एक तत्त्वबोधक प्रेरक कथा



 प्रतिष्ठानपुर नामक एक अत्यन्त विख्यात नगर था। वहॉ पर पृथ्वीरूप नामक एक अत्यन्त सुन्दर राजा था। एक बार वहाँ से कोई तत्त्वज्ञ भिक्षु जा रहा था। उसने पृथ्वीरूप राजा को देखा। उसको अत्यन्त सुन्दर देखकर उसने विचार किया कि इसके लायक ही कोई लड़की मिले और यह उससे ही विवाह करे तो ठीक होगा। उसने राजा के लोगों से कहा-'मैं राजा से मिलना चाहता हूँ, समय बता दिया जाय।' वह राजा से मिला तो राजा ने कहा- 'आपको क्या चाहिए?' उसने समझा कि भिक्षु है, कुछ लेने आया होगा। भिक्षु ने  कहा-'राजन्! मुझे तो कुछ नहीं चाहिए, परंतु तुम्हें कुछ बताने आया हूँ। तुम्हारे लायक एक कन्या है। उसका नाम है 'रूपलता' और वह अद्वितीय सुन्दरी है। वह मुक्तिपुर में रहती है। उसके पिता का नाम रूपधर' है और माता का नाम 'हेमलता' है वही तुम्हारी रानी बनने योग्य है; क्योंकि जैसी तुम्हारी सुन्दरता है, वैसी ही उसकी सुन्दरता है।'

राजा उसकी बात से प्रभावित हो गया। राजा ने मुक्तिपुर का पता लगाकर उस लड़की के साथ बात करने के लिये अपने मंत्रियों से कहा मुक्तिपुर  समुद्र का एक टापू था, अत: बहुत ढूँढ़ने के बाद ही उसका पता लग सका। उधर वह ज्ञानी भिक्षु विचारने लगा कि जैसे ही उस राजा की तरफ से मुक्तिपुर में विवाह-प्रस्ताव आयेगा तो क्या पता! रूप लता और यहाँ के लोग स्वीकार करें या न करें। वह भिक्षु एक सिद्धहस्त चित्रकार भी था। उसने राजा पृथ्वीरूप का बड़ा सुन्दर आकर्षक चित्र बनाया और मुक्तिपुर जाकर रूप लता को दिखा दिया और कह दिया-'यह प्रतिष्ठान पुरका राजा है और तुम्हारे लायक यही पति है।' इस पर रूपलता ने भी उससे ही विवाह करने की अपनी चाह माता-पिता को बता दी। इधर राजाने भी मुक्तिपुर का पता लगाकर अपने विवाह प्रस्ताव वहाँ भिजवाया। रूपलता तो उसका चित्र पहले ही देख चुकी थी। माता-पिता ने भी प्रस्ताव को स्वीकार कर रूपलता का विवाह पृथ्वीरूप राजा के साथ कर दिया। वहाँ से विवाह कर नवविवाहिता पत्नी को लेकर राजा जब प्रतिष्ठानपुर आया तो देखा कि प्रतिष्ठानपुर की जितनी युवतियाँ थीं, वे नाराज हुई बैठी हैं, वे कहती थीं कि क्या हमारे यहाँ कोई सुन्दर स्त्री नहीं है, जो हम सबको छोड़कर राजा दूर देश से विवाह करके आ रहे हैं?' परंतु हाथी पर बैठकर जब उसकी सवारी नवविवाहिता पत्नी के साथ निकली, तो सारी स्त्रियों का गर्व समाप्त हो गया और उन्होंने कहा कि राजा ने ठीक ही किया। तब दोनों सुख से रहने लगे।

प्रसंग का भावार्थ - इस दृष्टान्त का अर्थ यह है कि वह 'प्रतिष्ठानपुर' कोई नगर विशेष नहीं है, अपितु जिसमें सब चीजें प्रतिष्ठित हैं, उसका ही नाम प्रतिष्ठानपुर है और उसमें 'पृथ्वीरूप' राजा यह जीव है-यह पार्थिव देहवाला है। पृथ्वी के विकार का यह शरीर धारण किये हुए है, इसलिये यह पृथ्वीरूप राजा है। उससे वेदरूप भिक्षु जब मिलता है तो वह कहता है कि 'हे जीव! तेरे प्राप्त करने लायक पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या ही है, वही तुम्हारी पत्नी (जीवनसंगिनी) बनने योग्य है। इस पृथ्वीलोक के अन्दर जितने भी पदार्थ हैं, पार्थिव पदार्थ हैं, वे तेरे योग्य नहीं हैं, क्योंकि तेरी सुन्दरता चेतन की सुन्दरता है, मुक्तिपुर में रहनेवाली रूपलता ही तुम्हारी पत्नी बनने के योग्य है। पराविद्या ही रूपलता है। तत्त्वज्ञ भिक्षु (सद्गुरु) दोनों को मिलाने का काम करता है, सो यह साधन स्वरूप बुद्धि ही तत्व वेत्ता भिक्षु है, जिससे वेद के अर्थ का ज्ञान होता है। बुद्धि के द्वारा जिसको समझा जाय अर्थात् शुद्ध बुद्धि के द्वारा प्राप्त किया जाय, वही शास्त्र ज्ञान है। ब्रह्मविद्या तो पहले से ही जानती है कि मैं किसका विषय हूँ अर्थात् चेतन का ही विषय हूँ, इसलिये यह कभी नहीं समझना चाहिये कि मैं तो ब्रह्मविद्या को चाहता हूँ, क्या पता वह मुझे वरण करे या न करे परंतु जब तक तुम उसके समक्ष नहीं जाओगे, तब तक विवाह तो होगा नहीं। रास्ते में अनेक विघ्न आयेंगे, जैसे प्रतिष्ठानपुर की कोई स्त्री नहीं चाहती कि राजा दूसरे देश में जाएँ और वहां की लड़की से विवाह करें। उसी प्रकार तुम्हारे अन्तःकरण में रहने वाले जितने काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि विकार हैं, वे भी कोई नहीं चाहते कि तुम उनसे विमुख होकर शुद्ध ब्रह्मविद्या (पराविद्या) प्राप्त करो। परंतु एक बार पराविद्या आ गयी, तो ये काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि जो विकृतियाँ हैं, उनका गर्व समाप्त हो जायगा अर्थात् ये विकृतियाँ म्लान हो जाएगी। आत्मज्ञान के उदय होने पर तो ये सारे विकार सर्वथा म्लान हो जाते हैं। इनमें फिर कोई सामर्थ्य नहीं रहती। एक बार जहाँ पराविद्या की प्राप्ति हो गयी, वहाँ हमेशा के लिये सारे दुःखों से निवृत्ति हो जाती है अर्थात् अन्त:करण निर्मल हो जाता है।

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मोह में दुःख



रामनगर के एक शाहजी ने एक सफेद चूहा पाल रखा था। उसे वे बड़े प्यार से खिलाते-पिलाते तथा देख भाल किया करते थे। शाहजी जब दुकानपर जाते, तो उसे अपने साथ ही ले जाते और जब वे दुकान से घर लौटते, तो उसे भी लौटा लाते थे। शाहजी की दुकान आटा-दाल की थी। उनकी दुकान में चूहे बहुत पैदा हो गये थे, इसलिये चूहों को मारने के वास्ते शाहजी ने एक बिल्ली पाल ली। जब बिल्ली बड़ी हुई, तब दुकान के चूहों का शिकार करने लगी, 4-6 चूहे नित्य मारकर खा जाती थी। शाहजी उसके चूहा पकड़ने पर बड़े प्रसन्न होते थे।
एक दिन की बात है कि बिल्ली को शिकार करने के लिये एक भी चूहा न मिला। बिल्ली भूखी थी, उसे अपने-बिराने का ज्ञान तो था ही नहीं। उसने झट शाहजी का पाला हुआ सफेद चूहा मारकर खा लिया। शाहजी अब करते क्या, देखते रह गये। जब बिल्ली को मारने दौड़े, तब वह भाग गयी। शाहजी दुःख में निमग्न बैठे कुछ सोच रहे थे कि इतने में उधर से उनके गुरु महाराज आ निकले। शाहजी को चिन्तित देखकर बोले-'क्यों, क्या हुआ? कुशल तो है?' शाहजी बोले महाराज! वैसे तो आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है, परंतु मेरे एक पाले हुए सफेद चूहे को बिल्ली खा गया।' गुरुजी ने कहा कि 'जब तुमने चूहा पाला था तो फिर बिल्ली क्यों पाल ली?' शाहजी ने कहा कि 'मैंने तो बिल्ली को दुकान से चूहों को मारने के वास्ते पाला था।' महात्मा जी ने कहा कि 'क्या और चूहों में जान नहीं थी?' तब शाहजी बोले 'हुआ करे जान, मुझे क्या, मुझे तो इसी चूहे से प्रेम था। मैंने इसे बड़ी मोहब्बत से पाला था। तब महात्माजी ने कहा कि 'भाई! तुम्हारे दुख का कारण चूहा नहीं है, बल्कि ममता है (यह मेरा है ऐसा भाव)।' शाहजी ने कहा-'हाँ महाराज!'
महात्माजी ने कहा कि संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान् हैं और प्रत्येक प्राणी को मृत्यु रूपी बिल्ली अवश्य खायेगी। यदि तुम सांसारिक पदार्थों में ममता करोगे तो दुःख से सताये जाओगे इन पदार्थों और स्त्री, पुत्र, धन आदि की ममता (मोह) छोड़कर अपने कर्तव्य का धैर्य के साथ पालन करो और सब में आत्मवत् भाव करो तभी दुख से छुटकारा पा सकोंगे।
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
जिस ज्ञानी मनुष्य की दृष्टि में सभी प्राणी अपनी आत्मा के तुल्य हो जाते हैं, उसको फिर शोक, मोह नहीं होता।

