बैस राजपूत वंश
बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है, हालांकि कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं।
गोत्र – भारद्वाज
प्रवर – तीन: भारद्वाज, बृहस्पति और अंगिरस
वेद – यजुर्वेद
कुलदेवी – कालिका माता
इष्टदेव – भगवान शिव
ध्वज – आसमानी तथा नाग-चिह्न
प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्व
शालिवाहन – शालिवाहन राजा (जिन्हें कभी-कभी गौतमीपुत्र शातकर्णी के रूप में भी जाना जाता है) को शालिवाहन शक के शुभारंभ का श्रेय दिया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने वर्ष 78 ईस्वी में उज्जयिनी के नरेश विक्रमादित्य को युद्ध में पराजित किया था और इस युद्ध की स्मृति में इस युग का प्रारंभ किया। एक मत यह भी है कि शक युग, उज्जैन (मालवा) के राजा विक्रमादित्य के वंश पर शकों की विजय के साथ आरंभ हुआ।
हर्षवर्धन – हर्षवर्धन प्राचीन भारत के एक राजा थे, जिन्होंने उत्तरी भारत में एक सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया। वे अंतिम हिंदू सम्राट माने जाते हैं, जिन्होंने पंजाब को छोड़कर लगभग समस्त उत्तरी भारत पर शासन किया। शशांक की मृत्यु के उपरांत वे बंगाल को भी जीतने में सफल हुए। हर्षवर्धन के शासनकाल का इतिहास मगध से प्राप्त दो ताम्रपत्रों, राजतरंगिणी, चीनी यात्री युवानच्वांग (ह्वेनसांग) के विवरण तथा हर्ष एवं बाणभट्ट द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथों में प्राप्त होता है। उनके पिता का नाम प्रभाकरवर्धन था। राजवर्धन उनके बड़े भाई तथा राजश्री उनकी बड़ी बहन थीं।
त्रिलोकचंद
अभयचंद
राणा बेनी माधव बख्श सिंह
मेजर ध्यानचंद आदि।
बैस राजपूतों की शाखाएँ
बैस राजपूतों के प्राचीन राज्य एवं ठिकाने
प्रतिष्ठानपुरी, स्यालकोट, स्थानेश्वर, मुंगीपट्टम्म, कन्नौज, बैसवाड़ा, कसमांडा, बसंतपुर, खजूरगाँव, थालराई, कुर्रिसुदौली, देवगाँव, मुरारमऊ, गौंडा, थानगाँव, कटधर आदि।
बैस राजपूतों का वर्तमान निवास
उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र स्थित बैसवाड़ा, मैनपुरी, एटा, बदायूँ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, बाँदा, हमीरपुर, प्रतापगढ़, सीतापुर, रायबरेली, उन्नाव, लखनऊ, हरदोई, फतेहपुर, गोरखपुर, बस्ती, मिर्जापुर, गाज़ीपुर, गोंडा, बहराइच और बाराबंकी में इनकी बड़ी आबादी है। इसके अतिरिक्त बिहार, पंजाब, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, पाकिस्तान तथा मध्य प्रदेश एवं राजस्थान के कुछ भागों में भी इनकी उपस्थिति पाई जाती है।
परम्पराएँ
बैस राजपूत नागों को नहीं मारते तथा नाग-पूजा का इनके जीवन में विशेष महत्व है। इनके ज्येष्ठ भ्राता को ‘टिकायत’ कहा जाता था और स्वतंत्रता-पूर्व काल तक संपत्ति का बड़ा भाग उसी को प्राप्त होता था। मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही निवास करता था तथा अन्य भाई अलग किले अथवा मकान बनाकर रहते थे। बैस राजपूतों में आपसी भाईचारा अत्यधिक माना जाता है। बिहार के सोनपुर पशु मेले का प्रारंभ भी बैस राजपूतों द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है।
बैस क्षत्रियों की उत्पत्ति
बैस राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं—
ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड़ कृत ‘राजपूत वंशावली’ (पृष्ठ 112-114) के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु, जो बसाति जनपद के राजा थे, उनके वंशज बैस राजपूत कहलाए। बसाति जनपद महाभारत काल तक विद्यमान रहा।
देवी सिंह मंडावा कृत ‘राजपूत शाखाओं का इतिहास’ (पृष्ठ 67-74) के अनुसार वैशाली से निकास के कारण यह वंश वैस, बैस अथवा वैश कहलाया। उनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं। उनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा की सहायता से उन्नति की थी, इसलिए बैस राजपूत नाग-पूजा करते हैं तथा उनका चिह्न भी नाग है।
महाकवि बाणभट्ट ने सम्राट हर्षवर्धन, जो बैस क्षत्रिय थे, उनकी बहन राज्यश्री तथा कन्नौज के मौखरी (मखवान, झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्यवंश और चंद्रवंश का मिलन बताया है। मौखरी चंद्रवंशी थे, अतः इससे बैसों का सूर्यवंशी होना सिद्ध होता है।
महान इतिहासकार गौरीशंकर ओझा द्वारा रचित राजपूताना का इतिहास (पृष्ठ 154-162) में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी बताया गया है।
