जोड़कर सिर की सीध में आगे की ओर फैलाएँ।

  3. एड़ियों एवं पंजों को मिलाकर सीधा एवं तना हुआ रखें।

  4. अब गहरी श्वास लेते हुए धीरे-धीरे पैरों तथा शरीर के अगले भाग को यथासंभव ऊपर उठाएँ (लगभग 30 डिग्री तक)।

  5. शरीर को इस प्रकार उठाएँ कि उसका संतुलन नाभि के आसपास बना रहे तथा सिर और पैर ऊपर की ओर उठे रहें।

  6. इस अवस्था में शरीर की आकृति नाव के समान दिखाई देनी चाहिए।

  7. इसके बाद हाथों और पैरों में हल्का कंपन या गति उत्पन्न करें, किंतु शरीर की नाव जैसी आकृति बनाए रखें।

  8. अपनी क्षमता के अनुसार श्वास रोककर कुछ समय तक इस स्थिति में बने रहें।

  9. फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए शरीर को वापस सामान्य अवस्था में ले आएँ और पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दें।

  10. इस प्रक्रिया को लगभग तीन बार दोहराएँ।


नौकासन करते समय सावधानियाँ (Naukasana Ki Savdhaniyan)

  • कमर में तीव्र दर्द होने पर नौकासन नहीं करना चाहिए।

  • हर्निया के रोगियों को यह आसन किसी योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

  • रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या होने पर इस आसन से बचना चाहिए।

  • नौकासन के बाद भुजंगासन का अभ्यास करना लाभकारी माना जाता है।

  • अल्सर तथा कोलाइटिस से पीड़ित व्यक्तियों को इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

  • प्रारंभिक अवस्था में शरीर को पूर्ण रूप से ऊपर उठाना कठिन हो सकता है, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही अभ्यास करें।

  • गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए।

  • किसी भी प्रकार की शारीरिक समस्या होने पर योग विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।







नौकासन क्या है ?
नौकासन पीठ के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों में एक महत्वपूर्ण योगासन है। इस आसन के अभ्यास के समय व्यक्ति का आकार नाव के समान हो जाता है, इसलिए इसे नौकासन (Naukasana) कहते हैं। इस आसन के अभ्यास से नाभि पर बल अधिक पड़ता है तथा शरीर का पूरा भार नाभि पर रहता है। इसको नावासन के नाम से भी जाना जाता है। इसके फायदे अद्भुत हैं। यह पेट की चर्बी को कम करने के लिए बहुत ही प्रवभाशाली योगाभ्यास है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है और साथ ही साथ सिर से लेकर पैर की अंगुली तक फायदा पहुँचाता है। इसके जितने भी लाभ गिनाये जाए कम है। इसलिए चाहिए कि हर योग साधक नियमित रूप से इस योगासन का अभ्यास करना चाहिए।

लाभ - Benefits
इस आसन में शरीर की आकृति नाव के समान हो जाती है। इसलिए इसे नौकासन कहा जाता है। इस आसन में पूरे शरीर का भार पेट पर आ जाता है। बाकी शरीर आगे-पीछे से ऊपर उठ जाता है, जिससे पेट की मांसपेशियों की ताकत बढ़ती है व पाचन संस्थान स्वस्थ व बलिष्ठ हो जाता है। आमाशय, लिवर, आंतें, पेडू़, पेन्क्रियाज व किडनी को बल मिलता है। यह जठराग्नि को तीव्र करने में सहायक है। इससे हृदय व फेफड़ों को बल मिलता है। शरीर में रक्त का संचार सुचारू रूप से होने लगता है। कमर पीछे की ओर मोड़ने के कारण उसकी शक्ति व लचीलापन बढ़ता है और कमर की मांसपेशियों को बल मिलता है। कमर दर्द की रोकथाम होती है व नर्वस सिस्टम स्वस्थ बना रहता है। यह अभ्यास हनिर्या की रोकथाम में भी मददगार है।

हिंदी में नौकासन के फायदे : Naukasana Ke Fayde in Hindi
  1. नौकासन पेट की चर्बी को कम करने के लिए बहुत ही उम्दा योगाभ्यास है। इसका नियमित रूप से अभ्यास किया जाये तो बहुत जल्द पेट की चर्बी से निज़ात पाया जा सकता है।
  2. नौकासन का नियमित अभ्यास करने से पेट की चर्बी ही कम नहीं होती बल्कि पुरे शरीर का वजन घटता है और आप मोटापा को कंट्रोल कर सकते हैं।
  3. नौकासन ऐसा योग है जो किडनी को लाभ पहुंचाता है, नियमित रूप से इस आसन को करने से किडनी स्वस्थ रहता है और साथ ही साथ शरीर का यह अंग बेहतर तरीके से काम करता है।
  4. नौकासन योगाभ्यास आपके पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और पाचन से संबंधित रोग जैसे कब्ज, एसिडिटी, गैस आदि से छुटकारा दिलाता है।
  5. नौकासन का आरंभिक अभ्यास पहले कमर में थोड़ी बहुत परेशानी हो सकती है लेकिन धीरे धीरे यह आपके कमर को मजबूत बनाता है।
  6. नौकासन कब्ज को कम करने में बहुत मददगार है क्योंकि एंजाइम के स्राव में बड़ी भूमिका निभाता है।
  7. नौकासन रीढ़ की हड्डी के लिए यह बहुत लाभकारी है। यह आपके मेरुदंड को लचीला बनाता है।
  8. नौकासन हर्निया के लिए बहुत ही लाभदायक है।
  9. नौकासन पूरे शरीर को सिर से लेकर पैर तक फायदा पहुंचाता है।
  10. नौकासन मधुमेह (डायबटीज) दूर करने, पाचनक्रिया को ठीक करने, शरीर में स्फूर्ति लाने तथा भूख को बढ़ाने में भी यह आसन लाभकारी है।
  11. नौकासन फेफड़े व सांस से सम्बन्धित बीमारियों को दूर कर फेफड़ों में शुद्ध ऑक्सीजन को पहुंचाता है।
  12. नौकासन शरीर के सभी अंगों में खून के बहाव को तेज करता है, जिससे मांसपेशियां लचीली बनती है।
  13. नौकासन जिगर व तिल्ली के दोषों को दूर कर शारीरिक शक्ति को बढ़ाता है।
  14. नौकासन से कमर व गर्दन का दर्द ठीक होता है।

नौकासन की विधि : Naukasana Ki Vidhi
  1. नौकासन के अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जमीन पर चटाई या दरी बिछाकर पेट के बल लेट जाएं।
  2. इसके पश्चात् अपने दोनों हाथों को आपस में नमस्कार की स्थिति में जोड़कर सिर की सीध में आगे की ओर करके रखें और एड़ियों व पंजों को मिलाकर व तानकर रखे।
  3. फिर सांस लेते हुए धीरे-धीरे पैर तथा शरीर के अगले हिस्से को जितना संभव हो ऊपर उठाएं। (लगभग 30 डिग्री)
  4. इस तरह शरीर को इतना उठाएं कि शरीर का पूरा भार नाभि पर रहें तथा पैर व सिर ऊपर की ओर रखें। इस स्थिति में शरीर का आकार ऐसा हो जाना चाहिए, जैसे किसी नाव का आकार होता है।
  5. इसके बाद पहले हाथों को हिलाएं फिर पैरों को भी हिलाएं। परंतु शरीर का आकार नाव की तरह ही बनाएं रखें। सांस को जितनी देर तक अंदर रोक सकते हैं, रोक कर इस स्थिति में रहे और फिर शरीर को धीरे-धीरे नीचे सामान्य स्थिति में लाकर सांस को छोड़ते हुए पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। इस तरह से इस क्रिया को 3 बार करें।
नौकासन की सावधानियां : Naukasana Ki Savdhaniya
  1. जब कमर में दर्द हो तो नौकासन नहीं करनी चाहिए।
  2. हर्निया के रोगियों को यह आसन किसी विशेषज्ञ के निगरानी में करनी चाहिए।
  3. रीढ़ की हड्डी में कोई समस्या हो तो इस आसन को करने से बचें।
  4. नौकासन करने के बाद भुजंगासन करनी चाहिए।
  5. इस आसन का अभ्यास अल्सर, कोलाइटिस वाले रोगियों को नहीं करना चाहिए।
  6. शुरुआत में शरीर को पूर्ण रूप से ऊपर उठाने में कठिनाई हो सकती है इसलिए शुरू में अपनी क्षमता के अनुसार ही शरीर को ऊपर की ओर उठाएं।

नौकासन के प्रकार

1. सुप्त नौकासन (Supine Boat Pose)

इसमें पीठ के बल लेटकर शरीर को नाव के आकार में उठाया जाता है। आधुनिक योग में इसे अधिक प्रचलित रूप से नौकासन कहा जाता है।

2. उदर नौकासन (Prone Boat Pose)

इसमें पेट के बल लेटकर हाथ और पैरों को ऊपर उठाया जाता है। कुछ योग ग्रंथों में इसे भी नौकासन का एक रूप माना गया है।

नौकासन का वैज्ञानिक महत्व

नौकासन के दौरान पेट की मांसपेशियाँ, रीढ़, जांघें, कंधे तथा कूल्हों की मांसपेशियाँ एक साथ सक्रिय होती हैं। इससे—

  • कोर मसल्स (Core Muscles) मजबूत होती हैं।

  • पेट की चर्बी कम करने में सहायता मिलती है।

  • शरीर का संतुलन बेहतर होता है।

  • मांसपेशियों की सहनशक्ति बढ़ती है।

  • शरीर की मुद्रा (Posture) में सुधार होता है।

नौकासन का मानसिक लाभ

नियमित अभ्यास से—

  • मानसिक तनाव कम होता है।

  • एकाग्रता बढ़ती है।

  • आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

  • मन में स्थिरता आती है।

  • चिंता एवं बेचैनी कम होती है।

नौकासन में श्वास का महत्व

  • शरीर को ऊपर उठाते समय गहरी श्वास लें।

  • स्थिति बनाए रखते समय सामान्य श्वास लेते रहें।

  • नीचे आते समय धीरे-धीरे श्वास छोड़ें।

श्वास का सही समन्वय आसन के लाभों को बढ़ाता है।

नौकासन करने का उपयुक्त समय

  • प्रातःकाल खाली पेट।

  • भोजन के कम से कम 4–5 घंटे बाद।

  • योगाभ्यास के मध्य या अंत में।

नौकासन कितनी देर करना चाहिए?

स्तरअवधि
प्रारंभिक10–15 सेकंड
मध्यम20–30 सेकंड
उन्नत45–60 सेकंड

शुरुआत में 3 बार तथा बाद में 5–7 बार तक अभ्यास किया जा सकता है।

नौकासन से प्रभावित प्रमुख अंग

  • पेट की मांसपेशियाँ

  • अग्न्याशय (Pancreas)

  • यकृत (Liver)

  • गुर्दे (Kidneys)

  • आँतें

  • रीढ़ की हड्डी

  • जांघ एवं कूल्हे

  • फेफड़े

मधुमेह में नौकासन

नौकासन अग्न्याशय को सक्रिय करने वाला आसन माना जाता है। नियमित अभ्यास से इंसुलिन स्राव को संतुलित करने में सहायता मिल सकती है। इसलिए मधुमेह रोगियों के लिए यह लाभकारी योगासनों में गिना जाता है।

नौकासन के बाद किए जाने वाले आसन

नौकासन के बाद निम्न आसन करने से शरीर को संतुलन मिलता है—

  • भुजंगासन

  • मकरासन

  • शशांकासन

  • पवनमुक्तासन

सामान्य गलतियाँ

नौकासन करते समय लोग प्रायः निम्न गलतियाँ करते हैं—

  • झटके से शरीर उठाना।

  • गर्दन पर अधिक तनाव डालना।

  • श्वास रोक लेना।

  • घुटनों को मोड़ लेना।

  • कमर पर अत्यधिक दबाव डालना।

इन गलतियों से बचना चाहिए।

किन लोगों को नौकासन नहीं करना चाहिए?

  • गर्भवती महिलाएँ

  • हाल ही में ऑपरेशन करवाने वाले व्यक्ति

  • गंभीर स्लिप-डिस्क के रोगी

  • तीव्र कमर दर्द वाले व्यक्ति

  • उच्च रक्तचाप के गंभीर रोगी (चिकित्सकीय सलाह के बिना)

  • हृदय रोगी (विशेषज्ञ की सलाह से ही)

आध्यात्मिक महत्व

योग दर्शन के अनुसार नौकासन मणिपुर चक्र को सक्रिय करने वाला आसन माना जाता है। मणिपुर चक्र आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति, साहस तथा आंतरिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। इसलिए इस आसन के नियमित अभ्यास से व्यक्ति में उत्साह, सकारात्मकता तथा आत्मबल की वृद्धि होती है।

निष्कर्ष

नौकासन एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली योगासन है। यह पेट की चर्बी कम करने, पाचन शक्ति बढ़ाने, रीढ़ को मजबूत बनाने, मधुमेह नियंत्रण में सहायता करने तथा मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में लाभकारी माना जाता है। नियमित एवं सही विधि से किया गया नौकासन शरीर को स्वस्थ, संतुलित, सुदृढ़ एवं ऊर्जावान बनाता है।

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महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी एवं निबंध




महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी एवं निबंध;
Biography and Essay of Mahamana Madan Mohan Malaviya
भारत माता आदिकाल से ही महान आत्माओं को जन्म दे रही है और न जाने कितने कर्मवीरों और तपस्वियों को इसने जन्म देकर अपने आदर्श, चरित्र, त्याग और सेवा से संसार का मार्गदर्शन किया तथा उन्हें अंधकार से निकालकर ज्ञान का दीपक दिखाया है। भारत के ऐसे ही देव पुत्रों में से एक पत्रकार समाज सुधारक, देशभक्त, धार्मिक नेता और शिक्षाविद पं. मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर 1861 ई. को सूर्य कुण्ड या लालडिंग के कूंचा सांवल-दास मोहल्ले में बृजनाथ जी के घर संध्या को 6 बजकर 54 मिनट पर प्रयाग में हुआ। इनकी माता भूना देवी थी। बी.जे. अकद के कथानुसार - "यह भारत माता के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षण था, जब 25 दिसम्बर 1861 को इलाहाबाद में पं. बृजनाथ के घर एक नन्हें से बच्चे ने जन्म लिया था।" कौन जानता था कि वह छोटा-सा निर्बल बालक एक दिन देश की स्वतन्त्रता और आत्मनिर्भरता के लिए सिंह गर्जना करेगा। बचपन से ही इनके माता-पिता को ऐसा प्रतीत होता था कि भविष्य में यह बालक बहुत ही होनहार होगा। एक कहावत भी चरितार्थ है कि "होनहार बिखान के होत चिकने पात" मालवीय जी ने इस कहावत को अपने जीवन में चरितार्थ किया था। पाँच वर्ष की आयु से ही उनकी शिक्षा आरम्भ हुई थी। उस समय प्रयाग में अहिपापुर मौहल्ले में कोई पाठशाला न थी। लाला मनोहर दास रईस की कोठी के चबूतरे पर, जो तीन सवा तीन फीट चैड़ा और दस पन्द्रह फीट लम्बा था, उसी पर टाट बिछा कर एक गुरु जी लड़कों को पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां से हरदेव जी की पाठशाला जिसका नाम धर्मोपदेश पाठशाला था। जहाँ से स्थायी रूप से मदन मोहन मालवीय जी ने अपना विद्याध्ययन शुरू किया था। मदन मोहन मालवीय जी ने संस्कृत काव्य, गीता एवं अन्य धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया था। इनमें से मालवीय जी को संस्कृत काव्य ने अधिक प्रभावित किया था। यह उनकी अमूल्य निधि थी।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का एक सामाजिक-राजनीतिक सुधारक के रूप में ऐसे समय उदय हुआ जब पूरा देश विकट परिस्थितियों में गुजर रहा था। युगपुरुष महामना मदनमोहन मालवीय का जीवन अत्यंत उतार-चढ़ाव भरा रहा। गरीबी झेलते हुए उन्होंने न सिर्फ ज्ञानार्जन किया, बल्कि स्वयं को शिखर पर पहुंचाया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि, शिक्षक, पत्रकार, वकील के रूप में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, कि हर कोई आज भी उससे प्रेरणा ले रहा है। 15वीं सदी में वे उत्तर प्रदेश चले आए। मालवा का होने के कारण वे लोग मल्लई कहलाते थे, जो बाद में मालवीय हो गया। मालवीय जी की आरंभिक शिक्षा इलाहाबाद में पूरी हुई। उन्होंने मकरंद के नाम से 15 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था और सोलह सत्तरह वर्ष की आयु में उन्होंने एंट्रेंस की परीक्षा पास की। ऐंट्रस पास करने के बाद मालवीय जी म्योर सेंट्रल कालेज में पढ़ने लगे। परिवार के लिए कालेज की पढ़ाई का आर्थिक बोझ वहन करना कठिन था, पर माता ने कठिनाई सहकर, अपने जेवर गिरवी रखकर अपने बच्चे को पढ़ाने का निश्चय किया। प्रिंसीपल हैरिसन ने उन्हें एक मासिक वजीफा दिया। फिर भी मदनमोहन मालवीय को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चाहे मालवीय जी के शिक्षा क्षेत्र में कितनी भी कठिनाई क्यों न आई हो, उन्होंने बैरिस्टर तक की शिक्षा ग्रहण की। विनोद: कालेज में एक बार आर्यनाटक मण्डली की ओर से 'शकुंतला' नाटक का अभिनय हुआ, इसमें मदन मोहन मालवीय को शकुन्तला का पार्ट दिया गया। परदा उठने पर प्रियम्वदा और अनुसूया सखियों के साथ शकुन्तला हाथ में घड़ा लिए रंगमंच पर आयी, तब दर्शक दंग रह गये। शृंगार और करुणा दोनों रसों के हाव-भाव दिखला कर शकुंतला के अभिनेता ने दर्शकों को मुग्ध कर दिया।
मालवीय जी का विवाह 16 वर्ष की आयु में उनके चाचा पंडित गजाधर प्रसाद जी के माध्यम से मिर्जापुर के पंडित नन्दलाल जी की कन्या कुनन देवी से हुआ। वे माता-पिता के दुलार में पली थी। लड़कपन में उन्हें किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं था। ससुराल की आर्थिक दशा ने उन्हें बड़े धैर्य और साहस से निर्धनता के कष्ट सहन करने को बाध्य किया। उन्हें आधा पेट खा कर संतोष करना पड़ता था। फटी धोतियों सी कर पहननी पड़ती थी। एक दिन बहुत वर्षों बाद मालवीय जी ने उनसे पूछा, तुमने अपनी सास से कभी खाने-पीने पहनने की शिकायत नहीं की? इस पर देवी जी ने उत्तर दिया, 'शिकायत करके क्या करती? वे कहाँ से देती? घर का कोना-कोना जितना वे जानती थी, उतना मैं भी जानती थी। मेरा दुख सुनकर वे रो देती और क्या करती?' देवी जी को धैर्य के साथ-साथ पतिदेव का स्नेह तथा भगवद्भक्ति के प्रति अनुराग भी प्राप्त था। जैसा कि मालवीय जी ने पंडित रामनरेश त्रिपाठी को बताया, पति पत्नी दोनों वैवाहिक जीवन के प्रारम्भ से ही रामकृष्ण के उपासक थे। दोनों कोई भी काम करते, चाहे दूध पीते, चाहे पानी पीते, रामकृष्ण का स्मरण किए बिना नहीं करते। पतिदेव की तरह पतिव्रता साध्वी ने भी भगवान की भक्ति में कई दोहे कहे थे, वे कहती थी- 'ऐसा कोई घर नहीं, जहां न मेरा राम।'
वर्ष 1868 में उन्होंने प्रयाग सरकारी हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की। इसके उपरान्त उन्होंने मायर सेंट्रल कालेज में प्रवेश लिया। कालेज में पढ़ाई करते हुए वर्ष 1880 में उन्होंने अपने गुरु पं॰ आदित्यराम भट्टाचार्य के नेतृत्व में हिंदू समाज नामक सामाजिक सेवा संघ स्थापित किया। वे स्कूल के साथ-साथ कालेज में भी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते रहे। उन्होंने लिखा है, "मैं एक गरीब ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। इसलिए पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए एक सेठ के छोटे बच्चे को पढ़ाने जाता था। धार्मिक भावों के प्रति मेरा रुझान बचपन से था। स्कूल जाने के पहले मैं रोज हनुमान जी के दर्शन करने जाता था।" वे भारतीय विद्यार्थी के मार्ग में आने वाली भावी मुसीबतों को जानते थे। उनका कहना था, "छात्रों की सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भूभाग में उन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"
भारतीय स्वातंत्रय आन्दोलन के इतिहास में महामना का व्यक्तित्व स्वतः साक्ष्य रूप में प्रत्येक आन्दोलन से संबंधित रहा है चाहे राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रश्न रहा हो अथवा अछूतोद्धार या दलित वर्ग की समस्या रही हो या हिन्दू-मुस्लिम एकता की। चाहे औद्योगिक, आर्थिक अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विषय रहा हो या राष्ट्रीय शिक्षा के उन्नयन का अथवा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का। इन सभी क्षेत्रों में महामना एक सच्चे सिपाही की भाँति अग्रणी रहे हैं। पंडित मदन मोहन मालवीय महापुरुष और श्रेष्ठ आत्मा थे। उन्होंने समर्पित जीवन व्यतीत किया तथा धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आदि बहुत से क्षेत्रों में अपने लोगों की उत्कृष्ट सेवाएं की। धमकियों से निडर और प्रलोभनों से अनाकृर्षित उन्होंने अन्याय और क्ररताओं से संघर्ष किया तथा साहस और दृढ़तापूर्वक अपने उद्देश्य की नैतिकता पर दृढ़विश्वास के साथ अपने देशवासियों के सामूहिक हित और उत्कर्ष के लिए 50 वर्ष से अधिक काम किया निःसंदेह उनका व्यक्तित्व उनकी महान् उपलब्धियों से कहीं अधिक प्रतिष्ठित था। वे आध्यात्मिक सद्गुणों नैतिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष के असाधारण संश्लेषण थे।
मदनमोहन मालवीय जी का पूरा जीवन भले ही गरीबी में बीता हो लेकिन उसने कभी भी अपने मन में हीन भावना नहीं आने दी और सदा राजा कर्ण जैसी दानवीर की सोच रखी। अपने आप में यह बहुत बड़ी बात है कि अगर किसी के पास धन हो तो वह दान कर सकता है। उसमें कोई बड़ी बात नहीं लेकिन जो आदमी अपने परिवार को तीनों समय का भोजन भी पूर्णरूपेण न दे सके और वह आदमी फिर भी दानवीर की सोच रखता हो, यह सबसे बड़ी बात है। मालवीय जी ने चाहे विद्या का दान हो, चाहे किसी गरीब आदमी की मदद की बात हो, समाज उत्थान की बात हो, समाज की कुरीतियों की बात हो, किसी भी क्षेत्र में वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने जी भरकर लोगों की मदद की।
मदन मोहन मालवीय को महामना की उपाधि किसने दी
महात्मा गाँधी का महामना के लिए बहुत आदर था और मदनमोहन का हृदय से सम्मान करते थे वह उनकी कोई बात नहीं टालते थे। उन्होंने ही मदनमोहन मालवीय को 'महामना' की उपाधि दी।। उन्होंने महामना के लिए लिखा- 'जब मैं अपने देश में कर्म करने के लिए आया तो पहले लोकमान्य तिलक के पास गया। वे मुझे हिमालय से ऊँचे लगे। मैंने सोचा हिमालय पर चढ़ना मेरे लिए संभव नहीं और मैं लौट आया। पिफर मैं गोखले के पास गया। वे मुझे सागर के समान गंभीर लगे। मैंने देखा कि मेरे लिया इतने गहराई में पैठना संभव नहीं और मैं लौट आया। अंत में मैं महामना मालवीय के पास गया। मुझे वे गंगा की धारा के समान पारदर्शी निर्मल लगे। मैंने देखा इस पवित्र धारा में स्नान करना मेरे लिये असंभव नहीं है। मालवीय ऐसे व्यक्तित्व की ही, मैं तलाश कर रहा था।'
मालवीय जी अहिंसा के प्रबल समर्थक महात्मा गांधी के श्रद्धा पात्र एवं नियम विधान के पाबंद थे। मालवीय जी उन चंद महापुरुषों में से थे, जिनके गांधी जी चरण स्पर्श करते थे। दोनों ही अपने सिद्धांतों पर अटल रहा करते थे और कभी-कभी इसके चलते उनमें वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न हो जाते थे। परन्तु परस्पर सम्मान पर कायम उनके संबंधों में यह भी बाधक नहीं बना।
महामना ने अपनी वेशभूषा, व्यक्तित्व विचारों और अपने संपूर्ण जीवन से भारतीय संस्कृति और धर्म का जो आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उसका अनुसरण करना तो दूर रहा, आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम ठीक उसकी विपरीत दिशा में पागलों की तरह भागकर अर्द्ध पतित हुए चले जा रहे हैं, जिसमें महामना द्वारा प्रतिपादित नैतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को कोई स्थान नहीं है। महामना राष्ट्र की स्वतंत्रता के अडिग पुजारी, शिक्षा के अनन्य सेवक, कुशल पत्रकार एवं विधिवेत्ता तथा समस्त भारतीय समाज में चेतना का स्पफुर्लिंग प्रज्वलित करने वालों में प्रमुख कर्णधार थे। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने महामना के प्रति अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है कि 'भारत को अभिमान तुम्हारा, तुम भारत के अभिमानी।' महामना ने भारतीय राजनीति के नीलाकाश पर अपने शुभ्र धवल व्यक्तित्व की पुनीत आभा से विराट भास्कर की भाँति दिप्ती बिखेरी थी। धर्म, समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में अजातशत्रु महामना का व्यक्तित्व निष्कलंक था। वे जब तक जिये मनसा, वाचा, कर्मणा जनता की सेवा की। 'सागरः सागरोयम' भाँति उनका व्यक्तित्व अनुपमेय था। 28 दिसम्बर 1886 को कलकत्ता के टाउन हाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता ब्रिटिश संसद के प्रथम भारतीय सांसद दादा भाई नैरोजी ने की। महामना की आयु तब केवल 25 वर्ष की थी और इस अधिवेशन में अपने प्रथम भाषण में उन्हेांने अपने श्रोताओं को मंत्रामुग्ध कर दिया। उनके भाषण के बारे में कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ.ह्यूम ने 1886 की रिपोर्ट में लिखा, 'जिस भाषण को श्रोताओं ने अत्यन्त उत्साह से सुना, संभवतः वह भाषण पं. मदन मोहन मालवीय का था जो एक उच्च जातीय ब्राह्माण थे और जिनके मोहक सुकुमार और गौर वर्ण व्यक्तित्व तथा विद्वतापूर्ण संबोधन ने सभी को आकर्षित किया।' दादा भाई का कहना था, 'भारत माता की आवाज इस युवक की आवाज में स्वयं प्रतिध्वनित हो गई है।' सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कहा, 'यह भाषण मेरे सुने गये भाषणों में सर्वश्रेष्ठ है।'