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रस्सी में सर्प का भ्रम



घड़ी ने अभी-अभी नौका घण्टा बजाया था। हिरेन 'सुन्दरवन के बाघ' फिल्म देखने के बाद वापस अपने घर लौट रहा था। रॉयल बंगाल बाघों के अंचल में जाकर इस फिल्म का निर्माण किया गया था। हिरेन उस फिल्म के दृश्यों के बारे में सोचता हुआ चला जा रहा था। चलते-चलते वह सहसा चौंक गया। सामने सड़क पर एक सांप लेटा हुआ था। उस पर उसका पाँव पड़ते-पड़ते रह गया था। बड़े भाग्य से ही उसकी जान बच गयी थी। वह थोड़ा पीछे हटकर और भी अच्छी तरह सांप को देखने लगा। यह एक वैसा ही नाग लग रहा था, जैसा कि उसने कुछ दिनों पूर्व सँपेरे की टोकरी में देखा था।

हिरेन ने सांप से बचने के लिये बगल का एक दूसरा रास्ता पकड़ने की सोची। तभी उसने देखा कि एक व्यक्ति हाथ में टार्च लिये उस सांप की ओर ही चला जा रहा है।हिरेन चिल्लाया-'उधरसे मत जाओ, सड़क पर एक नाग लेटा है।'
वह व्यक्ति बोला-'डरो मत। मेरे साथ आओ। घण्टे भर पहले मैं इसी सड़क से होकर गया था। मैंने तुम्हारे साँप को देख लिया है। वह नाग नहीं, रस्सी का एक टुकड़ा मात्र है।' वह हीरेन को उस जगह ले गया। हिरेन ने टार्च से आलोकित सड़क को स्पष्ट रूपसे देखा तो उसे पता चला कि वहाँ कोई नाग नहीं, बल्कि एक रस्सी पड़ी है। दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। हिरेन का भय जा चुका था।
कभी-कभी हम एक वस्तु को कुछ दूसरा समझ बैठते हैं और इस कारण हम भ्रमित या भयभीत हो जाते हैं। वेदान्त की मतानुसार रस्सी में सर्प के भय के समान ही हमारे सुख-दुःख, हमारी समस्या, आशंका और चिन्ताएँ एक तरहके भ्रम पर आधारित होती हैं। मूलत: हम पूर्ण और आनन्दमय हैं, तथापि हम अपनेको श्मशान की ओर अग्रसर हो रहे एक लाचार मत्स्य प्राणी के रूपमें देखते हैं। हम लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो हमपर जादू कर दिया गया हो और इसीको वेदान्त में माया कहते हैं। जब मायाका जादू टूट जाता है, तब हमें अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होता है।

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वेदों और श्रुतियों की जननी देवी गायत्री की जयंती और अवतरण



Gayatri Mantra

कौन हैं गायत्री माता कैसे हुआ अवतरण
मान्यता है कि चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियां सभी गायत्री से जन्मी हैं। वेदों की उत्पति के कारण इन्हें वेदमाता कहा जाता है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की आराध्य भी इन्हें ही माना जाता है इसलिए इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की देवी भी गायत्री हैं इस कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की। आरंभ में गायत्री सिर्फ देवताओं तक सीमित थी लेकिन जिस प्रकार भगीरथ कड़े तप से गंगा मैया को स्वर्ग से धरती पर उतार लाए उसी तरह विश्वामित्र ने भी कठोर साधना कर मां गायत्री की महिमा अर्थात गायत्री मंत्र को सर्वसाधारण तक पंहुचाया।


मां गायत्री को माना गया है पंचमुखी
हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है, जिसका अर्थ है यह संपूर्ण ब्रह्मांड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। यही कारण है गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को प्रतिदिन गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिए।

गायत्री जयंती
पुराणों के अनुसार गायत्री जयंती ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में 11 वें दिन मनाई जाती है। कहते हैं कि महागुरु विश्वमित्र ने पहली बार गायत्री मंत्र को ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को बोला था, जिसके बाद इस दिन को गायत्री जयंती के रूप में जाना जाने लगा। तो कह सकते हैं कि गायत्री जयंती की उत्पति महर्षि विश्वमित्र द्वारा हुई थी, उनका दुनिया में अज्ञानता दूर करने में विशेष योगदान रहा है, वैसे गायत्री जयंती ज्यादातर गंगा दशहरे के दूसरे दिन आती है। कुछ लोगों के अनुसार इसे श्रवण पूर्णिमा के समय भी मनाया जाता है। गायत्री जयंती पर गायत्री मंत्र जपने से यश, प्रसिद्धि, धन व ऐश्वर्य की प्राप्‍ती होती है। यदि आप गायत्री मंत्र का पूरा लाभ चाहते हैं तो इसको सही विधि विधान तथा पूरी पवित्रता के साथ बोलना चाहिये।


गायत्री माता की महिमा
हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा जाता है अर्थात सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है। पुराणों के अनुसार इन गायत्री देवी को ब्रह्मा, विष्णु, महेश (त्रिमूर्ति) के बराबर माना जाता है और त्रिमूर्ति मानकर ही इनकी आराधना की जाती है। देवी गायत्री को सभी देवी-देवता की माता माना जाता है व देवी सरस्वती, पार्वती और देवी लक्षमी का अवतार माना जाता है। गायत्री के 5 सिर और 10 हाथ माने जाते हैं। उनके स्वरूप में चार सिर चारों वेदों के प्रतीक हैं और उनका पांचवा सिर सर्वशक्तिमान शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे कमल पर विराजमान हैं, गायत्री के 10 हाथ भगवान विष्णु के प्रतीक हैं, इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। माता गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी भी कहा जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गायत्री का अवतरण माना जाता है। इस दिन को हम गायत्री जयंती के रूप में मनाते हैं। धर्म ग्रंथों में यह भी लिखा है कि मां गायत्री की उपासना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और किसी वस्तु की कमी नहीं होती है। मां गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं।
गायत्री की महिमा में प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक भारत के विचारकों तक अनेक बातें कही हैं। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री मां की महिमा गाते ही हैं। अथर्ववेद में मां गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। महाभारत के रचयिता वेद व्यास कहते हैं गायत्री की महिमा में कहते हैं जैसे फूलों में शहद, दूध में घी सार रूप में होता है वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री को सिद्ध कर लिया जाए तो यह समस्त इच्छाओं की पूर्ति पूरी करने वाली दैवीय गाय कामधेनु के समान है। जैसे गंगा शरीर के पापों को धो कर तन मन को निर्मल करती है उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र हो जाती है। गायत्री को सर्वसाधारण तक पहुंचाने वाले विश्वामित्र कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाला गायत्री मंत्र निकाला है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला मंत्र और कोई नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से गायत्री का जप करता है वह पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे केंचुली से छूटने पर सांप होता है। गायत्री माता भक्त देवी गायत्री को आदि शक्ति मानते हैं और इसी रूप में उनकी आराधना करते हैं। प्रतीकात्मक रूप से गायत्री देवी को ज्ञान की देवी माना जाता है, कहते हैं कि इनके रहने से अज्ञानता दूर होती है, इस ज्ञान को विश्वमित्र द्वारा पूरी दुनिया में फैलाया गया है।

Gayatri Mata Wallpaper HD

क्यों कहा जाता है वेदमाता
गायत्री संहिता के अनुसार, ‘भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका’यानी गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन तीनों शक्तियों से ही इस परम ज्ञान यानी वेद की उत्पत्ति होने के कारण गायत्री को वेद माता कहा गया है। गायत्री मंत्र के लिए शास्त्रों में लिखा है कि सर्वदेवानां गायत्री सारमुच्यते जिसका मतलब है गायत्री मंत्र सभी वेदों का सार है। इसलिए मां गायत्री को वेदमाता कहा गया है। मां गायत्री का उल्लेख ऋक्, यजु, साम, तैत्तिरीय आदि सभी वैदिक संहिताओं में है। कुछ उपनिषदों में सावित्री और गायत्री दोनों को एक ही बताया गया है। किसी समय ये सविता की पुत्री के रूप में प्रकट हई थीं, इसलिये इनका नाम सावित्री पड़ गया। कहा जाता है कि सविता के मुख से इनका प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान सूर्य ने इन्हें ब्रह्माजी को समर्पित कर दिया। तभी से इनको ब्रह्माणी भी कहा जाता है। गायत्री ज्ञान-विज्ञान की मूर्ति हैं। ये ब्राह्मणों की आराध्या देवी हैं। इन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों और पुराणादि में इनकी विस्तृत महिमा का वर्णन मिलता है।