श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश (पृष्ठ 78, 79 एवं 368, 369) के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
डॉ. देवीलाल पालीवाल द्वारा संपादित कर्नल जेम्स टॉड कृत राजपूत जातियों का इतिहास (पृष्ठ 182) में भी बैसों को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना गया है।
ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में भी बैस वंश को स्पष्ट रूप से सूर्यवंशी बताया गया है।
इनके ध्वज में नाग-चिह्न होने के कारण कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी मानते हैं। लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है। अतः कुछ विद्वान बैस राजपूतों को लक्ष्मण का वंशज तथा नागवंशी मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला, जिसने तक्षशिला की स्थापना की। बाद में तक्षक नाग के वंशज वैशाली आए और उन्हीं से बैस राजपूत शाखा का प्रारंभ हुआ।
कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुंदरभान अथवा वयस कुमार था, जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया। कहा जाता है कि उन्होंने सहारनपुर की स्थापना की।
कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीरपुंडीर ने 12वीं शताब्दी के अंत में राजा अभयचंद्र को 22 परगने दहेज में दिए। इन्हीं बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा अथवा बैस कहलाने लगा।
कुछ विद्वान इन्हें गौतमीपुत्र शातकर्णी (शालिवाहन) का वंशज मानते हैं, जबकि कुछ के अनुसार ‘बैस’ शब्द का अर्थ उन क्षत्रियों से है, जिन्होंने विशाल भू-भाग पर अधिकार स्थापित किया हो।
बैस वंश की उत्पत्ति के विभिन्न मतों का विश्लेषण एवं निष्कर्ष
बैस राजपूत नाग-पूजा करते हैं और उनके ध्वज में नाग-चिह्न है, किंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वे नागवंशी हैं। महाकवि बाणभट्ट ने सम्राट हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री तथा मौखरी वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्यवंश और चंद्रवंश का मिलन बताया है। मौखरी चंद्रवंशी थे, अतः बैसों का सूर्यवंशी होना प्रमाणित होता है।
लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार माना जाता है, किंतु वे नागवंशी नहीं, बल्कि रघुवंशी थे। उनकी संतानों को आज प्रतिहार (परिहार) और मल्ल राजपूतों का पूर्वज माना जाता है।
जिन विद्वानों ने 12वीं शताब्दी में धीरपुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा बताया तथा उनके द्वारा अभयचंद्र को 22 परगने दहेज में दिए जाने से बैस नामकरण का अनुमान लगाया है, उनका मत ऐतिहासिक दृष्टि से विवादास्पद प्रतीत होता है। धीरपुंडीर गौतमवंशी नहीं, बल्कि पुंडीर क्षत्रिय थे और उस समय हरिद्वार क्षेत्र के शासक माने जाते थे।
बाणभट्ट तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में ही सम्राट हर्ष को बैस अथवा वैशवंशी कहा है। अतः 12वीं शताब्दी में बैस वंशनाम की उत्पत्ति का मत तार्किक नहीं प्रतीत होता।
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि यदि बैस परंपराओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार अथवा सुंदरभान सहारनपुर क्षेत्र में आए थे, तो उनके वंशज आगे कहाँ गए।
बैस वंश की एक शाखा त्रिलोकचंदी है। सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय में भी त्रिलोकचंदी शाखा पाई जाती है। इन्हीं जैनियों में राजा साहरनवीर सिंह हुए, जिन्होंने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया। उस समय सहारनपुर और हरिद्वार का क्षेत्र पुंडीर शासकों के नियंत्रण में था। इसलिए यह संभावना व्यक्त की जाती है कि शालिवाहन के कुछ वंशज इस क्षेत्र में आए हों तथा बाद में जैन धर्म ग्रहण कर व्यापारिक वर्ग में सम्मिलित हो गए हों। यद्यपि यह एक अनुमान मात्र है।
गौतमीपुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं, किंतु नासिक शिलालेख में गौतमीपुत्र श्री शातकर्णी को ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ तथा ‘क्षत्रियों का मान-मर्दन करने वाला’ जैसी उपाधियों से अलंकृत किया गया है। इसी शिलालेख में उनकी तुलना परशुराम से भी की गई है। साथ ही, दात्रीशतपुतलिका में भी शालिवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण तथा नागजाति से उत्पन्न बताया गया है। अतः गौतमीपुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंश के शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि बैस वंश को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना जाता है।