पंडित मदन मोहन मालवीय के महान योगदान
देश की दशा, प्रारम्भिक जीवन, राजनीतिक जागृति
19वीं सदी में भारतीय सभ्यता के मूल मूल्यों का पतन हो रहा था और अज्ञानता के कारण देश में अन्धविश्वास, कन्या वध, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवाओं की दयनीय दशा, नर बली, छुआछूत सरीखी कुप्रथाएँ समाज को खोखला किए जा रही थी। 1857 के पश्चात् तो भारत में जैसे उथल-पुथल-सी मच गई थी। आतंक और दमन के बादल आकाश में मंडराए हुए थे। अंग्रेजों का विचार था अब भारत में सिर उठाने वाला कोई नहीं रहा। उनका ऐसा सोचना किसी सीमा तक उचित भी था, क्योंकि उन्होंने देश भक्तों को जिस प्रकार से कुचला, फांसी पर लटकाया और खून की नदियाँ बहाई उसका उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। फिर भी ब्रिटिश सरकार के न चाहते हुए भी बदलती परिस्थितियों के फलस्वरूप भारतवासियों के रहन-सहन, वेशभूषा और विचारधारा में काफी परिवर्तन आ गया था। ऐसे समय में पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ।
मालवीय जी का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में मालवीय जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में रहा। मालवीय जी के अनुसार जनता की बदहाली का कारण अशिक्षा है। 20वीं सदी के पहले दशक में उन्होंने विशेष रूप से हिंदुओं के लिए तथा सामान्य रूप से सभी के लिए एक ऐसा हिंदु विश्वविद्यालय बनाने का निर्णय लिया जहां हिंदु धर्म और संस्कृति के अलावा प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान की उच्च शिक्षा प्रदान की जा सके और जो भारत की प्राचीन गुरुकुल पद्धति को आधुनिक रूप से आगे बढ़ाए। इसके लिए उन्होंने स्वयं ही धन एकत्रित करने का बीड़ा उठाया। विश्वविद्यालय के लिए हिंदुओं की आस्था नगरी वाराणसी को चुना गया। वाराणसी के तत्कालीन नरेश ने इस कार्य के लिए 1,300 एकड़ भूमि उन्हें दान में दी। मालवीय जी भारत के कोने-कोने में घूम कर विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्रित करते रहे। इसलिए उन्हें भारत का भिक्षु सम्राट कहा जाने लगा। उनके अथक परिश्रम के कारण 04 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी के दिन बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर भवन की नींव तत्कालीन भारत के वाइस राय लार्ड हार्डिंग द्वारा रखी गई। विश्वविद्यालय का नाम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय रखा गया। लगभग तीन दशक तक कुलपति के रूप में उन्होंने विश्वविद्यालय का मार्गदर्शन किया। मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदु विश्वविद्यालय के रूप में देश में पहली बार एक पूर्ण आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना की पहल की। जिस तरह से नालंदा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करता है। इसके एक ही परिसर में कला, विज्ञान, वाणिज्य, कृषि विज्ञान, तकनीकी, संगीत और ललित कलाओं की पढ़ाई संभव हुई।
मालवीय जी का उदार हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय का विरोधी नहीं था। हिंदू जागरण के अग्रणी नायक के रूप में उनका नाम प्रसिद्ध है। लेकिन वह सभी धर्मों और समुदायों की अधिकार रक्षा के प्रति सजग भी रहे। हिंदू महासभा से जुड़े होने पर भी वे मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी भाग लेते थे। हिंदुओं की जाति-वर्ण संबंधी रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने दलितों को मंत्र दीक्षा देने का ऐतिहासिक कार्य भी किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की। मालवीय जी का उदार हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय का विरोधी नहीं था। हिंदू जागरण के अग्रणी नायक के रूप में उनका नाम प्रसिद्ध है। लेकिन वह सभी धर्मों और समुदायों की अधिकार रक्षा के प्रति सजग भी रहे। हिंदू महासभा से जुड़े होने पर भी वे मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी भाग लेते थे। हिंदुओं की जाति-वर्ण संबंधी रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने दलितों को मंत्र दीक्षा देने का ऐतिहासिक कार्य भी किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की।
मालवीय जी ने संस्कृत में एम.ए. की परीक्षा पास करके अपने पिता की तरह धर्म प्रचार में अपना जीवन लगा देना चाहते थे ओर इसलिए उन्होंने अपने चचेरे भाई जय गोविन्द जी के आग्रह पर भी गवर्नमैंट स्कूल में अध्यापक का काम करने से इन्कार कर दिया। पर जब उनकी माता को इसका पता चला और वे उनसे कहने आई, तब उनकी सभी कल्पनाएँ माँ के आँसुओं में डूब गई ओर वे नौकरी करने के लिए राजी हो गए। 40 रुपए के मासिक वेतन पर उन्होंने गवर्नमैंट हाई स्कूल में, जहां उन्होंने पढ़ा था, अध्यापक की नौकरी कर ली। बाद में उनका मासिक वेतन 60 रुपए हो गया। इस आमदनी का अधिकांश भाग वे अपनी माता को परिवार के भरणपोषण के लिए दे देते थे। दो रुपए मासिक वे अपनी धर्मपत्नी को उसके निजी खर्च के लिए देते थे और बाकी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में तथा सार्वजनिक कार्यों के लिए खर्च कर देते थे।
मालवीय जी का कहना था कि पुरुषों की शिक्षा से स्त्रियों की शिक्षा कहीं अधिक अर्थवान है। उन्होंने कहा था, "स्त्रियां हमारे भावी राजनीतिज्ञों, विद्वानों, तत्वज्ञानियों, व्यापार तथा कला-कौशल के नेताओं की प्रथम शिक्षिका है। उनकी शिक्षा का प्रभाव भारत के भावी नागरिकों की शिक्षा पर विशेष रूप से पड़ेगा।" उनका मानना था कि पुरुषों की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण स्त्रियों की शिक्षा है, क्योंकि वे ही देश की भावी संतानों की माताएं हैं।
मालवीय जी सफल अध्यापक सिद्ध हुए। वे अपने पठनीय विषय को भली-भांति तैयार करके उसे बहुत रोचक ढंग से पढ़ाते थे तथा सदा विद्यार्थियों के प्रति स्नेह-भावना बनाए रखते थे। उनके एक प्रसिद्ध नागरिक छात्र का कहना है कि छात्रों के ऊपर उनकी स्नेहपूर्ण कृपा का, कोमल व्यवहार का, वाणी कि माधुर्य का तथा उनके आकर्षक व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव था। सभी उनका सम्मान करते थे।
सार्वजनिक कार्य
प्रोफेसर आदित्य राम भट्टाचार्य के प्रोत्साहन से मालवीय जी ने सन 1880 में ही सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय योगदान करना प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने अपने गुरु के आदेश पर 'प्रयाग हिन्दू समाज' नाम की संस्था के संचालन में काफी काम किया। पंडित बालकृष्ण भट्ट के सम्पादकत्व में प्रकाशित होने वाले पत्र में मालवीय जी ने धार्मिक और सामाजिक विषयों पर लेख लिखने प्रारम्भ किए। उन्होंने सन् 1882 में स्वयं स्वदेशी का व्रत लेकर उसका प्रचार करना शुरू कर दिया। इसी समय उनके कतिपय मित्रों ने देशी तिजारत कम्पनी खोली, जो कई वर्ष तक चलती रही। इस काम में वे अपने मित्रों को यथासम्भव परामर्श और सहयोग देते रहे। सन् 1884 में पंडित आदित्यराम भट्टाचार्य ने 'इडियन युनियन' के नाम से अंग्रेजी में एक साप्ताहिक निकालना प्रारम्भ किया। इसके सम्पादक का सारा भार उन्हें ही वहन करना पड़ता था। इसे देखकर उनके आदेश पर मालवीय जी ने उसके सम्पादन का बहुत कुछ भार अपने ऊपर ले लिया।
नागरी लिपि हिंदी के अथक साधक
मालवीय जी ने हिंदी साहित्य की भी सेवा की। तब वे मकरंद और झक्कड़ सिंह उपनाम से लिखते थे। उनका कथन था कि "जहां लोग हिंदी जानते हैं वहां आपस में हिंदी में वार्तालाप न करना देशद्रोह के समान अपराध है।" आधुनिक काल में हिंदी के निर्माण और विकास का सर्वाधिक श्रेय स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी और मदनमोहन मालवीय को दिया जाता है। मालवीय जी की मातृभाषा हिंदी थी। देश की एकता के लिए उन्होंने प्राचीन वैदिक संस्कृति और आर्य भाषा हिंदी को सम्बल दिया। वर्ष 1919 में मुम्बई में राष्ट्रभाषा के संबंध में उन्होंने कहा था, "वह कौन-सी भाषा है, जो वृन्दावन, बद्रीनारायण, द्वारका, जगन्नाथपुरी इत्यादि चारों धामों तक एक समान धार्मिक यात्रियों को सहायता देती है? वह एक हिंदी भाषा है। लिंग्वा फ्रेंका, लिंग्वा फ्रेंका ही क्यों लिंग्वा इंडिका है। गुरु नानकजी लंका, तिब्बत, मक्का और मदीना, चीन इत्यादि सब देशों में गये। वहां उन्होंने किस भाषा में उपदेश दिया था? यही हिंदी भाषा थी। इससे जान पड़ता है कि उस समय भी हिंदी भाषा राष्ट्रभाषा थी, और उसका सार्वजनिक प्रचार था।" मालवीय जी हिंदु और मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनका कहना था, "हम दोनों में जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी, उतने ही हम दुर्बल रहेंगे। इसीलिए जो जाति इन्हें परस्पर लड़ाने का प्रयत्न करती है, वह देश की शत्रु है।" उनका कहना था, "हिंदु और मुसलमान दोनों ही साम्प्रदायिकता से दूर रहें और अपने धर्म के साथ-साथ देश की उपासना करें।"
उन्होंने अनेक संगठनों की स्थापना की तथा सनातन धर्म के हिंदू विचारों को प्रोत्साहन देने तथा भारत को सशक्त और दुनिया का विकसित देश बनाने के लिए उच्च स्तर की पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने प्रयाग हिंदू समाज की स्थापना की और समकालीन मुद्दों और देश की समस्याओं पर अनेक लेख लिखे। वर्ष 1884 में "हिंदी-उद्धारिणी-प्रतिनिधि-मध्य-सभा" प्रयाग में खुली। इसका उद्देश्य नागरिकों को उसका अधिकार दिलाया था। मालवीय जी ने इसमें दिल खोलकर काम किया, व्याख्यान दिये, लेख लिखे और अपने मित्रों को भी इस काम में भाग लेने के लिए उत्प्रेरित किया। मालवीय जी ने अपने ही देश में विदेशी भाषाओं के स्थान पर नागरी को समुचित स्थान दिलाने का प्रयास में हिंदी का प्रचलन अपने ही प्रदेश में आरंभ किया।
मालवीय जी के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान वर्ष 1886 में कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे वार्षिक अधिवेशन से हुई। वहां उन्होंने जो भाषण दिया, उससे कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह प्रभावित हुए। वे 'हिन्दुस्तान' नामक एक साप्ताहिक समाचार पत्र निकालते थे। इसे वे दैनिक बनाना चाहते थे। उन्होंने मालवीय जी से इसका संपादक बनने का प्रस्ताव रखा। मालवीय जी बेहद स्वाभिमानी थे और अपने सिद्धांत के साथ समझौता नहीं करते थे। उन्होंने अपनी कुछ शर्तों सहित इसे स्वीकार किया।
वे एक प्रखर पत्रकार थे और हिंदी पत्रकारिता करते हुए उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम किया। मालवीय जी को हिंदी के अखबारों का जनक कहना भी अतिशयोक्ति न होगी। कालाकांकर के हिंदुस्तान का संपादन करने के बाद प्रयाग से वर्ष 1907 में प्रकाशित "अभ्युदय" व उसके बाद "मर्यादा" ने अपने समाचार पत्र संपादकीय से जो अतिशय सफलता पाई वह बाद में प्रकाशित होने वाले अन्य समाचार पत्रों के लिए मार्गदर्शक बनी। वर्ष 1909 में उन्होंने 'लीडर" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया और वर्ष 1924 से 1946 तक दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स से भी संबद्ध रहे। साथ ही "किसान" और "मर्यादा" नामक पत्रों का संपादन किया। "लीडर" के हिंदी संस्करण "भारत" और "हिन्दुस्तान टाइम्स" का हिंदी संस्करण "हिन्दुस्तान" निकला।
राष्ट्रभाषा हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रति उनका अटूट प्रेम था। मालवीय जी के प्रयास से सन् 1896 में सर एण्टनी मेकडानल ने प्रान्तीय सरकार की सन् 1877 की वह आज्ञा वापस ले ली, जिसने सरकारी दफ्तर में दस रुपए या उससे अधिक की नौकरी पाने के लिए उर्दू या फारसी में एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल परीक्षा पास करना अनिवार्य बना दिया था। मालवीय जी के प्रयास से 2 मार्च सन् 1898 को अयोध्या नरेश महाराज प्रताप नारायण सिंह, माण्डा के राजा राम प्रताप सिंह, आवागढ़ के राजा बलवंत सिंह, पंडित सुन्दरलाल तथा मालवीय जी का एक डेपूटेशन सर एण्टोनी मेकडसलसे, जो उस समय उनके प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, मिले और मालवीय जी ने उसकी ओर से नागरी लिपि के संबंध में प्रार्थना पत्र उन्हें पेश किया। सर एण्टोनी ने प्रार्थना पत्र पर विचार करने का वादा किया और 14 अप्रेल सन् 1900 ई. को अदालतों में फारसी लिपि के साथ नागरी लिपि के भी चलन की आज्ञा जारी कर दी। वे हिंदी में भाषण दिया करते थे। मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे अंतिम क्षणों तक इसका मार्ग दर्शन करते रहे। वर्ष 1910 में मालवीय के सहयोग से इलाहाबाद में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की नींव पड़ी। वे अखिलभारतीय सनातन धर्म महासभा के संस्थापक व आजीवन अध्यक्ष रहे। उन्होंने संगीत विद्या को भी कोठे की चारदिवारियों से बाहर निकाल कर पहली बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठापित किया। वर्ष 1919 में, प्रयाग में कुंभ के पावन अवसर पर उन्होंने श्रद्धालुओं की सेवा के लिए प्रयाग सेवा समिति की शुरुआत की। मालवीय जी स्वदेशी आंदोलन की भी नींव डालने वालों में अग्रणी थे। वर्ष 1881 में उन्होंने देशी तिजारत कंपनी का गठन किया। इसके बाद 1907 में उन्होंने इंडियन इंडस्ट्रियल कांफ्रेंस का भी आयोजन किया।
इस दशक में उनका महत्त्वपूर्ण कार्य अदालतों में देवनागरी लिपि के प्रयोग को सरकार द्वारा स्वीकृत कराना था। इसके लिए उन्हें लगातार तीन वर्ष तक कठिन परिश्रम करके एक प्रार्थना पत्र तैयार करना पड़ा। इस प्रार्थना पत्र में उन्होंने बहुत से विद्वानों और प्रकाशकों के विचारों तथा बहुत से तथ्यों के आधार पर नागरी लिपि के दावों को सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उन्होंने बताया कि प्रोफेसर मोनिपर विलियम्स, सर आइजैक पिटमैन, चीफ जस्टिस अर्सकिन पेरी जैसे विद्वान नागरी लिपि की सर्वांगपूर्णता स्वीकार करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि इन अक्षरों की मनोहरता, सुन्दरता, स्पष्टता, पूर्णता और शुद्धता निर्विवाद है। प्रार्थना पत्र में यह भी बताया गया कि 'यदि यह भी मान लिया जाए कि फारसी में अधिक शीघ्रता से काम चलता है' तो भी नागरी के गुणों तथा स्वत्वों को भुलाया नहीं जा सकता। बहुत से प्रमाणों से हिन्दी भाषा की व्यापकता को सिद्ध करते हुए प्रार्थनापत्र में कहा गया कि हिन्दी ही उत्तर भारत की भाषा है और नागरी अक्षरों का प्रचार पश्चिम तौर प्रान्त और अवध (मौजूदा उत्तर प्रदेश) में शिक्षा के प्रसार के लिए नितान्त आवश्यक है।
भारती भवन पुस्तकालय, प्रयाग म्यूनिस्पैलिटी छात्रावास का निर्माण आदि में मालवीय जी का भरपूर सहयोग रहा। मुसलमानों ने सरकार की आज्ञा का विरोध करते हुए मालवीय जी पर साम्प्रदायिकता का दोष लगाया और नागरी लिपि तथा हिन्दी की तरह-तरह से हिजो की। पर एक दिन मालवीय जी ने एक अरबी की नजीर नागरी लिपि में लिख कर हाइकोर्ट में पढकरर इस तरह ठीक-ठीक सुनाई कि मौलवी जामिन अला, जो कि मशहूर वकील थे, मुकदमा खत्म होने पर उनसे कोर्ट के बरामदे में मिले और उनका हाथ पकड़कर कहने लगे- "पंडित साहब, आज मैं नागरी अक्षरों की उमदगी का कायल हो गया, लेकिन मैं पब्लिक में यह नहीं कहूँगा।"