देवी गायत्री के विवाह की कथा
एक कथा के अनुसार ब्रह्मा किसी यज्ञ में जाते हैं। परंपरा के अनुसार किसी भी पूजा, अर्चना, यज्ञ में शादीशुदी इंसान को जोड़े में ही बैठना चाहिए। जोड़े में बैठने से उसका फल जल्दी व अवश्य मिलता है, लेकिन किसी कारणवश ब्रह्मा की पत्नी सावित्री को आने में देरी हो जाती है, इस दौरान ब्रह्मा जी वहां मौजूद देवी गायत्री से विवाह कर लेते हैं और अपनी पत्नी के साथ यज्ञ शुरू कर देते हैं।

गायत्री मंत्र और अर्थ
Gayatri Mantra
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थ - सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करे।
इस मंत्र के जाप से ज्ञान की प्राप्ति होती है और मन शांत तथा एकाग्र रहता है। ललाट पर चमक आती है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों के साथ जाप करने से दरिद्रता, दुख और कष्ट का नाश होता है, नि:संतानों को पुत्र की प्राप्ति होती है।

गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर
गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियां तथा चौबीस सिद्धियां कहा जाता है। गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर 24 शक्ति बीज हैं। गायत्री मंत्र की उपासना करने से उन मंत्र शक्तियों का लाभ और सिद्धियां मिलती हैं। गायत्री मंत्र में चचौबीस अक्षरों के चौबीस देवता हैं यह चौबीस अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं। यही कारण है कि ऋषियों ने गायत्री मंत्र को भौतिक जगत में सभी प्रकार की मनोकामना को पूर्ण करने वाला बताया है। उन शक्तियों के द्वारा क्या - क्या लाभ मिल सकते हैं, उनका वर्णन इस प्रकार हैं–
  1. तत्: देवता - गणेश, सफलता शक्ति। फल : कठिन कामों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।
  2. स: देवता - नरसिंह, पराक्रम शक्ति। फल : पुरुषार्थ, पराक्रम, वीरता, शत्रुनाश, आतंक - आक्रमण से रक्षा।
  3. वि: देवता - विष्णु, पालन शक्ति। फल : प्राणियों का पालन, आश्रितों की रक्षा, योग्यताओं की वृद्धि।
  4. तु: देवता - शिव, कल्याण शक्ति। फल : अनिष्ट का विनाश, कल्याण की वृद्धि, निश्चयता, आत्मपरायणता।
  5. व: देवी - श्रीकृष्ण, योग शक्ति। फल : क्रियाशीलता, कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति, आत्मनिष्ठा।
  6. रे: देवी - राधा, प्रेम शक्ति। फल : प्रेम - दृष्टि, द्वेषभाव की समाप्ति।
  7. णि: देवता - लक्ष्मी, धन शक्ति। फल : धन, पद, यश और भोग्य पदार्थों की प्राप्ति।
  8. यं: देवता - अग्नि, तेज शक्ति। फल : प्रकाश, शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि, प्रतिभाशाली और तेजस्वी होना।
  9. भ : देवता - इन्द्र, रक्षा शक्ति। फल : रोग, हिंसक चोर, शत्रु, भूत - प्रेतादि के आक्रमणों से रक्षा।
  10. र्गो : देवी - सरस्वती, बुद्धि शक्ति। फल: मेधा की वृद्धि, बुद्धि में पवित्रता, दूरदर्शिता, चतुराई, विवेकशीलता।
  11. दे : देवी - दुर्गा, दमन शक्ति। फल : विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन, शत्रुओं का संहार।
  12. व : देवता - हनुमान, निष्ठा शक्ति। फल : कर्तव्यपरायणता, निष्ठावान, विश्वासी, निर्भयता एवं ब्रह्मचर्य - निष्ठा।
  13. स्य : देवी - पृथिवी, धारण शक्ति। फल : गंभीरता, क्षमाशीलता, भार वहन करने की क्षमता, सहिष्णुता, दृढ़ता, धैर्य।
  14. धी : देवता - सूर्य, प्राण शक्ति। फल : आरोग्य - वृद्धि, दीर्घ जीवन, विकास, वृद्धि, उष्णता, विचारों का शोधन।
  15. म : देवता - श्रीराम, मर्यादा शक्ति। फल : तितिक्षा, कष्ट में विचलित न होना, मर्यादापालन, मैत्री, सौम्यता, संयम।
  16. हि : देवी - श्रीसीता, तप शक्ति। फल: निर्विकारता, पवित्रता, शील, मधुरता, नम्रता, सात्विकता।
  17. धि : देवता - चन्द्र, शांति शक्ति। फल : उद्विग्नता का नाश, काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिन्ता का निवारण, निराशा के स्थान पर आशा का संचार।
  18. यो : देवता - यम, काल शक्ति। फल : मृत्यु से निर्भयता, समय का सदुपयोग, स्फूर्ति, जागरुकता।
  19. यो : देवता - ब्रह्मा, उत्पादक शक्ति। फल: संतानवृद्धि, उत्पादन शक्ति की वृद्धि।
  20. न: देवता - वरुण, रस शक्ति। फल : भावुकता, सरलता, कला से प्रेम, दूसरों के लिए दयाभावना, कोमलता, प्रसन्नता, आर्द्रता, माधुर्य, सौन्दर्य।
  21. प्र :देवता - नारायण, आदर्श शक्ति। फल :महत्वकांक्षा - वृद्धि, दिव्य गुण-स्वभाव, उज्जवल चरित्र, पथ - प्रदर्शक कार्यशैली।
  22. चो : देवता - हयग्रीव, साहस शक्ति। फल : उत्साह, वीरता, निर्भयता, शूरता, विपदाओं से जूझने की शक्ति, पुरुषार्थ।
  23. द : देवता - हंस, विवेक शक्ति। फल : उज्जवल कीर्ति, आत्म - संतोष, दूरदर्शिता, सत्संगति, सत् - असत् का निर्णय लेने की क्षमता, उत्तम आहार-विहार।
  24. यात् : देवता - तुलसी, सेवा शक्ति। फल : लोकसेवा में रुचि, सत्यनिष्ठा, पातिव्रत्यनिष्ठा, आत्म - शान्ति, परदु:ख - निवारण।

गायत्री उपासना से हर कार्य संभव
गायत्री, गीता, गंगा और गौ यह भारतीय संस्कृति की चार आधार शिलाएं हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य को अपने कल्याण के लिए गायत्री और ॐ का उच्चारण करना चाहिए। वेदों में माँ गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्म तेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। इनकी उपासना से मनुष्य को यह सब आसानी से प्राप्त हो जाता हैं।

गायत्री मंत्र का लाभ
महाभारत के रचयिता वेद व्यासजी गायत्री की महिमा का यशोगान करते हुए कहते हैं कि जैसे फूलों में शहद, दूध में घी होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार देवी गायत्री हैं। यदि गायत्री को सिद्ध कर लिया जाए तो यह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय के समान हैं। गायत्री मंत्र से आध्यत्मिक चेतना विकास होता हैं एवं इस मंत्र का श्रद्धा पूर्वक निरंतर जप करने से सभी कष्टों का निवारण होता हैं एवं माँ उसके चारों ओर रक्षा-कवच का निर्माण स्वयं करती हैं।योगपद्धति में भी माँ गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता हैं।


देवी और देवताओं के गायत्री मंत्र
  1. काली :- ॐ कालिकायै च विद्महे, स्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात् ।।
  2. कृष्ण :- ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो कृष्ण प्रचोदयात् ।।
  3. गणेश:- ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।।
  4. दुर्गा :- ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्ये च धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ।।
  5. राम :- ॐ दशरताय विद्महे, सीता वल्लभाय धीमहि, तन्नो रामा: प्रचोदयात् ।।
  6. रुद्र :- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् ।।
  7. लक्ष्मी:- ॐ महादेव्यै च विद्महे, विष्णुपत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।।
  8. विष्णु:- ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।।
  9. सरस्वती :- ॐ वाग्देव्यै च विद्महे, कामराजाय धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात् ।
  10. हनुमान :- ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ।।
इस तरह गायत्री मंत्र का जप
गायत्री मंत्र के जप से कई प्रकार का लाभ मिलता है। यह मंत्र कहता है 'उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।' यानी इस मंत्र के जप से बौद्धिक क्षमता और मेधा शक्ति यानी स्मरण की क्षमता बढ़ती है। इससे व्यक्ति का तेज बढ़ता है साथ ही दुःखों से छूटने का रास्ता मिलता है। गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त से एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मौन मानसिक जप कभी भी कर सकते हैं लेकिन रात्रि में इस मंत्र का जप नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि रात में गायत्री मंत्र का जप लाभकारी नहीं होता है। आर्थिक मामलों में परेशानी आने पर गायत्री मंत्र के साथ श्रीं का संपुट लगाकर जप करने से आर्थिक बाधा दूर होती है। छात्रों के लिए यह मंत्र बहुत ही फायदेमंद है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है, इसलिऐ उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है। नियमित 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से बुद्धि प्रखर और किसी भी विषय को लंबे समय तक याद रखने की क्षमता बढ़ जाती है। यह व्यक्ति की बुद्धि और विवेक को निखारने का भी काम करता है।

