एक तत्त्वबोधक प्रेरक कथा



 प्रतिष्ठानपुर नामक एक अत्यन्त विख्यात नगर था। वहॉ पर पृथ्वीरूप नामक एक अत्यन्त सुन्दर राजा था। एक बार वहाँ से कोई तत्त्वज्ञ भिक्षु जा रहा था। उसने पृथ्वीरूप राजा को देखा। उसको अत्यन्त सुन्दर देखकर उसने विचार किया कि इसके लायक ही कोई लड़की मिले और यह उससे ही विवाह करे तो ठीक होगा। उसने राजा के लोगों से कहा-'मैं राजा से मिलना चाहता हूँ, समय बता दिया जाय।' वह राजा से मिला तो राजा ने कहा- 'आपको क्या चाहिए?' उसने समझा कि भिक्षु है, कुछ लेने आया होगा। भिक्षु ने  कहा-'राजन्! मुझे तो कुछ नहीं चाहिए, परंतु तुम्हें कुछ बताने आया हूँ। तुम्हारे लायक एक कन्या है। उसका नाम है 'रूपलता' और वह अद्वितीय सुन्दरी है। वह मुक्तिपुर में रहती है। उसके पिता का नाम रूपधर' है और माता का नाम 'हेमलता' है वही तुम्हारी रानी बनने योग्य है; क्योंकि जैसी तुम्हारी सुन्दरता है, वैसी ही उसकी सुन्दरता है।'

राजा उसकी बात से प्रभावित हो गया। राजा ने मुक्तिपुर का पता लगाकर उस लड़की के साथ बात करने के लिये अपने मंत्रियों से कहा मुक्तिपुर  समुद्र का एक टापू था, अत: बहुत ढूँढ़ने के बाद ही उसका पता लग सका। उधर वह ज्ञानी भिक्षु विचारने लगा कि जैसे ही उस राजा की तरफ से मुक्तिपुर में विवाह-प्रस्ताव आयेगा तो क्या पता! रूप लता और यहाँ के लोग स्वीकार करें या न करें। वह भिक्षु एक सिद्धहस्त चित्रकार भी था। उसने राजा पृथ्वीरूप का बड़ा सुन्दर आकर्षक चित्र बनाया और मुक्तिपुर जाकर रूप लता को दिखा दिया और कह दिया-'यह प्रतिष्ठान पुरका राजा है और तुम्हारे लायक यही पति है।' इस पर रूपलता ने भी उससे ही विवाह करने की अपनी चाह माता-पिता को बता दी। इधर राजाने भी मुक्तिपुर का पता लगाकर अपने विवाह प्रस्ताव वहाँ भिजवाया। रूपलता तो उसका चित्र पहले ही देख चुकी थी। माता-पिता ने भी प्रस्ताव को स्वीकार कर रूपलता का विवाह पृथ्वीरूप राजा के साथ कर दिया। वहाँ से विवाह कर नवविवाहिता पत्नी को लेकर राजा जब प्रतिष्ठानपुर आया तो देखा कि प्रतिष्ठानपुर की जितनी युवतियाँ थीं, वे नाराज हुई बैठी हैं, वे कहती थीं कि क्या हमारे यहाँ कोई सुन्दर स्त्री नहीं है, जो हम सबको छोड़कर राजा दूर देश से विवाह करके आ रहे हैं?' परंतु हाथी पर बैठकर जब उसकी सवारी नवविवाहिता पत्नी के साथ निकली, तो सारी स्त्रियों का गर्व समाप्त हो गया और उन्होंने कहा कि राजा ने ठीक ही किया। तब दोनों सुख से रहने लगे।

प्रसंग का भावार्थ - इस दृष्टान्त का अर्थ यह है कि वह 'प्रतिष्ठानपुर' कोई नगर विशेष नहीं है, अपितु जिसमें सब चीजें प्रतिष्ठित हैं, उसका ही नाम प्रतिष्ठानपुर है और उसमें 'पृथ्वीरूप' राजा यह जीव है-यह पार्थिव देहवाला है। पृथ्वी के विकार का यह शरीर धारण किये हुए है, इसलिये यह पृथ्वीरूप राजा है। उससे वेदरूप भिक्षु जब मिलता है तो वह कहता है कि 'हे जीव! तेरे प्राप्त करने लायक पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या ही है, वही तुम्हारी पत्नी (जीवनसंगिनी) बनने योग्य है। इस पृथ्वीलोक के अन्दर जितने भी पदार्थ हैं, पार्थिव पदार्थ हैं, वे तेरे योग्य नहीं हैं, क्योंकि तेरी सुन्दरता चेतन की सुन्दरता है, मुक्तिपुर में रहनेवाली रूपलता ही तुम्हारी पत्नी बनने के योग्य है। पराविद्या ही रूपलता है। तत्त्वज्ञ भिक्षु (सद्गुरु) दोनों को मिलाने का काम करता है, सो यह साधन स्वरूप बुद्धि ही तत्व वेत्ता भिक्षु है, जिससे वेद के अर्थ का ज्ञान होता है। बुद्धि के द्वारा जिसको समझा जाय अर्थात् शुद्ध बुद्धि के द्वारा प्राप्त किया जाय, वही शास्त्र ज्ञान है। ब्रह्मविद्या तो पहले से ही जानती है कि मैं किसका विषय हूँ अर्थात् चेतन का ही विषय हूँ, इसलिये यह कभी नहीं समझना चाहिये कि मैं तो ब्रह्मविद्या को चाहता हूँ, क्या पता वह मुझे वरण करे या न करे परंतु जब तक तुम उसके समक्ष नहीं जाओगे, तब तक विवाह तो होगा नहीं। रास्ते में अनेक विघ्न आयेंगे, जैसे प्रतिष्ठानपुर की कोई स्त्री नहीं चाहती कि राजा दूसरे देश में जाएँ और वहां की लड़की से विवाह करें। उसी प्रकार तुम्हारे अन्तःकरण में रहने वाले जितने काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि विकार हैं, वे भी कोई नहीं चाहते कि तुम उनसे विमुख होकर शुद्ध ब्रह्मविद्या (पराविद्या) प्राप्त करो। परंतु एक बार पराविद्या आ गयी, तो ये काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य आदि जो विकृतियाँ हैं, उनका गर्व समाप्त हो जायगा अर्थात् ये विकृतियाँ म्लान हो जाएगी। आत्मज्ञान के उदय होने पर तो ये सारे विकार सर्वथा म्लान हो जाते हैं। इनमें फिर कोई सामर्थ्य नहीं रहती। एक बार जहाँ पराविद्या की प्राप्ति हो गयी, वहाँ हमेशा के लिये सारे दुःखों से निवृत्ति हो जाती है अर्थात् अन्त:करण निर्मल हो जाता है।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


Share:

मोह में दुःख



रामनगर के एक शाहजी ने एक सफेद चूहा पाल रखा था। उसे वे बड़े प्यार से खिलाते-पिलाते तथा देख भाल किया करते थे। शाहजी जब दुकानपर जाते, तो उसे अपने साथ ही ले जाते और जब वे दुकान से घर लौटते, तो उसे भी लौटा लाते थे। शाहजी की दुकान आटा-दाल की थी। उनकी दुकान में चूहे बहुत पैदा हो गये थे, इसलिये चूहों को मारने के वास्ते शाहजी ने एक बिल्ली पाल ली। जब बिल्ली बड़ी हुई, तब दुकान के चूहों का शिकार करने लगी, 4-6 चूहे नित्य मारकर खा जाती थी। शाहजी उसके चूहा पकड़ने पर बड़े प्रसन्न होते थे।
एक दिन की बात है कि बिल्ली को शिकार करने के लिये एक भी चूहा न मिला। बिल्ली भूखी थी, उसे अपने-बिराने का ज्ञान तो था ही नहीं। उसने झट शाहजी का पाला हुआ सफेद चूहा मारकर खा लिया। शाहजी अब करते क्या, देखते रह गये। जब बिल्ली को मारने दौड़े, तब वह भाग गयी। शाहजी दुःख में निमग्न बैठे कुछ सोच रहे थे कि इतने में उधर से उनके गुरु महाराज आ निकले। शाहजी को चिन्तित देखकर बोले-'क्यों, क्या हुआ? कुशल तो है?' शाहजी बोले महाराज! वैसे तो आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है, परंतु मेरे एक पाले हुए सफेद चूहे को बिल्ली खा गया।' गुरुजी ने कहा कि 'जब तुमने चूहा पाला था तो फिर बिल्ली क्यों पाल ली?' शाहजी ने कहा कि 'मैंने तो बिल्ली को दुकान से चूहों को मारने के वास्ते पाला था।' महात्मा जी ने कहा कि 'क्या और चूहों में जान नहीं थी?' तब शाहजी बोले 'हुआ करे जान, मुझे क्या, मुझे तो इसी चूहे से प्रेम था। मैंने इसे बड़ी मोहब्बत से पाला था। तब महात्माजी ने कहा कि 'भाई! तुम्हारे दुख का कारण चूहा नहीं है, बल्कि ममता है (यह मेरा है ऐसा भाव)।' शाहजी ने कहा-'हाँ महाराज!'
महात्माजी ने कहा कि संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान् हैं और प्रत्येक प्राणी को मृत्यु रूपी बिल्ली अवश्य खायेगी। यदि तुम सांसारिक पदार्थों में ममता करोगे तो दुःख से सताये जाओगे इन पदार्थों और स्त्री, पुत्र, धन आदि की ममता (मोह) छोड़कर अपने कर्तव्य का धैर्य के साथ पालन करो और सब में आत्मवत् भाव करो तभी दुख से छुटकारा पा सकोंगे।
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
जिस ज्ञानी मनुष्य की दृष्टि में सभी प्राणी अपनी आत्मा के तुल्य हो जाते हैं, उसको फिर शोक, मोह नहीं होता।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


Share:

रस्सी में सर्प का भ्रम



घड़ी ने अभी-अभी नौका घण्टा बजाया था। हिरेन 'सुन्दरवन के बाघ' फिल्म देखने के बाद वापस अपने घर लौट रहा था। रॉयल बंगाल बाघों के अंचल में जाकर इस फिल्म का निर्माण किया गया था। हिरेन उस फिल्म के दृश्यों के बारे में सोचता हुआ चला जा रहा था। चलते-चलते वह सहसा चौंक गया। सामने सड़क पर एक सांप लेटा हुआ था। उस पर उसका पाँव पड़ते-पड़ते रह गया था। बड़े भाग्य से ही उसकी जान बच गयी थी। वह थोड़ा पीछे हटकर और भी अच्छी तरह सांप को देखने लगा। यह एक वैसा ही नाग लग रहा था, जैसा कि उसने कुछ दिनों पूर्व सँपेरे की टोकरी में देखा था।

हिरेन ने सांप से बचने के लिये बगल का एक दूसरा रास्ता पकड़ने की सोची। तभी उसने देखा कि एक व्यक्ति हाथ में टार्च लिये उस सांप की ओर ही चला जा रहा है।हिरेन चिल्लाया-'उधरसे मत जाओ, सड़क पर एक नाग लेटा है।'
वह व्यक्ति बोला-'डरो मत। मेरे साथ आओ। घण्टे भर पहले मैं इसी सड़क से होकर गया था। मैंने तुम्हारे साँप को देख लिया है। वह नाग नहीं, रस्सी का एक टुकड़ा मात्र है।' वह हीरेन को उस जगह ले गया। हिरेन ने टार्च से आलोकित सड़क को स्पष्ट रूपसे देखा तो उसे पता चला कि वहाँ कोई नाग नहीं, बल्कि एक रस्सी पड़ी है। दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। हिरेन का भय जा चुका था।
कभी-कभी हम एक वस्तु को कुछ दूसरा समझ बैठते हैं और इस कारण हम भ्रमित या भयभीत हो जाते हैं। वेदान्त की मतानुसार रस्सी में सर्प के भय के समान ही हमारे सुख-दुःख, हमारी समस्या, आशंका और चिन्ताएँ एक तरहके भ्रम पर आधारित होती हैं। मूलत: हम पूर्ण और आनन्दमय हैं, तथापि हम अपनेको श्मशान की ओर अग्रसर हो रहे एक लाचार मत्स्य प्राणी के रूपमें देखते हैं। हम लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो हमपर जादू कर दिया गया हो और इसीको वेदान्त में माया कहते हैं। जब मायाका जादू टूट जाता है, तब हमें अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होता है।

#बोध_कथा #प्रेरक_प्रसंग


Share:

12 राशि नाम और अक्षर - 12 Rashi Naam



 Rashi Name | 12 Rashi Akshar | 12 Rashi Name | 12 Rashi Ke Naam.

इसे साफ़ एवं व्यवस्थित सारणी के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है—

क्रमांकराशिअंग्रेज़ी नामनाम का प्रथम अक्षर
1मेषAriesअ, ल, ई
2वृषभTaurusब, व, उ
3मिथुनGeminiक, छ, घ
4कर्कCancerड, ह
5सिंहLeoम, ट
6कन्याVirgoप, ठ, ण
7तुलाLibraर, त
8वृश्चिकScorpioन, य
9धनुSagittariusफ, ध, भ, ढ
10मकरCapricornख, ज
11कुंभAquariusग, स, श, ष
12मीनPiscesद, च, झ, थ

राशि अनुसार नाम का प्रथम अक्षर

  • मेष राशि – अ, ल, ई

  • वृषभ राशि – ब, व, उ

  • मिथुन राशि – क, छ, घ

  • कर्क राशि – ड, ह

  • सिंह राशि – म, ट

  • कन्या राशि – प, ठ, ण

  • तुला राशि – र, त

  • वृश्चिक राशि – न, य

  • धनु राशि – फ, ध, भ, ढ

  • मकर राशि – ख, ज

  • कुंभ राशि – ग, स, श, ष

  • मीन राशि – द, च, झ, थ

नोट: पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में राशि निर्धारण सामान्यतः जन्म नक्षत्र और चंद्र राशि के आधार पर किया जाता है। नाम का प्रथम अक्षर संबंधित नक्षत्र के चरण (पाद) के अनुसार निर्धारित किया जाता है।Rashi Name | 12 Rashi Akshar | 12 Rashi Name | 12 Rashi Ke Naam.

Tag - Rashi Name,  12 Rashi Akshar,  12 Rashi Name,  12 Rashi Ke Naam



Share:

वेदों और श्रुतियों की जननी देवी गायत्री की जयंती और अवतरण



Gayatri Mantra

गायत्री माता : स्वरूप, अवतरण और महिमा

कौन हैं गायत्री माता? कैसे हुआ उनका अवतरण?

मान्यता है कि चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियाँ सभी गायत्री से उत्पन्न हुई हैं। वेदों की उत्पत्ति का कारण होने से इन्हें वेदमाता कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवताओं की आराध्या भी इन्हें ही माना जाता है, इसलिए इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। समस्त ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री को ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

मान्यता है कि सृष्टि के आदि काल में ब्रह्माजी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की। प्रारंभ में गायत्री का ज्ञान केवल देवताओं तक सीमित था, किन्तु जिस प्रकार राजा भगीरथ कठोर तपस्या द्वारा गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने भी कठिन साधना करके गायत्री मंत्र की महिमा को जन-जन तक पहुँचाया।

मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है

हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्मांड जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि (तेज) और आकाश—इन पाँच तत्वों से निर्मित है। संसार के सभी प्राणियों का शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से बना है।

इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राणशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। यही कारण है कि गायत्री को समस्त शक्तियों का आधार माना गया है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन गायत्री उपासना को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

गायत्री जयंती

पुराणों के अनुसार गायत्री जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार गायत्री मंत्र का उच्चारण इसी दिन किया था। इसलिए यह तिथि गायत्री जयंती के रूप में प्रसिद्ध हुई।

अधिकांश वर्षों में गायत्री जयंती गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ती है। कुछ परंपराओं में इसे श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि गायत्री जयंती के दिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र का जप करने से यश, कीर्ति, धन, ऐश्वर्य तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यदि गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा एवं पवित्रता के साथ किया जाए, तो इसका विशेष फल प्राप्त होता है।

गायत्री माता की महिमा

हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा गया है, क्योंकि सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से मानी जाती है। पुराणों में गायत्री देवी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश—त्रिमूर्ति के समतुल्य सम्मान दिया गया है। उन्हें समस्त देवताओं की माता तथा देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और पार्वती का संयुक्त स्वरूप माना गया है।

गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ मानी जाती हैं। उनके चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं, जबकि पाँचवाँ मुख परम दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे कमलासन पर विराजमान रहती हैं। उनकी दस भुजाएँ दिव्य शक्तियों और भगवान विष्णु के संरक्षणकारी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं।

भारतीय संस्कृति में गायत्री माता को संस्कृति की जननी भी कहा गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गायत्री का अवतरण हुआ था और इसी स्मृति में गायत्री जयंती मनाई जाती है।

मान्यता है कि मां गायत्री की उपासना से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। अथर्ववेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात प्रमुख प्रतिफलों का उल्लेख मिलता है—आयु, प्राण, प्रजा, पशुधन, कीर्ति, धन और ब्रह्मवर्चस्

ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की दृष्टि में गायत्री

गायत्री की महिमा का वर्णन प्राचीन ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक विचारकों तक ने किया है। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री माता की महिमा से परिपूर्ण हैं ही, अथर्ववेद में उन्हें आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है।

महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिस प्रकार पुष्पों में मधु और दूध में घी साररूप होता है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री सिद्ध हो जाए, तो वह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य कामधेनु के समान है।

जिस प्रकार गंगा शरीर और मन को पवित्र करती है, उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा आत्मा को निर्मल और प्रकाशित करती है।

महर्षि विश्वामित्र का कथन है कि ब्रह्माजी ने तीनों वेदों का सार निकालकर गायत्री मंत्र के रूप में मानवता को प्रदान किया है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करता है, वह पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे केंचुल छोड़ने पर सर्प।

गायत्री माता के भक्त उन्हें आदिशक्ति के रूप में पूजते हैं। प्रतीकात्मक रूप से गायत्री ज्ञान, विवेक और चेतना की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी कृपा से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और जीवन में प्रकाश, ज्ञान तथा आध्यात्मिक जागृति का उदय होता है। महर्षि विश्वामित्र ने इसी दिव्य ज्ञान को सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने का महान कार्य किया।


Gayatri Mata Wallpaper HD

क्यों कहा जाता है वेदमाता?

गायत्री संहिता के अनुसार— “भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका” अर्थात् गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी और काली—इन तीनों दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के इन त्रिविध स्वरूपों से ही वेदों के दिव्य ज्ञान का प्रादुर्भाव माना गया है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता कहा जाता है।

गायत्री मंत्र के विषय में शास्त्रों में कहा गया है— “सर्वदेवानां गायत्री सारमुच्यते” अर्थात् गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है। इसलिए गायत्री माता को वेदों की जननी और वेदमाता के रूप में सम्मानित किया गया है।

मां गायत्री का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तैत्तिरीय संहिता तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में प्राप्त होता है। अनेक उपनिषदों में सावित्री और गायत्री को एक ही शक्ति का स्वरूप बताया गया है। मान्यता है कि वे किसी समय सविता देव (सूर्य) की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं, इसलिए उनका नाम सावित्री पड़ा। कहा जाता है कि उनका प्रादुर्भाव सविता के मुख से हुआ था। भगवान सूर्य ने उन्हें ब्रह्माजी को समर्पित किया, जिसके कारण वे ब्रह्माणी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

गायत्री ज्ञान और विज्ञान की मूर्तिमान शक्ति हैं। वे ब्राह्मणों की आराध्य देवी मानी जाती हैं तथा उन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य धर्मग्रंथों में उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

देवी गायत्री के विवाह की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार किसी भी यज्ञ, पूजा अथवा धार्मिक अनुष्ठान में विवाहित व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ बैठकर ही कर्म करना चाहिए। पति-पत्नी के संयुक्त रूप से यज्ञ में सहभागी होने पर उसका फल पूर्ण एवं शीघ्र प्राप्त होता है।