प्रयाग के सांस्कृतिक जीवन की अभिवृद्धि के लिए मालवीय जी ने बाबू पुरुषोत्तमदास टण्डन को हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय को प्रयाग में स्थापित कर उसका संचालन करने को प्रोत्साहित किया। ठण्डन जी से मालवीय जी के बहुत ही मधुर संबंध थे। वे तो एक प्रकार से टण्डन जी के राजनीतिक गुरु थे। उन्हीं से टण्डन जी ने विद्यार्थी जीवन में सार्वजनिक सेवा की प्रथम प्रेरणा प्राप्त की थी। टण्डन जी संयमी, दृढ़प्रतिज्ञ, कर्तव्य परायण, निस्पृही राष्ट्रसेवी थे। किसानों के प्रति उनकी विशेष सहानुभूति थी। वे स्वतन्त्रता संग्राम के वीर सेनानी और नायक थे। जमींदारों की लूटखसोट के प्रतिरोध के लिए किसानों का संगठन तथा किसान आन्दोलन का नेतृत्व उनके राजनीतिक क्रियाकलापों का महत्त्वपूर्ण अंग था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तो वे प्राण ही थे। वे ही उसके प्रमुख कर्ता-धर्ता थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
भारतीय समाज एवं दलित
मालवीय जी दलितों के मंदिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के विरोध में संपूर्ण राष्ट्र में आंदोलन चलाया। 1 अगस्त, 1936 को काशी में महात्मा गांधी के एक वर्षीय हरिजनोद्धार कार्यक्रम के समापन पर आयोजित सभा में मालवीय जी ने एक रूढ़िवादी विद्वान के भाषण के जवाब में अपने भाषण में कहा, "मेरी समझ में नहीं आता कि करोड़ो गरीब हिंदुओं को धर्माचरण और देवदर्शन से वंचित रखना कौन-सा धर्म है। यह वही काशी नगरी है, जहां रैदास और कबीर जैसे भक्त हुए हैं, जहां स्वयं शंकर भगवान ने चांडाल का वेष धरकर भगवान शंकराचार्य को सब जीवों की एकता का उपदेश दिया। उस नगरी में एक विद्वान धर्माचार्य कैसे इतने बड़े अधर्म की बात कहता है? कैसे वह भगवान को भक्त से दूर रखने का साहस करता है। कैसे वह छुआछूत के नाम पर पवित्र राम-नाम और शिव का नाम लेने से उन्हें रोकता है, जिसके उच्चारण से उन्हें मुक्ति मिलती है?"
दलित अर्थात "जिसका दमन किया गया हो" जातियों की श्रेणी में वे जातियाँ आती है जो वर्ण व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर थी तथा जिनका विभिन्न प्रकार से सामाजिक, आर्थिक शोषण सदियों से होता चला आ रहा है। संवैधानिक भाषा में इन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। भारत की जनसंख्या में 16 प्रतिशत दलित है। पिछले 6-7 दशको में दलित पद का अर्थ काफी बदल गया है। विभिन्न समाज सुधारकों व नेताओं के प्रयास एवं आन्दोलनों के पश्चात् यह शब्द हिन्दू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित हजारों वर्षो से अस्पृश्य समझी जाने वाली तमाम जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग होता है। अपनी सभ्यता के इतिहास में भारत ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने विचारों को आचरण में उतार कर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया इन्हीं महापुरुषों के श्रेणी में एक अतुल्यनीय नाम श्री महामना मदन मोहन मालवीय जी का भी है जिन्होंने सामाजिक शोषण, दलितों की समाज में स्थिति तथा उनके उत्थान के विषयों में कई प्रयास कियें। इस प्रपत्र के माध्यम से मालवीय जी के द्वारा दलित उत्थान में किये प्रयासों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
दलित से अभिप्राय, उन लोगों से है जिन्हें जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण सदियों से स्वस्थ एवं समुन्नत सामाजिक जीवन से वंचित, तिरस्कृत और समाज के हाशिये पर रखकर अपेक्षित जीवन जीने के लिए विवश रखा गया है। इतिहास के पन्ने को पलटने से यह साफ पता चलता है कि भारतीय सभ्यता के निर्माता वैदिक जन थे, वैदिक काल में समस्त मानव जीवन को एक व्यवस्था में सुन्दर समाज में बांधने के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गयी इन्हीं चार आश्रमों की तरह चार वर्णों को भी बांटा गया-
  1. ब्राह्मण - समाज को शिक्षा प्रदान करे।
  2. क्षत्रिय - समाज की रक्षा करे।
  3. वैश्य - व्यापार तथा वस्तु की पूर्ति।
  4. शूद्र - सेवा का कार्य।
वेदकाल से ही जाति तथा प्रथा जैसी बुराई का प्रारम्भ हो चुका था जो मनुस्मृति काल में पनपकर विकसित हो गया। मनुस्मृति में सभी शूद्रों - अछूत जातियों के साथ पशुवत व्यवहार करने की व्यवस्था की गयी है। हिन्दू समाज व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था के उल्लंघन पर निम्न वर्ण के लोगों के लिए हिन्दू मानस दण्ड का विधान मनुस्मृति में है। आज भी वह विधान गाँवों में हिन्दुओं के निजी कानून के रूप में व्यवहार में है जो कि कितने हिंसक और क्रुरतम आदेश है। वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज का सबसे बड़ा अभिशाप रहा इसके क्रम में दलितों का जो स्थान था, वह पशु से भी गया गुजरा था। दलित जीवन की भयावह पीड़ा ने प्राचीन काल से ही अकांक्षी और संवेदन शील समाज सुधारकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, राजा राममोहन राय, महात्मा ज्योतिबा फूले, नारायण गुरू, महात्मा गाँधी एवं डा0 बाबा साहब अम्बेडकर आदि ने अछूतों की स्थितों को समझ्ाने की कोशिश की और उसे बदलने का भी संघर्ष किया।
दलित समाज का उत्थान
प्राचीन काल में कार्य अनुसार वर्ण व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ, यह व्यवस्था केवल कार्य विभाजन पर आधारित थी किन्तु जनसंख्या विस्फोट औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की तीव्र होती प्रक्रिया के पश्चात कार्य विभाजन के सिद्धांत में अनवरत परिवर्तन परिलक्षित हो रहे है।
हम शनैः शनैः वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल और अब तक का लम्बा सफर तय कर आये है परन्तु अभी तक रूढ़िवादी प्राचीन परम्पराओं को अपने से दूर नहीं कर पाये। न तो इसमें अपेक्षित परिवर्तन मध्यकाल में आया और न ही आधुनिक काल, जबकि इस अन्तराल में अनेक महान सामाजिक चिन्तन वादियों का उदय हुआ, फिर भी इस समस्या को जिस सीमा तक दूर करना चाहिए था, दूर नहीं कर पाये। अपवादों को छोड़कर चिन्तनवादी परिवर्तन करने की दिशा में असफल रहें। भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण के समय देश के कमजोर अथवा दलित वर्ग का विशेष ध्यान रखा और उनके विकास और उत्थान के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किये।
मालवीय जी एवं दलित चिंतन
आचरण का उपदेश वचनों के आदेश से अधिक प्रभावशाली होता है, अपने एक गीता प्रवचन में पूज्य महामना ने यह बात कही थी; सन्दर्भ भगवान श्री कृष्ण थे, जिनका पृथ्वी पर अवतार अपने आचरण का उपदेश देने के लिए हुआ था। अपने सभ्यता- इतिहास में भारत ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने विचारों को आचरण में उतार कर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किये। मालवीय जी को महामना की उपाधि उनके विराट हृदय और मानवीय संवेदना युक्त आचरण के लिए मिला था, उनके हृदय में दलित, स्त्री और समाज के कमजोर तबके इंसानों के प्रति अपार करुणा थी।
हिन्दू समाज की सनातन वर्ण व्यवस्था के अनुयायी होते हुए भी उनका साफ मानना था कि अस्पृश्यता हिन्दू समाज व्यवस्था का अंग नहीं है और जाति व्यवस्था और छुआछूत दोनो अलग-अलग बातें है। ऐसी कुरीति प्राचीन भारत में कभी नहीं रही इस समस्या के मूल में धर्म की रूढ़िवादी व्याख्या और अहंकारी सामंती प्रवृत्ति को जिम्मेदार ठहराते हुए उनका साफ मानना था कि जब तक दलितों की सामाजिक स्तर पर स्वीकार्यता नहीं होगी तब तक छुआछूत की समस्या दूर नहीं हो सकती। वे अस्पृश्यता को शास्त्रविध घोषित करते हुए आजीवन रूढ़िवादी विद्वानों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते रहें और उनके बताये गये धर्मग्रन्थों से ही श्लोकों, उक्तियों, प्रमाणों, वचनों आदि को उद्धृत करके उन्हें निरुत्तर करते रहें। मालवीय जी अपने वचनों में कहते थे- " शुद्ध स्त्री और निर्बल, ईश्वर के हृदय में बसते है जबकी अन्य धार्मिक उनकी कृपा के पात्र होते है।"
एक बार एक सभा में मालवीय जी से "समाज में शूद्रों का स्थान" विषय पर सीधा प्रश्न हुआ तो उन्होंने उत्तर दिया कि यदि शूद्र प्रभु चरण से उत्पन्न है और हम उनके चरणों की पूजा करते है, चरणामृत लेते है, तो शूद्रों को तिरस्कृत व उपेक्षित करने का कोई औचित्य नहीं है। सभी वर्गों को अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। इससे सामंजस्य और सद्भाव बढ़ेगा।
वर्ण व्यवस्था एवं मालवीय जी
वर्ण के विषय में मालवीय जी का विचार स्पष्ट था। वह जन्म के आधार पर पैतृक कर्म या प्रकृति को वर्ण व्यवस्था का आधार मानते थे। उनके अनुसार यदि ब्राह्मण के गुण शूद्र में पाये जाये तो वह शूद्र नहीं है और यदि ब्राह्मण के गुण नहीं पाये जाये तो वह ब्राह्मण नहीं हैं अतः उदाहरण देते हुए मालवीय जी ने कर्म के आधार पर वर्णों के सामाजिक महत्व को स्वीकार किया है उनके अनुसार मनुष्य पुण्य कर्म से वर्ण के उत्कर्ष को तथा पाप कर्म से वर्ण के अपकर्ष को प्राप्त होता है। मालवीय जी वर्णों के गुण के अनुसार ऊपर उठना उच्च वर्ण में स्वीकार करते थे। मालवीय जी ने कहा था- "हमारे वेद पुकार-पुकार कर कहते है कि हमारी हिन्दू जाति के अन्दर सब जातियाँ अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र एक ही शरीर के अंग है अतः सबसे प्रेम करना चाहिए। मालवीय जी वर्णो में गतिशीलता-सिद्धांत के समर्थक थे। उन्होंने कहा था कि मैं मनुष्यता का पूजक हूँ। मनुष्यत्व के आगे मैं जात-पात को नहीं मानता। उनका कहना था कि गरीब की सेवा करनी चाहिए द्वेष नहीं। उनके अनुसार- शीलं प्रधानं पुरूषे अर्थात् शील ही मनुष्य में प्रधान है। शीलं परंभूषणम् अर्थात् शील ही मनुष्य का सबसे उत्तम आभूषण है। शील सम्पन्न मनुष्य ही अपने जीवन का समुचित उत्कर्ष तथा समाज की सेवा कर सकता है।
दलित हजारों वर्षों तक अस्पृश्य या अछूत समझे जाने वाली उन तमाम शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होता है जो कि हिन्दू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित है। आज दलितों को भारत में जो भी अधिकार मिले है उसकी पृष्ठभूमि इसी शासन की देन थी। भारत में दलितों के उद्धार के लिए कदम उठाने वालो में विभिन्न समाज सुधारकों का नाम आता है मालवीय जी का अपने मानवीय मूल्यों की वजह से समाज में अलग स्थान रखते है मालवीय जी ने समय समय पर दलितों के उत्थान के लिए विभिन्न आवश्यक कदम उठाये। शिक्षा, धर्म, अस्पृश्यता आदि क्षेत्र में दलितों की समस्या का कैसे निष्कारण हो इसका उचित प्रयास किया। इनके सार्थक प्रयासों से दलित के प्रति सामाजिक बुराइयों में अधिकाधिक सुधार द्रष्टव्य है।
मालवीय जी और स्वतन्त्रता आन्दोलन
भारत की स्वतन्त्रता के वीर सेनानियों एवं देश के निर्माताओं में मालवीय जी का स्थान बहुत ऊंचा रहेगा। वे भारत की स्वतन्त्रता के लिए लड़े और इस विश्वास के साथ लड़े कि उसे अपने जीवन में ही प्राप्त कर लेंगे। लेकिन अपने जीवन काल में प्राप्त नहीं कर सके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसे उनके महत्तम कार्यों में से एक समझा जाता है। वस्तुतः एक ऐसी अनुल्लंघनीय दीवार है, जो उनके विविध विषयों के व्यापक कार्य क्षेत्र पर दर्शकों की दृष्टि पड़ने नहीं देती। उनमें एक महापुरुष के व्यापक गुणों का अद्भुत एवं दुर्लभ सामंजस्य था। यह भी सही है कि ऊपर देखने पर भारतीय स्वतन्त्रता के भवन में मालवीय जी हाथ उतना अधिक प्रत्यक्ष नहीं दिखलाई पड़ता, जितना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या नेता जी सुभाष चंद्र बोस का, क्योंकि नींव तो किसी को दिखलायी नहीं देती, किन्तु बिना नींव के भवन की कल्पना भी तो असम्भव है। इसी बात को लक्ष्य कर नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने एक बार नवयुवकों को आह्वान करते हुए कहा था- "आज जिस अग्नि के चंदन की लकड़ी का काम किया है, इसे कभी मत भूलना। नेहरू जी ने लगभग इसी प्रकार के भाव व्यक्त किए थे- "भारतीय स्वतन्त्रता का जो शानदार भवन आज खड़ा हुआ है, नींव से लेकर ऊपर तक उसकी रचना मालवीय जी के हाथों हुई है। वर्ष-प्रतिवर्ष, ईंट पर ईंट, पत्थर पर पत्थर रखते हुए भारतीय स्वतन्त्रता के इस आधुनिक विशाल भवन का निर्माण उन्होंने किया था। वह असाधारण रूप से महापुरुष थे।
मालवीय जी कानून के भी अच्छे जानकार थे। वर्ष 1891 में वह बैरिस्टर बने और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ की। वकालत के दौरान उन्हें गरीबों का वकील कहा जाता था। वह झूठा मुकदमा नहीं लेते थे। इन दिनों उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुकदमों में पैरवी भी की। वर्ष 1913 में उन्होंने वकालत छोड़ दी थी लेकिन ब्रिटिश राज से आजादी के लिए राष्ट्र की सेवा करने का फैसला लिया। लेकिन जब गोरखपुर के ऐतिहासिक चैरीचैरा कांड में 170 लोगों को फांसी की सजा हुई तब इलाहाबाद हाइकोर्ट में मालवीय जी ने अपनी बहस से इनमें से 150 लोगों को फांसी के फंदे से बचा लिया।वे निःसंदेह अजातशत्रु थे।
मालवीय जी हिंदु और मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनका कहना था, "हम दोनों में जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी, उतने ही हम दुर्बल रहेंगे। इसीलिए जो जाति इन्हें परस्पर लड़ाने का प्रयत्न करती है, वह देश की शत्रु है।" उनका कहना था, "हिंदु और मुसलमान दोनों ही साम्प्रदायिकता से दूर रहें और अपने धर्म के साथ-साथ देश की उपासना करें।" स्वतंत्रता के कुछ माह पूर्व 12 नवम्बर, 1946 को मालवीय जी का निधन हो गया। उनकी मृत्यु को राष्ट्रीय क्षति बताते हुए महात्मा गांधी ने कहा, "मालवीय जी ने देश को अपनी महान सेवाएं प्रदान की। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदु विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी सबसे महान सेवा व उपलब्धि रही। यह कार्य उन्हें प्राणों से भी प्रिय था, जिसके लिए उन्होंने अथक प्रयास किए। सभी जानते हैं कि मालवीय जी को भिक्षु सम्राट के नाम से जाना जाता है। ईश्वर की कृपा से उन्होंने स्वयं के लिए कोई इच्छा नहीं की अतः उन्हें कभी किसी चीज का अभाव भी नहीं रहा। उक्त कार्य को उन्होंने अपना कर्तव्य माना और स्वेच्छा से भिक्षु भी बने। इसीलिए ईश्वर ने भी उनके पात्र को सदा जरूरत से ज्यादा भरे रखा।" इस दृष्टि से भारत के इस लोकतांत्रिक युग के लिए मालवीय जी का व्यक्तिक और सार्वजनिक जीवन लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए अवश्य ही अनुकरणीय है। उनकी तत्परता, दृढ़ता, भद्रता तितिक्षता और कर्तव्‍य-परायणता तथा निर्भीकता और निस्वार्थ सेवा भावना का अनुकरण अवश्य ही इस देश के लोकतांत्रिक जीवन को ऊँचा उठा सकता है। इस तरह मालवीय जी का जीवन आज भी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह स्वतन्त्रता से पहले था।