गायत्री जयन्ती को क्या करें
  1. अन्न का दान करें।
  2. इस दिन भंडारा करायें। लोगों को शीतल जल पिलायें। घर की छत पर जल से भरा पात्र रखें जिससे चिड़ियों के कंठ तृप्त हो सकें।
  3. गायत्री मन्त्र का जप करके हवन करें।
  4. गुड़ और गेहूं का दान करें।
  5. धार्मिक पुस्तक का दान करें।
  6. पवित्र नदी में स्नान करें।
  7. फलाहार व्रत रहें।
  8. श्री आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करें।
  9. सत्य बोलनें का प्रयास करें।
  10. सूर्य पूजा करें।


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गंगा दशहरा का महत्व और पूजन की विधि



गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है, यह उत्तराखंड राज्य के गंगोत्री नामक स्थान से निकलते हुए गढ़मुकेश्वर, हरिद्वार, ऋषिकेश, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना सहित विभिन्न नगरों से निकलते हुए गंगासागर नामक तीर्थ स्थान पर समुद्र से मिल जाती है कई महत्वपूर्ण स्थानों से होकर गुजरती है। हिन्दू धर्म में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है और मां का स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि राजा भगीरथ के पूर्वजों को श्राप मिला था, जिसकी वजह से उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता गंगा ने उन्हें दर्शन दिए। राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न ने कहा मां गंगा ने कहा कि जिस समय मैं पृथ्वीतल पर गिरूं, उस समय मेरे वेग को कोई संभालने वाला होना चाहिए। ऐसा न होने पर पृथ्वी को फोड़कर मैं रसातल में चली जाऊंगी। इसके बाद भगीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की। भगवान शिव प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने के लिए तैयार हो जाते हैं। गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ देते हैं। इस प्रकार गंगा के जल से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल हो जाते हैं। पृथ्वी पर आने से पहले, मां गंगा भगवान ब्रह्मा के कमंडल में रहती थीं। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगा का जल पुण्य देता है और पापों का नाश करता है।
ganga-dussehra-celebration
प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है, इस लिए इसे जेठ का दशहरा भी कहा जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार, गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को निकट की किसी भी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। इस दिन ध्यान व दान करना चाहिए। इससे सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यह मान्यता है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में भागीरथी की तपस्या के फलस्वरूप स्वर्ग से गंगा का धरती पर आगमन हुआ था। इसे हम गंगावतरण के नाम से भी जानते हैं। यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस दिन गंगा में स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप-उपासना और उपवास किया जाय तो समस्त पाप दूर होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान विष्णु के चरणों से निकली और शिव की जटाओं में लिपटी गंगा के जल में डुबकी लगाने से मनुष्य को विष्णु और शिव का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है। इस दिन सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दोगुना फल प्राप्त होता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। मोक्षदायिनी मां गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है। गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए। दस वस्तुओं से ही पूजन भी करना चाहिए। गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी दस प्रकार के दोषों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं अवैध संबंध, अकारण जीवों को कष्ट पहुंचाने, असत्य बोलने व धोखा देने से जो पाप लगता है, वह पाप भी गंगा 'दसहरा' के दिन गंगा स्नान से धुल जाता है।


गंगा पूजन की विधि
गंगा दशहरा के दिन गंगा तटवर्ती प्रदेश में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप के किसी भी जलाशय या घर के शुद्ध जल से स्नान करके सुवर्णादि के पात्र में त्रिनेत्र, चतुर्भुज, सर्वावयवभूषित, रत्नकुम्भधारिणी, श्वेत वस्त्रादि से सुशोभित तथा वर और अभयमुद्रा से युक्त श्रीगंगा जी की प्रशान्त मूर्ति अंकित करें। अथवा किसी साक्षात् मूर्ति के समीप बैठ जाएं। फिर 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः' से आवाहनादि षोडषोपचार पूजन करें। इसके उपरान्त 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै स्वाहा' से हवन करें। तत्पश्चात 'ऊँ नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं (वाक्-काम-मायामयि) हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।' इस मंत्र से पांच पुष्पाञ्जलि अर्पण करके गंगा को भूतल पर लाने वाले भगीरथ का और जहाँ से वे आयी हैं, उस हिमालय का नाम- मंत्र से पूजन करें। फिर 10 फल, 10 दीपक और 10 सेर तिल- इनका 'गंगायै नमः' कहकर दान करें। साथ ही घी मिले हुए सत्तू और गुड़ के पिण्ड जल में डालें। सामर्थ्य हो तो कच्छप, मत्स्य और मण्डूकादि भी पूजन करके जल में डाल दें। इसके अतिरिक्त 10 सेर तिल, 10 सेर जौ, 10 सेर गेहूँ 10 ब्राह्मण को दें। इतना करने से सब प्रकार के पाप समूल नष्ट हो जाते हैं और दुर्लभ-सम्पत्ति प्राप्त होती है।

जेठ/गंगा दशहरा स्नान कब है - 1 जून 2020
गंगा दशहरा कब मनाया जाता है - प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है।


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नारियल का दूध



आज विश्व में दूध का प्रचलन इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग गाय, भैंस, बकरी, भेड़ यहां तक कि पैकेट बंद सिंथेटिक दूध का प्रयोग अधिक से अधिक करने लगे हैं जहां आज शरीर में बीमारियां पैदा करने के लिए यह दूध काफी हद तक जिम्मेदार है, वहीं नारियल का दूध ना केवल सेहत के लिए अच्छा है बल्कि स्वाद में भी दूध से कहीं बेहतर है। नारियल की अपनी कहानी है। जब यह पहले-पहल अमेरिका पहुंचा, तो उसके रेशेदार और फिर कठोर आवरण को देखकर लोगों ने मान लिया कि यह बेकार फल है। अमेरिका में जिन दिनों यह उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों हवाई द्वीप में माताएं नारियल का दूध अपने स्वस्थ बच्चों को पिला रहीं थी।

नारियल के दूध को मां के दूध जितना फायदेमंद होता है। मां के दूध को सर्वाधि‍क पोषक माना गया है लेकिन इसके बाद नारियल के दूध को दुनिया के सर्वाधिक फायदेमंद पेय के रूप में स्वीकार किया गया है। नारियल के दूध का इस्तेमाल खाना पकाने में भी किया जाता है। मलेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका और वियतनाम जैसे देशों में शिशु को मां का दूध न मिल पाने की स्थिति में गाय के दूध की जगह नारियल का दूध दिया जाता है। सीडीबी अब नारियल के दूध को प्राकृतिक स्वास्थ्य पेय के रूप में पेश करने की तैयारी कर रहा है। पके हुए नारियल के गूदे से नारियल का दूध बनाया जाता है। कई देशो में इसे नारियल का दूध कहते हैं, जबकि कई अन्य देशों में इसे नारियल रस भी कहा जाता है।

अब विश्व भर के पोषण विज्ञानी यह स्वीकार करने लगे हैं कि नारियल का दूध पोषण की दृष्टि से पूर्ण आहार है। उसकी समानता में बहुत कम चीजें ठहर पाती हैं। इसके साथ ही, लोग यह भी मानने लगे हैं कि पेट के अल्सर, कब्ज, कोलाइटिस और कमजोर पाचन-शक्ति वालों के लिए यह बड़ा ही हितकारी है। प्राœतिक आहारों में ऐसे बहुत कम आहार मिलेंगे जिनमें इतना विटामिन बी-1 होता, जितना नारियल के दूध में होता है। यह सभी जानते हैं कि पाचन-क्रिया की स्वस्थ यांत्रिकता में इस विटामिन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। जहां-जहां भी नारियल होता है, वहां के मूलवासियों के लिए यह एक अनिवार्य आहार माना जाता है। लोग इसे सर्वरोगहारी फल मानते हैं।

यौवन बनाये रखने की आकांक्षा रखने वालों के लिए यह एक बड़े महत्व की बात है कि नारियल का दूध विटामिन-ए का बहुत अच्छा स्रोत है। रसायन विज्ञान वेत्ताओं की मान्यता है कि नारियल और नारियल के दूध के आहार से आदमी पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है परन्तु, सभ्यता ने हमारे जीवन में जो गुत्थियां उत्पन्न कर दी हैं, उनके कारण सभ्य कहे जाने वाले लोगों के लिए यह शक्य नहीं हैं कि वे मात्र नारियल अथवा उसके उत्पादों पर रह जायें, पर उष्ण कटि बंधीय प्रदेशों के निवासियों के लिए नारियल का आहार एक स्वाभाविक आहार है।