यज्ञ के समय किसी कारणवश ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री के आने में विलंब हो गया। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। ऐसी स्थिति में यज्ञ की पूर्णता के लिए ब्रह्माजी ने गायत्री देवी के साथ विवाह किया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में आसन ग्रहण कराया। इसके पश्चात यज्ञ का शुभारंभ हुआ।

इस कथा के कारण गायत्री देवी को भगवान ब्रह्मा की पत्नी तथा ब्रह्माणी के रूप में भी पूजा जाता है। विभिन्न पुराणों में इस प्रसंग के अनेक रूप और विवरण मिलते हैं, किन्तु सभी में गायत्री की दिव्य शक्ति और उनके आध्यात्मिक महत्व का ही प्रतिपादन किया गया है।

गायत्री मंत्र और उसका अर्थ

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

मंत्र का अर्थ

हम उस परम दिव्य, पवित्र और तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो समस्त संसार का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और प्रेरणास्रोत है। वह परम दिव्य शक्ति हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, हमें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे तथा हमारे जीवन को ज्ञान, विवेक और सद्गुणों से आलोकित करे।

गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान का महान साधन है। नियमित श्रद्धापूर्वक इसके जप से मन, बुद्धि और आत्मा का परिष्कार होता है तथा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

Gayatri Mantra

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अर्थ – हम उस सृष्टिकर्ता, प्रकाशमान, परम तेजस्वी परमात्मा का ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

इस मंत्र के जप से ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा मन शांत और एकाग्र रहता है। ललाट पर तेज और आभा का विकास होता है। गायत्री माता के विभिन्न स्वरूपों का उनके मंत्रों सहित जप करने से दरिद्रता, दुःख और कष्टों का नाश होता है तथा निःसंतानों को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।

गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर

गायत्री मंत्र में चौबीस (24) अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप से विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना है जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। गायत्री मंत्र के ये चौबीस अक्षर चौबीस शक्ति-बीज माने गए हैं। गायत्री मंत्र की उपासना से इन शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।

1. तत्

देवता – गणेश
शक्ति – सफलता शक्ति
फल – कठिन कार्यों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।

2. स

देवता – नरसिंह
शक्ति – पराक्रम शक्ति
फल – पुरुषार्थ, वीरता, शत्रुनाश तथा आक्रमणों से रक्षा।

3. वि

देवता – विष्णु
शक्ति – पालन शक्ति
फल – संरक्षण, आश्रितों की रक्षा तथा योग्यताओं की वृद्धि।

4. तु

देवता – शिव
शक्ति – कल्याण शक्ति
फल – अनिष्ट का विनाश, कल्याण, आत्मपरायणता एवं निश्चय शक्ति।

5. व

देवता – श्रीकृष्ण
शक्ति – योग शक्ति
फल – कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति एवं आत्मनिष्ठा।

6. रे

देवी – राधा
शक्ति – प्रेम शक्ति
फल – प्रेमभाव, द्वेष का नाश।

7. णि

देवी – लक्ष्मी
शक्ति – धन शक्ति
फल – धन, पद, यश एवं भौतिक समृद्धि।

8. यं

देवता – अग्नि
शक्ति – तेज शक्ति
फल – तेज, प्रतिभा, सामर्थ्य और शक्ति की वृद्धि।

9. भ

देवता – इन्द्र
शक्ति – रक्षा शक्ति
फल – रोग, शत्रु, चोर एवं अन्य भय से रक्षा।

10. र्गो

देवी – सरस्वती
शक्ति – बुद्धि शक्ति
फल – मेधा, विवेक, दूरदर्शिता एवं ज्ञान-वृद्धि।

11. दे

देवी – दुर्गा
शक्ति – दमन शक्ति
फल – विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन।

12. व

देवता – हनुमान
शक्ति – निष्ठा शक्ति
फल – निर्भयता, कर्तव्यपरायणता एवं ब्रह्मचर्य।

13. स्य

देवी – पृथ्वी
शक्ति – धारण शक्ति
फल – धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता और स्थिरता।

14. धी

देवता – सूर्य
शक्ति – प्राण शक्ति
फल – आरोग्य, दीर्घायु, विकास एवं विचारों का शोधन।

15. म

देवता – श्रीराम
शक्ति – मर्यादा शक्ति
फल – संयम, सौम्यता, मैत्री एवं मर्यादा-पालन।

16. हि

देवी – श्रीसीता
शक्ति – तप शक्ति
फल – पवित्रता, नम्रता, शील एवं सात्त्विकता।

17. धि

देवता – चन्द्र
शक्ति – शान्ति शक्ति
फल – चिंता, क्रोध, लोभ और मोह का नाश।

18. यो

देवता – यम
शक्ति – काल शक्ति
फल – समय का सदुपयोग, जागरूकता एवं निर्भयता।

19. यो

देवता – ब्रह्मा
शक्ति – उत्पादक शक्ति
फल – सृजन क्षमता एवं संतान-वृद्धि।

20. नः

देवता – वरुण
शक्ति – रस शक्ति
फल – सरलता, करुणा, माधुर्य एवं कलाप्रेम।

21. प्र

देवता – नारायण
शक्ति – आदर्श शक्ति
फल – उच्च चरित्र, आदर्श जीवन एवं नेतृत्व क्षमता।

22. चो

देवता – हयग्रीव
शक्ति – साहस शक्ति
फल – उत्साह, वीरता एवं विपत्तियों से संघर्ष की क्षमता।

23. द

देवता – हंस
शक्ति – विवेक शक्ति
फल – सत्-असत् का निर्णय, आत्मसंतोष एवं सत्संगति।

24. यात्

देवता – तुलसी
शक्ति – सेवा शक्ति
फल – लोकसेवा, सत्यनिष्ठा, आत्मशान्ति एवं परोपकार।

गायत्री उपासना से हर कार्य संभव

गायत्री, गीता, गंगा और गौ—ये भारतीय संस्कृति की चार आधारशिलाएँ मानी गई हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में भी मनुष्य के कल्याण के लिए गायत्री और ॐ के महत्व का संकेत दिया है। वेदों में गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। उनकी उपासना से साधक को इन दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।

गायत्री मंत्र का लाभ

महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जैसे पुष्पों में मधु और दूध में घृत साररूप होता है, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री साधना सिद्ध हो जाए तो वह कामधेनु के समान सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बन जाती है।

गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक एवं नियमित जप करने से—

  • आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।

  • बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • मन की शुद्धि होती है।

  • दुःख एवं कष्टों का निवारण होता है।

  • आत्मबल और तेज में वृद्धि होती है।

  • साधक के चारों ओर आध्यात्मिक संरक्षण का कवच निर्मित होता है।

देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र

काली गायत्री
ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्॥

कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्॥

गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

दुर्गा गायत्री
ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्यै धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥

राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे, सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो रामः प्रचोदयात्॥

रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

लक्ष्मी गायत्री
ॐ महादेव्यै विद्महे, विष्णुपत्न्यै धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

सरस्वती गायत्री
ॐ वाग्देव्यै विद्महे, ब्रह्मपत्न्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥

इस प्रकार करें गायत्री मंत्र का जप

गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से लगभग दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक किया जा सकता है। मानसिक (मौन) जप किसी भी समय किया जा सकता है। सामान्यतः प्रातः और सायं संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है।

नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से—

  • बुद्धि प्रखर होती है।

  • स्मरण शक्ति बढ़ती है।

  • अध्ययन में एकाग्रता आती है।

  • व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण बढ़ता है।

  • विवेक एवं निर्णय क्षमता का विकास होता है।

स्वामी विवेकानन्द ने गायत्री को “सद्बुद्धि का मंत्र” कहा है और इसे मंत्रों का मुकुटमणि बताया है।

गायत्री जयंती पर क्या करें?

  1. अन्न का दान करें।

  2. भंडारा या अन्नक्षेत्र का आयोजन करें।

  3. लोगों को शीतल जल पिलाएँ।

  4. पक्षियों के लिए जल-पात्र रखें।

  5. गायत्री मंत्र जप एवं हवन करें।

  6. गुड़ और गेहूँ का दान करें।

  7. धार्मिक पुस्तकों का दान करें।

  8. पवित्र नदी में स्नान करें।

  9. फलाहार व्रत रखें।

  10. श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

  11. सत्य भाषण का संकल्प लें।

  12. सूर्य देव की उपासना करें।

जय माँ गायत्री। 🙏🌺



Share:

राष्ट्रवादी ओजस्वी वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ



 Pushpendra Kulshrestha
Pushpendra Kulshrestha

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ : राष्ट्रवादी चिंतन की ओजस्वी आवाज

आज इंटरनेट की वायरल दुनिया में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देशभर के अनेक राष्ट्रवादी विचारों से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन में व्हाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब के माध्यम से उनकी ओजस्वी वाणी की गूंज सुनाई पड़ती है। वर्तमान समय में वे अनेक युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित हैं। उनके प्रभावशाली भाषण नई पीढ़ी में भारतीयता, राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना के प्रति आस्था जागृत करने का कार्य कर रहे हैं।

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का जन्म 2 दिसंबर, 1960 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अलीगढ़ स्थित मिंटो सर्किल हाई स्कूल (वर्तमान में सैयदना ताहिर सैफुद्दीन स्कूल) से प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की शिक्षा पूर्ण की।

उनका पालन-पोषण अलीगढ़ के उस शैक्षणिक और सामाजिक वातावरण में हुआ, जहाँ विभिन्न वैचारिक धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। इसी परिवेश ने उनके व्यक्तित्व और चिंतन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ उनके राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता संबंधी विचार और अधिक मुखर एवं प्रखर होते गए। आज वे अपने भाषणों, लेखन और सार्वजनिक वक्तव्यों के माध्यम से राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं तथा लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं।

Pushpendra Kulshrestha Biography in Hindi


पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ पेशे से एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन में पाकिस्तान के कराची स्थित एएजे न्यूज़ (AAJ News) सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों के साथ कार्य किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सहारा न्यूज़, बीबीसी वर्ल्ड, ज़ी न्यूज़ तथा अन्य प्रमुख मीडिया संस्थानों में भी अपनी सेवाएँ दी हैं। वे तीन बार प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के महासचिव पद पर भी निर्वाचित हुए, जो उनकी पत्रकारिता जगत में स्वीकार्यता और सक्रियता का परिचायक है।