Madan Mohan Malaviya Slogans/मदन मोहन मालवीय जी के नारे
Hindi – सत्यमेव जयते. English – Satyameva Jayate.
Madan Mohan Malaviya Images/ मदन मोहन मालवीय जी के चित्र



महामना मदन मोहन मालवीय के दुर्लभ चित्र






















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भारतीय राज व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न



Important questions related to Indian polity

भारतीय राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रश्न (क्रमांक सहित, व्याकरण एवं वर्तनी शुद्ध)

  1. ‘पंथनिरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ तथा ‘अखंडता’ शब्द संविधान की उद्देशिका में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गए।

  2. ‘वन्दे मातरम्’ के रचयिता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय हैं। यह गीत सर्वप्रथम 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था।

  3. 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का एक अधिराज्य (Dominion) था।

  4. 26 जनवरी 2002 से भारतीय ध्वज संहिता, 2002 लागू हुई, जिसके अनुसार आम नागरिकों, निजी संस्थाओं तथा शैक्षणिक संस्थाओं को राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार प्राप्त है।

  5. 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन किया।

  6. 15 नवम्बर 1948 को संविधान के प्रारूप पर प्रथम वाचन प्रारम्भ हुआ।

  7. 3 जून 1947 की योजना के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन हुआ तथा इसकी सदस्य संख्या 299 रह गई।

  8. 4 अप्रैल 2007 को आंध्र प्रदेश में पुनः विधान परिषद का गठन किया गया।

  9. 42वाँ संविधान संशोधन स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था।

  10. 42वें संविधान संशोधन को ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहा जाता है।

  11. 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में मौलिक कर्तव्य जोड़े गए तथा उन्हें संविधान के भाग-4(क) में स्थान दिया गया।

  12. 52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित है।

  13. 86वें संविधान संशोधन द्वारा एक अतिरिक्त मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया, जिससे उनकी संख्या 11 हो गई।

  14. अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 तथा 30 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं।

  15. आकस्मिक निधि राष्ट्रपति के व्ययाधीन होती है।

  16. आपातकाल में मौलिक अधिकारों के निलंबन की व्यवस्था जर्मनी के संविधान से प्रेरित मानी जाती है।

  17. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में उच्चतम न्यायालय ने उद्देशिका को संविधान का अभिन्न अंग माना।

  18. उपाधियों का अंत अनुच्छेद 18 में वर्णित है।

  19. संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान की आत्मा और हृदय कहा गया है।

  20. कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक करने का निर्देश अनुच्छेद 50 में दिया गया है।

  21. सिखों को कृपाण धारण करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्राप्त है।

  22. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है।

  23. बाल श्रम का निषेध अनुच्छेद 24 में किया गया है।

  24. समान नागरिक संहिता का उल्लेख अनुच्छेद 44 में किया गया है।

  25. संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना की सिफारिशों के आधार पर हुआ था।

  26. केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।

  27. जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक है।

  28. गोवा को वर्ष 1961 में भारतीय संघ में सम्मिलित किया गया।

  29. छुआछूत का उन्मूलन अनुच्छेद 17 में वर्णित है।

  30. स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कांग्रेस के अध्यक्ष जे. बी. कृपलानी थे।

  31. स्वतंत्रता प्राप्ति के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली थे।

  32. झंडा समिति के अध्यक्ष जे. बी. कृपलानी थे।

  33. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था।

  34. प्रथम वित्त आयोग का गठन वर्ष 1951 में किया गया था।

  35. प्रथम लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर थे।

  1. जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान था, जिसे एक पृथक संविधान सभा द्वारा निर्मित किया गया था और यह 26 जनवरी 1957 को लागू हुआ था।

  2. वी. वी. गिरि ऐसे कार्यवाहक राष्ट्रपति थे जिन्होंने त्यागपत्र देकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा और विजयी हुए।

  3. देश में प्रथम राष्ट्रीय आपातकाल वर्ष 1962 में लगाया गया था।

  4. दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने वाले व्यक्ति गुलजारीलाल नंदा थे।

  5. धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा को केवल सिफारिश करने का अधिकार प्राप्त है।

  6. धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।

  7. धार्मिक व्यय हेतु कर लगाने का निषेध संविधान के अनुच्छेद 27 में वर्णित है।

  8. नए राज्यों के निर्माण का अधिकार संसद को प्राप्त है।

  9. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है।

  10. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं।

  11. नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बनने से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रह चुके थे।

  12. प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम वर्ष 1951 में पारित किया गया था।

  13. प्रथम लोकसभा की पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई थी।

  14. प्रथम लोकसभा को 4 अप्रैल 1957 को भंग किया गया था।

  15. प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन एवं मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी राष्ट्रपति को देता रहे।

  16. प्रधानमंत्री पद पर सबसे कम अवधि (13 दिन) तक रहने वाले व्यक्ति अटल बिहारी वाजपेयी थे।

  17. प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने वाले प्रथम प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे।

  18. प्रधानमंत्री बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है, जबकि अधिकतम आयु की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।

  19. प्रधानमंत्री सामान्यतः लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन का नेता होता है।

  20. प्रारूप समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को किया गया था।

  21. प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे।

  22. स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल थे।

  23. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।

  24. भारत का राष्ट्रपति राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख होता है।

  25. भारत का राष्ट्रीय पंचांग शक संवत पर आधारित है, जिसे 22 मार्च 1957 से अपनाया गया।

  26. भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल, राष्ट्रीय पशु बाघ, राष्ट्रीय वृक्ष बरगद, राष्ट्रीय फल आम, राष्ट्रीय पक्षी मोर तथा राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा डॉल्फिन है।

  27. भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ है, जो ‘आनन्दमठ’ उपन्यास से लिया गया है।

  28. भारत की उद्देशिका में प्रयुक्त ‘गणराज्य’ शब्द का तात्पर्य है कि राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत नहीं होगा।

  29. डॉ. जाकिर हुसैन तथा फखरुद्दीन अली अहमद ऐसे राष्ट्रपति थे जिनका निधन कार्यकाल के दौरान हुआ।

  30. भारत के उपराष्ट्रपति की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति से की जाती है।

  31. मोहम्मद हिदायतुल्ला ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में दायित्व निभाया था।

  32. भारत के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के रचयिता रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) हैं।

  33. भारत के राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति ब्रिटेन के सम्राट के समान मानी जाती है।

  34. भारत में गणतांत्रिक शासन व्यवस्था फ्रांस के संविधान से प्रेरित मानी जाती है।

  35. संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका के संविधान से प्रेरित है।

  36. भारतीय संविधान में एकल नागरिकता (Single Citizenship) की व्यवस्था ब्रिटिश संविधान से ग्रहण की गई है।

  37. भारतीय संविधान में नागरिकता संबंधी प्रावधान अनुच्छेद 5 से 11 तक वर्णित हैं।

  38. भारतीय संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर किया गया था।

  39. भारतीय संसद, राष्ट्रपति भवन तथा सर्वोच्च न्यायालय पर वर्ष भर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।

  40. भाषायी आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य आंध्र प्रदेश था।

  41. भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन वर्ष 1956 में किया गया।

  42. मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य बिना संसद का सदस्य बने अधिकतम छह माह तक मंत्री पद पर रह सकता है।

  43. मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।

  44. मंत्रिपरिषद के तीन स्तर होते हैं— कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री एवं उपमंत्री।

  45. मौलिक अधिकार तथा राष्ट्रपति पर महाभियोग की व्यवस्था अमेरिका के संविधान से ग्रहण की गई है।

  46. मौलिक अधिकारों की रक्षा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय करते हैं।

  47. मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ली गई है।

  48. मौलिक कर्तव्य 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गए थे।

  49. मूल संविधान में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 525 निर्धारित की गई थी।

  50. राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव राज्यसभा के सदस्य करते हैं।

  1. राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसे कभी भंग नहीं किया जाता।

  2. राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष बाद सेवानिवृत्त होते हैं।

  3. राज्यसभा का पदेन सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है।

  4. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व संविधान के भाग-4 में वर्णित हैं।

  5. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।

  6. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  7. राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है।

  8. राज्यपाल का कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष का होता है।

  9. राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है।

  10. राष्ट्रपति का निर्वाचन निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है।

  11. राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति एवं एकल संक्रमणीय मत प्रणाली पर आधारित है।

  12. राष्ट्रपति को पद की शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं।

  13. राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया संसद द्वारा संचालित की जाती है।

  14. राष्ट्रपति लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के सदस्यों को नामित कर सकता था। (यह प्रावधान 104वें संविधान संशोधन, 2020 द्वारा समाप्त कर दिया गया है।)

  15. राष्ट्रपति राज्यसभा में साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र के 12 सदस्यों को नामित करता है।

  16. राष्ट्रपति शासन संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लगाया जाता है।

  17. राष्ट्रपति शासन लागू होने पर राज्य की कार्यपालिका राष्ट्रपति के अधीन कार्य करती है।

  18. लोकसभा का कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष का होता है।

  19. लोकसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा किया जाता है।

  20. लोकसभा का विघटन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

  21. लोकसभा अध्यक्ष का निर्वाचन लोकसभा के सदस्य करते हैं।

  22. लोकसभा अध्यक्ष अपने पद से त्यागपत्र उपाध्यक्ष को देता है।

  23. लोकसभा में धन विधेयक केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

  24. लोकसभा वित्तीय मामलों में राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है।

  25. सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है।

  26. सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई थी।

  27. सर्वोच्च न्यायालय का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

  28. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  29. सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक एवं व्याख्याता है।

  30. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

  31. भारत में एकीकृत न्यायपालिका की व्यवस्था है।

  32. उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय होता है।

  33. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  34. उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

  35. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है।

  36. भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।

  37. निर्वाचन आयोग का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 324 में किया गया है।

  38. भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) लोक वित्त का संरक्षक कहलाता है।

  39. वित्त आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत किया जाता है।

  40. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 315 में किया गया है।

  41. भारत का महान्यायवादी (Attorney General) देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है।

  42. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  43. संविधान का अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित है।

  44. संविधान का भाग-3 मौलिक अधिकारों से संबंधित है।

  45. संविधान का भाग-4 राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से संबंधित है।

  46. संविधान का भाग-4(क) मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।

  47. संविधान का भाग-5 संघ सरकार से संबंधित है।

  48. संविधान का भाग-6 राज्य सरकारों से संबंधित है।

  49. संविधान का भाग-9 पंचायती राज व्यवस्था से संबंधित है।

  50. 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित है।

  51. 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम नगरपालिकाओं से संबंधित है।

  52. पंचायतों में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

  53. नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा 74वें संविधान संशोधन द्वारा प्रदान किया गया।

  54. भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान माना जाता है।

  55. भारतीय संविधान 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित किया गया था।

  56. भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

  57. संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा थे।

  58. संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।

  59. संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी. एन. राव थे।

  60. संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किया गया था।

  61. उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया गया था।

  62. भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान की प्रस्तावना से प्रेरित है।

  63. संविधान सभा को संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

  64. संविधान सभा की कुल 11 बैठकें तथा 165 दिनों तक कार्यवाही चली।

  65. संविधान निर्माण पर लगभग 64 लाख रुपये का व्यय हुआ था।

  1. संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर 1946 को आयोजित हुई थी।

  2. संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को आयोजित हुई थी।

  3. संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा थे।

  4. संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद निर्वाचित हुए थे।

  5. भारत का संविधान मूल रूप से 22 भागों, 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों का था।

  6. वर्तमान में भारतीय संविधान विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधानों में से एक है।

  7. संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों का उल्लेख किया गया है।

  8. संविधान का भाग-III मौलिक अधिकारों का वर्णन करता है।

  9. संविधान का भाग-IV राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से संबंधित है।

  10. संविधान का भाग-IV(क) मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।

  11. संविधान का अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार से संबंधित है।

  12. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का "हृदय और आत्मा" कहा था।

  13. भारत में एकल नागरिकता की व्यवस्था है।

  14. भारतीय संविधान संसदीय शासन प्रणाली को स्वीकार करता है।

  15. भारतीय शासन प्रणाली ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से प्रेरित है।

  16. संघीय व्यवस्था के साथ सशक्त केंद्र भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषता है।

  17. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य" कहा गया है।

  18. संविधान द्वारा नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

  19. शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21(क) के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।

  20. 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा शिक्षा का अधिकार जोड़ा गया था।

  21. संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के संगठन का प्रावधान किया गया है।

  22. संविधान के अनुच्छेद 51(क) में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।

  23. राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा अनुच्छेद 352 के अंतर्गत की जाती है।

  24. राज्य आपातकाल (राष्ट्रपति शासन) अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लागू किया जाता है।

  25. वित्तीय आपातकाल का प्रावधान अनुच्छेद 360 में किया गया है।

  26. भारत में अब तक वित्तीय आपातकाल कभी लागू नहीं किया गया है।

  27. राष्ट्रीय आपातकाल अब तक 1962, 1971 और 1975 में लगाया गया था।

  28. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने आपातकाल संबंधी प्रावधानों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

  29. भारत का सर्वोच्च न्यायालय नई दिल्ली में स्थित है।

  30. सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश हरिलाल जेकिसुंदास कानिया थे।

  31. उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है।

  32. संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

  33. न्यायिक पुनरावलोकन भारतीय न्यायपालिका की एक महत्वपूर्ण शक्ति है।

  34. भारत निर्वाचन आयोग स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है।

  35. मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  36. निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है।

  37. भारत में मतदान की आयु 18 वर्ष है।

  38. 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।

  39. लोकसभा के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित है।

  40. राज्यसभा के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित है।

  41. राष्ट्रपति पद हेतु न्यूनतम आयु 35 वर्ष निर्धारित है।

  42. उपराष्ट्रपति पद हेतु न्यूनतम आयु 35 वर्ष निर्धारित है।

  43. राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।

  44. भारत के राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।

  45. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल भी पाँच वर्ष का होता है।

  46. राज्यपाल का कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष का होता है।

  47. लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।

  48. राज्यसभा एक स्थायी सदन है।

  49. राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है।

  50. प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

  1. संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।

  2. अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।

  3. अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता प्रदान करता है।

  4. अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है।

  5. अनुच्छेद 18 उपाधियों के अंत से संबंधित है।

  6. अनुच्छेद 19 नागरिकों को छह प्रकार की स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है।

  7. अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है।

  8. अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से संबंधित है।

  9. अनुच्छेद 21(क) 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।

  10. अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी एवं निरोध के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है।

  11. अनुच्छेद 23 मानव तस्करी एवं बंधुआ मजदूरी का निषेध करता है।

  12. अनुच्छेद 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों एवं खानों में नियोजित करने का निषेध करता है।

  13. अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

  14. अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करता है।

  15. अनुच्छेद 27 किसी विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर लगाने का निषेध करता है।