प्रायः सभी आवश्यक खनिज लवण, कैल्शियम, फोस्फोरस, सोडियम, क्लोरीन, आयोडीन, सल्फर इसमें उपलब्ध हैं। खनिज लवणों के साथ ही विटामिनों की दृष्टि से भी यह फल किसी से कम नहीं है। पेड़ का पका नारियल धूप के सम्पर्क के कारण भी एक स्वास्थ्यदायक आहार हो जाता है। उष्ण कटिबंध की कड़ी धूप इतने कठोर आवरण के बावजूद, इसके ॉदय तक प्रविष्ट हो जाती है और गूदे को स्वास्थ्य के लिए हितकारी बनाती है। नारियल के दूध ने अनेक शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर आœष्ट किया है। उनके विश्लेषण से यह बात ज्ञात हुई है कि नारियल के दूध में 5 प्रतिशत पानी होता है और 25 प्रतिशत चिकनाई। इसके अतिरिक्त इसमें 19 प्रतिशत कार्बोहाइडेट तथा 4 प्रतिशत प्रोटीन होता है। यहां ध्यान देने लायक यह बात है कि नारियल के दूध में प्रोटीन और कोर्बोहाइड्रेट भले ही कम हो, पर खनिज लवणों की मात्रा बहुत अधिक होती है।

नारियल के दूध में अपेक्षाकृत कम प्रोटीन होने और स्वास्थ्यदायक खनिज लवणों के आधिक्य के कारण अधिक प्रोटीन से होने वाले नुकसानों का डर नहीं होता। इस दूध में महत्वपूर्ण एमिनो-एसिड भी होते हैं। अन्य खनिज लवणों के अतिरिक्त नारियल में कैल्शियम और फोस्फोरस की अधिक मात्रा होती है। कैल्शियम का दांतों, हड्डियों और मांसपेशियों को सशक्त करने में बड़ा महत्व पूर्ण योगदान होता है। यह रक्त के गाढ़ेपन के लिए भी उत्तरदायी होता है। पर, शरीर इसे तभी आत्मसात् कर पाता है, जब इसे पर्याप्त फोस्फोरस का सहयोग मिले। जो स्वास्थ्याकांक्षी स्वास्थ्य की दृष्टि से कैल्शियम बहुल आहार लेते हैं, उनको जान लेना चाहिये कि पर्याप्त मात्रा में फोस्फोरस के अभाव में उनका प्रयास निष्फल ही होने वाला है। यह एक महत्वपूर्ण बात है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिये। पर्याप्त मात्रा में नारियल का दूध पीने वाला बबुद्धिमान आदमी इस बात पर परम आश्वस्त होता है कि उसे कैल्शियम और फोस्फोरस का संयोग परम सुस्वादु रूप में मिल रहा है। पशुजन्य दूध से होने वाले नुकसान जैसे कफ विकार, यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल तथा दूध से होने वाली एलर्जी आदि का खतरा नारियल के दूध में नहीं है। इसके दूध के खट्टा होने की कोई आशंका नहीं रहती। अतः यह अपेक्षाकृत अधिक समय तक ताजा बना रहता है। 

नारियल दूध कैसे बनाएं?
 पानी वाला कच्चा नारियल तोड़कर इसकी गिरी निकाल लें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी के साथ मिक्सी में चला ले। चलनी में छान लें। नारियल दूध तैयार है। चिकनाई एवं गाढ़े पतले के हिसाब से पानी की मात्रा डालें। इस दूध को मीठा करने के लिए भीगे हुए खजूर का प्रयोग करें। इस दूध की खीर बनाने के लिए पानी की मात्रा कम रखकर नारियल का दूध बनाएं इसमें फल एवं मेवा डालकर खीर तैयार करें। बच्चों के लिए इसी दूध में केला, आम, पपीता, चीकू आदि फल डालकर बेहतरीन शेक तैयार किया जा सकता है। नारियल का जल भी शीतल, स्वादिष्ट, ह्रदय के लिए हितकर, अग्निदीपक, शुक्रजनक, लघु अत्यंत वस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शांत करने वाला होता है।

नारियल के दूध के त्वचा संबंधी फ़ायदे
  1. जब बात सनबर्न को ठंडक पहुंचाने की हो तो नारियल का दूध एक अच्छा नैसर्गिक विकल्प हो सकता है। यह त्वचा को ठंडक का एहसास कराता है और साथ ही यह त्वचा पर काफ़ी सौम्य होता है। ताज़ा तैयार किए गए नारियल के दूध में कॉटन पैड डुबोएं और इसे प्रभावित हिस्से पर लगाएं।
  2. नारियल का दूध त्वचा को गहराई से मॉइस्चराइज़ करता है और शुष्क त्वचा से छुटकारा दिलाता है। नारियल का ताज़ा दूध निकालें और कॉटन पैड्स की मदद से इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाएं। चेहरा धोने से पहले इसे कई बार लगाने की कोशिश करें, क्योंकि यह बहुत जल्दी सूख जाता है। एक कप नारियल दूध में, आधा कप गुलाब जल मिलाएं और इसे अपने नहाने के पानी में मिलाएं। यह निश्चित तौर पर आपकी त्वचा के खोए हुए मॉइस्चर को वापस लौटाएगा।
  3. नारियल का दूध हर तरह की त्वचा के लिए नॉन-ड्राइंग मेकअप रिमूवर बन सकता है। कॉटन बॉल को ताज़ा नारियल दूध में डुबोकर हल्के हाथों से मेकअप निकालें। दूध में मौजूद फ़ैटी एसिड्स ज़िद्दी से ज़िद्दी मेकअप के निशानों को हटाएंगे और त्वचा को पोषित करेंगे।
  4. नारियल के दूध में बड़े पैमाने पर विटामिन सी और ई होता है, जो त्वचा के लचीलेपन को बनाए रख सकता है। नारियल के दूध से चेहरे पर मसाज करने से त्वचा मुलायम बनती है और झुर्रियों से छुटकारा मिलता है।
  5. संवेदनशील से लेकर ऑयली त्वचा तक नारियल का दूध हर तरह की त्वचा के लिए उपयुक्त है। अपने मॉइस्चराइज़िंग और ठंडक देनेवाले गुणों की वजह से यह शुष्क त्वचा और एक्ज़िमा, सोराइसिस जैसी समस्याओं से भी छुटकारा पाने में मदद करता है।
  6. नारियल के दूध में मौजूद ऐसे कई सारे पोष्टिक आहार होते हैं जो बालों को पोषण देते हैं। बालों को धोने से पहले 20- 30 मिनट तक अच्छे से मालिश करें।
  7. समय-समय पर नारियल के दूध को बालों में लगाने से पोषण वापस आ सकता है। इसके साथ ही एंटी- इंफ्लामेट्री खूबी होने के कारण रूसी से भी राहत मिलती है। नारियल का दूध त्वचा को पोषण देता है।
  8. यह एंटीऑक्सीडेंट जैसे कि विटामिन सी और मिनरल्स जैसे कि कॉपर से भरपूर है, नारियल के दूध से मालिश करने से त्वचा में खिंचाव बना रहता है और फ्री रेडिकल से भी त्वचा का बचाव रहता है। चेहरे पर नारियल के दूध की कुछ बूंदों को फेस मास्क 15 मिनट तक लगाएं। ऐसा हफ्ते में 2 से 3 बार करें और आपको अपनी त्वचा में फर्क अपने आप नज़र आ जाएगा।
  9. रोजाना लेकिन नियमित रूप से नारियल के दूध का सेवन करने से कोलेस्टॉल कंट्रोल में रहता है। इसका सेवन करने से खराब कोलेस्टॉल की मात्रा कम रहती है और अच्छे कोलेस्टॉल का लेवल बढ़ जाता है। सही मात्रा में नारियल के दूध का सेवन करने से आपके लिपिड लेवल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।


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योगाभ्यास के लिए सामान्य दिशा निर्देश




yogabhyas ke liye samanya dishanirdesh

योगाभ्यास करते समय योग के अभ्यासी को नीचे दिए गए दिशा निर्देशों एवं सिद्धांतों का पालन अवश्य करना चाहिए:
अभ्यास से पूर्व

  1. शौच - शौच का अर्थ है शोधन, यह योग अभ्यास के लिए एक महत्वपूर्ण एवं पूर्व अपेक्षित क्रिया है। इसके अन्तर्गत आसपास का वातावरण, शरीर एवं मन की शुद्धि की जाती है।
  2. योग अभ्यास शांत वातावरण में आराम के साथ शरीर एवं मन को शिथिल करके किया जाना चाहिए।
  3. योग अभ्यास खाली पेट अथवा अल्पाहार लेकर करना चाहिए। यदि अभ्यास के समय कमजोरी महसूस हो तो गुनगुने पानी में थोड़ी सी शहद मिलाकर लेना चाहिए।
  4. योग अभ्यास मल एवं मूत्र का विसर्जन करने के उपरान्त प्रारम्भ करना चाहिए।
  5. अभ्यास करने के लिए चटाई, दरी, कंबल अथवा योग मैट का प्रयोग करना चाहिए।
  6. अभ्यास करते समय शरीर की गतिविधि आसानी से हो, इसके लिए सूती के हल्के और आरामदायक वस्त्र पहनना चाहिए।
  7. थकावट, बीमारी, जल्दबाजी एवं तनाव की स्थिति में योग नहीं करना चाहिए।
  8. यदि पुराने रोग, पीड़ा एवं हृदय संबंधी समस्याएं हों तो ऐसी स्थिति में योग अभ्यास शुरू करने के पूर्व चिकित्सक अथवा योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
  9. गर्भावस्था एवं मासिक धर्म के समय योग करने से पहले योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
अभ्यास के समय