उपरोक्त सभी मतों का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं। प्राचीन काल में सूर्यवंशी इक्ष्वाकुवंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य की स्थापना की थी। विशाल के एक पुत्र लिच्छवी थे। इन्हीं से आगे चलकर लिच्छवी, शाक्य (गौतम), मोरिय (मौर्य), कुशवाहा (कछवाहा) तथा बैस शाखाओं का विकास हुआ।
जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नंदवंश का शासन स्थापित हुआ, तब क्षत्रियों पर अत्याचार बढ़ने लगे। परिणामस्वरूप वैशाली के अनेक सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब, तक्षशिला, महाराष्ट्र, स्थानेश्वर, दिल्ली आदि क्षेत्रों में जाकर बस गए। दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय तक बैस वंशियों का प्रभाव माना जाता है। बैसों की एक शाखा पंजाब में जाकर बसी। उन्होंने वहाँ श्रीकंठ नामक नगर पर अधिकार किया, जो आगे चलकर स्थानेश्वर कहलाया।
दिल्ली क्षेत्र स्थानेश्वर के निकट होने के कारण दिल्ली शाखा, स्थानेश्वर शाखा तथा सहारनपुर शाखा के बीच किसी न किसी प्रकार का संबंध माना जाता है। बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी स्थानेश्वर से हटाकर कन्नौज में स्थापित की। उन्होंने बंगाल, असम, पंजाब, राजपूताना, मालवा तथा नेपाल तक अपने राज्य का विस्तार किया और स्वयं ‘राजपुत्र शिलादित्य’ की उपाधि धारण की।
हर्षवर्धन के पश्चात इस वंश का शासन समाप्त हो गया और उनके वंशज कन्नौज से आगे बढ़कर अवध क्षेत्र में फैल गए। इन्हीं में आगे चलकर त्रिलोकचंद नामक प्रसिद्ध व्यक्ति हुए, जिनसे बैस वंश की अनेक शाखाएँ चलीं।
त्रिलोकचंद के बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज ‘भाले सुल्तान’ शाखा के बैस कहलाए, जिन्होंने सुल्तानपुर की स्थापना की। इन्हीं बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए, जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सालार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित पराजित किया। इस संघर्ष में राजा सुहेलदेव ने वीरता का परिचय दिया और अंततः स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हुए।
चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा की पत्नी को तुर्कों से बचाया। इससे प्रसन्न होकर गौतम राजा ने अपनी पुत्री का विवाह अभयचंद से कर दिया तथा 1440 गाँव दहेज में प्रदान किए। कहा जाता है कि इन क्षेत्रों में विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य की नींव रखी, जिसे आगे चलकर बैसवाड़ा या बैसवारा कहा गया। इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्यावर्त के एक बड़े भू-भाग में फैल गए।
सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व बैस राजपूतों का इतिहास
बैस राजपूत परंपरागत रूप से मानते हैं कि उनका राज्य प्रारंभ में मुर्गीपाटन में था। जब उस पर शत्रुओं ने अधिकार कर लिया, तब वे प्रतिष्ठानपुर आ गए। इसी वंश में आगे चलकर राजा शालिवाहन हुए, जिन्होंने विक्रमादित्य को पराजित किया और शक संवत् का प्रारंभ किया।
कुछ इतिहासकार गौतमीपुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताते हैं तथा पैठण को प्रतिष्ठानपुर मानते हैं। कुछ विद्वान स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताते हैं। किंतु ये मत सर्वमान्य नहीं हैं। इतिहास में कई बार एक ही नाम वाले प्रसिद्ध व्यक्तियों के कारण वंशावलियों में भ्रम उत्पन्न हो गया है। शालिवाहन नाम के अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति विभिन्न वंशों में हुए हैं। भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए तथा सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था।
विक्रम संवत् और शक संवत् के बीच लगभग 135 वर्षों का अंतर है, अतः विक्रमादित्य और गौतमीपुत्र शातकर्णी का समकालीन होना संभव नहीं प्रतीत होता। इसके अतिरिक्त, नासिक शिलालेख में गौतमीपुत्र शातकर्णी को स्पष्ट रूप से ब्राह्मण कहा गया है। इसलिए उनका सूर्यवंशी बैस वंश से संबंध स्थापित करना कठिन प्रतीत होता है।
वास्तव में बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण भारत का पैठण था और न ही पंजाब का स्यालकोट। इसे प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) के निकट झूंसी स्थित प्रतिष्ठानपुर माना जाता है। इतना अवश्य प्रतीत होता है कि बैस वंश में शालिवाहन नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए, जिन्होंने प्रतिष्ठानपुरी में एक विशाल बैस राज्य स्थापित किया।
शालिवाहन ने अनेक राज्यों को जीतकर उनकी राजकुमारियों को अपने महल में लाया। इससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ अप्रसन्न होकर अपने पिता के घर चली गईं। उन तीन रानियों की संतानों को आगे चलकर भी बैस कहा जाता रहा, जबकि बाद में आई हुई रानियों की संतानों को कठबैस कहा गया। ये प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग) के शासक माने जाते हैं।
इन्हीं शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली (जिसका उस समय संभवतः कोई अन्य नाम रहा होगा) पर अधिकार स्थापित किया। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को पराजित कर शासन स्थापित किया। इसके बाद विक्रमचंद, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचंद्र, कल्याणचंद्र, भीमचंद्र, बोधचंद्र, गोविंदचंद्र तथा प्रेमो देवी ने दो सौ वर्षों से अधिक समय तक शासन किया।
वास्तव में ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र शासक न होकर पहले गुप्त वंश तथा बाद में बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन के सामंत के रूप में शासन करते रहे होंगे। इसके बाद दिल्ली से इस वंश का प्रभाव समाप्त हो गया और सातवीं शताब्दी के पश्चात पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों (अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली की स्थापना की। वस्तुतः बैसवाड़ा ही बैसों का प्रमुख राज्य माना जाता है। (देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास, पृष्ठ 70 तथा ईश्वर सिंह मढ़ाड़ कृत राजपूत वंशावली, पृष्ठ 113-114)
बैस वंश की शाखाएँ
कोट बाहर बैस
शालिवाहन की जो रानियाँ अपने पीहर चली गई थीं, उनकी संतानों को कोट बाहर बैस कहा जाता है।
कठ बैस
शालिवाहन द्वारा विजित राज्यों से आई रानियों की संतानों को कोट बैस अथवा कठ बैस कहा जाता है।
डोडिया बैस
डोडिया खेड़ा में निवास करने के कारण यह शाखा डोडिया बैस कहलाती है। इनका संबंध हल्दौर, जिला बिजनौर से माना जाता है।
त्रिलोकचंदी बैस
त्रिलोकचंद के वंशज त्रिलोकचंदी बैस कहलाते हैं। इनकी चार उपशाखाएँ हैं—
प्रतिष्ठानपुरी बैस
प्रतिष्ठानपुर में निवास करने के कारण यह शाखा प्रतिष्ठानपुरी बैस कहलाती है।
चंदोसिया
ठाकुर उदय बुधसिंह बैसवाड़ा से सुल्तानपुर के चंदोर में जाकर बसे। उनकी संतानों को चंदोसिया बैस कहा जाता है।
रावत
यह शाखा मुख्यतः फतेहपुर तथा उन्नाव क्षेत्र में पाई जाती है।
कुम्भी एवं नरवरिया
ये शाखाएँ मुख्यतः बैसवाड़ा क्षेत्र में पाई जाती हैं।
बैसवंशी राजपूतों की वर्तमान स्थिति
बैस राजपूत वंश वर्तमान समय में भी एक प्रभावशाली एवं प्रतिष्ठित वंश माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियरों में भी इस वंश की संपन्नता तथा कुलीनता का उल्लेख विस्तार से मिलता है। अवध तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के बैसवाड़ा क्षेत्र में अनेक बड़े जमींदार बैस वंश से संबंधित थे।
सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बैसवंशी राणा बेनी माधव बख्श सिंह तथा अन्य अनेक बैस जमींदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। बैस राजपूतों द्वारा अंग्रेजी शासन का प्रबल विरोध किए जाने के बावजूद अंग्रेज उनकी अनेक जमींदारियों को समाप्त करने का साहस नहीं कर सके।
बैस राजपूत अपने क्षेत्रों में सम्मानित एवं प्रभावशाली माने जाते रहे हैं। स्वच्छ, सलीकेदार एवं आकर्षक वस्त्र धारण करना उनकी विशेष पहचान माना जाता था। अंग्रेजी शासनकाल से ही उनके विशाल एवं पक्के आवास उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाते थे।
उनके संबंध में एक अंग्रेजी विवरण में उल्लेख मिलता है कि—
"The Bais Rajput became so rich at a time it is recorded that each Bais Rajput held lakhs of rupees, which could buy them nearly anything. This wealth caused the Bais Rajput to become the best dressed and housed people in the areas they resided."
अर्थात एक समय ऐसा था जब अनेक बैस राजपूत अत्यंत संपन्न थे और उनके पास लाखों रुपये की संपत्ति होती थी। इसी समृद्धि के कारण वे अपने निवास क्षेत्रों में सर्वाधिक अच्छे वस्त्र पहनने वाले तथा श्रेष्ठ आवासों में रहने वाले लोगों में गिने जाते थे।
जमींदारी के अतिरिक्त बैस राजपूत राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में भी निरंतर कीर्तिमान स्थापित करते रहे हैं। भारत और पाकिस्तान में अनेक बड़े व्यापारी तथा राजनेता बैस वंश से संबंधित रहे हैं, जिनमें से कई ने विदेशों तक अपने व्यापार का विस्तार किया है।
राजनीति और व्यापार के अतिरिक्त खेल जगत में भी बैस वंश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विश्वविख्यात हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद तथा उनके भाई कैप्टन रूप सिंह जैसे महान खिलाड़ी इसी वंश में उत्पन्न हुए। इसके अतिरिक्त अनेक प्रशासनिक अधिकारी, सैन्य अधिकारी तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तित्व भी बैस वंश का नाम गौरवान्वित कर रहे हैं।
वास्तव में जिस सूर्यवंशी बैस वंश में शालिवाहन, हर्षवर्धन, त्रिलोकचंद, अभयचंद, राणा बेनी माधव बख्श सिंह तथा मेजर ध्यानचंद जैसे महान व्यक्तित्व हुए, उसी वंश के लोग आज भारत, पाकिस्तान, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, कनाडा तथा यूरोप के विभिन्न देशों में निवास कर रहे हैं। वे अपनी योग्यता, परिश्रम और सामाजिक योगदान के माध्यम से अपने पूर्वजों की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
बैस राजपूत समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं, सामाजिक संगठन, पारिवारिक मूल्यों तथा ऐतिहासिक गौरव के प्रति विशेष आस्था रखता है। समाज के अनेक सदस्य शिक्षा, प्रशासन, सेना, राजनीति, उद्योग, व्यापार, खेल तथा अन्य विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।
इस प्रकार बैस वंश भारतीय क्षत्रिय परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है, जिसका इतिहास अनेक किंवदंतियों, परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भों तथा सामाजिक उपलब्धियों से समृद्ध रहा है। यद्यपि इसकी उत्पत्ति एवं प्रारंभिक इतिहास के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं, तथापि बैस समाज स्वयं को मुख्यतः सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित मानता है और उसी गौरवशाली विरासत का संवाहक समझता है।
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उपसंहार
बैस राजपूत वंश का इतिहास भारतीय क्षत्रिय परंपरा के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक माना जाता है। इस वंश से संबंधित ऐतिहासिक, पारंपरिक एवं वंशावलीगत विवरणों में अनेक मतभेद अवश्य मिलते हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि बैस समाज ने विभिन्न कालखंडों में राजनीतिक, सामाजिक, सैन्य एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
हर्षवर्धन, राणा बेनी माधव बख्श सिंह तथा मेजर ध्यानचंद जैसे व्यक्तित्वों के कारण इस वंश का नाम भारतीय इतिहास और समाज में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्तमान समय में भी बैस समाज शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, व्यापार, सेना और खेल जगत में सक्रिय भूमिका निभा रहा है तथा अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है।
इस प्रकार बैस राजपूत वंश का इतिहास केवल अतीत की स्मृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।