  16. अनुच्छेद 28 धार्मिक शिक्षा से संबंधित प्रावधानों का वर्णन करता है।

  17. अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण से संबंधित है।

  18. अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित एवं संचालित करने का अधिकार प्रदान करता है।

  19. अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार से संबंधित है।

  20. अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का वर्णन किया गया है।

  21. अनुच्छेद 38 सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश देता है।

  22. अनुच्छेद 39 समान वेतन एवं समान अवसर के सिद्धांत को प्रोत्साहित करता है।

  23. अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों के संगठन का निर्देश देता है।

  24. अनुच्छेद 41 कार्य, शिक्षा एवं लोक सहायता के अधिकार से संबंधित है।

  25. अनुच्छेद 42 मानवीय कार्य-दशाओं तथा प्रसूति सहायता का प्रावधान करता है।

  26. अनुच्छेद 43 श्रमिकों के लिए निर्वाह योग्य वेतन की व्यवस्था का निर्देश देता है।

  27. अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता से संबंधित है।

  28. अनुच्छेद 45 बालकों की प्रारंभिक शिक्षा एवं देखभाल से संबंधित है।

  29. अनुच्छेद 46 अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य दुर्बल वर्गों के हितों की उन्नति से संबंधित है।

  30. अनुच्छेद 47 पोषण स्तर एवं जनस्वास्थ्य में सुधार का निर्देश देता है।

  31. अनुच्छेद 48 कृषि एवं पशुपालन के संगठन से संबंधित है।

  32. अनुच्छेद 48(क) पर्यावरण एवं वन संरक्षण से संबंधित है।

  33. अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की सुरक्षा का प्रावधान करता है।

  34. अनुच्छेद 50 कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के पृथक्करण से संबंधित है।

  35. अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।

  36. मौलिक कर्तव्यों का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 51(क) में किया गया है।

  37. वर्तमान में भारतीय नागरिकों के 11 मौलिक कर्तव्य हैं।

  38. मौलिक कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था।

  39. 86वें संविधान संशोधन द्वारा एक अतिरिक्त मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया।

  40. राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान एवं संविधान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।

  41. भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहलाता है।

  42. भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है।

  43. राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे "सत्यमेव जयते" अंकित है।

  44. "सत्यमेव जयते" वाक्य मुण्डक उपनिषद से लिया गया है।

  45. भारत का राष्ट्रगान "जन-गण-मन" है।

  46. राष्ट्रगान के गायन की निर्धारित अवधि लगभग 52 सेकंड है।

  47. भारत का राष्ट्रीय गीत "वन्दे मातरम्" है।

  48. "वन्दे मातरम्" के रचयिता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय हैं।

  49. भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ है।

  50. भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है।

  51. भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल है।

  52. भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद है।

  53. भारत का राष्ट्रीय फल आम है।

  54. भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा डॉल्फिन है।

  55. भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर शक संवत् पर आधारित है।

  56. भारत का राष्ट्रीय खेल आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।

  57. भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न है।

  58. पद्म पुरस्कारों में पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री शामिल हैं।

  59. भारत रत्न की स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी।

  60. पद्म पुरस्कारों की स्थापना भी वर्ष 1954 में की गई थी।

  61. संविधान दिवस प्रतिवर्ष 26 नवम्बर को मनाया जाता है।

  62. राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रतिवर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है।

  63. राष्ट्रीय विधि दिवस 26 नवम्बर को मनाया जाता है।

  64. राष्ट्रीय एकता दिवस 31 अक्टूबर को मनाया जाता है।

  65. राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को मनाया जाता है।

  66. राष्ट्रीय महिला दिवस 13 फरवरी को मनाया जाता है।

  67. राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 24 दिसम्बर को मनाया जाता है।

  68. राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है।

  69. संविधान सभा की प्रथम बैठक संविधान हॉल (वर्तमान संसद भवन के केंद्रीय कक्ष) में हुई थी।

  70. संविधान सभा में विभिन्न समितियों का गठन संविधान निर्माण कार्य को सुचारु रूप से संपन्न करने हेतु किया गया था।

  71. प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे।

  72. संघ शक्ति समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।

  73. संघ संविधान समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।

  74. प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे।

  75. मौलिक अधिकार समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे।

  76. अल्पसंख्यक उपसमिति भी सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में कार्यरत थी।

  77. संविधान सभा में महिलाओं की संख्या 15 थी।

  78. संविधान सभा में कुल 11 अधिवेशन आयोजित किए गए।

  79. संविधान की मूल प्रति हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हस्तलिखित है।

  80. संविधान की मूल प्रति पर 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षर किए गए।

  1. भारत का राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका शक्ति का संवैधानिक प्रमुख होता है।

  2. संविधान का अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति के पद का प्रावधान करता है।

  3. संविधान का अनुच्छेद 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होने का प्रावधान करता है।

  4. राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है।

  5. राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।

  6. राष्ट्रपति बनने के लिए लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता आवश्यक है।

  7. राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।

  8. राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है।

  9. राष्ट्रपति को पद की शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं।

  10. राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया संविधान में निर्धारित है।

  11. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।

  12. भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल थीं।

  13. भारत के वर्तमान संवैधानिक ढाँचे में राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यपालिका प्रमुख माना जाता है।

  14. वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है।

  15. राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।

  16. प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रमुख होता है।

  17. संविधान का अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद से संबंधित है।

  18. संविधान का अनुच्छेद 75 मंत्रियों की नियुक्ति एवं कार्यकाल से संबंधित है।

  19. प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  20. लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता सामान्यतः प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है।

  21. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे।

  22. सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू थे।

  23. प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का गठन करता है।

  24. मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

  25. प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संपर्क सूत्र का कार्य करता है।

  26. प्रधानमंत्री नीति-निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

  27. उपराष्ट्रपति का पद संविधान के अनुच्छेद 63 में वर्णित है।

  28. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।

  29. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है।

  30. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।

  31. भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे।

  32. राज्यसभा संसद का उच्च सदन कहलाती है।

  33. लोकसभा संसद का निम्न सदन कहलाती है।

  34. भारतीय संसद राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है।

  35. संसद की विधायी शक्ति संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों तक विस्तृत है।

  36. संसद को अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।

  37. लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं।

  38. राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते हैं।

  39. राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है।

  40. लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 निर्धारित की गई थी।

  41. धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  42. धन विधेयक पर अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष का होता है।

  43. राज्यसभा धन विधेयक को अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है।

  44. संसद का संयुक्त अधिवेशन राष्ट्रपति द्वारा बुलाया जाता है।

  45. संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।

  46. संविधान का अनुच्छेद 79 संसद से संबंधित है।

  47. संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान अनुच्छेद 108 में है।

  48. भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है।

  49. मतदान का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है।

  50. अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा में आरक्षण का प्रावधान है।

  51. संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग से संबंधित है।

  52. मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  53. निर्वाचन आयोग स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों का संचालन करता है।

  54. भारत में प्रथम आम चुनाव 1951-52 में संपन्न हुए थे।

  55. निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।

  56. सर्वोच्च न्यायालय संविधान का अंतिम व्याख्याकार है।

  57. सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई थी।

  58. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

  59. सर्वोच्च न्यायालय को मूल, अपीलीय और परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार प्राप्त है।

  60. संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेने की अनुमति देता है।

  61. न्यायिक पुनरावलोकन सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण शक्ति है।

  62. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा न्यायपालिका द्वारा विकसित की गई है।

  63. उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय होता है।

  64. संविधान का अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य में उच्च न्यायालय के प्रावधान से संबंधित है।

  65. उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

  66. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहते हैं।

  67. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहते हैं।

  68. भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मानी जाती है।

  69. संविधान का संरक्षक एवं रक्षक सर्वोच्च न्यायालय है।

  70. भारतीय लोकतंत्र का आधार संविधान, विधि का शासन तथा स्वतंत्र न्यायपालिका है।

  1. संविधान का अनुच्छेद 1 भारत को "राज्यों का संघ" घोषित करता है।

  2. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को नए राज्यों को संघ में सम्मिलित करने का अधिकार प्राप्त है।

  3. संविधान का अनुच्छेद 3 राज्यों की सीमाओं, क्षेत्रफल एवं नाम में परिवर्तन से संबंधित है।

  4. संसद को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार प्राप्त है।

  5. भारत वर्तमान में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित है।

  6. संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची का उल्लेख संविधान की सातवीं अनुसूची में किया गया है।

  7. संघ सूची के विषयों पर केवल संसद कानून बना सकती है।

  8. राज्य सूची के विषयों पर सामान्यतः राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।

  9. समवर्ती सूची के विषयों पर संसद एवं राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।

  10. समवर्ती सूची में संघर्ष की स्थिति में संघ का कानून प्रभावी होता है।

  11. अवशिष्ट शक्तियाँ संसद को प्राप्त हैं।

  12. संविधान की सातवीं अनुसूची भारत की संघीय व्यवस्था का आधार है।

  13. वित्त आयोग का गठन प्रत्येक पाँच वर्ष बाद किया जाता है।

  14. वित्त आयोग राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करता है।

  15. भारत का प्रथम वित्त आयोग वर्ष 1951 में गठित किया गया था।

  16. वित्त आयोग संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत गठित किया जाता है।

  17. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  18. CAG को भारत की लोक वित्त प्रणाली का संरक्षक कहा जाता है।

  19. CAG की रिपोर्ट राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को प्रस्तुत की जाती है।

  20. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) एक संवैधानिक निकाय है।

  21. UPSC का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 315 में किया गया है।

  22. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  23. राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।

  24. भारत के महान्यायवादी का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 76 में किया गया है।

  25. महान्यायवादी भारत सरकार का सर्वोच्च विधिक सलाहकार होता है।

  26. महान्यायवादी संसद की कार्यवाही में भाग ले सकता है, किंतु मतदान नहीं कर सकता।

  27. राज्य के महाधिवक्ता का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 165 में किया गया है।

  28. राज्य का महाधिवक्ता राज्य सरकार का प्रमुख विधिक सलाहकार होता है।

  29. पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा 73वें संविधान संशोधन द्वारा दिया गया।

  30. 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1992 में पारित किया गया था।

  31. पंचायतों से संबंधित प्रावधान संविधान के भाग-9 में वर्णित हैं।

  32. ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था की मूल इकाई है।

  33. त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की संस्तुति बलवंत राय मेहता समिति ने की थी।

  34. भारत में पंचायती राज व्यवस्था का प्रथम शुभारंभ 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान में हुआ था।

  35. नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा 74वें संविधान संशोधन द्वारा दिया गया।

  36. नगरपालिकाओं से संबंधित प्रावधान संविधान के भाग-9(क) में वर्णित हैं।

  37. जिला योजना समिति का प्रावधान संविधान में किया गया है।

  38. महानगर योजना समिति का प्रावधान भी संविधान में निहित है।

  39. संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित है।

  40. दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।

  41. संविधान की नौवीं अनुसूची भूमि सुधार कानूनों के संरक्षण से संबंधित है।

  42. नौवीं अनुसूची प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ी गई थी।

  43. संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची पंचायतों के कार्यों से संबंधित है।

  44. संविधान की बारहवीं अनुसूची नगरपालिकाओं के कार्यों से संबंधित है।

  45. भारतीय संविधान में वर्तमान में 12 अनुसूचियाँ हैं।

  46. संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त भाषाओं का उल्लेख है।

  47. वर्तमान में आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ सम्मिलित हैं।

  48. संविधान की पहली अनुसूची राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों का विवरण देती है।

  49. संविधान की दूसरी अनुसूची राष्ट्रपति, राज्यपाल, न्यायाधीशों आदि के वेतन-भत्तों से संबंधित है।

  50. संविधान की तीसरी अनुसूची विभिन्न पदाधिकारियों की शपथ एवं प्रतिज्ञान से संबंधित है।

  51. संविधान की चौथी अनुसूची राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित है।

  52. संविधान की पाँचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन से संबंधित है।

  53. संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।

  54. भारत में विधि का शासन (Rule of Law) की अवधारणा ब्रिटेन से ग्रहण की गई है।

  55. संसदीय शासन प्रणाली ब्रिटिश संविधान से प्रेरित है।

  56. मौलिक अधिकारों की अवधारणा अमेरिकी संविधान से प्रेरित है।

  57. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं।

  58. मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ली गई है।

  59. न्यायिक पुनरावलोकन की अवधारणा अमेरिका से ग्रहण की गई है।

  60. संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका के संविधान से प्रेरित है।

  61. समवर्ती सूची की अवधारणा ऑस्ट्रेलिया से ग्रहण की गई है।

  62. स्वतंत्र न्यायपालिका का सिद्धांत अमेरिका से प्रेरित है।

  63. राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया अमेरिका से ग्रहण की गई है।

  64. गणराज्य की अवधारणा फ्रांस से प्रेरित मानी जाती है।

  65. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित हैं।

  66. भारतीय संविधान विश्व के विभिन्न संविधानों का समन्वित एवं विशिष्ट दस्तावेज है।

  67. संविधान भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है।

  68. संविधान नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का संरक्षक है।

  69. संविधान शासन की शक्तियों को सीमित एवं नियंत्रित करता है।

  70. भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व पर आधारित समाज की स्थापना करना है।

  1. संविधान की प्रस्तावना को संविधान की आत्मा एवं दर्शन का संक्षिप्त सार माना जाता है।

  2. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के आदर्शों का उल्लेख किया गया है।

  3. प्रस्तावना में भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है।

  4. संविधान की प्रस्तावना में "हम भारत के लोग" शब्द जनता की सर्वोच्चता को व्यक्त करते हैं।

  5. केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना था।

  6. संविधान की मूल प्रस्तावना में "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द नहीं थे।

  7. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इन शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ा गया।

  8. भारतीय लोकतंत्र सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित है।

  9. भारत में प्रत्येक नागरिक को 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर मतदान का अधिकार प्राप्त है।

  10. निर्वाचन प्रक्रिया लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला मानी जाती है।

  11. भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों का विशेष महत्व है।

  12. संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग की स्थापना का प्रावधान करता है।

  13. भारत निर्वाचन आयोग चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण करता है।

  14. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है।

  15. संसद भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च विधायिका है।

  16. संसद कानून निर्माण का प्रमुख संस्थान है।

  17. संसद जनता की आकांक्षाओं एवं हितों का प्रतिनिधित्व करती है।

  18. संसद की स्वीकृति के बिना कोई कर नहीं लगाया जा सकता।

  19. संसद संघीय वित्त पर नियंत्रण रखती है।

  20. संसद कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाती है।

  21. संसदीय प्रश्नकाल कार्यपालिका पर नियंत्रण का महत्वपूर्ण साधन है।

  22. शून्यकाल भारतीय संसदीय प्रणाली की एक विशिष्ट देन है।

  23. अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  24. मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।

  25. लोकसभा को लोकप्रिय सदन कहा जाता है।

  26. राज्यसभा को स्थायी सदन कहा जाता है।

  27. राज्यसभा संघीय ढाँचे में राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।

  28. संसद की संप्रभुता संविधान की सीमाओं के अधीन है।

  29. भारत में संविधान सर्वोच्च है, संसद नहीं।

  30. न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा करती है।

  31. न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक है।

  32. सर्वोच्च न्यायालय संविधान का अंतिम व्याख्याकार है।

  33. सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक कहा जाता है।

  34. उच्च न्यायालय राज्यों की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च निकाय है।