  1. अभ्यास सत्र प्रार्थना अथवा स्तुति से प्रारम्भ करना चाहिए क्योंकि प्रार्थना अथवा स्तुति मन एवं मस्तिष्क को विश्रांति प्रदान करने के लिए शान्त वातावरण निर्मित करते हैं।
  2. योग अभ्यास आरामदायक स्थिति में शरीर एवं श्वास-प्रश्वास की सजगकता के साथ धीरे-धीरे प्रारम्भ करना चाहिए।
  3. अभ्यास के समय श्वास-प्रश्वास की गति नहीं रोकनी चाहिए, जब तक कि आपको ऐसा करने के लिए विशेष रूप से कहा न जाए।
  4. श्वास-प्रश्वास सदैव नासारन्ध्रों से ही लेना चाहिए, जब तक कि आपको अन्य विधि से श्वास प्रश्वास लेने के लिए न कहा जाए।
  5. शरीर को सख्त नहीं करें अथवा शरीर को किसी भी प्रकार के झटके से बचाएं।
  6. अभ्यास के समय शरीर को शिथिल रखें, शरीर को किसी भी प्रकार के झटके से बचाएं।
  7. अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के अनुसार ही योग अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के अच्छे परिणाम आने में कुछ समय लगता है, इसलिए लगातार और नियमित अभ्यास बहुत आवश्यक है।
  8. प्रत्येक योग अभ्यास के लिए ध्यातव्य निर्देश एवं सावधानियां तथा सीमाएं होती हैं। ऐसे ध्यातव्य निर्देशों को सदैव अपने मन में रखना चाहिए।
  9. योग सत्र का समापन सदैव ध्यान एवं गहन मौन तथा शांति पाठ से करना चाहिए।
अभ्यास के बाद
 अभ्यास के 20-30 मिनट के बाद स्नान करना चाहिए।
अभ्यास के 20-30 मिनट बाद ही आहार ग्रहण करना चाहिए, उससे पहले नहीं।

सात्विक विचार के लिए भोजन
आहार संबंधी दिशा निर्देश - सुनिश्चित करें कि अभ्यास के लिए शरीर एवं मन ठीक प्रकार से तैयार हैं। अभ्यास के बाद आमतौर पर शाकाहारी आहार ग्रहण करना श्रेयस्कर माना जाता है। 30 वर्ष की आयु से ऊपर के व्यक्ति के लिए बीमारी या अत्यधिक शारीरिक कार्य अथवा श्रम की स्थिति को छोड़कर एक दिन में दो बार भोजन ग्रहण करना पर्याप्त होता है।
General guidelines for yoga practice
योग किस प्रकार सहायता कर सकता है?
 योग निश्चित रूप से सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति प्रदान करने का साधन है। वर्तमान समय में हुए चिकित्सा शोधों ने योग से होने वाले कई शारीरिक और मानसिक लाभों के रहस्य प्रकट किए हैं। यही नहीं लाखों योग अभ्यासियों के अनुभव के आधार पर इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि योग किस प्रकार सहायता कर सकता है।
  • योग शारीरिक स्वास्थ्य, स्नायुतंत्र एवं कंकाल तन्त्र को सुचारू रूप से कार्य करने और हृदय तथा नाडियों के स्वास्थ्य के लिए हितकर अभ्यास है।
  • यह मधुमेह, श्वसन संबधी विकार, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप और जीवन शैली संबंधी कई प्रकार के विकारों के प्रबंधन में लाभकर है।
  • योग अवसाद, थकान, चिंता संबंधी विकार और तनाव को कम करने में सहायक है।
  • योग मासिक धर्म को नियमित बनाता है।
  • संक्षेप में यदि यह कहा जाए कि योग शरीर एवं मन के निर्माण की ऐसी प्रक्रिया है, जो समृद्ध और परिपूर्ण जीवन की उन्नति का मार्ग है, न कि जीवन के अवरोध का।


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अधोमुखश्वानासन योग - परिचय, विधि एवं लाभ



अधोमुखश्वानासन 3 शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है 'अधोमुख' जिसका अर्थ होता है नीचे की तरफ मुंह करना। जबकि दूसरा शब्द है 'श्वान' जिसका अर्थ कुत्ता होता है। तीसरा शब्द है 'आसन' जिसका अर्थ है बैठना। अधोमुख श्वानासन को डाउनवर्ड फेसिंग डॉग पोज भी कहा जाता है। अधोमुख श्वानासन को भारतीय योग में बड़ा ही अहम स्थान हासिल है। अधोमुख श्वानासन को अष्टांग योग का बेहद महत्वपूर्ण आसन माना जाता है। ये आसन सूर्य नमस्कार के 7 आसनों में से एक है। योग की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसके आसन प्रकृति में पाई जाने वाली मुद्राओं और आकृतियों से प्रभावित होते हैं। योग विज्ञान ने अधोमुख श्वानासन को कुत्ते या श्वान से सीखा है। कुत्ते अक्सर इसी मुद्रा में शरीर की थकान मिटाने के लिए स्ट्रेचिंग करते हैं। यकीन जानिए, शरीर में स्ट्रेचिंग के लिए बताए गए सर्वश्रेष्ठ आसनों में से एक है। इस योगासन को करने की प्रक्रिया बहुत आसान है और कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने योगाभ्यास करना शुरू ही किया है, यह आसान कर सकता है। यह योगासन अत्यंत लाभदायक है और इसे प्रतिदिन के योगाभ्यास में अवश्य जोड़ना चाहिए।
Adhomukhswanasana
अधोमुख श्वानासन करने के फायदे/ अधोमुखश्वानासन के लाभ
  1. इंसोमेनिया दूर करने में - अधोमुख श्वानासन करने से पीठ दर्द और कमर का दर्द, थकान, सिर दर्द और अनिद्रा की बीमारी दूर हो जात है। इसके अलावा यह आसन उच्च रक्त चाप, अस्थमा, साइटिका आदि रोग भी दूर करने में सहायक होता है।
  2. एंग्जाइटी को करे कंट्रोल - ये आसन आपकी रिलैक्स रहने में मदद करता है और दिमाग को शांति प्रदान करता है। अधोमुख श्वानासन एंग्जाइटी से लड़ने में भी बहुत मददगार साबित हो सकता है। इस आसन के अभ्यास के दौरान गर्दन और सर्विकल स्पाइन में खिंचाव पड़ता है। ये स्ट्रेस को दूर करने में काफी मदद करता है।
  3. एनर्जी प्रदान करने में - अधोमुख श्वानासन करने से शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होता है। इसके अलावा यह पूरे शरीर का कायाकल्प करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा यह आसन महिलाओं में मेनोपॉज के लक्षणों को दूर करने में मदद करता है।
  4. चिंता दूर करने में - अधोमुख श्वानासन करने से दिमाग शांत रहता है और हर तरह की चिंता से मुक्ति मिलती है। इस आसन को करने से गर्दन और गर्दन की हड्डी में खिंचाव उत्पन्न होता है जिसके कारण मस्तिष्क से चिंता दूर हो जाती है।
  5. पाचन सुधारने में - हालांकि अधोमुख श्वानासन में शरीर को आधा ही मोड़ा जाता है लेकिन इससे पेट की मांसपेशियां पाचन तंत्र के अंगों जैसे लिवर, किडनी और प्लीहा पर दबाव डालकर इसे संकुचित करती हैं जिसके कारण पाचन क्रिया बेहतर होती है।
  6. पेट की निचली मांसपेशियों को मजबूत बनाए - अधोमुख श्वानासन में बनने वाली शरीर की स्थिति को अगर ठीक उल्टा किया जाए तो नौकासन बन जाता है। हम सभी जानते हैं कि नौकासन शरीर में पेट की निचली मांसपेशियों को मजबूत करने के साथ ही रीढ़ को भी सहारा देता है। ये योगाभ्यास करने वालों को भी वैसे ही लाभ मिलते हैं। ये इन मांसपेशियों को मजबूत बनाने और खिंचाव पैदा करने में मदद करता है।
  7. रक्त संचार बढ़ाए - इस बात की तरफ शायद ही आपका ध्यान जाए। लेकिन अधोमुख श्वानासन में सिर दिल से नीचे की तरफ होता है जबकि आपके हिप्स ऊपर की तरफ उठे हुए होते हैं। इस आसन के अभ्यास से गुरुत्व बल की मदद से सिर की ओर नए रक्त की आपूर्ति बढ़ती है। इसीलिए ये आसन रक्त संचार बढ़ाने में मदद कर पाता है।
  8. सुधरता है पाचनतंत्र - अधोमुख श्वानासन में भले ही शरीर पूरी तरह से न मुड़ता हो, लेकिन फिर भी इस आसन से शरीर के भीतरी अंगों को अच्छी मसाज मिलती है। टांगें मुड़ने के कारण हमारे पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ता है। इस आसन से प्रभावित होने वाले अंगों में लीवर, किडनी और स्पलीन या तिल्ली शामिल हैं।
  9. हाथों और पैरों को टोन करने में - अधोमुख श्वानासन को करने के दौरान शरीर का पूरा भार हाथों और पैरों पर आकर टिकता है। इसलिए यह हाथों, पैरों एवं अन्य अंगों को टोन करने का काम करता है और उन्हें संतुलन की अवस्था में रखता है। यह आसन हाथ, पैरों के अलावा कंधे, बांहों और सीने को भी टोन करने के साथ मजबूती प्रदान करता है।
अधोमुखश्वानासन योग - Adho Mukha Svanasana
अधोमुख श्वानासन करने का सही तरीका
  1. अधोमुख श्वानासन देखने में बिल्कुल वैसा ही दिखता है जब कोई कुत्ता आगे की तरफ झुकता है। इस आसन को करने से हमें कई जबरदस्त फायदे होते हैं, जिन्हें पाने के लिए ये जरूरी है कि आप रोज इस आसन का नियमित रूप से अभ्यास करें। इस आसन की सबसे अच्छी बात यही है कि इस आसन को बेहद आसानी से कोई भी कर सकता है।
  2. सबसे पहले जमीन पर एकदम सीधे खड़े हो जाएं और उसके बाद दोनों हाथों को आगे करते हुए नीचे जमीन की ओर झुक जाएं।
  3. झुकते समय आपके घुटने सीधे होने चाहिए और कूल्हों के ठीक नीचे होने चाहिए जबकि आपके दोनों हाथ कंधे के बराबर नहीं बल्कि इससे थोड़ा सा पहले झुका होना चाहिए।
  4. अपने हाथों की हथेलियों को झुकी हुई अवस्था में ही आगे की ओर फैलाएं और उंगलियां समानांतर रखें।
  5. श्वास छोड़ें और अपने घुटनों को अधोमुख श्वानासन मुद्रा के लिए हल्का सा धनुष के आकार में मो़ड़े और एड़ियों को जमीन से ऊपर उठाएं।
  6. इस प्वाइंट पर अपने कूल्हों को पेल्विस से पर्याप्त खींचें और हल्का सा प्यूबिस की ओर दबाएं।
  7. हाथों को पूरी तरह जमीन पर कंधों के नीचे से आगे की ओर फैलाए रखें, लेकिन उंगलियां जमीन पर फैली होनी चाहिए।
  8. इसके बाद अपने घुटनों को जमीन पर थोड़ा और झुकाएं और कूल्हों को जितना संभव हो ऊपर उठाएं।
  9. सिर हल्का सा जमीन की ओर झुका होना चाहिए और पीठ के लाइन में ही होनी चाहिए। अब आप पूरी तरह अधोमुख श्वानासन मुद्रा में हैं।
अधोमुख श्वान आसन की सावधानियाँ - अगर आप उच्च रक्तचाप, आँखों की केशिकाएँ कमजोर है कंधे की चोट या दस्त से पीड़ित हैं तो यह आसन न करें रक्तचाप