जैसा कि सामान्यतः माना जाता है कि भारतीय मीडिया जगत में विभिन्न वैचारिक धाराओं का प्रभाव रहा है, ऐसे वातावरण में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ अपनी पत्रकारिता जारी रखी। उन्होंने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में लगभग चार वर्षों तक अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। बाद में उन पर कुछ आरोप लगाए गए और उन्हें प्रेस क्लब ऑफ इंडिया से निष्कासित कर दिया गया।

उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 406 एवं 120-बी के अंतर्गत प्रकरण दर्ज किया गया। इस मामले की जाँच प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की ओर से गठित समिति, पुलिस तथा अन्य संबंधित एजेंसियों द्वारा की गई। उनके समर्थकों का मत है कि जाँच के दौरान उनके विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं हो सके और यह पूरा प्रकरण उनकी सार्वजनिक छवि को धूमिल करने का प्रयास था। वहीं, इस विषय पर विभिन्न पक्षों के अपने-अपने मत और दृष्टिकोण रहे हैं।

आज भी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ अपने भाषणों, लेखन और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र, समाज और समसामयिक विषयों पर अपने विचार प्रकट करते रहते हैं तथा बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनते और अनुसरण करते हैं।

Pushpendra Kulshrestha

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ : एक प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी चिंतक

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ निश्चित रूप से एक प्रखर वक्ता हैं। वक्तृत्व कला का यह गुण उन्होंने अपने जीवन के आरंभिक शैक्षिक काल से ही विकसित करना प्रारम्भ कर दिया था। जब वे महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब तक उन्हें अनेक मंचों पर अपने विचार रखने के अवसर मिलने लगे थे। इन अवसरों ने उनके भीतर एक प्रभावशाली और ओजस्वी वक्ता के गुणों को और अधिक निखारा।

पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने कदम जमाने के बाद वे एक गुणशील, निर्भीक और प्रखर वक्ता के रूप में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा अपने कार्यों के माध्यम से विशिष्ट पहचान बनाई। इसी कारण उन्हें देश-विदेश के अनेक मंचों पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा। विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वे मुख्य अतिथि तथा वक्ता के रूप में सम्मानित हुए। उनके विचारों और शब्दों को सुनने के लिए पत्रकारिता जगत के लोग तथा युवा वर्ग विशेष रूप से उत्सुक रहता था।

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने पाकिस्तान के कराची स्थित एएजे न्यूज़ में कार्यकारी संपादक एवं भारत प्रमुख (India Head) के रूप में कार्य किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने सहारा न्यूज़, बीबीसी वर्ल्ड तथा ज़ी न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में भी विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। वर्ष 2017 में उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से अलग होकर स्वतंत्र रूप से समाज के साथ प्रत्यक्ष संवाद का मार्ग अपनाया।

वर्तमान में वे ‘पब्लिक 24×7’ नामक यूट्यूब चैनल का संचालन कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वे राष्ट्रीय, सामाजिक और समसामयिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन, कश्मीर संघर्ष, कश्मीर घाटी में उनके पुनर्वास, इस्लामी कट्टरवाद तथा आतंकवाद जैसे विषयों पर वे खुलकर अपनी बात रखते हैं। इन विषयों पर उनके व्याख्यान और विश्लेषण बड़ी संख्या में लोगों द्वारा सुने और साझा किए जाते हैं।

अपने ओजस्वी वक्तृत्व, स्पष्ट विचारों और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित दृष्टिकोण के कारण पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ आज देश के चर्चित वक्ताओं और विचारकों में गिने जाते हैं। उनके भाषण अनेक युवाओं को राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

Pushpendra Kulshrestha

अनुच्छेद 35ए और 370 के विषय में जन-जागरण

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर “वी द सिटिजन्स” (We The Citizens) नामक एक नागरिक संगठन के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय विषयों पर जन-जागरूकता उत्पन्न करने का प्रयास किया। संगठन के अध्यक्ष संदीप कुलकर्णी के साथ मिलकर उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की, जिसमें जम्मू-कश्मीर से संबंधित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 की वैधता को चुनौती दी गई थी।

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का मत रहा कि अनुच्छेद 35ए और 370 के कारण जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण, विकास तथा वहाँ के नागरिकों के समान अधिकारों की स्थापना प्रभावित हुई। उनके अनुसार देश के अधिकांश लोग इन संवैधानिक प्रावधानों और उनके प्रभावों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं थे। इसी कारण उन्होंने अपने व्याख्यानों, लेखों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से इन विषयों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास किया।

उनके प्रयासों तथा अन्य अनेक सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक संगठनों द्वारा चलाए गए जन-जागरण अभियानों के परिणामस्वरूप देश में अनुच्छेद 35ए और 370 को लेकर व्यापक चर्चा प्रारम्भ हुई। इस विषय पर लोगों की जागरूकता बढ़ी और इसे लेकर सार्वजनिक बहस तेज हुई।

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करते हुए तथा अनुच्छेद 35ए को समाप्त करते हुए जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन किया। पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के समर्थकों का मानना है कि इस विषय पर जनमत निर्माण और जागरूकता बढ़ाने में उनके तथा उनकी टीम के प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यद्यपि इस निर्णय का औपचारिक श्रेय भारत सरकार, संसद तथा उस समय के राजनीतिक नेतृत्व को दिया जाता है, फिर भी इस विषय को जनचर्चा का हिस्सा बनाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के योगदान को भी अनेक लोग महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

इस प्रकार पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने केवल पत्रकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक जन-जागरूकता अभियानकर्ता के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ सम्पूर्ण जीवनी
Pushpendra Kulshrestha Biography in Hindi



Share:

गंगा दशहरा का महत्व और पूजन की विधि



गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है, यह उत्तराखंड राज्य के गंगोत्री नामक स्थान से निकलते हुए गढ़मुकेश्वर, हरिद्वार, ऋषिकेश, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना सहित विभिन्न नगरों से निकलते हुए गंगासागर नामक तीर्थ स्थान पर समुद्र से मिल जाती है कई महत्वपूर्ण स्थानों से होकर गुजरती है। हिन्दू धर्म में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है और मां का स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि राजा भगीरथ के पूर्वजों को श्राप मिला था, जिसकी वजह से उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता गंगा ने उन्हें दर्शन दिए। राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न ने कहा मां गंगा ने कहा कि जिस समय मैं पृथ्वीतल पर गिरूं, उस समय मेरे वेग को कोई संभालने वाला होना चाहिए। ऐसा न होने पर पृथ्वी को फोड़कर मैं रसातल में चली जाऊंगी। इसके बाद भगीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की। भगवान शिव प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने के लिए तैयार हो जाते हैं। गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ देते हैं। इस प्रकार गंगा के जल से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल हो जाते हैं। पृथ्वी पर आने से पहले, मां गंगा भगवान ब्रह्मा के कमंडल में रहती थीं। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगा का जल पुण्य देता है और पापों का नाश करता है।
ganga-dussehra-celebration
प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है, इस लिए इसे जेठ का दशहरा भी कहा जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार, गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को निकट की किसी भी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। इस दिन ध्यान व दान करना चाहिए। इससे सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यह मान्यता है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में भागीरथी की तपस्या के फलस्वरूप स्वर्ग से गंगा का धरती पर आगमन हुआ था। इसे हम गंगावतरण के नाम से भी जानते हैं। यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस दिन गंगा में स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप-उपासना और उपवास किया जाय तो समस्त पाप दूर होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान विष्णु के चरणों से निकली और शिव की जटाओं में लिपटी गंगा के जल में डुबकी लगाने से मनुष्य को विष्णु और शिव का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है। इस दिन सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दोगुना फल प्राप्त होता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। मोक्षदायिनी मां गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है। गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए। दस वस्तुओं से ही पूजन भी करना चाहिए। गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी दस प्रकार के दोषों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं अवैध संबंध, अकारण जीवों को कष्ट पहुंचाने, असत्य बोलने व धोखा देने से जो पाप लगता है, वह पाप भी गंगा 'दसहरा' के दिन गंगा स्नान से धुल जाता है।


गंगा पूजन की विधि
गंगा दशहरा के दिन गंगा तटवर्ती प्रदेश में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप के किसी भी जलाशय या घर के शुद्ध जल से स्नान करके सुवर्णादि के पात्र में त्रिनेत्र, चतुर्भुज, सर्वावयवभूषित, रत्नकुम्भधारिणी, श्वेत वस्त्रादि से सुशोभित तथा वर और अभयमुद्रा से युक्त श्रीगंगा जी की प्रशान्त मूर्ति अंकित करें। अथवा किसी साक्षात् मूर्ति के समीप बैठ जाएं। फिर 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः' से आवाहनादि षोडषोपचार पूजन करें। इसके उपरान्त 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै स्वाहा' से हवन करें। तत्पश्चात 'ऊँ नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं (वाक्-काम-मायामयि) हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।' इस मंत्र से पांच पुष्पाञ्जलि अर्पण करके गंगा को भूतल पर लाने वाले भगीरथ का और जहाँ से वे आयी हैं, उस हिमालय का नाम- मंत्र से पूजन करें। फिर 10 फल, 10 दीपक और 10 सेर तिल- इनका 'गंगायै नमः' कहकर दान करें। साथ ही घी मिले हुए सत्तू और गुड़ के पिण्ड जल में डालें। सामर्थ्य हो तो कच्छप, मत्स्य और मण्डूकादि भी पूजन करके जल में डाल दें। इसके अतिरिक्त 10 सेर तिल, 10 सेर जौ, 10 सेर गेहूँ 10 ब्राह्मण को दें। इतना करने से सब प्रकार के पाप समूल नष्ट हो जाते हैं और दुर्लभ-सम्पत्ति प्राप्त होती है।

जेठ/गंगा दशहरा स्नान कब है - 1 जून 2020
गंगा दशहरा कब मनाया जाता है - प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है।


Share:

नारियल का दूध



आज विश्व में दूध का प्रचलन इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग गाय, भैंस, बकरी, भेड़ यहां तक कि पैकेट बंद सिंथेटिक दूध का प्रयोग अधिक से अधिक करने लगे हैं जहां आज शरीर में बीमारियां पैदा करने के लिए यह दूध काफी हद तक जिम्मेदार है, वहीं नारियल का दूध ना केवल सेहत के लिए अच्छा है बल्कि स्वाद में भी दूध से कहीं बेहतर है। नारियल की अपनी कहानी है। जब यह पहले-पहल अमेरिका पहुंचा, तो उसके रेशेदार और फिर कठोर आवरण को देखकर लोगों ने मान लिया कि यह बेकार फल है। अमेरिका में जिन दिनों यह उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों हवाई द्वीप में माताएं नारियल का दूध अपने स्वस्थ बच्चों को पिला रहीं थी।

नारियल के दूध को मां के दूध जितना फायदेमंद होता है। मां के दूध को सर्वाधि‍क पोषक माना गया है लेकिन इसके बाद नारियल के दूध को दुनिया के सर्वाधिक फायदेमंद पेय के रूप में स्वीकार किया गया है। नारियल के दूध का इस्तेमाल खाना पकाने में भी किया जाता है। मलेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका और वियतनाम जैसे देशों में शिशु को मां का दूध न मिल पाने की स्थिति में गाय के दूध की जगह नारियल का दूध दिया जाता है। सीडीबी अब नारियल के दूध को प्राकृतिक स्वास्थ्य पेय के रूप में पेश करने की तैयारी कर रहा है। पके हुए नारियल के गूदे से नारियल का दूध बनाया जाता है। कई देशो में इसे नारियल का दूध कहते हैं, जबकि कई अन्य देशों में इसे नारियल रस भी कहा जाता है।

अब विश्व भर के पोषण विज्ञानी यह स्वीकार करने लगे हैं कि नारियल का दूध पोषण की दृष्टि से पूर्ण आहार है। उसकी समानता में बहुत कम चीजें ठहर पाती हैं। इसके साथ ही, लोग यह भी मानने लगे हैं कि पेट के अल्सर, कब्ज, कोलाइटिस और कमजोर पाचन-शक्ति वालों के लिए यह बड़ा ही हितकारी है। प्राœतिक आहारों में ऐसे बहुत कम आहार मिलेंगे जिनमें इतना विटामिन बी-1 होता, जितना नारियल के दूध में होता है। यह सभी जानते हैं कि पाचन-क्रिया की स्वस्थ यांत्रिकता में इस विटामिन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। जहां-जहां भी नारियल होता है, वहां के मूलवासियों के लिए यह एक अनिवार्य आहार माना जाता है। लोग इसे सर्वरोगहारी फल मानते हैं।

यौवन बनाये रखने की आकांक्षा रखने वालों के लिए यह एक बड़े महत्व की बात है कि नारियल का दूध विटामिन-ए का बहुत अच्छा स्रोत है। रसायन विज्ञान वेत्ताओं की मान्यता है कि नारियल और नारियल के दूध के आहार से आदमी पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है परन्तु, सभ्यता ने हमारे जीवन में जो गुत्थियां उत्पन्न कर दी हैं, उनके कारण सभ्य कहे जाने वाले लोगों के लिए यह शक्य नहीं हैं कि वे मात्र नारियल अथवा उसके उत्पादों पर रह जायें, पर उष्ण कटि बंधीय प्रदेशों के निवासियों के लिए नारियल का आहार एक स्वाभाविक आहार है।

प्रायः सभी आवश्यक खनिज लवण, कैल्शियम, फोस्फोरस, सोडियम, क्लोरीन, आयोडीन, सल्फर इसमें उपलब्ध हैं। खनिज लवणों के साथ ही विटामिनों की दृष्टि से भी यह फल किसी से कम नहीं है। पेड़ का पका नारियल धूप के सम्पर्क के कारण भी एक स्वास्थ्यदायक आहार हो जाता है। उष्ण कटिबंध की कड़ी धूप इतने कठोर आवरण के बावजूद, इसके ॉदय तक प्रविष्ट हो जाती है और गूदे को स्वास्थ्य के लिए हितकारी बनाती है। नारियल के दूध ने अनेक शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर आœष्ट किया है। उनके विश्लेषण से यह बात ज्ञात हुई है कि नारियल के दूध में 5 प्रतिशत पानी होता है और 25 प्रतिशत चिकनाई। इसके अतिरिक्त इसमें 19 प्रतिशत कार्बोहाइडेट तथा 4 प्रतिशत प्रोटीन होता है। यहां ध्यान देने लायक यह बात है कि नारियल के दूध में प्रोटीन और कोर्बोहाइड्रेट भले ही कम हो, पर खनिज लवणों की मात्रा बहुत अधिक होती है।

नारियल के दूध में अपेक्षाकृत कम प्रोटीन होने और स्वास्थ्यदायक खनिज लवणों के आधिक्य के कारण अधिक प्रोटीन से होने वाले नुकसानों का डर नहीं होता। इस दूध में महत्वपूर्ण एमिनो-एसिड भी होते हैं। अन्य खनिज लवणों के अतिरिक्त नारियल में कैल्शियम और फोस्फोरस की अधिक मात्रा होती है। कैल्शियम का दांतों, हड्डियों और मांसपेशियों को सशक्त करने में बड़ा महत्व पूर्ण योगदान होता है। यह रक्त के गाढ़ेपन के लिए भी उत्तरदायी होता है। पर, शरीर इसे तभी आत्मसात् कर पाता है, जब इसे पर्याप्त फोस्फोरस का सहयोग मिले। जो स्वास्थ्याकांक्षी स्वास्थ्य की दृष्टि से कैल्शियम बहुल आहार लेते हैं, उनको जान लेना चाहिये कि पर्याप्त मात्रा में फोस्फोरस के अभाव में उनका प्रयास निष्फल ही होने वाला है। यह एक महत्वपूर्ण बात है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिये। पर्याप्त मात्रा में नारियल का दूध पीने वाला बबुद्धिमान आदमी इस बात पर परम आश्वस्त होता है कि उसे कैल्शियम और फोस्फोरस का संयोग परम सुस्वादु रूप में मिल रहा है। पशुजन्य दूध से होने वाले नुकसान जैसे कफ विकार, यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल तथा दूध से होने वाली एलर्जी आदि का खतरा नारियल के दूध में नहीं है। इसके दूध के खट्टा होने की कोई आशंका नहीं रहती। अतः यह अपेक्षाकृत अधिक समय तक ताजा बना रहता है। 

नारियल दूध कैसे बनाएं?
 पानी वाला कच्चा नारियल तोड़कर इसकी गिरी निकाल लें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी के साथ मिक्सी में चला ले। चलनी में छान लें। नारियल दूध तैयार है। चिकनाई एवं गाढ़े पतले के हिसाब से पानी की मात्रा डालें। इस दूध को मीठा करने के लिए भीगे हुए खजूर का प्रयोग करें। इस दूध की खीर बनाने के लिए पानी की मात्रा कम रखकर नारियल का दूध बनाएं इसमें फल एवं मेवा डालकर खीर तैयार करें। बच्चों के लिए इसी दूध में केला, आम, पपीता, चीकू आदि फल डालकर बेहतरीन शेक तैयार किया जा सकता है। नारियल का जल भी शीतल, स्वादिष्ट, ह्रदय के लिए हितकर, अग्निदीपक, शुक्रजनक, लघु अत्यंत वस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शांत करने वाला होता है।

नारियल के दूध के त्वचा संबंधी फ़ायदे
  1. जब बात सनबर्न को ठंडक पहुंचाने की हो तो नारियल का दूध एक अच्छा नैसर्गिक विकल्प हो सकता है। यह त्वचा को ठंडक का एहसास कराता है और साथ ही यह त्वचा पर काफ़ी सौम्य होता है। ताज़ा तैयार किए गए नारियल के दूध में कॉटन पैड डुबोएं और इसे प्रभावित हिस्से पर लगाएं।
  2. नारियल का दूध त्वचा को गहराई से मॉइस्चराइज़ करता है और शुष्क त्वचा से छुटकारा दिलाता है। नारियल का ताज़ा दूध निकालें और कॉटन पैड्स की मदद से इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाएं। चेहरा धोने से पहले इसे कई बार लगाने की कोशिश करें, क्योंकि यह बहुत जल्दी सूख जाता है। एक कप नारियल दूध में, आधा कप गुलाब जल मिलाएं और इसे अपने नहाने के पानी में मिलाएं। यह निश्चित तौर पर आपकी त्वचा के खोए हुए मॉइस्चर को वापस लौटाएगा।
  3. नारियल का दूध हर तरह की त्वचा के लिए नॉन-ड्राइंग मेकअप रिमूवर बन सकता है। कॉटन बॉल को ताज़ा नारियल दूध में डुबोकर हल्के हाथों से मेकअप निकालें। दूध में मौजूद फ़ैटी एसिड्स ज़िद्दी से ज़िद्दी मेकअप के निशानों को हटाएंगे और त्वचा को पोषित करेंगे।
  4. नारियल के दूध में बड़े पैमाने पर विटामिन सी और ई होता है, जो त्वचा के लचीलेपन को बनाए रख सकता है। नारियल के दूध से चेहरे पर मसाज करने से त्वचा मुलायम बनती है और झुर्रियों से छुटकारा मिलता है।
  5. संवेदनशील से लेकर ऑयली त्वचा तक नारियल का दूध हर तरह की त्वचा के लिए उपयुक्त है। अपने मॉइस्चराइज़िंग और ठंडक देनेवाले गुणों की वजह से यह शुष्क त्वचा और एक्ज़िमा, सोराइसिस जैसी समस्याओं से भी छुटकारा पाने में मदद करता है।
  6. नारियल के दूध में मौजूद ऐसे कई सारे पोष्टिक आहार होते हैं जो बालों को पोषण देते हैं। बालों को धोने से पहले 20- 30 मिनट तक अच्छे से मालिश करें।
  7. समय-समय पर नारियल के दूध को बालों में लगाने से पोषण वापस आ सकता है। इसके साथ ही एंटी- इंफ्लामेट्री खूबी होने के कारण रूसी से भी राहत मिलती है। नारियल का दूध त्वचा को पोषण देता है।
  8. यह एंटीऑक्सीडेंट जैसे कि विटामिन सी और मिनरल्स जैसे कि कॉपर से भरपूर है, नारियल के दूध से मालिश करने से त्वचा में खिंचाव बना रहता है और फ्री रेडिकल से भी त्वचा का बचाव रहता है। चेहरे पर नारियल के दूध की कुछ बूंदों को फेस मास्क 15 मिनट तक लगाएं। ऐसा हफ्ते में 2 से 3 बार करें और आपको अपनी त्वचा में फर्क अपने आप नज़र आ जाएगा।
  9. रोजाना लेकिन नियमित रूप से नारियल के दूध का सेवन करने से कोलेस्टॉल कंट्रोल में रहता है। इसका सेवन करने से खराब कोलेस्टॉल की मात्रा कम रहती है और अच्छे कोलेस्टॉल का लेवल बढ़ जाता है। सही मात्रा में नारियल के दूध का सेवन करने से आपके लिपिड लेवल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।