  35. न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की मूल विशेषता है।

  36. न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की मूल संरचना का भाग है।

  37. मूल संरचना सिद्धांत का प्रतिपादन केशवानंद भारती वाद में किया गया था।

  38. संसद संविधान की मूल संरचना को परिवर्तित नहीं कर सकती।

  39. संघवाद भारतीय संविधान की मूल संरचना का अंग है।

  40. धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की मूल संरचना का भाग है।

  41. लोकतंत्र भारतीय संविधान की मूल संरचना का एक आवश्यक तत्व है।

  42. विधि का शासन (Rule of Law) भारतीय संविधान की आधारभूत विशेषता है।

  43. न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना में सम्मिलित है।

  44. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं।

  45. सामाजिक न्याय भारतीय संविधान का प्रमुख उद्देश्य है।

  46. आर्थिक न्याय का उद्देश्य संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है।

  47. राजनीतिक न्याय सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अवसर प्रदान करता है।

  48. समानता का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है।

  49. स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक है।

  50. बंधुत्व की भावना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है।

  51. राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता संविधान के प्रमुख उद्देश्यों में से है।

  52. संविधान विविधता में एकता की भावना को प्रोत्साहित करता है।

  53. भारतीय संविधान सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावी साधन है।

  54. संविधान सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना का लक्ष्य रखता है।

  55. भारतीय संविधान कल्याणकारी राज्य की स्थापना का समर्थन करता है।

  56. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मूर्त रूप देते हैं।

  57. नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।

  58. मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा संरक्षित एवं प्रवर्तनीय हैं।

  59. संविधान नागरिकों को अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध कराता है।

  60. मौलिक कर्तव्यों का उद्देश्य राष्ट्र के प्रति नागरिकों में उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है।

  61. पर्यावरण संरक्षण प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।

  62. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद एवं सुधार की भावना का विकास नागरिकों का कर्तव्य है।

  63. सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

  64. राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रगान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  65. संविधान का पालन करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।

  66. राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  67. भारतीय संविधान विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक दस्तावेजों में से एक माना जाता है।

  68. भारतीय संविधान सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करता है।

  69. भारतीय संविधान शासन, प्रशासन एवं न्याय व्यवस्था का आधार है।

  70. संविधान भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का मूल स्रोत है।

  71. संविधान नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

  72. संविधान शासन की शक्तियों को संतुलित एवं नियंत्रित करता है।

  73. संविधान नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों को परिभाषित करता है।

  74. भारतीय संविधान परिवर्तनशील एवं गतिशील दस्तावेज है।

  75. संविधान समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से विकसित होता रहा है।

  76. भारतीय संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक है।

  77. संविधान राष्ट्रीय विकास एवं सामाजिक प्रगति का मार्गदर्शक है।

  78. भारतीय संविधान का अंतिम उद्देश्य एक न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं समावेशी समाज की स्थापना करना है।

  79. संविधान भारतीय गणराज्य की आधारशिला है।

  80. भारतीय संविधान राष्ट्र की एकता, अखंडता, लोकतंत्र तथा विधि के शासन का सर्वोच्च आधार है।

  1. भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ शासन की अंतिम शक्ति जनता में निहित है।

  2. भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा किया गया था।

  3. संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना, 1946 के आधार पर हुआ था।

  4. संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित किया।

  5. संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

  6. संविधान भारत को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है।

  7. भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता संविधान द्वारा संरक्षित है।

  8. भारत में संसदीय शासन प्रणाली लागू है।

  9. भारत में द्विसदनीय संसदीय व्यवस्था है।

  10. राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है।

  11. लोकसभा को जनता का सदन कहा जाता है।

  12. राज्यसभा को राज्यों की परिषद कहा जाता है।

  13. संविधान के अनुसार मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए उत्तरदायी है।

  14. प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रधान होता है।

  15. मंत्रिपरिषद की वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री में निहित होती है।

  16. राष्ट्रपति की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रयोग की जाती हैं।

  17. लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करता है।

  18. लोकसभा अध्यक्ष सदन की गरिमा एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता है।

  19. राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति कार्य करता है।

  20. संसद का मुख्य कार्य कानून बनाना है।

  21. संसद वित्तीय मामलों पर सर्वोच्च नियंत्रण रखती है।

  22. वार्षिक बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है।

  23. बजट को संविधान में वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है।

  24. भारत की संचित निधि का उल्लेख संविधान में किया गया है।

  25. आकस्मिक निधि अप्रत्याशित व्यय के लिए उपयोग में लाई जाती है।

  26. लोक लेखा समिति संसद की एक महत्वपूर्ण वित्तीय समिति है।

  27. प्राक्कलन समिति सरकारी व्यय में मितव्ययिता के सुझाव देती है।

  28. लोक उपक्रम समिति सार्वजनिक उपक्रमों के कार्यों की समीक्षा करती है।

  29. वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों का निर्धारण करता है।

  30. संघवाद भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है।

  31. भारत में संघीय व्यवस्था के साथ एकात्मक झुकाव पाया जाता है।

  32. संविधान संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है।

  33. संघ सूची राष्ट्रीय महत्व के विषयों से संबंधित है।

  34. राज्य सूची स्थानीय एवं प्रादेशिक महत्व के विषयों से संबंधित है।

  35. समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।

  36. भारतीय संघ अविनाशी है, जबकि राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन किया जा सकता है।

  37. संसद राज्यों की सीमाओं, नाम और क्षेत्रफल में परिवर्तन कर सकती है।

  38. भारतीय नागरिकता एकल नागरिकता पर आधारित है।

  39. नागरिकता संबंधी मूल प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक वर्णित हैं।

  40. संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।

  41. नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता का प्रमुख कानून है।

  42. मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

  43. समानता का अधिकार लोकतंत्र का आधार है।

  44. स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में सहायक है।

  45. शोषण के विरुद्ध अधिकार मानव गरिमा की रक्षा करता है।

  46. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार भारत की धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करता है।

  47. सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करते हैं।

  48. संवैधानिक उपचारों का अधिकार मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

  49. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है।

  50. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है।

  51. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु जारी की जाने वाली रिट है।

  52. परमादेश (Mandamus) किसी सार्वजनिक अधिकारी को कर्तव्य पालन हेतु निर्देशित करती है।

  53. प्रतिषेध (Prohibition) रिट अधीनस्थ न्यायालय को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकती है।

  54. उत्प्रेषण (Certiorari) रिट अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को निरस्त करने हेतु जारी की जाती है।

  55. अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) किसी पदाधिकारी के अधिकार की वैधता की जाँच करती है।

  56. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व शासन के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

  57. नीति-निर्देशक तत्व सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का लक्ष्य रखते हैं।

  58. कल्याणकारी राज्य की अवधारणा नीति-निर्देशक तत्वों में निहित है।

  59. ग्राम स्वराज की अवधारणा महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित है।

  60. समान नागरिक संहिता का प्रावधान नीति-निर्देशक तत्वों में किया गया है।

  61. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व संविधान की आत्मा के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं।

  62. मौलिक कर्तव्य नागरिकों में राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करते हैं।

  63. संविधान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  64. राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  65. देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  66. सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का उत्तरदायित्व है।

  67. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं संवर्धन नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है।

  68. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना नागरिकों का कर्तव्य है।

  69. उत्कृष्टता की ओर निरंतर प्रयास करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य माना गया है।

  70. माता-पिता या अभिभावकों का 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा दिलाना मौलिक कर्तव्य है।

  71. न्यायपालिका संविधान की संरक्षक संस्था है।

  72. सर्वोच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है।

  73. न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है।

  74. न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करता है।

  75. न्यायिक सक्रियता जनहित की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

  76. जनहित याचिका ने न्याय को आम नागरिकों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

  77. विधि का शासन लोकतांत्रिक प्रशासन की आधारशिला है।

  78. संविधान के समक्ष सभी नागरिक समान हैं।

  79. लोकतंत्र का वास्तविक आधार जागरूक नागरिक होते हैं।

  80. भारतीय संविधान नागरिकों को अधिकार, स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय प्रदान करने वाला सर्वोच्च विधिक दस्तावेज है।

  1. भारतीय संविधान विश्व के सबसे व्यापक एवं विस्तृत लिखित संविधानों में से एक है।

  2. भारतीय संविधान लोकतंत्र, गणराज्य, धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित है।

  3. संविधान नागरिकों और राज्य के बीच संबंधों को विनियमित करता है।

  4. संविधान शासन की शक्तियों को सीमित एवं नियंत्रित करता है।

  5. संविधान विधि के शासन (Rule of Law) को स्थापित करता है।

  6. भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।

  7. संविधान सामाजिक न्याय की स्थापना का आधार प्रदान करता है।

  8. संविधान आर्थिक न्याय को प्रोत्साहित करता है।

  9. संविधान राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।

  10. लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सर्वोच्च शक्ति का स्रोत होती है।

  11. चुनाव लोकतंत्र का आधारभूत तत्व हैं।

  12. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक शासन की पहचान हैं।

  13. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है।

  14. संविधान नागरिकों को समान अवसर प्रदान करने का प्रयास करता है।

  15. सामाजिक समानता लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है।

  16. भारतीय संविधान सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है।

  17. अस्पृश्यता का उन्मूलन भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

  18. अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं।

  19. संविधान कमजोर वर्गों के उत्थान को प्रोत्साहित करता है।

  20. आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय की अवधारणा से संबंधित है।

  21. भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षा करती है।

  22. न्यायपालिका संविधान की संरक्षक संस्था है।

  23. सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षक है।

  24. न्यायपालिका शासन के अन्य अंगों पर संवैधानिक नियंत्रण रखती है।

  25. न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है।

  26. संविधान संशोधन की व्यवस्था संविधान को लचीला एवं गतिशील बनाती है।

  27. भारतीय संविधान कठोरता एवं लचीलेपन का समन्वय है।

  28. संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

  29. मूल संरचना सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका का महत्वपूर्ण योगदान है।

  30. संविधान की सर्वोच्चता भारतीय शासन व्यवस्था की मूल विशेषता है।

  31. भारतीय संघ राज्यों का संघ है, न कि राज्यों के बीच किया गया कोई समझौता।

  32. भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता संविधान द्वारा सुरक्षित है।

  33. संसद राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर कानून बनाती है।

  34. राज्य विधानमंडल राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाता है।

  35. समवर्ती सूची संघ और राज्य दोनों को विधायी अधिकार प्रदान करती है।

  36. आपातकालीन परिस्थितियों में केंद्र की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।

  37. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संघीय व्यवस्था पर एकात्मक प्रभाव बढ़ जाता है।

  38. राष्ट्रपति शासन राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में लगाया जाता है।

  39. वित्तीय आपातकाल संविधान का एक विशेष प्रावधान है।

  40. अब तक भारत में वित्तीय आपातकाल कभी लागू नहीं किया गया है।

  41. संविधान नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।

  42. मौलिक अधिकार लोकतंत्र की आत्मा माने जाते हैं।

  43. संवैधानिक उपचारों का अधिकार अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी है।

  44. मौलिक अधिकार व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करते हैं।

  45. शिक्षा का अधिकार सामाजिक विकास का आधार है।

  46. शिक्षा लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने का प्रभावी माध्यम है।

  47. भारतीय संविधान महिला एवं पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान करता है।

  48. संविधान लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करता है।

  49. संविधान बालकों के संरक्षण एवं विकास के लिए विशेष प्रावधान करता है।

  50. बाल श्रम का निषेध सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण अंग है।

  51. संविधान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

  52. सांस्कृतिक विविधता भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण विशेषता है।

  53. भारतीय संविधान राष्ट्रीय एकता के साथ सांस्कृतिक बहुलता को भी महत्व देता है।

  54. संविधान विभिन्न धर्मों के प्रति समान सम्मान की भावना को प्रोत्साहित करता है।

  55. धर्मनिरपेक्षता भारतीय राज्य की आधारभूत विशेषताओं में से एक है।

  56. भारतीय राज्य किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रूप में स्वीकार नहीं करता।

  57. सभी नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

  58. संविधान सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है।

  59. बंधुत्व की भावना राष्ट्रीय एकीकरण का आधार है।

  60. राष्ट्रीय एकता और अखंडता संविधान के प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित हैं।

  61. संविधान राष्ट्रीय विकास का मार्गदर्शक दस्तावेज है।

  62. संविधान शासन की वैधता का आधार है।

  63. भारत का लोकतंत्र संविधान द्वारा संरक्षित एवं संचालित होता है।

  64. संविधान नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति आस्था विकसित करता है।

  65. संविधान का पालन प्रत्येक नागरिक का नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व है।

  66. लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी समान महत्व है।

  67. संविधान नागरिकों को उत्तरदायी एवं जागरूक बनने की प्रेरणा देता है।

  68. भारतीय संविधान विश्व के अनेक संविधानों के श्रेष्ठ तत्वों का समन्वित स्वरूप है।

  69. संविधान भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है।

  70. भारतीय संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित राष्ट्र निर्माण का आधार है।

  71. संविधान भारत की राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला है।

  72. संविधान प्रशासनिक संस्थाओं के संगठन एवं कार्यप्रणाली का निर्धारण करता है।

  73. संविधान शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित करता है।

  74. संविधान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ राज्य के दायित्व भी निर्धारित करता है।

  75. भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जो समयानुसार विकसित होता रहता है।

  76. संविधान लोकतांत्रिक शासन को स्थायित्व प्रदान करता है।

  77. भारतीय संविधान राष्ट्रीय हित एवं जनकल्याण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

  78. संविधान का अंतिम लक्ष्य एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और समावेशी समाज की स्थापना है।

  79. संविधान नागरिकों को राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है।

  80. भारतीय संविधान राष्ट्र की एकता, अखंडता, लोकतंत्र और विधि के शासन का सर्वोच्च संरक्षक है।

  1. भारतीय संविधान विश्व के सबसे व्यापक एवं विस्तृत लिखित संविधानों में से एक है।

  2. भारतीय संविधान लोकतंत्र, गणराज्य, धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित है।

  3. संविधान नागरिकों और राज्य के बीच संबंधों को विनियमित करता है।

  4. संविधान शासन की शक्तियों को सीमित एवं नियंत्रित करता है।

  5. संविधान विधि के शासन (Rule of Law) को स्थापित करता है।

  6. भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।

  7. संविधान सामाजिक न्याय की स्थापना का आधार प्रदान करता है।

  8. संविधान आर्थिक न्याय को प्रोत्साहित करता है।

  9. संविधान राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।

  10. लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सर्वोच्च शक्ति का स्रोत होती है।

  11. चुनाव लोकतंत्र का आधारभूत तत्व हैं।

  12. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक शासन की पहचान हैं।

  13. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है।

  14. संविधान नागरिकों को समान अवसर प्रदान करने का प्रयास करता है।

  15. सामाजिक समानता लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है।

  16. भारतीय संविधान सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है।

  17. अस्पृश्यता का उन्मूलन भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

  18. अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं।

  19. संविधान कमजोर वर्गों के उत्थान को प्रोत्साहित करता है।

  20. आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय की अवधारणा से संबंधित है।

  21. भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षा करती है।

  22. न्यायपालिका संविधान की संरक्षक संस्था है।

  23. सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षक है।

  24. न्यायपालिका शासन के अन्य अंगों पर संवैधानिक नियंत्रण रखती है।

  25. न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है।

  26. संविधान संशोधन की व्यवस्था संविधान को लचीला एवं गतिशील बनाती है।

  27. भारतीय संविधान कठोरता एवं लचीलेपन का समन्वय है।

  28. संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

  29. मूल संरचना सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका का महत्वपूर्ण योगदान है।

  30. संविधान की सर्वोच्चता भारतीय शासन व्यवस्था की मूल विशेषता है।

  31. भारतीय संघ राज्यों का संघ है, न कि राज्यों के बीच किया गया कोई समझौता।

  32. भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता संविधान द्वारा सुरक्षित है।

  33. संसद राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर कानून बनाती है।

  34. राज्य विधानमंडल राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाता है।

  35. समवर्ती सूची संघ और राज्य दोनों को विधायी अधिकार प्रदान करती है।

  36. आपातकालीन परिस्थितियों में केंद्र की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।

  37. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संघीय व्यवस्था पर एकात्मक प्रभाव बढ़ जाता है।

  38. राष्ट्रपति शासन राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में लगाया जाता है।

  39. वित्तीय आपातकाल संविधान का एक विशेष प्रावधान है।

  40. अब तक भारत में वित्तीय आपातकाल कभी लागू नहीं किया गया है।

  41. संविधान नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।

  42. मौलिक अधिकार लोकतंत्र की आत्मा माने जाते हैं।

  43. संवैधानिक उपचारों का अधिकार अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी है।

  44. मौलिक अधिकार व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करते हैं।

  45. शिक्षा का अधिकार सामाजिक विकास का आधार है।

  46. शिक्षा लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने का प्रभावी माध्यम है।

  47. भारतीय संविधान महिला एवं पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान करता है।

  48. संविधान लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करता है।

  49. संविधान बालकों के संरक्षण एवं विकास के लिए विशेष प्रावधान करता है।

  50. बाल श्रम का निषेध सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण अंग है।

  51. संविधान अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

  52. सांस्कृतिक विविधता भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण विशेषता है।

  53. भारतीय संविधान राष्ट्रीय एकता के साथ सांस्कृतिक बहुलता को भी महत्व देता है।

  54. संविधान विभिन्न धर्मों के प्रति समान सम्मान की भावना को प्रोत्साहित करता है।

  55. धर्मनिरपेक्षता भारतीय राज्य की आधारभूत विशेषताओं में से एक है।

  56. भारतीय राज्य किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रूप में स्वीकार नहीं करता।

  57. सभी नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

  58. संविधान सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है।

  59. बंधुत्व की भावना राष्ट्रीय एकीकरण का आधार है।

  60. राष्ट्रीय एकता और अखंडता संविधान के प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित हैं।

  61. संविधान राष्ट्रीय विकास का मार्गदर्शक दस्तावेज है।

  62. संविधान शासन की वैधता का आधार है।

  63. भारत का लोकतंत्र संविधान द्वारा संरक्षित एवं संचालित होता है।

  64. संविधान नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति आस्था विकसित करता है।

  65. संविधान का पालन प्रत्येक नागरिक का नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व है।

  66. लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी समान महत्व है।

  67. संविधान नागरिकों को उत्तरदायी एवं जागरूक बनने की प्रेरणा देता है।

  68. भारतीय संविधान विश्व के अनेक संविधानों के श्रेष्ठ तत्वों का समन्वित स्वरूप है।

  69. संविधान भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है।

  70. भारतीय संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित राष्ट्र निर्माण का आधार है।

  71. संविधान भारत की राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला है।

  72. संविधान प्रशासनिक संस्थाओं के संगठन एवं कार्यप्रणाली का निर्धारण करता है।

  73. संविधान शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित करता है।

  74. संविधान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ राज्य के दायित्व भी निर्धारित करता है।

  75. भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जो समयानुसार विकसित होता रहता है।

  76. संविधान लोकतांत्रिक शासन को स्थायित्व प्रदान करता है।

  77. भारतीय संविधान राष्ट्रीय हित एवं जनकल्याण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

  78. संविधान का अंतिम लक्ष्य एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और समावेशी समाज की स्थापना है।

  79. संविधान नागरिकों को राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है।

  80. भारतीय संविधान राष्ट्र की एकता, अखंडता, लोकतंत्र और विधि के शासन का सर्वोच्च संरक्षक है।

  1. भारतीय संविधान विश्व के सबसे विस्तृत लोकतांत्रिक संविधानों में से एक है।

  2. भारतीय संविधान का निर्माण लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष एवं कल्याणकारी राज्य की स्थापना के उद्देश्य से किया गया था।

  3. संविधान राज्य की सभी संस्थाओं के अधिकार एवं कर्तव्यों को निर्धारित करता है।

  4. संविधान शासन की शक्तियों के दुरुपयोग पर नियंत्रण स्थापित करता है।

  5. संविधान नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों का संरक्षण करता है।

  6. लोकतांत्रिक शासन में संविधान सर्वोच्च विधिक दस्तावेज होता है।

  7. संविधान की सर्वोच्चता भारतीय शासन प्रणाली की आधारभूत विशेषता है।

  8. संविधान नागरिकों को न्याय प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है।

  9. संविधान के अनुसार सभी नागरिक विधि के समक्ष समान हैं।

  10. भारतीय लोकतंत्र में जनमत का विशेष महत्व है।

  11. चुनाव जनता की संप्रभुता की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं।

  12. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन लोकतंत्र की सफलता का आधार हैं।

  13. संविधान प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा करता है।

  14. मौलिक अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।

  15. संविधान सामाजिक एवं आर्थिक विषमताओं को कम करने का प्रयास करता है।

  16. समाजवादी व्यवस्था का उद्देश्य संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण है।

  17. भारतीय संविधान अवसर की समानता पर बल देता है।

  18. संविधान कमजोर वर्गों के संरक्षण हेतु विशेष व्यवस्थाएँ प्रदान करता है।

  19. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

  20. भारतीय संविधान समावेशी विकास की अवधारणा को प्रोत्साहित करता है।

  21. संविधान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

  22. महिलाओं को समान अवसर एवं समान अधिकार प्रदान करना संविधान का उद्देश्य है।

  23. संविधान बालकों के हितों की रक्षा हेतु विशेष प्रावधान करता है।

  24. बाल विवाह, बाल श्रम एवं शोषण के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षण उपलब्ध है।

  25. शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी साधन मानी जाती है।

  26. संविधान शिक्षा के प्रसार को राष्ट्रीय विकास का आधार मानता है।

  27. पर्यावरण संरक्षण संविधान की महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रतिबद्धताओं में से एक है।

  28. राज्य एवं नागरिक दोनों पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तरदायी हैं।

  29. वन, वन्यजीव एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण राष्ट्रीय दायित्व है।

  30. संविधान सतत विकास की अवधारणा को समर्थन प्रदान करता है।

  31. भारतीय संविधान राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सर्वोच्च महत्व देता है।

  32. राष्ट्रीय एकीकरण लोकतांत्रिक स्थिरता का आधार है।

  33. संविधान भाषाई, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करता है।

  34. भारत की विविधता उसकी लोकतांत्रिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार है।

  35. धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की भावना को व्यक्त करती है।

  36. भारतीय राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करता है।

  37. किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।

  38. संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है।

  39. संविधान राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक बहुलता के बीच संतुलन स्थापित करता है।

  40. संविधान भारतीय राष्ट्रवाद को लोकतांत्रिक एवं समावेशी स्वरूप प्रदान करता है।

  41. संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका भारतीय शासन व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग हैं।

  42. विधायिका कानून बनाती है।

  43. कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है।

  44. न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या एवं संरक्षण करती है।

  45. शक्तियों का पृथक्करण लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

  46. नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) की व्यवस्था शासन में उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है।

  47. न्यायपालिका की स्वतंत्रता नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

  48. विधि का शासन लोकतंत्र का मूल आधार है।

  49. भारत में सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान उत्तरदायी हैं।

  50. संविधान शासन को जनहित के अनुरूप संचालित करने का आधार प्रदान करता है।

  51. संविधान राष्ट्रीय विकास की दिशा निर्धारित करता है।

  52. संविधान सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी साधन है।

  53. संविधान राष्ट्र की राजनीतिक स्थिरता का आधार है।

  54. भारतीय संविधान लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों को साकार करने का माध्यम है।

  55. संविधान नागरिकों में कर्तव्यपरायणता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है।

  56. नागरिकों का सक्रिय सहयोग लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है।

  57. संविधान नागरिकों को राष्ट्रहित में कार्य करने की प्रेरणा देता है।

  58. संविधान राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  59. लोकतंत्र केवल अधिकारों पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों पर भी आधारित होता है।

  60. राष्ट्र की उन्नति जागरूक, शिक्षित और उत्तरदायी नागरिकों पर निर्भर करती है।

  61. भारतीय संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक है।

  62. संविधान सामाजिक न्याय, आर्थिक प्रगति और राजनीतिक स्थिरता का आधार है।

  63. संविधान शासन और नागरिकों के मध्य विश्वास का सेतु है।

  64. संविधान राष्ट्रीय हितों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं में संतुलन स्थापित करता है।

  65. संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा का आधारभूत दस्तावेज है।

  66. भारतीय संविधान आधुनिक भारत के निर्माण का मार्गदर्शक है।

  67. संविधान भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है।

  68. संविधान नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और स्वतंत्रताओं का संरक्षक है।

  69. संविधान राष्ट्र के समग्र विकास का आधार प्रदान करता है।

  70. भारतीय संविधान एक सशक्त, समावेशी, लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र की स्थापना का मूल आधार है।

  1. भारतीय संविधान नागरिकों को लोकतांत्रिक शासन में भागीदारी का अवसर प्रदान करता है।

  2. संविधान शासन को उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाने का आधार है।

  3. भारतीय लोकतंत्र की सफलता संविधान के प्रति आस्था पर निर्भर करती है।

  4. संविधान नागरिक स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय हितों में संतुलन स्थापित करता है।

  5. भारतीय संविधान मानव गरिमा की रक्षा को विशेष महत्व देता है।

  6. संविधान सभी नागरिकों को समान सम्मान प्रदान करता है।

  7. सामाजिक न्याय भारतीय संविधान की मूल प्रेरणा है।

  8. संविधान का उद्देश्य शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना है।

  9. भारतीय संविधान कमजोर एवं वंचित वर्गों के संरक्षण का समर्थन करता है।

  10. संविधान सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है।

  11. संविधान राष्ट्रीय जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना का आधार है।

  12. लोकतांत्रिक शासन में कानून का शासन सर्वोपरि होता है।

  13. भारतीय संविधान विधि की सर्वोच्चता को स्वीकार करता है।

  14. संविधान शासन को संविधानबद्ध एवं सीमित बनाता है।

  15. संविधान किसी भी प्रकार की निरंकुशता का विरोध करता है।

  16. संविधान लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्थायित्व प्रदान करता है।

  17. स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की रक्षा का प्रमुख साधन है।

  18. न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की अंतिम संरक्षक है।

  19. न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है।

  20. संविधान शासन के प्रत्येक अंग को उसके अधिकार एवं सीमाएँ निर्धारित करता है।

  21. भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

  22. विचारों की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक समाज की महत्वपूर्ण विशेषता है।

  23. संविधान शांतिपूर्ण एवं वैधानिक विरोध के अधिकार को मान्यता देता है।

  24. लोकतंत्र में जनमत का सम्मान आवश्यक है।

  25. संविधान विविध मतों एवं विचारों के सह-अस्तित्व को स्वीकार करता है।

  26. भारतीय संविधान सहिष्णुता एवं बहुलवाद की भावना को प्रोत्साहित करता है।

  27. धर्मनिरपेक्षता भारतीय लोकतंत्र का आधारभूत सिद्धांत है।

  28. सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान भारतीय राज्य की नीति है।

  29. संविधान धार्मिक स्वतंत्रता एवं सामाजिक सद्भाव दोनों को महत्व देता है।

  30. राष्ट्रीय एकता संविधान का सर्वोच्च लक्ष्य है।

  31. संविधान राष्ट्र की अखंडता की रक्षा हेतु विशेष प्रावधान करता है।

  32. भारत की संप्रभुता संविधान द्वारा संरक्षित है।

  33. संविधान राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकतांत्रिक अधिकारों में संतुलन स्थापित करता है।

  34. आपातकालीन प्रावधान राष्ट्रहित की रक्षा के लिए बनाए गए हैं।

  35. संविधान संकट की परिस्थितियों में शासन की निरंतरता सुनिश्चित करता है।

  36. संविधान संघ और राज्यों के मध्य सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।

  37. सहकारी संघवाद भारतीय शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण अवधारणा है।

  38. केंद्र और राज्य मिलकर राष्ट्रीय विकास में योगदान देते हैं।

  39. संविधान राष्ट्रीय संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग का मार्गदर्शन करता है।

  40. संविधान आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

  41. भारतीय संविधान कल्याणकारी राज्य की स्थापना का समर्थन करता है।

  42. राज्य का दायित्व जनकल्याण को बढ़ावा देना है।

  43. नीति-निर्देशक तत्व राज्य को सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की दिशा प्रदान करते हैं।

  44. संविधान गरीबी, अशिक्षा एवं असमानता को दूर करने की प्रेरणा देता है।

  45. शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार कल्याणकारी राज्य के प्रमुख उद्देश्य हैं।

  46. संविधान वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं आधुनिक विचारधारा को प्रोत्साहित करता है।

  47. संविधान राष्ट्रीय विकास में शिक्षा की भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है।

  48. ज्ञान एवं शिक्षा लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के आधार हैं।

  49. संविधान अनुसंधान, नवाचार एवं प्रगति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करता है।

  50. शिक्षा का अधिकार सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम है।

  51. संविधान पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय दायित्व मानता है।

  52. स्वच्छ पर्यावरण स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है।

  53. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भावी पीढ़ियों के हित में आवश्यक है।

  54. पर्यावरणीय संतुलन सतत विकास का आधार है।

  55. संविधान प्रकृति एवं मानव के मध्य संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

  56. नागरिकों का कर्तव्य है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें।

  57. संविधान सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानता है।

  58. राष्ट्रीय धरोहरों का संरक्षण प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

  59. संविधान सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को महत्व देता है।

  60. भारत की सांस्कृतिक विविधता संविधान द्वारा संरक्षित है।

  61. संविधान राष्ट्रीय एकता के साथ सांस्कृतिक बहुलता को भी स्वीकार करता है।

  62. संविधान भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं के संरक्षण को प्रोत्साहित करता है।

  63. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  64. राष्ट्रध्वज राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है।

  65. राष्ट्रगान राष्ट्रीय एकता और सम्मान का प्रतीक है।

  66. संविधान राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ बनाने का माध्यम है।

  67. संविधान नागरिकों में राष्ट्रभक्ति और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है।

  68. जागरूक नागरिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं।

  69. संविधान नागरिकों को अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन की भी प्रेरणा देता है।

  70. भारतीय संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा राष्ट्रीय एकता पर आधारित आधुनिक भारतीय राष्ट्र का मूल आधार है।



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