अधोमुख श्वानासन करने से पहले ध्यान रखने वाली बातें -
  1.  अधोमुख श्वानासन का अभ्यास सुबह के वक्त ही किया जाना चाहिए। लेकिन अगर आप शाम के वक्त ये आसन कर रहे हों तो जरूरी है कि आपने भोजन कम से कम 4 से 6 घंटे पहले कर लिया हो।
  2. ये भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आसन करने से पहले आपने शौच कर लिया हो और पेट एकदम खाली हो।
अधोमुख श्वान आसन से पहले किये जाने वाले आसन
धनुरासन और दण्डासन
अधोमुख श्वान आसन के बाद किये जाने वाले आसन
अर्धपिंचा मयुरासन, चतुरंग दण्डासन और ऊर्ध्व मुख श्वानासन


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गुटनिरपेक्षता



द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप में परिवर्तन लाने वाले तत्वों में ‘गुटनिरपेक्षता’ का विशेष महत्व है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति का कारण कोई संयोग मात्र नहीं था, अपितु यह सुविचारित अवधारणा थी। इसका उद्देश्य नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा करना एवं युद्ध की सम्भावनाओं को रोकना था। गुटनिरपेक्ष अवधारणा के उदय के पीछे मूल धारणा यही थी कि साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उसकी स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखा जाय। आज एशिया, अफ्रिका, और लैटिंन अमेरिका के अधिकांश देश गुटनिरपेक्ष होने का दावा करने लगे है।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय दो विरोधी गुटों सोवियत गुट और अमेरिकी गुटों में विभक्त हो चुका था और दूसरी तरफ एशिया एवं अफ्रिका के राष्ट्रों का स्वतन्त्र आस्तित्व उभरने लगा। अमेरिकी गुट एशिया के इन नवोदित राष्ट्रों पर तरह-तरह के दबाव डाल रहा था ताकि वे उसके गुट में शामिल हो जाय, लेकिन एशिया के अधिकांश राष्ट्र पश्चिमी देशों की भाॅति गुटबन्दी मे विश्वास नही करते है। वे सोवियत साम्यवाद और अमेरिकी पूॅजीवाद दोनों को अस्वीकार करते थें। वे अपने आपको किसी ‘वाद’ के साथ सम्बद्ध नही करना चाहते थे और उनका विश्वास था कि उनके प्रदेश ‘तीसरी शक्ति’ हो सकते है जो गुटोंके विभाजन को अधिक जाटिल सन्तुलन में परिणत करके अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में सहायक हो सकते है। गुटों से अलग रहने की नीति - गुटनिरपेक्षतावाद एशिया के नव जागरण की प्रमुख विशेषता थी। सन् 1947 में स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत ने इस नीति का पालन करना शुरू किया; उसके बाद एशिया के अनेक देशों ने इस नीति में अपनी आस्था व्यक्त की। जैसे-जैसे अफ्रीका के देश स्वतन्त्र होते गये, वैसे-वैसे उन्होंने भी इस नीति का अवलम्बन करना शुरू किया। भारत के जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने ‘तीसरी शक्ति’ की इस धारणा को काफी मजबूत बनाया।
शीत युद्ध के राजनीतिक ध्रुवीकरण ने गुटनिरपेक्षता की समझ तैयार करने में एक उत्पे्ररक का कार्य किया। लम्बे औपनिवेशिक आधिपत्य सें स्वतन्त्र होने के लम्बे संघर्ष के बाद किसी दूसरे आधिपत्य को स्वीकार कर लेना नवोदित राष्ट्रों के लिए एक असुविधाजनक स्थिति थी। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वे एक ऐसी भूमिका की तलाश में थे जो उनके आत्मसम्मान और क्षमता के अनुरूप हो। क्षमता स्तर पर किसी एक राष्ट्र के लिए ऐसी स्वतंन्त्र भूमिका अर्जित कर पाना एक भागीरथी प्रयत्न होता, जिसकी सम्भावनाएं भी अत्याधिक सन्दिग्ध बनती। अतः आत्मसम्मान की एक अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका के लिए सामूहिक पहल न सिर्फ वांछित थी, अपितु आवश्यक थी। स्वतन्त्रता और सामूहिकता की इस मानसिकता ने गुटनिरपेक्षता की वैचारिक और राजनीतिक नींव रखी। इस प्रक्रिया को शीत युद्ध के तात्कालिक वातावरण ने गति प्रदान की।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का उदय व विकास 
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का जन्म नव साम्राज्यवादी ताकतो के विरूद्ध तीसरी दुनिया के राष्ट्रों के संगठित होने के प्रयासो से हुआ। यद्यपि आधिकारिक रूप से इसकी स्थापना वर्ष 1961 मे बेलग्रेड में आयोजित गुटनिरपेक्ष देश के प्रथम सम्मेलन के साथ हुई परन्तु इसके बीज द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ही अंकुरित हो चुके थे। इसकी एक झलक हमें एशियाई संबंध सम्मेलन से दिखाई पड़ती है।


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वारसा पैक्ट



जब पश्चिमी जर्मनी भी 9 मई 1955 को नाटो का सदस्य बना लिया गया और पश्चिमी राष्ट्रों ने जर्मनी का पुनः शस्त्रीकरण कर दिया तो इसमें सोवियत संघ तथा अन्य पूर्वी यूरोप के राष्ट्रों के लिए चिन्तित होना स्वाभाविक था। पश्चिमी शाक्तियों ने नाटो, सीटो, सेण्टो, द्वारा सोवियत संघ के इर्द-गिर्द घेरे की स्थिति पैदा कर दी थी। अतः यह स्वभाविक था कि सोवियत संघ सैनिक गठबन्धनों का उत्तर सैनिक गठबन्धन से देता।

साम्यवादी राष्ट्रों का एक सम्मेलन 11 से 14 मई 1955 को वारसा में बुलाया गया। इस सम्मेलन में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सात राष्ट्रों अल्बानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, पूर्वी जर्मनी हंगरी, पोलैण्ड तथा रोमानिया ने भाग लिया। यूगोस्लाविया ने इसमें भाग नहीं लिया। 14 मई 1955 को सम्मेलन में भाग लेने वाले राष्ट्रों ने मित्रता एवं पारस्पारिक सहयोग की सन्धि पर हस्ताक्षर किये जिसे ‘वारसा पैक्ट‘ कहा जाता है।
इस पैक्ट की मुख्य व्यवस्था धारा 3 में हैं। इसके अनुसार यदि किसी सदस्य पर सशस्त्र आक्रमण होता है तो अन्य देश उसकी सैनिक सहायता करेंगे। इसके लिए धारा 5 में एक ‘संयुक्त सैनिक कमान’ बनायी गयी। सैनिक सहयोग के अतिरिक्त वारसा पैक्ट हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों में आर्थिक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहयोग की व्यवस्था भी करती है। इसमें संन्धिकर्ता राष्ट्र पारस्पारिक संबंधों में शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिमय साधनों से सुलझाने का प्रयास करेंगे।
वारसा पैक्ट का मुख्य अंग राजनीतिक परामर्शदात्री समिति है। आवश्यकता पड़ने पर यह सहायक अंगो की स्थापना कर सकती है। प्रत्येक सदस्य राज्य का एक एक प्रतिनिधि राजनीतिक परामर्शदात्री समिति का सदस्य होता है। इसकी बैठक वर्ष में दो बार होती है। दूसरे कार्यों में सहायता करने के लिए सचिवालय है जिसका सर्वोच्च पदाधिकारी महासचिव होता है। 1989-90 में पूर्वी यूरोप में साम्यवादी व्यवस्थाओं के पतन तथा लोकतन्त्रात्मक व्यवस्थाओं के आगमन के बाद तथा शीतयुद्ध कें अंत की प्रक्रिया के साथ 31 मार्च 1991 को वारसा पैक्ट समाप्त कर दिया गया।


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उत्तर प्रदेश गुण्डा नियन्त्रण अधिनियम 1970



 UP Control of Goondas Act, 1970
UP Control of Goondas Act, 1970
 
धारा-1, इसका प्रसार सम्पूर्ण उ0प्र0 में होगा।
धारा-2, परिभाषायें -  क. जिला मजिस्ट्रेट- जिला मजिस्ट्रेट के अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अपर जिला मजिस्ट्रेट भी होगा अधिसूचना सं0 1528/6-पु0-9-30(2)(1)/83 दिनाॅंक 4 जुलाई 1991 के द्वारा राज्यपाल महोदय समस्त अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन तथा वित्त राजस्व)को क्रमशः अपनी अपनी तैनाती के जिले की सीमा के भीतर उक्त अधिनियम के अधीन जिला मजिस्ट्रेट की समस्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिये शक्ति प्रदान करते हैं।

ख. गुण्डा-गुण्डा का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है-
  1. जो स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या सरगना के रुप में भा0द0सं0 की धारा 153 या धारा 153-ख, या धारा 294 या उक्त संहिता के अध्याय 16,17,22 के अधीन दंडनीय अपराध को अभ्यस्तः करता है या करने का प्रयास करता है या करने के लिये दुष्प्रेरित करता है या
  2. जो स्त्री तथा लड़की अनैतिक व्यापार दमन अधिनियम 1956 के अधीन दंडनीय अपराध के लिये न्यायालय से सिद्धदोष हो चुका है।
  3. जो उ0प्र0 आबकारी अधिनियम 1910 या सार्वजनिक जुआ अधिनियम या आयुध अधिनियम 1959 की धारा 25,27,या धारा 29 के अधीन दंडनीय अपराध के लिये कम से कम तीन बार दंडित हो चुका हो।
  4. जिसकी सामान्य ख्याति दुस्साहसिक और समाज के लिये एक खतरनाक व्यक्ति की है या
  5. जो अभ्यस्तः महिलाओं या लड़कियों को चिढाने के लिये अश्लील टिप्पणियां करता हो।
  6. जो दलाल हो- इसके अन्तर्गत वे व्यक्ति आयेगें जो अपने लिये या दूसरों के लिये लाभ प्राप्त करते हों, प्राप्त करने के लिये सहमत होते हो या प्रयास करते हों जिससे वह किसी लोक सेवक को या सरकार, विधान मंडल, संसद के किसी सदस्य को किसी पक्षपात के द्वारा कोई कार्य करने या न करने के लिये प्रेरित करते हों।
  7. जो मकानों पर अवैध कब्जा करते हैं।
स्पष्टीकरण-‘‘मकानों पर कब्जा करने वाले से’’ तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो नाजायज/बिना अधिकार कब्जा ग्रहण करता है या ग्रहण करने का प्रयास करता है या करने के लिये सहायता करता है या दुष्प्रेरित करता है या वैध रुप से प्रवेश करके भूमि, बाग, गैरेजो को शामिल करके भवन या भवन से संलग्न बाहरी गृहों के कब्जा में अवैध रुप से बना रहता है।
धारा-3, गुण्डों का निष्कासन आदि- यदि जिला मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति गुण्डा है और जनपद में या उसके किसी भाग में उसकी गतिविधियाॅं या कार्य व्यक्तियों की जान या उनकी सम्पत्ति के लिये संत्रास,संकट अथवा नुक्सान उत्पन्न कर रही हैं या यह विश्वास करने का आधार है कि वह जनपद में या उसके किसी भाग में धारा-2, में वर्णित खण्ड-ख, के उपखण्ड-1 से 3 तक वर्णित अपराधों में लगा हुआ है अथवा उसके लगने की संभावना है और गवाह उसके डर के मारे उसके विरुद्ध गवाही देने के लिये तैयार नही है तो जिला मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को एक लिखित नोटिस के द्वारा उसके विरुद्ध लगाये आरोपों से सूचित करेगें और उसे अपना उत्तर देने के लिये अवसर प्रदान करेगें।
2. जिस व्यक्ति को नोटिस जारी किया गया है उसको किसी अधिवक्ता के द्वारा अपनी प्रतिरक्षा करने का अधिकार है और यदि वह चाहता है तो उसको व्यक्तिगत रुप से सुने जाने का भी अवसर दिया जायेगा और वह अपनी प्रतिरक्षा में गवाह भी पेश कर सकता है।
3. यदि जिला मजि0 का यह समाधान हो जाता है कि उस व्यक्ति की गतिविधियाॅं धारा-3 की उपधारा-1, के अन्तर्गत आती हैं तो वह उस व्यक्ति को अपने जनपद के किसी क्षेत्र से या जनपद से 6 माह तक के लिये निष्कासन का आदेश कर सकता है। इसके अतिरिक्त वह यह भी आदेश कर सकते हैं कि वह आदेश में निर्दिष्ट प्राधिकारी या व्यक्ति को अपनी गतिविधियों की सूचना देने अथवा उसके समक्ष उपस्थित होने अथवा उक्त दोनों कार्य करने की अपेक्षा कर सकते है।
धारा-4, निष्कासन के पश्चात अस्थाई रुप से वापिस आने की अनुमति-जिला मजि0 किसी गुण्डे के निष्कासन के बाद उसे अस्थाई रुप से उस क्षेत्र में आने की अनुमति दे सकते है जहाॅं से वह निष्कासित किया गया था।
धारा-5, आदेश की अवधि में बढ़ोत्तरी-जिला मजि0 धारा 3 के अधीन दिये गये आदेश में निर्दिष्ट अवधि को,सामन्य जनता के हित में समय-समय पर बढा सकतें है,किन्तु इस प्रकार बढायी गयी अवधि किसी भी दशा में कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न होगी।
धारा-6 , अपील- धारा 3 या 4 या 5 के अधीन दिये गये किसी आदेश से क्षुब्ध व्यक्ति ऐसे आदेश के दिनांक से 15 दिन के भीतर आयुक्त के पास अपील कर सकता है। आयुक्त अपील का निस्तारण होने तक आदेश के प्रवर्तन को स्थगित कर सकते है।
धारा-10, धारा 3 से 6 के अधीन दिये गये आदेशों का उल्लंघन करने पर- यदि कोई गुडां धारा 3,4,5,6 के अधीन दिये गये आदेशों का उल्लंघन करे तो न्यूनतम 6 माह से जो 3 वर्ष तक का हो सकता है के कठिन कारावास से और जुर्माने से दंडित किया जायेगा।
धारा-11, निष्कासित गुंडे द्वारा आदेशों का उल्लंघन करते हुये पुनः प्रवेश आदि पर उसका बल प्रयोग द्वारा हटाया जाना-
1. जिला मजिस्ट्रेट उसे गिरफतार करा सकता है और पुलिस की अभिरक्षा में उक्त आदेश में निर्दिष्ट क्षेत्र के बाहर किसी ऐसे स्थान के लिये,जैसा वह निर्देश दे हटवा सकता है।
2.कोई पुलिस अधिकारी ऐसे व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर तुरंत निकटतम मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करेगा,जो उसे जिला मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करायेगा जो पुलिस अभिरक्षा में उसे हटवा सकेगा।
3. इस धारा के उपबन्ध धारा 10 के उपबन्धों के अतिरिक्त है और धारा 10 के प्रभाव को कम नही करते।


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