Share:

योगाभ्यास के लिए सामान्य दिशा निर्देश




yogabhyas ke liye samanya dishanirdesh

योगाभ्यास करते समय योग के अभ्यासी को नीचे दिए गए दिशा निर्देशों एवं सिद्धांतों का पालन अवश्य करना चाहिए:
अभ्यास से पूर्व

  1. शौच - शौच का अर्थ है शोधन, यह योग अभ्यास के लिए एक महत्वपूर्ण एवं पूर्व अपेक्षित क्रिया है। इसके अन्तर्गत आसपास का वातावरण, शरीर एवं मन की शुद्धि की जाती है।
  2. योग अभ्यास शांत वातावरण में आराम के साथ शरीर एवं मन को शिथिल करके किया जाना चाहिए।
  3. योग अभ्यास खाली पेट अथवा अल्पाहार लेकर करना चाहिए। यदि अभ्यास के समय कमजोरी महसूस हो तो गुनगुने पानी में थोड़ी सी शहद मिलाकर लेना चाहिए।
  4. योग अभ्यास मल एवं मूत्र का विसर्जन करने के उपरान्त प्रारम्भ करना चाहिए।
  5. अभ्यास करने के लिए चटाई, दरी, कंबल अथवा योग मैट का प्रयोग करना चाहिए।
  6. अभ्यास करते समय शरीर की गतिविधि आसानी से हो, इसके लिए सूती के हल्के और आरामदायक वस्त्र पहनना चाहिए।
  7. थकावट, बीमारी, जल्दबाजी एवं तनाव की स्थिति में योग नहीं करना चाहिए।
  8. यदि पुराने रोग, पीड़ा एवं हृदय संबंधी समस्याएं हों तो ऐसी स्थिति में योग अभ्यास शुरू करने के पूर्व चिकित्सक अथवा योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
  9. गर्भावस्था एवं मासिक धर्म के समय योग करने से पहले योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
अभ्यास के समय

  1. अभ्यास सत्र प्रार्थना अथवा स्तुति से प्रारम्भ करना चाहिए क्योंकि प्रार्थना अथवा स्तुति मन एवं मस्तिष्क को विश्रांति प्रदान करने के लिए शान्त वातावरण निर्मित करते हैं।
  2. योग अभ्यास आरामदायक स्थिति में शरीर एवं श्वास-प्रश्वास की सजगकता के साथ धीरे-धीरे प्रारम्भ करना चाहिए।
  3. अभ्यास के समय श्वास-प्रश्वास की गति नहीं रोकनी चाहिए, जब तक कि आपको ऐसा करने के लिए विशेष रूप से कहा न जाए।
  4. श्वास-प्रश्वास सदैव नासारन्ध्रों से ही लेना चाहिए, जब तक कि आपको अन्य विधि से श्वास प्रश्वास लेने के लिए न कहा जाए।
  5. शरीर को सख्त नहीं करें अथवा शरीर को किसी भी प्रकार के झटके से बचाएं।
  6. अभ्यास के समय शरीर को शिथिल रखें, शरीर को किसी भी प्रकार के झटके से बचाएं।
  7. अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के अनुसार ही योग अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के अच्छे परिणाम आने में कुछ समय लगता है, इसलिए लगातार और नियमित अभ्यास बहुत आवश्यक है।
  8. प्रत्येक योग अभ्यास के लिए ध्यातव्य निर्देश एवं सावधानियां तथा सीमाएं होती हैं। ऐसे ध्यातव्य निर्देशों को सदैव अपने मन में रखना चाहिए।
  9. योग सत्र का समापन सदैव ध्यान एवं गहन मौन तथा शांति पाठ से करना चाहिए।
अभ्यास के बाद
 अभ्यास के 20-30 मिनट के बाद स्नान करना चाहिए।
अभ्यास के 20-30 मिनट बाद ही आहार ग्रहण करना चाहिए, उससे पहले नहीं।

सात्विक विचार के लिए भोजन
आहार संबंधी दिशा निर्देश - सुनिश्चित करें कि अभ्यास के लिए शरीर एवं मन ठीक प्रकार से तैयार हैं। अभ्यास के बाद आमतौर पर शाकाहारी आहार ग्रहण करना श्रेयस्कर माना जाता है। 30 वर्ष की आयु से ऊपर के व्यक्ति के लिए बीमारी या अत्यधिक शारीरिक कार्य अथवा श्रम की स्थिति को छोड़कर एक दिन में दो बार भोजन ग्रहण करना पर्याप्त होता है।
General guidelines for yoga practice
योग किस प्रकार सहायता कर सकता है?
 योग निश्चित रूप से सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति प्रदान करने का साधन है। वर्तमान समय में हुए चिकित्सा शोधों ने योग से होने वाले कई शारीरिक और मानसिक लाभों के रहस्य प्रकट किए हैं। यही नहीं लाखों योग अभ्यासियों के अनुभव के आधार पर इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि योग किस प्रकार सहायता कर सकता है।
  • योग शारीरिक स्वास्थ्य, स्नायुतंत्र एवं कंकाल तन्त्र को सुचारू रूप से कार्य करने और हृदय तथा नाडियों के स्वास्थ्य के लिए हितकर अभ्यास है।
  • यह मधुमेह, श्वसन संबधी विकार, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप और जीवन शैली संबंधी कई प्रकार के विकारों के प्रबंधन में लाभकर है।
  • योग अवसाद, थकान, चिंता संबंधी विकार और तनाव को कम करने में सहायक है।
  • योग मासिक धर्म को नियमित बनाता है।
  • संक्षेप में यदि यह कहा जाए कि योग शरीर एवं मन के निर्माण की ऐसी प्रक्रिया है, जो समृद्ध और परिपूर्ण जीवन की उन्नति का मार्ग है, न कि जीवन के अवरोध का।


Share:

अधोमुखश्वानासन योग - परिचय, विधि एवं लाभ



अधोमुखश्वानासन (Adhomukhswanasana) 3 शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है 'अधोमुख' जिसका अर्थ होता है नीचे की तरफ मुंह करना। जबकि दूसरा शब्द है 'श्वान' जिसका अर्थ कुत्ता होता है। तीसरा शब्द है 'आसन' जिसका अर्थ है बैठना। अधोमुख श्वानासन को डाउनवर्ड फेसिंग डॉग पोज भी कहा जाता है। अधोमुख श्वानासन को भारतीय योग में बड़ा ही अहम स्थान हासिल है। अधोमुख श्वानासन को अष्टांग योग का बेहद महत्वपूर्ण आसन माना जाता है। ये आसन सूर्य नमस्कार के 7 आसनों में से एक है। योग की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसके आसन प्रकृति में पाई जाने वाली मुद्राओं और आकृतियों से प्रभावित होते हैं। योग विज्ञान ने अधोमुख श्वानासन को कुत्ते या श्वान से सीखा है। कुत्ते अक्सर इसी मुद्रा में शरीर की थकान मिटाने के लिए स्ट्रेचिंग करते हैं। यकीन जानिए, शरीर में स्ट्रेचिंग के लिए बताए गए सर्वश्रेष्ठ आसनों में से एक है। इस योगासन को करने की प्रक्रिया बहुत आसान है और कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने योगाभ्यास करना शुरू ही किया है, यह आसान कर सकता है। यह योगासन अत्यंत लाभदायक है और इसे प्रतिदिन के योगाभ्यास में अवश्य जोड़ना चाहिए।
Adhomukhswanasana
अधोमुख श्वानासन करने के फायदे/ अधोमुखश्वानासन के लाभ
  1. इंसोमेनिया दूर करने में - अधोमुख श्वानासन करने से पीठ दर्द और कमर का दर्द, थकान, सिर दर्द और अनिद्रा की बीमारी दूर हो जाती है। इसके अलावा यह आसन उच्च रक्तचाप, अस्थमा, साइटिका आदि रोग भी दूर करने में सहायक होता है।
  2. एंग्जाइटी को करे कंट्रोल - ये आसन आपकी रिलैक्स रहने में मदद करता है और दिमाग को शांति प्रदान करता है। अधोमुख श्वानासन एंग्जाइटी से लड़ने में भी बहुत मददगार साबित हो सकता है। इस आसन के अभ्यास के दौरान गर्दन और सर्वाइकल स्पाइन में खिंचाव पड़ता है। ये स्ट्रेस को दूर करने में काफी मदद करता है।
  3. एनर्जी प्रदान करने में - अधोमुख श्वानासन करने से शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होता है। इसके अलावा यह पूरे शरीर का कायाकल्प करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा यह आसन महिलाओं में मेनोपॉज के लक्षणों को दूर करने में मदद करता है।
  4. चिंता दूर करने में - अधोमुख श्वानासन करने से दिमाग शांत रहता है और हर तरह की चिंता से मुक्ति मिलती है। इस आसन को करने से गर्दन और गर्दन की हड्डी में खिंचाव उत्पन्न होता है जिसके कारण मस्तिष्क से चिंता दूर हो जाती है।
  5. पाचन सुधारने में - हालांकि अधोमुख श्वानासन में शरीर को आधा ही मोड़ा जाता है लेकिन इससे पेट की मांसपेशियां पाचन तंत्र के अंगों जैसे लिवर, किडनी और प्लीहा पर दबाव डालकर इसे संकुचित करती हैं जिसके कारण पाचन क्रिया बेहतर होती है।
  6. पेट की निचली मांसपेशियों को मजबूत बनाए - अधोमुख श्वानासन में बनने वाली शरीर की स्थिति को अगर ठीक उल्टा किया जाए तो नौकासन बन जाता है। हम सभी जानते हैं कि नौकासन शरीर में पेट की निचली मांसपेशियों को मजबूत करने के साथ ही रीढ़ को भी सहारा देता है। ये योगाभ्यास करने वालों को भी वैसे ही लाभ मिलते हैं। ये इन मांसपेशियों को मजबूत बनाने और खिंचाव पैदा करने में मदद करता है।
  7. रक्त संचार बढ़ाए - इस बात की तरफ शायद ही आपका ध्यान जाए। लेकिन अधोमुख श्वानासन में सिर दिल से नीचे की तरफ होता है जबकि आपके हिप्स ऊपर की तरफ उठे हुए होते हैं। इस आसन के अभ्यास से गुरुत्व बल की मदद से सिर की ओर नए रक्त की आपूर्ति बढ़ती है। इसीलिए ये आसन रक्त संचार बढ़ाने में मदद कर पाता है।
  8. सुधरता है पाचन तंत्र - अधोमुख श्वानासन में भले ही शरीर पूरी तरह से न मुड़ता हो, लेकिन फिर भी इस आसन से शरीर के भीतरी अंगों को अच्छी मसाज मिलती है। टांगें मुड़ने के कारण हमारे पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ता है। इस आसन से प्रभावित होने वाले अंगों में लीवर, किडनी और स्पलीन या तिल्ली शामिल हैं।
  9. हाथों और पैरों को टोन करने में - अधोमुख श्वानासन को करने के दौरान शरीर का पूरा भार हाथों और पैरों पर आकर टिकता है। इसलिए यह हाथों, पैरों एवं अन्य अंगों को टोन करने का काम करता है और उन्हें संतुलन की अवस्था में रखता है। यह आसन हाथ, पैरों के अलावा कंधे, बांहों और सीने को भी टोन करने के साथ मजबूती प्रदान करता है।
अधोमुखश्वानासन योग - Adho Mukha Svanasana
अधोमुख श्वानासन करने का सही तरीका
  1. अधोमुख श्वानासन देखने में बिल्कुल वैसा ही दिखता है जब कोई कुत्ता आगे की तरफ झुकता है। इस आसन को करने से हमें कई जबरदस्त फायदे होते हैं, जिन्हें पाने के लिए ये जरूरी है कि आप रोज इस आसन का नियमित रूप से अभ्यास करें। इस आसन की सबसे अच्छी बात यही है कि इस आसन को बेहद आसानी से कोई भी कर सकता है।
  2. सबसे पहले जमीन पर एकदम सीधे खड़े हो जाएं और उसके बाद दोनों हाथों को आगे करते हुए नीचे जमीन की ओर झुक जाएं।
  3. झुकते समय आपके घुटने सीधे होने चाहिए और कूल्हों के ठीक नीचे होने चाहिए जबकि आपके दोनों हाथ कंधे के बराबर नहीं बल्कि इससे थोड़ा सा पहले झुका होना चाहिए।
  4. अपने हाथों की हथेलियों को झुकी हुई अवस्था में ही आगे की ओर फैलाएं और उंगलियां समानांतर रखें।
  5. श्वास छोड़ें और अपने घुटनों को अधोमुख श्वानासन मुद्रा के लिए हल्का सा धनुष के आकार में मो़ड़े और एड़ियों को जमीन से ऊपर उठाएं।
  6. इस पॉइंट पर अपने कूल्हों को पेल्विस से पर्याप्त खींचें और हल्का सा प्यूबिस की ओर दबाएं।
  7. हाथों को पूरी तरह जमीन पर कंधों के नीचे से आगे की ओर फैलाए रखें, लेकिन उंगलियां जमीन पर फैली होनी चाहिए।
  8. इसके बाद अपने घुटनों को जमीन पर थोड़ा और झुकाएं और कूल्हों को जितना संभव हो ऊपर उठाएं।
  9. सिर हल्का सा जमीन की ओर झुका होना चाहिए और पीठ के लाइन में ही होनी चाहिए। अब आप पूरी तरह अधोमुख श्वानासन मुद्रा में हैं।
अधोमुख श्वान आसन की सावधानियाँ - अगर आप उच्च रक्तचाप, आँखों की केशिकाएँ कमजोर है कंधे की चोट या दस्त से पीड़ित हैं तो यह आसन न करें रक्तचाप

अधोमुख श्वानासन करने से पहले ध्यान रखने वाली बातें -
  1.  अधोमुख श्वानासन का अभ्यास सुबह के वक्त ही किया जाना चाहिए। लेकिन अगर आप शाम के वक्त ये आसन कर रहे हों तो जरूरी है कि आपने भोजन कम से कम 4 से 6 घंटे पहले कर लिया हो।
  2. ये भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आसन करने से पहले आपने शौच कर लिया हो और पेट एकदम खाली हो।
अधोमुख श्वान आसन से पहले किये जाने वाले आसन
धनुरासन और दण्डासन
अधोमुख श्वान आसन के बाद किये जाने वाले आसन

इसे भी पढ़े
  1. पश्चिमोत्तानासन योग विधि, लाभ और सावधानी
  2. नौकासन योग विधि, लाभ और सावधानियां
  3. सूर्य नमस्कार की स्थितियों में विभिन्न आसनों का समावेष एवं उसके लाभ
  4. अनुलोम विलोम प्राणायामः एक संपूर्ण व्यायाम
  5. प्राणायाम और आसन दें भयंकर बीमारियों में लाभ
  6. वज्रासन योग : विधि और लाभ
  7. सूर्य नमस्कार का महत्त्व, विधि और मंत्र
  8. ब्रह्मचर्यासन से करें स्वप्नदोष, तनाव और मस्तिष्क के बुरे विचारों को दूर
  9. प्राणायाम के नियम, लाभ एवं महत्व
  10. मोटापा घटाने अचूक के उपाय


Share:

गुटनिरपेक्षता




गुटनिरपेक्ष आन्दोलन : उद्भव एवं विकास

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप में परिवर्तन लाने वाले तत्वों में ‘गुटनिरपेक्षता’ का विशेष महत्व है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति का कारण कोई संयोग मात्र नहीं था, अपितु यह एक सुविचारित अवधारणा थी। इसका उद्देश्य नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा करना एवं युद्ध की सम्भावनाओं को रोकना था। गुटनिरपेक्ष अवधारणा के उदय के पीछे मूल धारणा यही थी कि साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उनकी स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखा जाए। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश गुटनिरपेक्ष होने का दावा करने लगे हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय विश्व दो विरोधी गुटों—सोवियत गुट और अमेरिकी गुट—में विभक्त हो चुका था और दूसरी तरफ एशिया एवं अफ्रीका के राष्ट्रों का स्वतन्त्र अस्तित्व उभरने लगा था। अमेरिकी गुट एशिया के इन नवोदित राष्ट्रों पर तरह-तरह के दबाव डाल रहा था ताकि वे उसके गुट में शामिल हो जाएँ, लेकिन एशिया के अधिकांश राष्ट्र पश्चिमी देशों की भाँति गुटबन्दी में विश्वास नहीं करते थे। वे सोवियत साम्यवाद और अमेरिकी पूँजीवाद दोनों को अस्वीकार करते थे। वे अपने आपको किसी ‘वाद’ के साथ सम्बद्ध नहीं करना चाहते थे और उनका विश्वास था कि उनके प्रदेश ‘तीसरी शक्ति’ हो सकते हैं, जो गुटों के विभाजन को अधिक जटिल सन्तुलन में परिणत करके अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में सहायक हो सकते हैं।

गुटों से अलग रहने की नीति—गुटनिरपेक्षतावाद—एशिया के नवजागरण की प्रमुख विशेषता थी। सन् 1947 में स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत ने इस नीति का पालन करना प्रारम्भ किया। उसके बाद एशिया के अनेक देशों ने इस नीति में अपनी आस्था व्यक्त की। जैसे-जैसे अफ्रीका के देश स्वतन्त्र होते गए, वैसे-वैसे उन्होंने भी इस नीति का अवलम्बन करना प्रारम्भ किया। भारत के जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने ‘तीसरी शक्ति’ की इस धारणा को काफी मजबूत बनाया।

शीत युद्ध के राजनीतिक ध्रुवीकरण ने गुटनिरपेक्षता की समझ तैयार करने में एक उत्प्रेरक का कार्य किया। लम्बे औपनिवेशिक आधिपत्य से स्वतन्त्र होने के लिए संघर्ष करने वाले राष्ट्रों के लिए किसी दूसरे आधिपत्य को स्वीकार कर लेना अत्यन्त असुविधाजनक स्थिति थी। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वे एक ऐसी भूमिका की तलाश में थे, जो उनके आत्मसम्मान और क्षमता के अनुरूप हो। क्षमता के स्तर पर किसी एक राष्ट्र के लिए ऐसी स्वतन्त्र भूमिका अर्जित कर पाना एक भागीरथी प्रयत्न था, जिसकी सम्भावनाएँ भी अत्यन्त सन्दिग्ध थीं। अतः आत्मसम्मान पर आधारित एक अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका के लिए सामूहिक पहल न केवल वांछित थी, अपितु आवश्यक भी थी। स्वतन्त्रता और सामूहिकता की इसी मानसिकता ने गुटनिरपेक्षता की वैचारिक और राजनीतिक नींव रखी। इस प्रक्रिया को शीत युद्ध के तात्कालिक वातावरण ने और अधिक गति प्रदान की।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का उदय एवं विकास

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का जन्म नव-साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध तीसरी दुनिया के राष्ट्रों के संगठित होने के प्रयासों से हुआ। यद्यपि आधिकारिक रूप से इसकी स्थापना वर्ष 1961 में बेलग्रेड में आयोजित गुटनिरपेक्ष देशों के प्रथम सम्मेलन के साथ हुई, परन्तु इसके बीज द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ही अंकुरित हो चुके थे। इसकी एक झलक हमें एशियाई सम्बन्ध सम्मेलन में दिखाई पड़ती है।



Share:

वारसा पैक्ट



जब पश्चिमी जर्मनी भी 9 मई 1955 को नाटो का सदस्य बना लिया गया और पश्चिमी राष्ट्रों ने जर्मनी का पुनः शस्त्रीकरण कर दिया तो इसमें सोवियत संघ तथा अन्य पूर्वी यूरोप के राष्ट्रों के लिए चिन्तित होना स्वाभाविक था। पश्चिमी शाक्तियों ने नाटो, सीटो, सेण्टो, द्वारा सोवियत संघ के इर्द-गिर्द घेरे की स्थिति पैदा कर दी थी। अतः यह स्वभाविक था कि सोवियत संघ सैनिक गठबन्धनों का उत्तर सैनिक गठबन्धन से देता।

साम्यवादी राष्ट्रों का एक सम्मेलन 11 से 14 मई 1955 को वारसा में बुलाया गया। इस सम्मेलन में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सात राष्ट्रों अल्बानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, पूर्वी जर्मनी हंगरी, पोलैण्ड तथा रोमानिया ने भाग लिया। यूगोस्लाविया ने इसमें भाग नहीं लिया। 14 मई 1955 को सम्मेलन में भाग लेने वाले राष्ट्रों ने मित्रता एवं पारस्पारिक सहयोग की सन्धि पर हस्ताक्षर किये जिसे ‘वारसा पैक्ट‘ कहा जाता है।
इस पैक्ट की मुख्य व्यवस्था धारा 3 में हैं। इसके अनुसार यदि किसी सदस्य पर सशस्त्र आक्रमण होता है तो अन्य देश उसकी सैनिक सहायता करेंगे। इसके लिए धारा 5 में एक ‘संयुक्त सैनिक कमान’ बनायी गयी। सैनिक सहयोग के अतिरिक्त वारसा पैक्ट हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों में आर्थिक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहयोग की व्यवस्था भी करती है। इसमें संन्धिकर्ता राष्ट्र पारस्पारिक संबंधों में शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिमय साधनों से सुलझाने का प्रयास करेंगे।
वारसा पैक्ट का मुख्य अंग राजनीतिक परामर्शदात्री समिति है। आवश्यकता पड़ने पर यह सहायक अंगो की स्थापना कर सकती है। प्रत्येक सदस्य राज्य का एक एक प्रतिनिधि राजनीतिक परामर्शदात्री समिति का सदस्य होता है। इसकी बैठक वर्ष में दो बार होती है। दूसरे कार्यों में सहायता करने के लिए सचिवालय है जिसका सर्वोच्च पदाधिकारी महासचिव होता है। 1989-90 में पूर्वी यूरोप में साम्यवादी व्यवस्थाओं के पतन तथा लोकतन्त्रात्मक व्यवस्थाओं के आगमन के बाद तथा शीतयुद्ध कें अंत की प्रक्रिया के साथ 31 मार्च 1991 को वारसा पैक्ट समाप्त कर दिया गया।


Share:

उत्तर प्रदेश गुण्डा नियन्त्रण अधिनियम 1970



 UP Control of Goondas Act, 1970
UP Control of Goondas Act, 1970
 
धारा-1, इसका प्रसार सम्पूर्ण उ0प्र0 में होगा।
धारा-2, परिभाषायें -  क. जिला मजिस्ट्रेट- जिला मजिस्ट्रेट के अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अपर जिला मजिस्ट्रेट भी होगा अधिसूचना सं0 1528/6-पु0-9-30(2)(1)/83 दिनाॅंक 4 जुलाई 1991 के द्वारा राज्यपाल महोदय समस्त अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन तथा वित्त राजस्व)को क्रमशः अपनी अपनी तैनाती के जिले की सीमा के भीतर उक्त अधिनियम के अधीन जिला मजिस्ट्रेट की समस्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिये शक्ति प्रदान करते हैं।

ख. गुण्डा-गुण्डा का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है-
  1. जो स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या सरगना के रुप में भा0द0सं0 की धारा 153 या धारा 153-ख, या धारा 294 या उक्त संहिता के अध्याय 16,17,22 के अधीन दंडनीय अपराध को अभ्यस्तः करता है या करने का प्रयास करता है या करने के लिये दुष्प्रेरित करता है या
  2. जो स्त्री तथा लड़की अनैतिक व्यापार दमन अधिनियम 1956 के अधीन दंडनीय अपराध के लिये न्यायालय से सिद्धदोष हो चुका है।
  3. जो उ0प्र0 आबकारी अधिनियम 1910 या सार्वजनिक जुआ अधिनियम या आयुध अधिनियम 1959 की धारा 25,27,या धारा 29 के अधीन दंडनीय अपराध के लिये कम से कम तीन बार दंडित हो चुका हो।
  4. जिसकी सामान्य ख्याति दुस्साहसिक और समाज के लिये एक खतरनाक व्यक्ति की है या
  5. जो अभ्यस्तः महिलाओं या लड़कियों को चिढाने के लिये अश्लील टिप्पणियां करता हो।
  6. जो दलाल हो- इसके अन्तर्गत वे व्यक्ति आयेगें जो अपने लिये या दूसरों के लिये लाभ प्राप्त करते हों, प्राप्त करने के लिये सहमत होते हो या प्रयास करते हों जिससे वह किसी लोक सेवक को या सरकार, विधान मंडल, संसद के किसी सदस्य को किसी पक्षपात के द्वारा कोई कार्य करने या न करने के लिये प्रेरित करते हों।
  7. जो मकानों पर अवैध कब्जा करते हैं।
स्पष्टीकरण-‘‘मकानों पर कब्जा करने वाले से’’ तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो नाजायज/बिना अधिकार कब्जा ग्रहण करता है या ग्रहण करने का प्रयास करता है या करने के लिये सहायता करता है या दुष्प्रेरित करता है या वैध रुप से प्रवेश करके भूमि, बाग, गैरेजो को शामिल करके भवन या भवन से संलग्न बाहरी गृहों के कब्जा में अवैध रुप से बना रहता है।
धारा-3, गुण्डों का निष्कासन आदि- यदि जिला मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति गुण्डा है और जनपद में या उसके किसी भाग में उसकी गतिविधियाॅं या कार्य व्यक्तियों की जान या उनकी सम्पत्ति के लिये संत्रास,संकट अथवा नुक्सान उत्पन्न कर रही हैं या यह विश्वास करने का आधार है कि वह जनपद में या उसके किसी भाग में धारा-2, में वर्णित खण्ड-ख, के उपखण्ड-1 से 3 तक वर्णित अपराधों में लगा हुआ है अथवा उसके लगने की संभावना है और गवाह उसके डर के मारे उसके विरुद्ध गवाही देने के लिये तैयार नही है तो जिला मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को एक लिखित नोटिस के द्वारा उसके विरुद्ध लगाये आरोपों से सूचित करेगें और उसे अपना उत्तर देने के लिये अवसर प्रदान करेगें।
2. जिस व्यक्ति को नोटिस जारी किया गया है उसको किसी अधिवक्ता के द्वारा अपनी प्रतिरक्षा करने का अधिकार है और यदि वह चाहता है तो उसको व्यक्तिगत रुप से सुने जाने का भी अवसर दिया जायेगा और वह अपनी प्रतिरक्षा में गवाह भी पेश कर सकता है।
3. यदि जिला मजि0 का यह समाधान हो जाता है कि उस व्यक्ति की गतिविधियाॅं धारा-3 की उपधारा-1, के अन्तर्गत आती हैं तो वह उस व्यक्ति को अपने जनपद के किसी क्षेत्र से या जनपद से 6 माह तक के लिये निष्कासन का आदेश कर सकता है। इसके अतिरिक्त वह यह भी आदेश कर सकते हैं कि वह आदेश में निर्दिष्ट प्राधिकारी या व्यक्ति को अपनी गतिविधियों की सूचना देने अथवा उसके समक्ष उपस्थित होने अथवा उक्त दोनों कार्य करने की अपेक्षा कर सकते है।
धारा-4, निष्कासन के पश्चात अस्थाई रुप से वापिस आने की अनुमति-जिला मजि0 किसी गुण्डे के निष्कासन के बाद उसे अस्थाई रुप से उस क्षेत्र में आने की अनुमति दे सकते है जहाॅं से वह निष्कासित किया गया था।
धारा-5, आदेश की अवधि में बढ़ोत्तरी-जिला मजि0 धारा 3 के अधीन दिये गये आदेश में निर्दिष्ट अवधि को,सामन्य जनता के हित में समय-समय पर बढा सकतें है,किन्तु इस प्रकार बढायी गयी अवधि किसी भी दशा में कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न होगी।
धारा-6 , अपील- धारा 3 या 4 या 5 के अधीन दिये गये किसी आदेश से क्षुब्ध व्यक्ति ऐसे आदेश के दिनांक से 15 दिन के भीतर आयुक्त के पास अपील कर सकता है। आयुक्त अपील का निस्तारण होने तक आदेश के प्रवर्तन को स्थगित कर सकते है।
धारा-10, धारा 3 से 6 के अधीन दिये गये आदेशों का उल्लंघन करने पर- यदि कोई गुडां धारा 3,4,5,6 के अधीन दिये गये आदेशों का उल्लंघन करे तो न्यूनतम 6 माह से जो 3 वर्ष तक का हो सकता है के कठिन कारावास से और जुर्माने से दंडित किया जायेगा।
धारा-11, निष्कासित गुंडे द्वारा आदेशों का उल्लंघन करते हुये पुनः प्रवेश आदि पर उसका बल प्रयोग द्वारा हटाया जाना-
1. जिला मजिस्ट्रेट उसे गिरफतार करा सकता है और पुलिस की अभिरक्षा में उक्त आदेश में निर्दिष्ट क्षेत्र के बाहर किसी ऐसे स्थान के लिये,जैसा वह निर्देश दे हटवा सकता है।
2.कोई पुलिस अधिकारी ऐसे व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर तुरंत निकटतम मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करेगा,जो उसे जिला मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करायेगा जो पुलिस अभिरक्षा में उसे हटवा सकेगा।
3. इस धारा के उपबन्ध धारा 10 के उपबन्धों के अतिरिक्त है और धारा 10 के प्रभाव को कम नही करते।


Share: