आय-कर अधिनियम, 1961 Income Tax Act 1961






  • अध्याय 1 - प्रारंभिक
    • धारा - 1 : संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ
    • धारा - 2 : परिभाषाएं
    • धारा - 3 : "पूर्व वर्ष" की परिभाषा
  • अध्याय 2 - प्रभार का आधार
    • धारा - 4 : आय-कर का प्रभार
    • धारा - 5 : कुल आय की परिधि
    • धारा - 5क : पुर्तगाली सिविल कोड द्वारा शासित पति या पत्नी के बीच आय का प्रभाजन
    • धारा - 6 : भारत में निवास
    • धारा - 7 : प्राप्त हुई समझी गयी आय
    • धारा - 8 : लाभांश आय
    • धारा - 9 : भारत में प्रोद्भूत या उद्भूत हुई समझी गयी आय
    • धारा - 9क : भारत में कारबार संबंध गठित न करने वाले क्रियाकलाप
  • अध्याय 3 - आय जो कुल आय का भाग नहीं है
    • धारा - 10 : आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है
    • धारा - 10क : मुक्त व्यापार क्षेत्र में नवस्थापित औद्योगिक उपक्रमों आदि के बारे में विशेष उपबंध
    • धारा - 10कक : विशेष आर्थिक जोनों में नए सिरे से स्थापित यूनिटों की बाबत विशेष उपबंध
    • धारा - 10ख : नवस्थापित शत-प्रतिशत निर्यातोन्मुख उपक्रमों की बाबत विशेष उपबंध
    • धारा - 10खक : कतिपय वस्तुओं या चीजों के निर्यात के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 10खख : कतिपय मामलों में कम्प्यूटर कार्यक्रमों का अर्थ
    • धारा - 10ग : पूर्वोत्तर क्षेत्र में कतिपय औद्योगिक उपक्रमों की बाबत विशेष उपबंध
    • धारा - 11 : पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित संपत्ति से आय
    • धारा - 12 : अभिदायों से होने वाली न्यासों या संस्थाओं की आय
    • धारा - 12क : धारा 11 और 12 को लागू किए जाने संबंधी शर्तें
    • धारा - 12कक : रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया
    • धारा - 13 : कतिपय दशाओं में धारा 11 का लागू न होना
    • धारा - 13क : राजनैतिक दलों की आय के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 13ख : निर्वाचन न्यास को प्राप्त स्वैच्छिक अभिदायों से संबंधित विशेष उपबंध
  • अध्याय 4 - कुल आय की संगणना
    • धारा - 14 : आय के शीर्ष
    • धारा - 14क : ऐसी आय के संबंध में किया गया व्यय, जो कुल आय 27 में सम्मिलित नहीं किया जा सकता
    • धारा - 15 : वेतन
    • धारा - 16 : वेतन से कटौतियां
    • धारा - 17 : ''वेतन'', ''परिलब्धि'' और ''वेतन के बदले में लाभ'' की परिभाषा
    • धारा - 18 : धारा 18 से 21 का वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया।
    • धारा - 22 : गृह संपत्ति से आय
    • धारा - 23 : वार्षिक मूल्य किस प्रकार अवधारित किया जाता है
    • धारा - 24 : गृह संपत्ति से होने वाली आय में से कटौतियां
    • धारा - 25 : गृह संपत्ति से आय में से कटौती न किए जाने योग्य रकमें
    • धारा - 25क : किराए के बकाया और वसूल न किए गए किराए के पश्चात्वर्ती प्राप्त होने के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 26 : सह-स्वामियों के स्वामित्वाधीन संपत्ति
    • धारा - 27 : ''गृह संपत्ति का स्वामी'', ''वार्षिक प्रभार'' आदि की परिभाषा
    • धारा - 28 : कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ
    • धारा - 29 : कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ से आय की संगणना कैसे की जाएगी
    • धारा - 30 : भवनों के लिए किराया, रेट, कर, मरम्मत और बीमा
    • धारा - 31 : मशीनरी, संयंत्र और फर्नीचर की मरम्मत और बीमा
    • धारा - 32 : अवक्षयण
    • धारा - 32क : विनिधान मोक
    •  धारा - 32कख : विनिधान निक्षेप लेखा
    • धारा - 32कग : नए संयंत्र या मशीनरी में विनिधान
    • धारा - 32कघ : कतिपय राज्यों में अधिसूचित पिछडे़ क्षेत्रों में नए संयंत्र या मशीनरी में विनिधान
    • धारा - 33 : विकास रिबेट
    • धारा - 33क : विकास मोक
    • धारा - 33कख : चाय विकास खाता, काफी विकास खाता और रबड़ विकास खाता
    • धारा - 33कखक : स्थल पुन:स्थापन निधि
    • धारा - 33कग : पोत परिवहन कारबार के लिए आरक्षितियां
    • धारा - 33ख : पुनर्वास मोक
    • धारा - 34 : अवक्षयण मोक और विकास रिबेट के लिए शर्तें
    • धारा - 34क : कुछ देशी कंपनियों की दशा में सीमित अवधि के लिए शेष अवक्षयण और शेष विनिधान मोक पर निर्बन्धन (पाबंदियां)
    • धारा - 35 : वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय
    • धारा - 35क : पेटेंट अधिकारों या कापीराइट (प्रतिलिप्याधिकारों) के अर्जन पर व्यय
    • धारा - 35कख : व्यवहार ज्ञान पर व्यय
    • धारा - 35कखक : दूर-संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम के उपयोग का अधिकार अभिप्राप्त करने के लिए व्यय
    • धारा - 35कखख : दूरसंचार सेवाएं चलाने के लिए लाइसेंस लेने में व्यय
    • धारा - 35कग : पात्र परियोजनाओं और स्कीमों पर व्यय
    • धारा - 35कघ : विनिर्दिष्ट कारबार पर व्यय की बाबत कटौती
    • धारा - 35ख : निर्यात मार्केट विकास मोक
    • धारा - 35ग : कृषि विकास मोक
    • धारा - 35गग : ग्रामीण विकास मोक
    • धारा - 35गगक : ग्राम विकास कार्यक्रमों को चलाने के लिए संगमों और संस्थाओं को संदाय के रूप में व्यय
    • धारा - 35गगख : प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण के कार्यक्रमों को चलाने के लिए संगमों या संस्थाओं को संदाय के रूप में व्यय
    • धारा - 35गगग : कृषि विस्तार परियोजना संबंधी व्यय
    • धारा - 35घ : कतिपय प्रारम्भिक व्ययों पर अपाकरण (अमोरटाइजेशन)
    • धारा - 35घघ : समामेलन या अविलयन की दशा में व्यय का अपाकरण (अमोरटाइजेशन)
    • धारा - 35घघक : स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम के अधीन उपगत व्यय का अपाकरण
    • धारा - 35ड़ : कतिपय खनिजों के लिए पूर्वेक्षण आदि पर व्यय के लिए कटौती
    • धारा - 36 : अन्य कटौतियां
    • धारा - 37 : साधारण
    • धारा - 38 : भवन आदि जिनका कारबार आदि के लिए भागत: उपयोग किया जाता है या इस प्रकार अनन्यत: उपयोग नहीं किया जाता है
    • धारा - 39 : प्रबंध अभिकरण कमीशन
    • धारा - 40 : कटौती न करने योग्य रकमें
    • धारा - 40क : कुछ परिस्थितियों में व्यय या भुगतान का कटौती योग्य न होना
    • धारा - 41 : कर से प्रभार्य लाभ
    • धारा - 42 : खनिज तेल के पूर्वेक्षण आदि के कारबार की दशा में कटौतियों के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 43 : कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ से होने वाली आय से सुसंगत कतिपय पदों की परिभाषा
    • धारा - 43क : करेंसी की विनिमय दर में परिवर्तनों के परिणामस्वरूप विशेष उपबंध
    • धारा - 43ख : वास्तविक संदाय पर ही की जाने वाली कुछ कटौतियां
    • धारा - 43ग : कुछ आस्तियों के अर्जन की लागत की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 43गक : कतिपय मामलों में पूंजी आस्तियों से भिन्न आस्तियों के अंतरण के लिए प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 43घ : लोक वित्तीय संस्थाओं, पब्लिक कंपनियों आदि की आय की दशा में विशेष उपबंध
    • धारा - 44 : बीमा कारबार
    • धारा - 44क : व्यापारिक, वृत्तिक या समरूप संगम की दशा में कटौती के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44कक : वृत्ति या कारबार चलाने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा लेखा रखना
    • धारा - 44कख : वृत्ति या कारबार चलाने वाले कुछ व्यक्तियों के लेखाओं की संपरीक्षा
    • धारा - 44कग : कुछ माल में व्यापार करने के कारबार से लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44कघ : उपधारणात्मक आधार पर कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44कघक : लाभ और अभिलाभों का उपधारणात्मक आधार पर संगणित करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44कड़ : माल वाहन चलाने, किराए या पट्टे पर देने के कारबार के लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44कच : खुदरा कारबार के लाभ और अभिलाभ की संगणना के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44ख : अनिवासी की दशा में पोत परिवहन के कारबार के लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44खख : खनिज तेलों की खोज, आदि के कारबार के संबंध में लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44खखक : अनिवासी की दशा में विमान चलाने के कारबार के लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44खखख : कुछ टर्न-की विद्युत परियोजनाओं में सिविल सन्निर्माण के कारबार आदि में लगी विदेशी कंपनियों के लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44ग : अनिवासियों की दशा में मुख्यालय व्यय की कटौती
    • धारा - 44घ : विदेशी कंपनियों की दशा में स्वामिस्व आदि के रूप में आय की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44घक : अनिवासियों की दशा में स्वामिस्व आदि के रूप में आय की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 44घख : सहकारी बैंकों के कारबार के पुनर्गठन की दशा में कटौतियों की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 45 : पूंजी अभिलाभ
    • धारा - 46 : समापनाधीन कंपनियों द्वारा आस्तियों के वितरण पर पूंजी अभिलाभ
    • धारा - 46क : कंपनी द्वारा अपने स्वयं के शेयरों या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों के क्रय पर पूंजी अभिलाभ
    • धारा - 47 : अंतरण न समझे जाने वाले संव्यवहार
    • धारा - 47क : कुछ दशाओं में छूट का वापिस लिया जाना
    • धारा - 48 : संगणना करने का ढंग
    • धारा - 49 : अर्जन के कुछ ढंगों के संबंध में लागत
    • धारा - 50 : अवक्षयणीय आस्तियों की दशा में पूंजी अभिलाभों की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 50क : अवक्षयणीय आस्ति की दशा में अर्जन की लागत के विशेष उपबंध
    • धारा - 50ख : मंदी विक्रय की दशा में पूंजी अभिलाभ की संगणना के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 50ग : कतिपय दशाओं में प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 50गक : कोट किए गए शेयर से भिन्न शेयर के अंतरण के लिए प्रतिफल के पूर्ण मूल्य हेतु विशेष उपबंध।
    • धारा - 50घ : कतिपय मामलों में उचित बाजार मूल्य को प्रतिफल का पूर्ण मूल्य समझा जाना
    • धारा - 51 : प्राप्त अग्रिम धन
    • धारा - 52 : अवकथन के मामलों में अंतरण के लिए प्रतिफल
    • धारा - 53 : निवास गृह से पूंजी अभिलाभ की छूट
    • धारा - 54 : निवास के लिए उपयोग में लार्इ गर्इ संपत्ति के विक्रय पर लाभ
    • धारा - 54क : कुछ मामलों में पूंजी अभिलाभों पर राहत
    • धारा - 54ख : कृषि प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भूमि के अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभों को कुछ दशाओं में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ग : निजी उपयोग हेतु धारित आभूषणों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभों का कुछ दशाओं में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54घ : भूमि और भवनों के अनिवार्य अर्जन पर पूंजी अभिलाभ कुछ दशाओं में प्रभारित नहीं किया जाना
    • धारा - 54ड़ : पूंजी आस्तियों के अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभों का कुछ दशाओं में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ड़क : दीर्घकालिक पूंजी आस्तियों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभों का 72[विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों] में विनिधान की दशा में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ड़ख : दीर्घकालिक पूंजी आस्तियों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभ का कुछ मामलों में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ड़ग : कतिपय बंधपत्रों में विनिधान पर पूंजी अभिलाभ प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ड़घ : कुछ सूचीबद्ध प्रतिभूतियों या यूनिटों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभ का कुछ मामलों में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ड़ड़ : पूंजी अभिलाभ, किसी विनिर्दिष्ट निधि की यूनिटों में विनिधान पर प्रभारित नहीं किया जाएगा
    • धारा - 54च : निवास गृह में विनिधान की दशा में कतिपय पूंजी आस्तियों के अंतरण पर पूंजी लाभ का प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54छ : नगरीय क्षेत्र से औद्योगिक उपक्रम के स्थानांतरण की दशा में आस्तियों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभों को छूट
    • धारा - 54छक : औद्योगिक उपक्रम को शहरी क्षेत्र से किसी विशेष आर्थिक जोन में स्थानान्तरित करने की दशा में आस्तियों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभों की छूट
    • धारा - 54छख : आवासिक संपत्ति के अंतरण पर पूंजी अभिलाभ का कतिपय दशाओं में प्रभारित न किया जाना
    • धारा - 54ज : नर्इ आस्ति अर्जित करने या पूंजी अभिलाभ की रकम का निक्षेप या विनिधान करने के लिए समय का विस्तार
    • धारा - 55 : ''समायोजित'', ''सुधार की लागत'' और ''अर्जन की लागत'' के अर्थ
    • धारा - 55क : मूल्यांकन अधिकारी को निर्देश
    • धारा - 56 : अन्य स्रोतों से आय
    • धारा - 57 : कटौतियां
    • धारा - 58 : कटौती न करने योग्य रकमें
    • धारा - 59 : कर से प्रभार्य लाभ
  • अध्याय 5 - अन्य व्यक्तियों की आय जो निर्धारिती की कुल आय में सम्मिलित है
    • धारा - 60 : जहां आस्तियों का अंतरण न हो वहां आय का अंतरण
    • धारा - 61 : आस्तियों का प्रतिसंहरणीय अंतरण
    • धारा - 62 : विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए अप्रतिसंहरणीय अंतरण
    • धारा - 63 : ''अंतरण'' और ''प्रतिसंहरणीय अंतरण'' की परिभाषा
    • धारा - 64 : व्यष्टि की आय में पति या पत्नी, अवयस्क संतान आदि की आय का भी सम्मिलित होना
    • धारा - 65 : व्यक्ति का ऐसी आय की जो अन्य व्यक्ति की आय में सम्मिलित है बाबत दायित्व
  • अध्याय 6 - आय का संकलन और हानि का मुजरा करना या उसे अग्रनीत करना
    • धारा - 66 : कुल आय
    • धारा - 67 : फर्म की आय में भागीदार के अंश की संगणना करने की पद्धति
    • धारा - 67क : व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय की आय में सदस्य के अंश की संगणना करने की पद्धति
    • धारा - 68 : रोकड़ जमा
    • धारा - 69 : अस्पष्टीकृत विनिधान
    • धारा - 69क : अस्पष्टीकृत धनराशि, आदि
    • धारा - 69ख : विनिधानों आदि की रकम जो लेखा पुस्तकों में पूरी तरह से प्रकट न की गर्इ हो
    • धारा - 69ग : अस्पष्टीकृत व्यय आदि
    • धारा - 69घ : हुंडी पर उधार ली गर्इ या लौटार्इ गर्इ रकम
    • धारा - 70 : आय के एक ही शीर्ष के अधीन एक स्रोत से होने वाली हानि का दूसरे स्रोत से होने वाली आय के प्रति मुजरा किया जाना
    • धारा - 71 : एक शीर्ष से होने वाली हानि का अन्य शीर्ष से होने वाली आय के प्रति मुजरा किया जाना
    • धारा - 71क : ''गृह संपत्ति से आय'' शीर्ष के अधीन हानि का मुजरा किए जाने के लिए संक्रमणकालीन उपबंध
    • धारा - 71ख : गृह संपत्ति से हानि का अग्रनीत किया जाना और मुजरा किया जाना।
    • धारा - 72 : कारबार की हानियों का अग्रनीत किया जाना और मुजरा किया जाना
    • धारा - 72क : समामेलन या अविलयन आदि में संचयित हानि और शेष अवक्षयण मोक के अग्रनयन और मुजरा करने से संबंधित उपबंध
    • धारा - 72कक : कुछ दशाओं में बैंककारी कंपनी के समामेलन की स्कीम में संचयित हानि और शेष अवक्षयण मोक के अग्रनयन और मुजरा करने से संबंधित उपबंध
    • धारा - 72कख : सहकारी बैंकों के कारबार के पुनर्गठन में संचयित हानि या शेष अवक्षयण मोक के अग्रनयन और मुजरे से संबंधित उपबंध
    • धारा - 73 : सट्टे के कारबार में हानियां
    • धारा - 73क : विनिर्दिष्ट कारबार द्वारा हानियों का अग्रनयन और मुजरा
    • धारा - 74 : ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन हानियां
    • धारा - 74क : ''अन्य स्रोतों से आय'' शीर्ष के अधीन आने वाले कतिपय विनिर्दिष्ट स्रोतों से हानियां
    • धारा - 75 : फर्म की हानियां
    • धारा - 78 : फर्म के गठन की तब्दीली की दशा में या उत्तराधिकार पर हानियों का अग्रनीत किया जाना और उनका मुजरा किया जाना
    • धारा - 79 : कुछ कंपनियों की दशा में हानियों का अग्रनीत किया जाना और उनका मुजरा किया जाना
    • धारा - 80 : हानियों के लिए विवरणी का प्रस्तुत किया जाना
  • अध्याय 6क - कुल आय की संगणना करने में की जाने वाली कटौतियां
    • धारा - 80झ : निश्चित तारीख के पश्चात् औद्योगिक उपक्रमों से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती आदि
    • धारा - 80झक : अवसंरचना विकास आदि में लगे हुए औद्योगिक उपक्रमों या उद्यमों से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80झकख : विशेष आर्थिक जोन के विकास में लगे किसी उपक्रमों या उद्यमों के लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौतियां
    • धारा - 80झकग : विनिर्दिष्ट कारबार के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 80झख : अवसंरचना विकास उपक्रमों से भिन्न कुछ औद्योगिक उपक्रमों से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80झखक : गृह निर्माण परियोजनाओं से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80झग : कतिपय विशेष प्रवर्ग के राज्यों में कतिपय उपक्रमों या उद्यमों की बाबत विशेष उपबंध
    • धारा - 80झघ : विनिर्दिष्ट क्षेत्र में होटलों और कन्वेंशन केन्द्रों के कारबार से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80झड़ : पूर्वोत्तर राज्यों में कतिपय उपक्रमों की बाबत विशेष उपबंध
    • धारा - 80ण : कतिपय विदेशी उद्यमों से स्वामिस्व आदि के संबंध में कटौती
    • धारा - 80क : कुल आय की संगणना करने में की जाने वाली कटौतियां
    • धारा - 80कक : धारा 80ड के अधीन कटौती की संगणना
    • धारा - 80कख : सकल कुल आय में सम्मिलित आय के निर्देश में कटौतियों का किया जाना
    •  धारा - 80कग : जब तक आय की विवरणी प्रस्तुत नहीं कर दी जाती तब तक कटौती का अनुज्ञात न किया जाना
    • धारा - 80ख : परिभाषाएं
    • धारा - 80ग : जीवन बीमा प्रीमियम, आस्थगित वार्षिकी, भविष्य निधि में अभिदाय कतिपय साधारण शेयरों या डिबेंचरों आदि में अभिदान की बाबत कटौती
    •  धारा - 80गग : कुछ नए शेयरों में विनिधान की बाबत कटौती
    • धारा - 80गगक : राष्ट्रीय बचत स्कीम के अधीन निक्षेप या आस्थगित वार्षिकी योजना में जमा की बाबत कटौती
    • धारा - 80गगख : साधारण शेयर बचत स्कीम के अधीन किए गए विनिधान की बाबत कटौती
    • धारा - 80गगग : कुछ पेंशन निधियों में अभिदाय की बाबत कटौती
    • धारा - 80गगघ : केन्द्रीय सरकार की पेंशन स्कीम में अभिदाय के संबंध में कटौती
    • धारा - 80गगड़ : धारा 80ग, धारा 80गगग और धारा 80 गगघ के अधीन कटौतियों की सीमा
    • धारा - 80गगच : दीर्घकालिक अवसंरचना बंधपत्रों के अभिदाय की बाबत कटौती
    • धारा - 80गगछ : किसी साधारण बचत स्कीम के अधीन किए गए विनिधान की बाबत कटौती
    • धारा - 80घ : स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम के संबंध में कटौती
    • धारा - 80घघ : ऐसे किसी आश्रित के, जो नि:शक्त व्यक्ति है, चिकित्सीय उपचार सहित भरण-पोषण की बाबत कटौती
    • धारा - 80घघख : चिकित्सीय उपचार आदि की बाबत कटौती
    • धारा - 80ड़ : उच्चतर शिक्षा हेतु लिए गए उधार पर ब्याज की बाबत कटौती
    • धारा - 80ड़ड़ : आवासीय गृह संपत्ति के लिए, लिए गए उधार पर ब्याज की बाबत कटौती
    • धारा - 80च : कुछ मामलों में शिक्षा संबंधी व्ययों की बाबत कटौती
    • धारा - 80चच : कतिपय मामलों में उच्चतर शिक्षा पर व्यय की बाबत कटौती
    • धारा - 80छ : कुछ निधियों, पूर्त संस्थाओं आदि को दान की बाबत कटौती
    • धारा - 80छछ : संदत्त किराए की बाबत कटौती
    • धारा - 80छछक : वैज्ञानिक अनुसंधान या ग्राम विकास के लिए कुछ संदानों की बाबत कटौती
    • धारा - 80छछख : कंपनियों द्वारा राजनैतिक दलों को दिए गए अभिदायों की बाबत कटौती
    • धारा - 80छछग : किसी व्यक्ति द्वारा राजनैतिक दलों के दिए गए अभिदायों की बाबत कटौती
    • धारा - 80ज : विस्थापित व्यक्तियों को नियोजित करने वाले नए औद्योगिक उपक्रमों की दशा में कटौती, आदि
    • धारा - 80जज : पिछड़े क्षेत्रों में नए स्थापित औद्योगिक उपक्रमों या होटल कारबार से लाभ और अभिलाभ के संबंध में कटौती
    • धारा - 80जजक : कुछ क्षेत्रों में लगाए गए नए लघु उद्योग उपक्रमों के लाभ और अभिलाभ के बारे में कटौती
    • धारा - 80जजख : भारत से बाहर की परियोजनाओं से लाभ और अभिलाभ के संबंध में कटौती
    • धारा - 80जजखक : कतिपय दशाओं में आवास परियोजना से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80जजग : निर्यात कारबार के लिए प्रतिधारित लाभों की बाबत कटौती
    • धारा - 80जजघ : संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में उपार्जनों के संबंध में कटौती
    • धारा - 80जजड़ : कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर आदि के निर्यात से लाभ की बाबत कटौती
    • धारा - 80जजच : फिल्म सॉफ्टवेयर के निर्यात या अन्तरण से लाभों और अभिलाभों की बाबत कटौतियां
    • धारा - 80ञ : कतिपय दशाओं में नवस्थापित औद्योगिक उपक्रमों या पोतों या होटल के कारबार से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौती
    • धारा - 80ञञ : कुक्कट पालन के कारबार से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौती
    • धारा - 80ञञक : जैव-अवक्रमणीय अपशिष्ट के संग्रहण और प्रसंस्करण के कारबार से लाभ और अभिलाभ की बाबत कटौती।
    • धारा - 80ञञकक : नए कर्मचारियों के नियोजन के संबंध में कटौती
    • धारा - 80ट : नए औद्योगिक उपक्रमों या पोत या होटल के कारबार से लाभ और अभिलाभ के लिए माने जा सकने वाले लाभांशों की बाबत कटौती
    • धारा - 80ठ : कुछ प्रतिभूतियों, लाभांशों, आदि पर ब्याज की बाबत कटौतियां
    • धारा - 80ठक : अपतट बैंककारी यूनिटों और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र की कतिपय आय की बाबत कटौतियां
    • धारा - 80ड : कतिपय अंतर्निगमित लाभांशों के संबंध में कटौती
    • धारा - 80डड : भारत में किसी समुत्थान से प्राप्त स्वामिस्व आदि के संबंध में भारतीय कंपनी की दशा में कटौती
    • धारा - 80ढ : कुछ विदेशी कंपनियों से प्राप्त लाभांशों के संबंध में कटौती
    • धारा - 80त : सहकारी सोसाइटियों की आय के संबंध में कटौती
    • धारा - 80थ : पुस्तकों के प्रकाशन के कारबार से लाभों और अभिलाभों के संबंध में कटौती
    • धारा - 80थथ : पुस्तकों के प्रकाशन के कारबार से लाभ और अभिलाभ के संबंध में कटौती
    • धारा - 80थथक : भारतीय भाषाओं में पाठ्य-पुस्तकों के लेखकों की वृत्तिक आय के संबंध में कटौतियां
    • धारा - 80थथख : पाठ्य-पुस्तकों से भिन्न कतिपय पुस्तकों के लेखकों की स्वामिस्व आय, आदि की बाबत कटौती
    • धारा - 80द : प्राचार्यों, शिक्षकों आदि की दशा में, कुछ विदेशी स्रोतों से पारिश्रमिक के संबंध में कटौती
    • धारा - 80दद : कतिपय दशाओं में विदेशी स्रोतों से वृत्तिक आय के संबंध में कटौती
    • धारा - 80ददक : भारत से बाहर की गर्इ सेवाओं के लिए प्राप्त पारिश्रमिक के संबंध में कटौती
    • धारा - 80ददख : पेटेंटों पर स्वामिस्व की बाबत कटौती
    • धारा - 80ध : कंपनियों से भिन्न निर्धारितियों की दशा में प्रबंध अभिकरण आदि की समाप्ति के लिए प्रतिकर के संबंध में कटौती
    • धारा - 80न : कंपनियों से भिन्न निर्धारितियों की दशा में दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के संबंध में कटौती
    • धारा - 80नन : लाटरी से जीत के संबंध में कटौती
    • धारा - 80ननक : बचत खाते में निक्षेपों पर ब्याज की बाबत कटौती
    • धारा - 80प : किसी नि:शक्त व्यक्ति की दशा में कटौती
    • धारा - 80फ : कुछ दशाओं में माता या पिता की सकल कुल आय में से कटौती
    • धारा - 80फफ : अधिनियम के अधीन कुछ कार्यवाहियों के संबंध में किए गए व्यय की बाबत कटौती
  • अध्याय 7 - कुल आय की भागरूप आय जिस पर कोर्इ आय-कर संदेय नहीं है
    • धारा - 81 से 85ग : वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से लोप किया गया
    • धारा - 86 : व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय की आय में ऐसे संगम या निकाय के सदस्य का अंश
    • धारा - 86क : कतिपय प्रतिभूतियों पर कर की बाबत कटौती
  • अध्याय 8 - रिबेट और राहत
    • धारा - 87 : आय-कर की संगणना करने में अनुज्ञात किया जाने वाला रिबेट
    • धारा - 87क : कतिपय व्यष्टियों की दशा में आय-कर का रिबेट
    • धारा - 88 : जीवन बीमा प्रीमियम, भविष्य निधि में अभिदाय आदि पर रिबेट
    • धारा - 88क : कुछ नये शेयरों या यूनिटों में विनिधान की बाबत रिबेट
    • धारा - 88ख : पैंसठ वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यष्टियों की दशा में आय-कर रिबेट
    • धारा - 88ग : पैंसठ वर्ष से कम आयु की स्त्रियों की दशा में आय-कर रिबेट
    • धारा - 88घ : कतिपय व्यष्टियों की दशा में आय-कर रिबेट
    • धारा - 88ड़ : प्रतिभूति संव्यवहार कर की बाबत रिबेट
    • धारा - 89 : उस दशा में राहत जिसमें वेतन आदि का भुगतान बकाया या अग्रिम के रूप में किया जाता है
    • धारा - 89क : निर्यात के कुल आवर्त के संबंध में कर राहत
  • अध्याय 9 - दोहरे कराधान से राहत
    • धारा - 90 : [विदेशों या विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों से करार
    • धारा - 90क : दोहरे कराधन राहत के लिए विनिर्दिष्ट संगमों के बीच हुए करारों का केंद्रीय सरकार द्वारा अंगीकार किया जाना
    • धारा - 91 : वे देश जिनके साथ कोर्इ करार नहीं है
  • अध्याय 10 - कर के परिवर्जन के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 92 : असन्निकट कीमत को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय संव्यवहार से आय की संगणना
    • धारा - 92क : सहयुक्त उद्यम का अर्थ
    • धारा - 92ख : अंतरराष्ट्रीय संव्यवहार का अर्थ
    • धारा - 92खक : विनिर्दिष्ट देशी संव्यवहार का अर्थ
    • धारा - 92ग : असन्निकट कीमत की संगणना
    • धारा - 92गक : अंतरण मूल्यांकन अधिकारी को निर्देश
    • धारा - 92गख : सुरक्षित बंदरगाह नियम बनाने की बोर्ड की शक्ति
    • धारा - 92गग : अग्रिम मूल्यांकन करार
    • धारा - 92गघ : अग्रिम मूल्यांकन करार को प्रभावी रूप देना
    • धारा - 92गड़ : कतिपय मामलों में द्वितीय समायोजन।
    • धारा - 92घ : अंतरराष्ट्रीय संव्यवहार या विनिर्दिष्ट देशी संव्यवहार करने वाले व्यक्तियों द्वारा जानकारी और दस्तावेजों का रखा जाना और उन्हें बनाए रखा जाना
    • धारा - 92ड़ : अंतरराष्ट्रीय संव्यवहार या विनिर्दिष्ट देशी संव्यवहार करने वाले व्यक्तियों द्वारा लेखापाल से प्राप्त रिपोर्ट का दिया जाना
    • धारा - 92च : असन्निकट कीमत, आदि की संगणना से संबंधित कुछ पदों की परिभाषाएं
    • धारा - 93 : अनिवासियों को आय के अंतरण में परिणत होने वाले संव्यवहारों द्वारा आय-कर का परिवर्जन
    • धारा - 94 : प्रतिभूतियों में कुछ संव्यवहारों द्वारा कर का परिवर्जन
    • धारा - 94क : अधिसूचित अधिकारिता वाले क्षेत्र में अवस्थित व्यक्तियों से संव्यवहार के संबंध में विशेष अध्युपाय
    • धारा - 94ख : कतिपय मामलों में ब्याज कटौती को सीमित करना।
  • अध्याय 10क - सामान्य परिवर्जनरोधी नियम
    • धारा - 95 : सामान्य परिवर्जनरोधी नियम का लागू होना
    • धारा - 96 : अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव
    • धारा - 97 : ठहरावों में वाणिज्यिक सारतत्व का न होना
    • धारा - 98 : अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव का परिणाम
    • धारा - 99 : संबद्ध व्यक्ति और अनुकूलक पक्षकार का निरूपण
    • धारा - 100 : अध्याय का लागू होना
    • धारा - 101 : मार्गदर्शक सिद्धांतों का विरचित किया जाना
    • धारा - 102 : परिभाषाएं
  • अध्याय 11 - अवितरित लाभों पर अतिरिक्त आय कर
    • धारा - 104 : कुछ कंपनियों की अवितरित आय पर आय-कर
    • धारा - 105 : कुछ कंपनियों के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 106 : धारा 104 के अधीन आदेश करने का परिसीमा काल
    • धारा - 107 : धारा 104 के अधीन आदेशों के लिए सहायक आयुक्त (निरीक्षण) का अनुमोदन
    • धारा - 107क : कुछ मामलों में न्यूनतम वितरण को घटाना
    • धारा - 108 : उस कंपनी के लिए व्यावृत्तियां जिनमें जनता पर्याप्त रूप से हितबद्ध है
    • धारा - 109 : ''वितरण योग्य आय'' ''विनिधान कंपनी'' और ''कानूनी प्रतिशतता'' की परिभाषा
  • अध्याय 12 - कुछ विशेष दशाओं में कर का अवधारण
    • धारा - 110 : जहां कुल आय के अंतर्गत ऐसी आय है जिस पर कोर्इ कर संदेय नहीं है वहां कर का अवधारण
    • धारा - 111 : मान्यताप्राप्त भविष्य निधि के संचित अतिशेष पर कर
    • धारा - 111क : कतिपय मामलों में अल्पकालिक पूंजी अभिलाभों पर कर
    • धारा - 112 : दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों पर कर
    • धारा - 112क : राष्ट्रीय बचत पत्रों (प्रथम निर्गम) पर ब्याज पर कर
    • धारा - 113 : तलाशी के मामलों के समूह निर्धारण की दशा में करधारा - 114 : कंपनियों से भिन्न निर्धारितियों के मामले में पूंजी अभिलाभ पर कर
    • धारा - 115 : कंपनियों की दशा में पूंजी अभिलाभ पर कर
    • धारा - 115क : विदेशी कंपनियों की दशा में लाभांश, स्वामिस्व और तकनीकी सेवाओं की फीस पर कर
    • धारा - 115कख : विदेशी मुद्रा में क्रय किए गए यूनिटों या उनके अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभों से आय पर कर
    • धारा - 115कग : विदेशी करेंसी में क्रय किए गए बंधपत्रों या ग्लोबल निक्षेपागार रसीदों से आय पर अथवा उनके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभों से उद्भूत आय पर कर
    • धारा - 115कगक : विदेशी करेन्सी में खरीदी गर्इ ग्लोबल निक्षेपागार रसीदों से आय या उनके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ पर कर
    • धारा - 115कघ : विदेशी संस्थागत विनिधानकर्ताओं की प्रतिभूतियों से अथवा उनके अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभों से आय पर कर
    • धारा - 115ख : जीवन-बीमा कारबार के लाभ और अभिलाभ पर कर
    • धारा - 115खक : कतिपय देशी कंपनियों की आय पर कर
    • धारा - 115खख : लाटरी, वर्ग पहेली, दौड़, जिसके अंतर्गत घुड़दौड़ भी है, ताश के खेल और अन्य सभी प्रकार के खेल या हर प्रकार या प्रकृति के जुए या दाव से जीत पर कर
    • धारा - 115खखख : भारतीय यूनिट ट्रस्ट की खुली साधारण शेयरोन्मुखी निधि या पारस्परिक निधियों की यूनिटों से आय पर कर
    • धारा - 115खखग : कतिपय मामलों में अनाम संदानों पर कर लगाया जाना
    • धारा - 115खखघ : विदेशी कंपनियों से प्राप्त कतिपय लाभांशों पर कर
    • धारा - 115खखघक : देशी कंपनियों से प्राप्त कतिपय लाभाशों पर कर
    • धारा - 115खखड़ : धारा 68 या धारा 69 या धारा 69क या धारा 69ग या धारा 69घ में निर्दिष्ट आय पर कर
    • धारा - 115खखच : पेटेंट से आय पर कर
  • अध्याय 12क - अनिवासियों की कुछ आय के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115झ : यदि निर्धारिती चाहे तो अध्याय का लागू न होना
    • धारा - 115ग : परिभाषाएं
    • धारा - 115घ : अनिवासियों की कुल आय की संगणना के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 115ड़ : विनिधान आय और दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ पर कर
    • धारा - 115च : विदेशी मुद्रा आस्तियों के अंतरण पर पूंजी अभिलाभ का कुछ दशाओं में प्रभारित न होना
    • धारा - 115छ : कुछ मामलों में आय की विवरणी का फाइल न किया जाना
    • धारा - 115ज : निर्धारिती के निवासी हो जाने के बाद भी कुछ दशाओं में इस अध्याय के अधीन फायदों का उपलभ्य होना
  • अध्याय 12घ - देशी कंपनियों के वितरित लाभों पर कर संबंधी विशेष उपबंध
    • धारा - 115ण : देशी कंपनियों के वितरित लाभों पर कर
    • धारा - 115त : देशी कंपनियों द्वारा कर न देने के लिए संदेय ब्याज
    • धारा - 115थ : कंपनी को व्यतिक्रमी कब समझा जाता है
  • अध्याय 12ख - कुछ कंपनियों के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञ : कुछ कंपनियों के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञक : कुछ कंपनियों के संबंध में समझी गर्इ आय
    • धारा - 115ञकक : कुछ कंपनियों से सम्बद्ध समझी गर्इ आय पर संदत्त कर की बाबत कर क्रेडिट
    • धारा - 115ञख : कुछ कंपनियों द्वारा कर संदाय के लिए विशेष उपबंध

  • अध्याय 12खक - कंपनी से भिन्न कतिपय व्यक्तियों] के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञग : कंपनी से भिन्न कतिपय व्यक्तियों द्वारा कर के संदाय के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञघ : अनुकल्पी न्यूनतम कर के लिए कर प्रत्यय
    • धारा - 115ञड : इस अधिनियम के अन्य उपबंधों का लागू होना
    • धारा - 115ञड़ड़ : इस अध्याय का कतिपय व्यक्तियों को लागू होना
    • धारा - 115ञच : इस अध्याय का निर्वचन
  • अध्याय 12खख - किसी विदेशी बैंक की भारतीय शाखा के समनुषंगी कंपनी में संपरिवर्तन के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञछ : किसी विदेशी कंपनी की भारतीय शाखा का समनुषंगी भारतीय कंपनी में संपरिवर्तन
  • अध्याय 12खग - भारत में निवासी के रूप में कथित विदेशी कंपनी से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115ञज : भारत में निवासी के रूप में कथित विदेशी कंपनी
  • अध्याय 12ग - खुदरा व्यापार आदि के संबंध में विशेष उपबंध
    • धारा - 115ट : कुछ दशाओं में आय की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 115ठ : कुछ दशाओं में आय की विवरणी का दाखिल न किया जाना
    • धारा - 115ड : कटौतियों और आय-कर रिबेट नामंजूर करने के लिए विशेष उपबंध
    • धारा - 115ढ : कुछ मामलों में कार्यवाहियों का वर्जन
  • अध्याय 12घक - शेयरों के क्रय द्वारा वापस लिए जाने के लिए देशी कंपनी की वितरित आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115थक : शेयर धारकों को वितरित आय पर कर
    • धारा - 115थख : कंपनी द्वारा कर का संदाय न किए जाने पर संदेय ब्याज
    • धारा - 115थग : कंपनी को कब व्यतिक्रमी निर्धारिती माना जाएगा
  • अध्याय 12ड़ - वितरित आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115द : यूनिट धारकों को वितरित आय पर कर
    • धारा - 115ध : कर न देने के लिए संदेय ब्याज
    • धारा - 115न : भारतीय यूनिट ट्रस्ट या पारस्परिक निधि का व्यतिक्रमी निर्धारिती होना
  • अध्याय 12ड़क - प्रतिभूतिकरण न्यासों द्वारा वितरित आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115नक : विनिधानकर्ताओं को वितरित आय पर कर
    • धारा - 115नख : कर का संदाय न करने के लिए संदेय ब्याज
    • धारा - 115नग : प्रतिभूतिकरण न्यास का व्यतिक्रमी निर्धारिती होना
    • धारा - 115नगक : प्रतिभूतिकरण न्यासों से आय पर कर
  • अध्याय 12ड़ख - कतिपय न्यासों और संस्थाओं की अनुवर्धित आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115नघ : अनुवर्धित आय पर कर
      धारा - 115नड़ : न्यास या संस्था द्वारा कर के असंदाय के लिए संदेय ब्याज
    • धारा - 115नच : न्यास या संस्था को कब व्यतिक्रमी निर्धारिती माना जाएगा
  • अध्याय 12च - जोखिम पूंजी कंपनी और जोखिम पूंजी निधि से प्राप्त आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115प : कुछ मामलों में आय पर कर
  • अध्याय 12चक - कारबार न्यास से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115पक : यूनिट धारक और कारबार न्यास की आय पर कर
  • अध्याय 12चख - विनिधान निधियों की आय और ऐसी निधियों से प्राप्त आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115पख : विनिधान निधि और इसके यूनिट धारकों की आय पर कर
  • अध्याय 12छ - पोत परिवहन कंपनियों की आय से संबंधित विशेष उपबंध
    • धारा - 115फ : परिभाषाएं
    • धारा - 115फझ : सुसंगत पोत परिवहन आय
    • धारा - 115फण : धारा 115ञख के उपबंधों से अपवर्जन
    • धारा - 115फक : अर्हक पोतों के प्रचालन के कारबार से होने वाले लाभों और अभिलाभों की संगणना
    • धारा - 115फख : पोत प्रचालन
    • धारा - 115फग : अर्हक कंपनी
    • धारा - 115फघ : अर्हक पोत
    • धारा - 115फड़ : टनभार कर स्कीम के अधीन आय की संगणना करने की रीति
    • धारा - 115फच : टनभार आय
    • धारा - 115फछ : टनभार आय की संगणना
    • धारा - 115फज : संयुक्त प्रचालन, आदि की दशा में गणना
    • धारा - 115फञ : सामान्य खर्चों का अवधारण
    • धारा - 115फट : अवक्षयण
    • धारा - 115फठ : कटौती और मुजरा आदि का साधारण अपवर्जन
    • धारा - 115फड : हानि का अपवर्जन
    • धारा - 115फढ : टनभार कर आस्तियों के अंतरण से प्रभार्य अभिलाभ
    • धारा - 115फत : टनभार कर स्कीम संबंधी विकल्प अपनाने की पद्धति और समय
    • धारा - 115फथ : वह अवधि, जिसके लिए टनभार कर विकल्प प्रवृत्त रहेगा
    • धारा - 115फद : टनभार स्कीम का नवीकरण
    • धारा - 115फध : कतिपय मामलों में टनभार कर स्कीम संबंधी विकल्प अपनाने का प्रतिषेध
    • धारा - 115फन : टनभार कर आरक्षिति खाते में लाभों का अंतरण
    • धारा - 115फप : टनभार कर कंपनी के लिए न्यूनतम प्रशिक्षण की अपेक्षा
    • धारा - 115फफ : टनभार के भाड़े पर लेने के लिए सीमा
    • धारा - 115फब : लेखाओं का रखा जाना और संपरीक्षा
    • धारा - 115फभ : टनभार का अवधारण
    • धारा - 115फम : समामेलन
    • धारा - 115फय : अविलयन
    • धारा - 115फयक : अर्हक पोतों का अस्थायीतौर पर प्रचालन बंद करने का प्रभाव
    • धारा - 115फयख : कर का परिवर्जन
    • धारा - 115फयग : टनभार कर स्कीम में अपवर्जन
  • अध्याय 12ज - अनुषंगी फायदों पर आय-कर
    • धारा - 115ब : परिभाषाएं
    • धारा - 115बक : अनुषंगी फायदा कर प्रभारण
    • धारा - 115बख : अनुषंगी फायदे
    • धारा - 115बग : अनुषंगी फायदों का मूल्य
    • धारा - 115बघ : अनुषंगी फायदों की विवरणी
    • धारा - 115बड़ : निर्धारण
    • धारा - 115बच : सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारण
    • धारा - 115बछ : निर्धारण से छूट गए अनुषंगी फायदे
    • धारा - 115बज : जहां अनुषंगी फायदे निर्धारण से छूट गए हैं वहां सूचना का जारी किया जाना
    • धारा - 115बझ : अनुषंगी फायदा कर का संदाय
    • धारा - 115बञ : अनुषंगी फायदों की बाबत अग्रिम कर
    • धारा - 115बट : अनुषंगी फायदों की विवरणी देने में व्यतिक्रम करने के लिए ब्याज
    • धारा - 115बटक : नियोजक द्वारा कर्मचारी से अनुषंगी फायदा कर की वसूली
    • धारा - 115बटख : कर्मचारी द्वारा कर का समझा गया संदाय
    • धारा - 115बठ : इस अधिनियम के अन्य उपबंधों का लागू होना
    • धारा - 115बड : अध्याय 12ज का निश्चित तारीख के पश्चात् लागू न होना
  • अध्याय 13 - आय-कर प्राधिकारी
    • धारा - 116 : आय-कर प्राधिकारी
    • धारा - 117 : आय-कर प्राधिकारियों की नियुक्ति
    • धारा - 118 : आय-कर प्राधिकारियों का नियंत्रण
    • धारा - 119 : अधीनस्थ प्राधिकारियों को अनुदेश
    • धारा - 120 : आय-कर प्राधिकारियों की अधिकारिता
    • धारा - 121 : आयुक्तों की अधिकारिता
    • धारा - 121क : आयुक्त (अपील) की अधिकारिता
    • धारा - 122 : सहायक आयुक्त (अपील) की अधिकारिता
    • धारा - 123 : सहायक आयुक्त (निरीक्षण) की अधिकारिता
    • धारा - 124 : निर्धारण अधिकारियों की अधिकारिता
    • धारा - 125 : विनिर्दिष्ट क्षेत्र, मामलों, व्यक्तियों आदि की बाबत आयुक्त की शक्तियां
    • धारा - 125क : सहायक आयुक्त (निरीक्षण) और आय-कर अधिकारी की समवर्ती अधिकारिता
    • धारा - 126 : विनिर्दिष्ट क्षेत्र, व्यक्तियों या आय के वर्गों की बाबत बोर्ड की शक्तियां
    • धारा - 127 : मामले अंतरित करने की शक्ति
    • धारा - 128 : आय-कर निरीक्षकों के कार्य
    • धारा - 129 : किसी पद के धारक की तब्दीली
    • धारा - 130 : किसी कृत्य या किन्हीं कृत्यों को करने के लिए सक्षम आयुक्त
    • धारा - 130क : किसी कृत्य या किन्हीं कृत्यों को करने के लिए सक्षम आय-कर अधिकारी
    • धारा - 131 : साक्ष्य के प्रकटीकरण, पेश करने आदि के बारे में शक्ति
    • धारा - 132 : तलाशी और अभिग्रहण
    • धारा - 132क : लेखा बहियों आदि की अध्यपेक्षा करने की शक्ति
    • धारा - 132ख : अभिगृहीत या अध्यपेक्षित आस्तियों का उपयोजन
    • धारा - 133 : जानकारी मांगने की शक्ति
    • धारा - 133क : सर्वेक्षण की शक्ति
    • धारा - 133ख : कुछ सूचना एकत्र करने की शक्ति
    • धारा - 133ग : विहित आय-कर प्राधिकारी द्वारा सूचना मंगाने की शक्ति
    • धारा - 134 : कंपनियों के रजिस्टरों का निरीक्षण करने की शक्ति
    • धारा - 135 : प्रधान महानिदेशक या महानिदेशक या प्रधान निदेशक या निदेशक, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त तथा संयुक्त आयुक्त की शक्ति
    • धारा - 136 : आय-कर प्राधिकारियों के समक्ष की कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना
    • धारा - 137 : सूचना का प्रकटीकरण प्रतिषिद्ध होना
    • धारा - 138 : निर्धारितियों के संबंध में जानकारी का प्रकटीकरण
  • अध्याय 14 - निर्धारण के लिये प्रक्रिया
    • धारा - 139 : आय की विवरणी
    • धारा - 139क :
    • धारा - 139ख : कर विवरणी तैयार करने वालों के माध्यम से विवरणियां प्रस्तुत करने संबंधी स्कीम
    • धारा - 139ग : विवरणी के साथ दस्तावेज आदि प्रस्तुत करने से अभिमुक्ति देने की बोर्ड की शक्ति
    • धारा - 139घ : इलेक्ट्रानिक रूप में विवरणी का फाइल किया जाना
    • धारा - 140 : विवरणी किसके द्वारा सत्यापित हो
    • धारा - 140क : स्वत: निर्धारण
    • धारा - 141 : अनंतिम निर्धारण
    • धारा - 141क : प्रतिदाय के लिए अनंतिम निर्धारण
    • धारा - 142 : निर्धारण के पूर्व जांच
    • धारा - 142क : मूल्यांकन प्राधिकारी द्वारा आस्तियों के मूल्य का प्राक्कलन
    • धारा - 143 : निर्धारण
    • धारा - 144 : सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारण
    • धारा - 144क : संयुक्त आयुक्त की कुछ मामलों में निर्देश देने की शक्ति
    • धारा - 144ख : कुछ मामलों में उपायुक्त को निर्देश
    • धारा - 144खक : कतिपय मामलों में प्रधान आयुक्त या आयुक्त को निर्देश
    • धारा - 144ग : विवाद समाधान पैनल को निर्देश
    • धारा - 145 : लेखा पद्धति
    • धारा - 145क : कतिपय मामलों में लेखा पद्धति
    • धारा - 146 : निर्धारिती की प्रेरणा पर निर्धारण को पुन: खोलना
    • धारा - 147 : निर्धारण से छूट गर्इ आय
    • धारा - 148 : जहां आय निर्धारण से छूट गर्इ है, वहां सूचना का जारी किया जाना
    • धारा - 149 : सूचना के लिए समय सीमा
    • धारा - 150 : ऐसे मामलों के लिए उपबंध जिनमें निर्धारण अपील आदि पर आदेश के अनुसरण में किया गया है
    • धारा - 151 : सूचना जारी करने की मंजूरी
    • धारा - 152 : अन्य उपबंध
    • धारा - 153 : निर्धारण, पुन: निर्धारण और पुन: संगणना को पूरा करने के लिए समय-सीमा
    • धारा - 153क : तलाशी या अध्यपेक्षा की दशा में निर्धारण
    • धारा - 153ख : धारा 153क के अधीन निर्धारण पूरा करने के लिए समय सीमा
    • धारा - 153ग : किसी अन्य व्यक्ति की आय का निर्धारण
    • धारा - 153घ : तलाशी या अध्यपेक्षा के मामलों में निर्धारण के लिए पूर्व अनुमोदन का आवश्यक होना
    • धारा - 154 : भूल सुधार
    • धारा - 155 : अन्य संशोधन
    • धारा - 156 : मांग की सूचना
    • धारा - 157 : हानि की जानकारी
    • धारा - 158 : फर्म के निर्धारण की जानकारी
  • अध्याय 14क - पुनरावर्ती अपीलों से बचने के लिये विशेष उपबंध
    • धारा - 158क : जब निर्धारिती दावा करता है कि विधि का वैसा ही प्रश्न उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है
    • धारा - 158कक : प्रक्रिया, जब राजस्व द्वारा किसी अपील में, विधि का समरूप प्रश्न उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित हो।
  • अध्याय 14ख - तलाशी के मामलों के निर्धारण के लिये विशेष प्रक्रिया
    • धारा - 158ख : परिभाषाएं
    • धारा - 158खक : तलाशी के परिणामस्वरूप अप्रकट आय का निर्धारण
    • धारा - 158खख : ब्लाक अवधि की अप्रकट आय की संगणना
    • धारा - 158खग : समूह निर्धारण संबंधी प्रक्रिया
    • धारा - 158खघ : किसी अन्य व्यक्ति की अप्रकट आय
    • धारा - 158खड़ : समूह निर्धारण पूरा करने के लिए समय-सीमा
    • धारा - 158खच : कुछ ब्याजों और शास्तियों का उद्गृहीत या अधिरोपित न किया जाना
    • धारा - 158खचक : कुछ मामलों में ब्याज और शास्ति का उद्ग्रहण
    • धारा - 158खछ : समूह निर्धारण करने में सक्षम प्राधिकारी
    • धारा - 158खज : इस अधिनियम के अन्य उपबंधों का लागू होना
    • धारा - 158खझ : अध्याय का निश्चित तारीख के पश्चात् लागू न होना
  • अध्याय 15 - विशेष दशाओं में दायित्व
    • धारा - 159 : विधिक प्रतिनिधि
    • धारा - 160 : प्रतिनिधि निर्धारिती
    • धारा - 161 : प्रतिनिधि निर्धारिती का दायित्व
    • धारा - 162 : संदत्त कर को वसूल करने का प्रतिनिधि निर्धारिती का अधिकार
    • धारा - 163 : अभिकर्ता कौन समझे जा सकेंगे
    • धारा - 164 : जहां हिताधिकारियों का अंश अज्ञात हो वहां कर का प्रभारण
    • धारा - 164क : मौखिक न्यास की दशा में कर प्रभारित किया जाना
    • धारा - 165 : ऐसे मामले जिनमें न्यास की आय का भाग प्रभार्य हो
    • धारा - 166 : प्रत्यक्ष निर्धारण या वसूली का वर्जित न होना
    • धारा - 167 : प्रतिनिधि निर्धारितियों की दशा में संपत्ति के विरुद्ध उपचार
    • धारा - 167क : फर्म की दशा में कर का प्रभारण
    • धारा - 167ख : जहां व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय के सदस्यों के अंश अज्ञात हैं वहां कर प्रभारित किया जाना आदि
    • धारा - 167ग : परिसमापन में सीमित दायित्व भागीदारी के भागीदारों का दायित्व
    • धारा - 168 : निष्पादक
    • धारा - 169 : निष्पादक का संदत्त कर वसूल करने का अधिकार
    • धारा - 170 : मृत्यु पर से अन्यथा कारबार का उत्तराधिकार
    • धारा - 171 : हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का विभाजन के पश्चात् निर्धारण
    • धारा - 172 : अनिवासियों का पोत परिवहन कारबार
    • धारा - 173 : अनिवासी की बाबत कर की उसकी आस्तियों से वसूली
    • धारा - 174 : भारत छोड़ने वाले व्यक्तियों का निर्धारण
    • धारा - 174क : किसी विशिष्ट घटना या प्रयोजन के लिए बनाए गए व्यक्तियों के संगम या व्यष्टियों के निकाय या कृत्रिम विधिक व्यक्ति का निर्धारण
    • धारा - 175 : ऐसे व्यक्तियों का निर्धारण जिनके द्वारा कर से बचने के लिए संपत्ति का अंतरित किया जाना संभाव्य है
    • धारा - 176 : बंद कर दिया गया कारबार
    • धारा - 177 : विघटित संगम या बंद कर दिया गया कारबार
    • धारा - 178 : समापनाधीन कंपनी
    • धारा - 179 : समापनाधीन प्राइवेट कंपनी के निदेशकों का दायित्व
    • धारा - 180 : साहित्यिक या कलात्मक कृति के लिए स्वामिस्व या प्रतिलिप्याधिकार फीसें
    • धारा - 180क : व्यवहार ज्ञान के लिए प्रतिफल
    • धारा - 181 : वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से धारा 181 और उपशीर्ष ''ण–राज्य सरकारों का दायित्व'' का लोप किया गया।
  • अध्याय 16 - फर्मों को लागू विशेष उपबंध
    • धारा - 182 : रजिस्ट्रीकृत फर्मों का निर्धारण
    • धारा - 183 : अरजिस्ट्रीकृत फर्मों का निर्धारण
    • धारा - 184 : फर्म के रूप में निर्धारण
    • धारा - 185 : जब धारा 184 का अनुपालन न हो तब निर्धारण
    • धारा - 186 : फर्म के गठन में तब्दीली
    • धारा - 187 : एक फर्म का दूसरी फर्म द्वारा उत्तराधिकार
    • धारा - 188क : फर्म द्वारा देय कर के लिए भागीदारों का संयुक्त और पृथक दायित्व
    • धारा - 189 : विघटित फर्म या बंद किया गया कारबार
    • धारा - 189क : फर्मों के पूर्व निर्धारणों को लागू उपबंध
  • अध्याय 17 - कर संग्रहण और वसूली
    • धारा - 190 : स्रोत पर कटौती और अग्रिम संदाय
    • धारा - 191 : प्रत्यक्ष भुगतान
    • धारा - 192 : वेतन
    • धारा - 192क : किसी कर्मचारी को शोध्य संचयित अतिशेष का संदाय
    • धारा - 193 : प्रतिभूतियों पर ब्याज
    • धारा - 194 : लाभांश
    • धारा - 194झ : किराया
    • धारा - 194क : 'प्रतिभूतियों पर ब्याज'' से भिन्न ब्याज
    • धारा - 194ख : लाटरी या वर्ग पहेली से जीत
    • धारा - 194खख : घुड़दौड़ से जीत
    • धारा - 194ग : ठेकेदारों को संदाय
    • धारा - 194घ : बीमा कमीशन
    • धारा - 194घक : जीवन बीमा पालिसी के संबंध में संदाय
    • धारा - 194ड़ : अनिवासी खिलाड़ियों या खेलकूद संघों (एसोसिएशनों) को संदाय
    • धारा - 194ड़ड़ : राष्ट्रीय बचत स्कीम आदि के अधीन निक्षेपों की बाबत संदाय
    • धारा - 194च : पारस्परिक निधि या भारतीय यूनिट ट्रस्ट द्वारा यूनिटों के पुन: क्रय मद्धे संदाय
    • धारा - 194छ : लाटरी टिकटों के विक्रय पर कमीशन आदि
    • धारा - 194ज : कमीशन या दलाली
    • धारा - 194झक : कृषि भूमि से भिन्न कतिपय स्थावर संपत्ति के अंतरण पर संदाय
    • धारा - 194झख : कतिपय व्यष्टियों या हिन्दू अविभक्त कुटुंब द्वारा किराए का संदाय
    • धारा - 194झग : विनिर्दिष्ट करार के अधीन संदाय
    • धारा - 194ञ : वृत्तिक या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस
    • धारा - 194ट : यूनिटों की बाबत आय
    • धारा - 194ठ : पूंजी आस्ति के अर्जन पर प्रतिकर का संदाय
    • धारा - 194ठक : कतिपय स्थावर संपत्ति के अर्जन पर प्रतिकर का संदाय
    • धारा - 194ठख : अवसंरचना ऋण निधि के ब्याज के रूप में आय
    • धारा - 194ठखक : किसी कारबार न्यास की यूनिटों से कतिपय आय
    • धारा - 194ठखख : विनिधान निधि की यूनिटों के संबंध में आय
    • धारा - 194ठखक : प्रतिभूतिकरण न्यास में विनिधान के संबंध में आय
    • धारा - 194ठग : कतिपय कारबार में लगी हुर्इ भारतीय कंपनी से ब्याज के रूप में आय
    • धारा - 194ठघ : कतिपय बंधपत्रों और सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज के रूप में आय
    • धारा - 195 : अन्य राशियां
    • धारा - 195क : आय, जिस पर "शुद्ध कर" संदेय है
    • धारा - 196 : सरकार, रिजर्व बैंक या कुछ निगमों को संदेय ब्याज या लाभांश या अन्य राशियां
    • धारा - 196क : अनिवासियों के यूनिटों की बाबत आय
    • धारा - 196ख : यूनिटों से आय
    • धारा - 196ग : भारतीय कंपनी के विदेशी मुद्रा में बंधपत्रों या शेयरो से आय
    • धारा - 196घ : प्रतिभूतियों से विदेशी संस्थागत विनिधानकर्ताओं की आय
    • धारा - 197 : निम्नतर दर पर कटौती के लिए प्रमाणपत्र
    • धारा - 197क : कुछ दशाओं में कटौती का न किया जाना
    • धारा - 198 : कटौती किया गया कर प्राप्त हुर्इ आय है
    • धारा - 199 : कटौती किए गए कर की बाबत मुजरा
    • धारा - 200 : कर की कटौती करने वाले व्यक्ति का कर्त्तव्य
    • धारा - 200क : स्रोत पर काटे गए कर के विवरण की प्रक्रिया
    • धारा - 201 : कटौती करने की या संदाय करने में असफल रहने के परिणाम
    • धारा - 202 : वसूल करने के ढंगों में कटौती का केवल एक ढंग होना
    • धारा - 203 : कटौती किए गए कर के लिए प्रमाणपत्र
    • धारा - 203क : कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक
    • धारा - 203कक : कटौती किए गए कर, आदि का विवरण दिया जाना
    • धारा - 204 : 'संदाय करने के लिए उत्तरदायी'' व्यक्ति का अर्थ
    • धारा - 205 : निर्धारिती पर प्रत्यक्ष मांग का वर्जन
    • धारा - 206 : कर की कटौती करने वाले व्यक्तियों द्वारा विहित विवरणी का दिया जाना
    • धारा - 206क : निवासियों को कर की कटौती के बिना ब्याज के संदाय की बाबत तिमाही विवरणी का दिया जाना
    • धारा - 206कक : स्थायी खाता संख्यांक देने की अपेक्षा
    • धारा - 206ख : कर की कटौती किए बिना कुछ निवासियों को लाभांश का संदाय करने वाले व्यक्ति द्वारा विहित विवरणी का दिया जाना
    • धारा - 206ग : एल्कोहाली लिकर, वनोत्पाद, स्क्रैप आदि में व्यापार के कारबार से लाभ और अभिलाभ
    • धारा - 206गक : कर-संग्रहण खाता संख्यांक
    • धारा - 206गख : स्रोत पर संगृहीत कर के विवरणों का तैयार किया जाना
    • धारा - 206गग : उस व्यक्ति द्वारा, जिससे संग्रह किया गया है, स्थायी खाता संख्यांक दिए जाने की अपेक्षा
    • धारा - 207 : अग्रिम कर का संदाय करने का दायित्व
    • धारा - 208 : अग्रिम कर का संदाय करने के दायित्व की शर्तें
    • धारा - 209 : अग्रिम कर की संगणना
    • धारा - 209क : निर्धारिती द्वारा अग्रिम कर की संगणना तथा संदाय
    • धारा - 210 : निर्धारिती द्वारा स्वप्रेरणा से या निर्धारण अधिकारी के आदेश के अनुसरण में अग्रिम कर का संदाय
    • धारा - 211 : अग्रिम कर की किस्तें और नियत तारीखें
    • धारा - 212 : निर्धारिती द्वारा प्राक्कलन
    • धारा - 213 : कमीशन प्राप्तियां
    • धारा - 214 : सरकार द्वारा संदेय ब्याज
    • धारा - 215 : निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याज
    • धारा - 216 : अव-प्राक्कलन आदि की दशा में निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याज
    • धारा - 217 : निर्धारिती द्वारा उस दशा में संदेय ब्याज जिसमें कोर्इ प्राक्कलन नहीं किया गया है
    • धारा - 218 : निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा
    • धारा - 219 : अग्रिम कर के लिए मुजरा
    • धारा - 220 : कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा
    • धारा - 221 : कर में व्यतिक्रम होने पर देय शास्ति
    • धारा - 222 : कर वसूली अधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र
    • धारा - 223 : कर वसूली अधिकारी जिसके द्वारा वसूली की जानी है
    • धारा - 224 : प्रमाणपत्र की विधिमान्यता और उसका रद्द किया जाना या उसका संशोधन
    • धारा - 225 : प्रमाणपत्र के अनुसरण में कार्यवाहियों का रोका जाना और उसका संशोधन या रद्द किया जाना
    • धारा - 226 : वसूली के अन्य ढंग
    • धारा - 227 : राज्य सरकार की मार्फत वसूली
    • धारा - 228 : पाकिस्तान में भारतीय कर और भारत में पाकिस्तानी कर की वसूली
    • धारा - 228क : विदेशों से करार के अनुसरण में कर की वसूली
    • धारा - 229 : शास्तियों, जुर्माने, ब्याज तथा अन्य राशियों की वसूली
    • धारा - 230 : कर-समाशोधन प्रमाणपत्र
    • धारा - 230क : कतिपय दशाओं में अचल संपत्ति के अंतरण के रजिस्ट्रीकरण पर निर्बंधन
    • धारा - 231 : वसूली कार्यवाहियां प्रारंभ करने के लिए अवधि
    • धारा - 232 : वाद के द्वारा या अन्य विधि के अंतर्गत वसूली का प्रभावित न होना
    • धारा - 233 : अनंतिम निर्धारण के अधीन संदेय कर की वसूली
    • धारा - 234 : कटौती या अग्रिम संदाय द्वारा संदत कर
    • धारा - 234क : आय की विवरणी देने में व्यतिक्रम के लिए ब्याज
    • धारा - 234ख : अग्रिम कर के भुगतान में व्यतिक्रम के लिए ब्याज
    • धारा - 234ग : अग्रिम कर के आस्थगन के लिए ब्याज
    • धारा - 234घ : अधिक प्रतिदाय पर ब्याज
    • धारा - 234ड़ : विवरण प्रस्तुत करने में व्यतिक्रमों के लिए फीस
    • धारा - 234च : आय की विवरणी देने में व्यतिक्रम के लिए फीस
  • अध्याय 18 - कुछ दशाओं में लाभांशों पर कर विषयक राहत
    • धारा - 235 : लाभांशों के मद्दे मानी जाने वाली कृषि आय के कर बाबत शेयरधारकों को राहत
    • धारा - 236 : पहले कर लगे लाभों में से अदा लाभांश की बाबत कंपनी को राहत
    • धारा - 236क : कुछ लाभांशों की बाबत कुछ पूर्त संस्थाओं या निधियों को राहत
  • अध्याय 19 - प्रतिदाय (रिफंड)
    • धारा - 237 : प्रतिदाय
    • धारा - 238 : कुछ विशेष दशाओं में प्रतिदाय का दावा करने के लिए हकदार व्यक्ति
    • धारा - 239 : प्रतिदाय के दावे का प्ररूप और परिसीमा
    • धारा - 240 : अपील आदि पर प्रतिदाय
    • धारा - 241 : कुछ दशाओं में प्रतिदाय को रोक रखने की शक्ति
    • धारा - 241क : कतिपय मामलों में प्रतिदाय को रोके रखना।
    • धारा - 242 : निर्धारण के सही होने को प्रश्नगत न किया जाना
    • धारा - 243 : विलंबित प्रतिदायों पर ब्याज
    • धारा - 244 : जहां किसी दावे का किया जाना आवश्यक नहीं है, वहां प्रतिदाय पर ब्याज
    • धारा - 244क : प्रतिदायों पर ब्याज
    • धारा - 245 : ऐसे कर के प्रति, जो संदेय है, प्रतिदायों का मुजरा
  • अध्याय 19क - मामलों का समझौता
    • धारा - 245क : परिभाषाएं
    • धारा - 245ख : आय-कर समझौता आयोग
    • धारा - 245खक : समझौता आयोग की अधिकारिता और शक्तियां
    • धारा - 245खख : कुछ परिस्थितियों में उपाध्यक्ष का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना
    • धारा - 245खग : एक न्यायपीठ से दूसरे न्यायपीठ को मामले अन्तरित करने की अध्यक्ष की शक्ति
    • धारा - 245खघ : बहुमत द्वारा विनिश्चय का किया जाना
    • धारा - 245ग : मामलों के समझौते के लिए आवेदन
    • धारा - 245घ : धारा 245ग के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर प्रक्रिया
    • धारा - 245घघ : राजस्व संरक्षण के लिए अनन्तिम कुर्की का आदेश करने की समझौता आयोग की शक्ति
    • धारा - 245ड़ : पूरी की गर्इ कार्यवाहियों को पुन: आरम्भ करने की समझौता आयोग की शक्ति
    • धारा - 245च : समझौता आयोग की शक्तियां और प्रक्रिया
    • धारा - 245छ : रिपोर्टों का निरीक्षण आदि
    • धारा - 245ज : अभियोजन और शास्ति से उन्मुक्ति देने की समझौता आयोग की शक्ति
    • धारा - 245जक : समझौता आयोग के समक्ष कार्यवाही का उपशमन
    • धारा - 245जकक : कार्यवाहियों के उपशमन की दशा में संदत्त कर के लिए प्रत्यय
    • धारा - 245झ : समझौता आदेश का निश्चायक होना
    • धारा - 245ञ : समझौता आदेश के अधीन शोध्य राशि की वसूली
    • धारा - 245ट : समझौते के लिए पश्चात्वर्ती आवेदन का वर्जन
    • धारा - 245ठ : समझौता आयोग के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना
    • धारा - 245ड : कुछ व्यक्तियों का जिन्होंने अपील अधिकरण में अपील की है, समझौता आयोग के पास आवेदन करने का हकदार होना
  • अध्याय 19ख - अग्रिम विनिर्णय (एडवांस रूलिंग्स)
    • धारा - 245ढ : परिभाषाएं
    • धारा - 245ण : अग्रिम विनिर्णय प्राधिकरण
    • धारा - 245त : रिक्तियों आदि से कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना
    • धारा - 245थ : अग्रिम विनिर्णय के लिए आवेदन
    • धारा - 245द : आवेदन की प्राप्ति पर प्रक्रिया
    • धारा - 245दद : कुछ मामलों में अपील प्राधिकरण का कार्यवाही न करना
    • धारा - 245ध : अग्रिम विनिर्णय का लागू होना
    • धारा - 245न : कुछ परिस्थितियों में अग्रिम विनिर्णय का शून्य होना
    • धारा - 245प : प्राधिकरण की शक्तियां
    • धारा - 245फ : प्राधिकरण की प्रक्रिया
  • अध्याय 20 - अपीलें और पुनरीक्षण
    • धारा - 246 : अपीलीय आदेश
    • धारा - 246क : आयुक्त (अपील) के समक्ष अपीलीय आदेश
    • धारा - 247 : भागीदार द्वारा अपील
    • धारा - 248 : कतिपय मामलों में कर की कटौती करने के दायित्व से इन्कार करने वाले व्यक्ति द्वारा अपील
    • धारा - 249 : अपील का प्ररूप और परिसीमा
    • धारा - 250 : अपील में प्रक्रिया
    • धारा - 251 : [* * *] आयुक्त (अपील) की शक्तियां
    • धारा - 252 : अपील अधिकरण
    • धारा - 252क : अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की अर्हता और सेवा के अन्य निबंधन तथा शर्तें
    • धारा - 253 : अपील अधिकरण को अपीलें
    • धारा - 254 : अपील अधिकरण के आदेश
    • धारा - 255 : अपील अधिकरण की प्रक्रिया
    • धारा - 256 : उच्च न्यायालय को मामलों का कथन
    • धारा - 257 : कुछ दशाओं में उच्चतम न्यायालय को मामलों का कथन
    • धारा - 258 : उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय को कथन का संशोधन करने की अपेक्षा करने की शक्ति
    • धारा - 259 : उच्च न्यायालय के समक्ष मामला दो से कम न्यायाधीशों द्वारा न सुना जाना
    • धारा - 260 : कथित मामले पर उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का विनिश्चय
    • धारा - 260क : उच्च न्यायालय में अपील
    • धारा - 260ख : उच्च न्यायालय के समक्ष मामला दो से कम न्यायाधीशों द्वारा न सुना जाना
    • धारा - 261 : उच्चतम न्यायालय में अपील
    • धारा - 262 : उच्चतम न्यायालय के समक्ष सुनवार्इ
    • धारा - 263 : राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले आदेशों का पुनरीक्षण
    • धारा - 264 : अन्य आदेशों का पुनरीक्षण
    • धारा - 265 : निर्देश आदि के होते हुए भी कर दिया जाना
    • धारा - 266 : उच्चतम न्यायालय द्वारा दिलवाए गए खर्चों का निष्पादन
    • धारा - 267 : अपील पर निर्धारण का संशोधन
    • धारा - 268 : प्रतिलिपि लेने में लगे समय का अपवर्जन
    • धारा - 268क : आय-कर प्राधिकारी द्वारा अपील या निर्देश के लिए आवेदन का फाइल किया जाना
    • धारा - 269 : 'उच्च न्यायालय'' की परिभाषा
  • अध्याय 20क - कर अपवंचन रोकने के लिए अंतरण की कुछ दशाओं में स्थावर सम्पत्ति का अर्जन
    • धारा - 269क : परिभाषाएं
    • धारा - 269कख : कुछ संव्यवहारों का रजिस्ट्रीकरण
    • धारा - 269ख : सक्षम प्राधिकारी
    • धारा - 269ग : स्थावर सम्पत्ति जिसकी बाबत अर्जन की कार्यवाहियां की जा सकती हैं
    • धारा - 269घ : प्रारम्भिक सूचना
    • धारा - 269ड़ : आक्षेप (आपत्तियां)
    • धारा - 269च : आक्षेपों की सुनवार्इ
    • धारा - 269छ : अर्जन के आदेश के विरुद्ध अपील
    • धारा - 269ज : उच्च न्यायालय में अपील
    • धारा - 269झ : केन्द्रीय सरकार में संपत्ति का निहित होना
    • धारा - 269ञ : प्रतिकर
    • धारा - 269ट : प्रतिकर का संदाय या निक्षेप
    • धारा - 269ठ : मूल्यांकन अधिकारियों द्वारा सहायता
    • धारा - 269ड : सक्षम प्राधिकारी की शक्तियां
    • धारा - 269ढ : भूल सुधार
    • धारा - 269ण : प्राधिकृत प्रतिनिधि या रजिस्ट्रीकृत मूल्यांकक द्वारा हाजिरी
    • धारा - 269त : स्थावर सम्पत्ति के अन्तरणों की बाबत विवरण दिया जाना
    • धारा - 269थ : अध्याय का नातेदारों को किए जाने वाले अन्तरणों को लागू न होना
    • धारा - 269द : इस अध्याय के अधीन अर्जन की दायित्वाधीन संपत्तियों का अन्य विधियों के अधीन अर्जन न किया जाना
    • धारा - 269दद : किसी निश्चित तारीख के पश्चात् किए गए स्थावर संपत्ति के अंतरण को इस अध्याय का लागू न होना
    • धारा - 269ध : अध्याय का विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य पर न होना
    • धारा - 269धन : संव्यवहार करने का ढंग
  • अध्याय 20ख - कर अपवंचन को रोकने के लिए कुछ दशाओं में स्वीकृति, संदाय या प्रतिसंदाय के ढंग के बारे में अपेक्षा
    • धारा - 269धध : कुछ उधार, निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशियां लेने या प्रतिगृहीत करने का ढंग
    • धारा - 269न : कुछ उधारों और निक्षेपो के प्रतिसंदाय का ढंग
    • धारा - 269नन : विशेष वाहक बंधपत्र, 1991 के प्रतिसंदाय का ढंग
  • अध्याय 20ग - अंतरण के कुछ मामलों में स्थावर संपत्ति का केन्द्रीय सरकार द्वारा क्रय
    • धारा - 269प : अध्याय का प्रारम्भ
    • धारा - 269पक : परिभाषाएं
    • धारा - 269पख : समुचित प्राधिकरण
    • धारा - 269पग : स्थावर संपत्ति के अंतरण पर निर्बन्धन
    • धारा - 269पघ : केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थावर संपत्ति के खरीदे जाने के लिए समुचित प्राधिकरण द्वारा आदेश
    • धारा - 269पड़ : केन्द्रीय सरकार में संपत्ति का निहित होना
    • धारा - 269पच : केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थावर संपत्ति के क्रय के लिए प्रतिफल
    • धारा - 269पछ : प्रतिफल का संदाय या निक्षेप
    • धारा - 269पज : प्रतिफल के न देने या जमा न करने पर संपत्ति का अंतरण में पुन: निहित होना
    • धारा - 269पझ : समुचित प्राधिकरण की शक्तियां
    • धारा - 269पञ : भूल सुधार
    • धारा - 269पट : स्थावर संपत्ति के अंतरण संबंधी कुछ करारों के प्रतिसंहरण या परिवर्तन पर अथवा कुछ स्थावर सम्पत्ति के अंतरण पर निर्बन्धन
    • धारा - 269पठ : स्थावर संपत्ति के अंतरण की बाबत दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण आदि पर निर्बन्धन
    • धारा - 269पड : अंतरिती के अंतरण के दावे से अन्तरक को उन्मुक्ति
    • धारा - 269पढ : समुचित प्राधिकरण के आदेश का अंतिम और निश्चायक होना
    • धारा - 269पण : कुछ अंतरणों को अध्याय का लागू न होना
    • धारा - 269पत : अध्याय का वहां लागू न होना जहां स्थावर संपत्ति का अंतरण निश्चित तारीख के पश्चात् होता है।
  • अध्याय 21 - अधिरोपणीय शास्तियां
    • धारा - 270 : प्रतिभूतियों आदि के बारे में जानकारी देने में असफलता
    • धारा - 270क : आय की कम रिपोर्ट करने और मिथ्या रिपोर्ट करने के लिए शास्ति
    • धारा - 270कक : शास्ति आदि के अधिरोपण से उन्मुक्ति
    • धारा - 271 : विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि
    • धारा - 271-झ : धारा 195 के अधीन जानकारी देने में असफलता या गलत सूचना देने के लिए शास्ति
    • धारा - 271क : लेखा बहियां, दस्तावेज आदि रखने, बनाए रखने या रखे रखने में असफलता
    • धारा - 271कक : कतिपय संव्यवहारों की बाबत जानकारी और दस्तावेज रखने और बनाए रखने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 271ककक : जहां तलाशी आरंभ की गई वहां शास्ति
    • धारा - 271ककख : जहां तलाशी आरंभ की गई है, वहां शास्ति
    • धारा - 271ख : लेखाओं की संपरीक्षा कराने में असफलता
    • धारा - 271खक : धारा 92ड़ के अधीन रिपोर्ट देने में असफल रहने पर शास्ति
    • धारा - 271खख : उपयुक्त पूंजी पुरोधरण में अभिदाय करने में असफलता
    • धारा - 271ग : स्रोत पर कर की कटौती करने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271गक : स्रोत पर कर का संग्रहण करने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 271घ : धारा 269धध के उपबंधों के पालन में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271घक : धारा 269घन के उपबंधों का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271ड़ : धारा 269न के उपबंधों के पालन में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271च : आय की विवरणी न देने के लिए शास्ति
    • धारा - 271चक : वित्तीय संव्यवहार या रिपोर्ट योग्य खाते का विवरण देने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271चकक : वित्तीय संव्यवहार या रिपोर्ट योग्य खाते का गलत विवरण प्रस्तुत करने के लिए शास्ति
    • धारा - 271चकख : किसी पात्र विनिधान निधि द्वारा विवरण या सूचना या दस्तावेज देने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 271चख : अनुषंगी फायदों की विवरणी देने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271छ : धारा 92घ के अधीन जानकारी या दस्तावेज देने में असफल रहने पर शास्ति
    • धारा - 271छक : धारा 285क के अधीन सूचना या दस्तावेज देने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 271छख : धारा 286 के अधीन रिपोर्ट देने में असफलता या अयथार्थ रिपोर्ट देने के लिए शास्ति
    • धारा - 271ज : विवरण, आदि प्रस्तुत करने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 272 : बंद करने की सूचना देने में असफलता
    • धारा - 272क : प्रश्नों का उत्तर देने, कथन पर हस्ताक्षर करने, जानकारी, विवरणियां या कथन देने, निरीक्षण की अनुज्ञा देने आदि में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 272कक : धारा 133ख के उपबंधों के पालन में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 272ख : धारा 139क के उपबंधों का पालन करने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 272खख : धारा 203क के उपबंधों के पालन करने में असफलता के लिए शास्ति
    • धारा - 272खखख : धारा 206गक के उपबंधों का पालन करने में असफल रहने के लिए शास्ति
    • धारा - 273 : अग्रिम कर का मिथ्या प्राक्कलन या उसके संदाय में असफलता
    • धारा - 273क : कुछ दशाओं में शास्ति आदि घटाने या अधित्यजन (वेव) करने की शक्ति
    • धारा - 273कक : शास्ति से उन्मुक्ति प्रदान किए जाने की प्रधान आयुक्त या आयुक्त की शक्ति
    • धारा - 273ख : कुछ दशाओं में शास्ति अधिरोपित न किया जाना
    • धारा - 274 : प्रक्रिया
    • धारा - 275 : शास्ति अधिरोपित करने के लिए परिसीमा का वर्जन
  • अध्याय 22 - अपराध और अभियोजन
    • धारा - 275क : धारा 132 की उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश का उल्लंघन
    • धारा - 275ख : धारा 132 की उपधारा (1) के खंड (iiख) के उपबंधों का पालन करने में असफल रहना
    • धारा - 276 : कर वसूली को विफल करने के लिए सम्पत्ति को हटाना, छिपाना या उसका अंतरण या परिदान
    • धारा - 276क : धारा 178 की उपधारा (1) और (3) के उपबंधों के अनुपालन में असफलता
    • धारा - 276कक : धारा 269कख या धारा 269झ के उपबंधों के अनुपालन में असफलता
    • धारा - 276कख : धारा 276पग, धारा 276पड़ और धारा 276पठ के उपबंधों के अनुपालन में असफलता
    • धारा - 276ख : अध्याय 12घ या 17ख के अधीन केन्द्रीय सरकार के जमा खाते कर संदाय करने में असफलता
    • धारा - 276खख : स्रोत पर संग्रहित कर देने में असफलता
    • धारा - 276ग : जानबूझकर कर आदि का अपवंचन करने का प्रयास
    • धारा - 276गग : आय की विवरणी देने में असफल रहना
    • धारा - 276गगग : तलाशी के मामलों में आय की विवरणी देने में असफलता
    • धारा - 276घ : लेखा और दस्तावेजें पेश करने में असफलता
    • धारा - 276घघ : धारा 269धध के उपबंधों के अनुपालन में असफलता
    • धारा - 276ड़ : धारा 269न के उपबंधों के अनुपालन में असफलता
    • धारा - 277 : सत्यापन आदि में मिथ्या कथन
    • धारा - 277क : लेखा बहियों या दस्तावेजों आदि का मिथ्याकरण
    • धारा - 278 : मिथ्या विवरणी आदि का दुष्प्रेरण
    • धारा - 278क : दूसरे और बाद के अपराधों के लिए दण्ड
    • धारा - 278कक : कुछ दशाओं में दंड अधिरोपित न किया जाना
    • धारा - 278कख : अभियोजन से उन्मुक्ति प्रदान किए जाने की प्रधान आयुक्त या आयुक्त की शक्ति
    • धारा - 278ख : कंपनियों द्वारा अपराध
    • धारा - 278ग : हिन्दू अविभक्त कुटुंब द्वारा अपराध
    • धारा - 278घ : कुछ मामलों में आस्तियों, लेखा बहियों, आदि के बारे में उपधारणा
    • धारा - 278ड़ : आपराधिक मन:स्थिति के बारे में उपधारणा
    • धारा - 279 : अभियोजन का प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त की प्रेरणा से होना
    • धारा - 279क : कुछ अपराधों का असंज्ञेय होना
    • धारा - 279ख : अभिलेखों या दस्तावेजों में प्रविष्टियों का सबूत
    • धारा - 280 : लोक सेवकों द्वारा विशिष्टियों का प्रकटन
    • धारा - 280क : विशेष न्यायालय
    • धारा - 280ख : विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध
    • धारा - 280ग : अपराधों का समन मामले के रूप में विचारण
    • धारा - 280घ : दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का विशेष न्यायालय के समक्ष की कार्यवाहियों को लागू होना
  • अध्याय 22ख - कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
    • धारा - 280म : परिभाषाएं
    • धारा - 280य : कुछ साधारण शेयरधारकों को कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
    • धारा - 280यक : औद्योगिक उपक्रम को शहरी क्षेत्र से स्थानांतरित करने के लिए कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
    • धारा - 280यख : कुछ दशाओं में कुछ विनिर्माण करने वाली कंपनियों को कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
    • धारा - 280यग : निर्यातों के बारे में कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
    • धारा - 280यघ : कुछ मामलों के वर्धित उत्पादन के संबंध में कर क्रेडिट प्रमाणपत्र
  • अध्याय 23 - प्रकीर्ण
    • धारा - 281 : कुछ अन्तरणों का शून्य होना
    • धारा - 281क : बेनामी धारित संपत्तियों के संबंध में जानकारी देने में असफल रहने का प्रभाव
    • धारा - 281ख :
    • धारा - 282 : साधारणतया सूचना की तामील
    • धारा - 282क : सूचनाओं और अन्य दस्तावेजों का अधिक प्रमाणीकरण
    • धारा - 282ख : दस्तावेज पहचान संख्यांक का आवंटन
    • धारा - 283 : सूचना की तामील जब कुटुम्ब विभाजित हो गया है या फर्म, आदि, विघटित हो गर्इ है
    • धारा - 284 : बंद किए गए कारबार की दशा में सूचना की तामील
    • धारा - 285 : ऐसे अनिवासी द्वारा, जिसका संपर्क कार्यालय है, विवरण प्रस्तुत किया जाना
    • धारा - 285क : कतिपय मामलों में भारतीय समुत्थान द्वारा सूचना या दस्तावेजों का प्रस्तुत किया जाना
    • धारा - 285ख : चलचित्र फिल्मों के निर्माताओं द्वारा विवरणियों का दिया जाना
    • धारा - 285खक : वित्तीय संव्यवहार या रिपोर्ट योग्य खाते का विवरण प्रस्तुत करने के लिए बाध्यता
    • धारा - 286 : अंतरराष्ट्रीय समूह के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करना
    • धारा - 287 : कुछ दशाओं में निर्धारितियों संबंधी जानकारी का प्रकाशन
    • धारा - 287क : कुछ मामलों में रजिस्ट्रीकृत मूल्यांकक द्वारा उपस्थिति
    • धारा - 288 : प्राधिकृत प्रतिनिधि द्वारा उपस्थिति
    • धारा - 288क : आय का पूर्णांकन
    • धारा - 288ख : संदेय रकम और शोध्य प्रतिदाय का पूर्णांकित किया जाना
    • धारा - 289 : रसीद का दिया जाना
    • धारा - 290 : परित्राण (इन्डेम्निटी)
    • धारा - 291 : अभियोजन से उन्मुक्ति देने की शक्ति
    • धारा - 292 : अपराधों का संज्ञान
    • धारा - 292क : दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360 का और अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का लागू न होना
    • धारा - 292ख : कुछ आधारों पर आय की विवरणी, आदि का अविधिमान्य न होना
    • धारा - 292खख : कतिपय परिस्थितियों में सूचना का विधिमान्य समझा जाना
    • धारा - 292ग : आस्तियों, लेखा बहियों आदि के बारे में उपधारणा
    • धारा - 292गग : तलाशी या अध्यपेक्षा की दशा में प्राधिकार और निर्धारण
    • धारा - 293 : सिविल न्यायालयों में वादों का वर्जन
    • धारा - 293क : खनिज तेलों के पूर्वेक्षण, निष्कर्षण आदि के कारबार में भाग लेने के संबंध में छूट आदि देने की शक्ति
    • धारा - 293ख : अनुमोदन प्राप्त करने में विलम्ब के लिए माफी देने की केन्द्रीय सरकार या बोर्ड की शक्ति
    • धारा - 293ग : अनुमोदन वापस लेने की शक्ति
    • धारा - 294 : कर के प्रभार के लिए विधायी उपबंध के लंबित रहने तक अधिनियम का प्रभावी रहना
    • धारा - 294क : कुछ संघ राज्य क्षेत्रों के संबंध में छूट आदि देने की शक्ति
    • धारा - 295 : नियम बनाने की शक्ति
    • धारा - 296 : नियमों और कुछ अधिसूचनाओं का संसद के समक्ष रखा जाना
    • धारा - 297 : निरसन और व्यावृत्तियां
    • धारा - 298 : कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति


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मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत दंड की प्रावधान



मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 की प्रमुख विशेषताएँ

इस विधेयक में 28 नई धाराएँ जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है। ये संशोधन मुख्यतः सड़क सुरक्षा में सुधार, परिवहन विभागों से संबंधित कार्यों के दौरान नागरिकों को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने, ग्रामीण परिवहन को सुदृढ़ बनाने, अंतिम छोर तक संपर्क (लास्ट माइल कनेक्टिविटी) सुनिश्चित करने, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन देने, स्वचालन एवं कम्प्यूटरीकरण को बढ़ावा देने तथा ऑनलाइन सेवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने पर केंद्रित हैं।

सड़क सुरक्षा, यात्रियों की सुविधा, अंतिम छोर तक परिवहन सेवाओं की उपलब्धता, सार्वजनिक परिवहन तथा ग्रामीण परिवहन को प्रोत्साहित करने के लिए राज्यों को स्टेज कैरिज एवं अनुबंध कैरिज परमिटों में छूट देने का प्रस्ताव इस विधेयक में किया गया है, जिससे देश की परिवहन व्यवस्था में सुधार लाया जा सके।

विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि राज्य सरकार एक गुणक (Multiplier) निर्धारित कर सकेगी, जो एक से कम तथा दस से अधिक नहीं होगा। यह गुणक इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रत्येक जुर्माने एवं संशोधित दंड पर लागू किया जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वे पैदल यात्रियों के लिए सार्वजनिक स्थलों तथा परिवहन के विभिन्न साधनों में गतिविधियों को विनियमित कर सकें।

ई-गवर्नेंस के माध्यम से हितधारकों को सेवाओं का अधिक प्रभावी वितरण इस विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसके अंतर्गत ऑनलाइन लर्निंग लाइसेंस जारी करना, ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता अवधि बढ़ाना तथा परिवहन लाइसेंस प्राप्त करने के लिए शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता समाप्त करना जैसी सुविधाएँ प्रस्तावित की गई हैं।

विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि यदि कोई किशोर वाहन चलाते हुए अपराध करता है, तो उसके अभिभावक अथवा वाहन-मालिक को उत्तरदायी माना जाएगा तथा किशोर के विरुद्ध किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी। साथ ही संबंधित मोटर वाहन का पंजीकरण भी निरस्त किया जा सकेगा।

नए वाहनों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल एवं पारदर्शी बनाने के लिए डीलर स्तर पर ही पंजीकरण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है तथा अस्थायी पंजीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है।

सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा यातायात नियमों के उल्लंघन को रोकने के उद्देश्य से विभिन्न अपराधों के लिए दंड की राशि में वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है। इनमें किशोरों द्वारा वाहन चलाना, शराब पीकर वाहन चलाना, बिना लाइसेंस वाहन चलाना, खतरनाक ढंग से वाहन चलाना, अत्यधिक गति से वाहन चलाना तथा निर्धारित सीमा से अधिक भार ले जाना आदि अपराध शामिल हैं।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से यातायात नियमों के उल्लंघन का पता लगाने के प्रावधानों के साथ-साथ हेलमेट पहनने संबंधी नियमों को भी अधिक कठोर बनाया गया है।

सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों की सहायता को प्रोत्साहित करने के लिए ‘सद्भावी नागरिक दिशा-निर्देश’ (Good Samaritan Guidelines) को भी विधेयक में शामिल किया गया है।

परिवहन वाहनों के लिए स्वचालित फिटनेस परीक्षण का प्रावधान भी किया गया है, जो 1 अक्टूबर, 2018 से प्रभावी होने का प्रस्ताव था। इससे परिवहन विभागों में भ्रष्टाचार कम होने तथा वाहनों की सड़क-योग्यता में सुधार होने की अपेक्षा की गई है।

सुरक्षा एवं पर्यावरण संबंधी मानकों का जानबूझकर उल्लंघन करने वालों के लिए तथा बॉडी बिल्डरों एवं स्पेयर पार्ट्स आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं।

पंजीकरण एवं लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए ‘वाहन’ एवं ‘सारथी’ जैसे डिजिटल मंचों के माध्यम से ड्राइविंग लाइसेंस तथा वाहन पंजीकरण के राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने का प्रस्ताव किया गया है। इससे पूरे देश में प्रक्रिया की समानता सुनिश्चित होगी।

वाहनों के परीक्षण एवं प्रमाणन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए परीक्षण एजेंसियों को भी इस अधिनियम के दायरे में लाया गया है।

ड्राइविंग प्रशिक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करने का भी प्रावधान किया गया है, जिससे परिवहन लाइसेंस शीघ्र जारी किए जा सकें और देश में वाणिज्यिक चालकों की कमी को दूर करने में सहायता मिले।

दिव्यांगजनों के लिए परिवहन सुविधाओं को अधिक सुगम बनाने के उद्देश्य से ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने तथा उनके उपयोग हेतु वाहनों को उपयुक्त रूप से अनुकूलित करने में विद्यमान बाधाओं को दूर करने का प्रस्ताव किया गया है।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कैबिनेट द्वारा स्वीकृत मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 को सड़क सुरक्षा एवं परिवहन क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा सुधार बताया है। उन्होंने इस संबंध में मार्गदर्शन एवं समर्थन प्रदान करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया।

उन्होंने राज्य परिवहन मंत्रियों के समूह द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना की तथा विश्वास व्यक्त किया कि संसद में इस विधेयक पर विचार किया जाएगा और सभी राजनीतिक दल जनहित में इसका समर्थन करेंगे, जिससे देश में सुरक्षित, प्रभावी एवं नागरिक-अनुकूल परिवहन व्यवस्था स्थापित की जा सके।


The Provision and Penalties under the Motor Vehicles Act 1988

मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2016 के अंतर्गत विभिन्न जुर्मानों में प्रस्तावित संशोधन

धाराअपराधपुराना जुर्मानाप्रस्तावित नया जुर्माना
177सामान्य अपराध₹100₹500
177Aसड़क विनियमन नियमों का उल्लंघन₹100₹500
178बिना टिकट यात्रा₹200₹500
179अधिकारियों के आदेशों की अवज्ञा₹500₹2,000
180बिना लाइसेंस व्यक्ति को वाहन चलाने देना₹1,000₹5,000
181बिना लाइसेंस वाहन चलाना₹500₹5,000
182अयोग्यता के बावजूद वाहन चलाना₹500₹10,000
182Bनिर्धारित आकार से बड़े वाहननया प्रावधान₹5,000
183निर्धारित गति सीमा से अधिक वाहन चलाना₹400एलएमवी हेतु ₹1,000 तथा मध्यम यात्री वाहन हेतु ₹2,000
184खतरनाक ढंग से वाहन चलाना₹1,000₹5,000 तक
185शराब पीकर वाहन चलाना₹2,000₹10,000
189रेसिंग अथवा स्पीड ट्रायल₹500₹5,000
192Aबिना परमिट वाहन संचालन₹5,000 तक₹10,000 तक
193एग्रीगेटर द्वारा लाइसेंस शर्तों का उल्लंघननया प्रावधान₹25,000 से ₹1,00,000
194ओवरलोडिंग₹2,000 तथा ₹1,000 प्रति अतिरिक्त टन₹20,000 तथा ₹2,000 प्रति अतिरिक्त टन
194Aयात्रियों की ओवरलोडिंग₹1,000 प्रति अतिरिक्त यात्री
194Bसीट बेल्ट का उल्लंघन₹100₹1,000
194Cदोपहिया वाहन पर ओवरलोडिंग₹100₹2,000 तथा 3 माह के लिए लाइसेंस निलंबन
194Dहेलमेट नियमों का उल्लंघन₹100₹1,000 तथा 3 माह के लिए लाइसेंस निलंबन
194Eआपातकालीन वाहनों को मार्ग न देनानया प्रावधान₹10,000
196बिना बीमा वाहन चलाना₹1,000₹2,000
199किशोर द्वारा अपराधनया प्रावधानअभिभावक/मालिक दोषी माना जाएगा; ₹25,000 जुर्माना, 3 वर्ष तक कारावास, वाहन का पंजीकरण रद्द तथा किशोर पर जेजे एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई
206दस्तावेज़ जब्त करने की शक्तिधारा 183, 184, 185, 189, 190, 194C, 194D एवं 194E के अंतर्गत ड्राइविंग लाइसेंस जब्त किया जा सकेगा
210Bनियुक्त अधिकारियों द्वारा अपराधसंबंधित धारा के अंतर्गत निर्धारित जुर्माने का दोगुना दंड

प्रमुख विशेषताएँ

  1. अधिकांश यातायात उल्लंघनों पर जुर्माने की राशि में कई गुना वृद्धि की गई।

  2. शराब पीकर वाहन चलाने, बिना लाइसेंस वाहन चलाने तथा खतरनाक ड्राइविंग पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया।

  3. हेलमेट एवं सीट बेल्ट नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई का प्रस्ताव किया गया।

  4. किशोरों द्वारा वाहन चलाने की स्थिति में अभिभावकों को भी उत्तरदायी बनाया गया।

  5. आपातकालीन वाहनों (एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड आदि) को मार्ग न देने पर विशेष दंड का प्रावधान किया गया।

  6. सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए दंड व्यवस्था को अधिक प्रभावी एवं निवारक बनाने का प्रयास किया गया।

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अंतर्गत प्रमुख अपराध एवं दंड

क्रमांकअपराधदंड / जुर्माना
1बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलानाजुर्माना एवं कारावास, दोनों का प्रावधान
2नशे की अवस्था में वाहन चलानाजुर्माना, कारावास अथवा दोनों
3खतरनाक ढंग से वाहन चलानाकारावास, जुर्माना अथवा दोनों
4निर्धारित गति सीमा से अधिक गति से वाहन चलानाआर्थिक दंड
5बिना पंजीकरण वाहन चलानाजुर्माना
6बिना बीमा वाहन चलानाजुर्माना एवं अन्य वैधानिक कार्रवाई
7बिना परमिट परिवहन वाहन का संचालनजुर्माना एवं वाहन जब्ती की कार्रवाई
8ओवरलोड वाहन चलानाआर्थिक दंड
9वाहन में निर्धारित क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठानाजुर्माना
10सीट बेल्ट का प्रयोग न करनाजुर्माना
11हेलमेट का उपयोग न करनाजुर्माना एवं लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई
12प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) न होनाजुर्माना
13वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोगजुर्माना
14ट्रैफिक संकेतों की अवहेलनाआर्थिक दंड
15लाल बत्ती पार करनाजुर्माना
16गलत दिशा में वाहन चलानाजुर्माना
17सार्वजनिक मार्ग में रेस लगानाकारावास एवं जुर्माना
18दुर्घटना के बाद सहायता न देनादंडनीय अपराध
19वाहन से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत न करनाजुर्माना
20किशोर को वाहन चलाने देनावाहन-मालिक/अभिभावक पर दंडात्मक कार्रवाई

सड़क सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण प्रावधान

1. ड्राइविंग लाइसेंस

कोई भी व्यक्ति बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के सार्वजनिक मार्ग पर मोटर वाहन नहीं चला सकता। विभिन्न श्रेणी के वाहनों के लिए पृथक लाइसेंस की व्यवस्था है।

2. वाहन पंजीकरण

प्रत्येक मोटर वाहन का सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पंजीकरण कराना अनिवार्य है। बिना पंजीकरण वाहन का संचालन विधि-विरुद्ध है।

3. बीमा

तृतीय पक्ष बीमा (Third Party Insurance) प्रत्येक मोटर वाहन के लिए अनिवार्य है। इसका उद्देश्य दुर्घटना पीड़ितों के हितों की रक्षा करना है।

4. प्रदूषण नियंत्रण

प्रत्येक वाहन के पास वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) होना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण प्रावधान है।

5. दुर्घटना की स्थिति में चालक का कर्तव्य

दुर्घटना होने पर चालक का दायित्व है कि वह—

  • घायल व्यक्ति की सहायता करे।

  • निकटतम अस्पताल तक पहुँचाने का प्रयास करे।

  • पुलिस अथवा संबंधित प्राधिकारी को सूचना दे।

  • घटनास्थल से अनुचित रूप से फरार न हो।

6. नाबालिग द्वारा वाहन संचालन

यदि कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता है अथवा दुर्घटना करता है, तो उसके अभिभावक अथवा वाहन-मालिक को भी उत्तरदायी माना जा सकता है। ऐसे मामलों में वाहन का पंजीकरण निरस्त किए जाने का भी प्रावधान है।

अधिनियम का उद्देश्य

मोटर वाहन अधिनियम का मुख्य उद्देश्य—

  • सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना,

  • दुर्घटनाओं में कमी लाना,

  • वाहन संचालन को विनियमित करना,

  • यात्रियों एवं पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करना,

  • तथा परिवहन व्यवस्था को अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी बनाना है।

इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित नियमों का पालन प्रत्येक चालक, वाहन-मालिक एवं नागरिक का वैधानिक कर्तव्य है।



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नौकासन योग विधि, लाभ और सावधानियां



नौकासन क्या है?

नौकासन पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले महत्वपूर्ण योगासनों में से एक है। इस आसन के अभ्यास के दौरान शरीर की आकृति नाव के समान दिखाई देती है, इसलिए इसे नौकासन (Naukasana) कहा जाता है। इसे नावासन के नाम से भी जाना जाता है।

इस आसन के अभ्यास में नाभि क्षेत्र पर विशेष बल पड़ता है तथा शरीर का संतुलन मुख्य रूप से नाभि के आसपास बना रहता है। नौकासन पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने के लिए अत्यंत प्रभावी योगाभ्यास माना जाता है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के साथ-साथ सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर को लाभ पहुँचाता है। इसके अनेक लाभ हैं, इसलिए प्रत्येक योग साधक को इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए।

Benefits of the Naukasana

नौकासन के लाभ (Benefits of Naukasana)

इस आसन में शरीर की आकृति नाव के समान हो जाती है, इसलिए इसे नौकासन कहा जाता है। इस आसन के दौरान शरीर का अधिकांश भार पेट के भाग पर आता है तथा शरीर के अन्य भाग ऊपर उठ जाते हैं। इससे पेट की मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं और पाचन तंत्र स्वस्थ एवं शक्तिशाली बनता है।

यह आमाशय, यकृत (लिवर), आँतों, पेडू, अग्न्याशय (पैंक्रियाज) तथा गुर्दों (किडनी) को बल प्रदान करता है। यह जठराग्नि को तीव्र करने में सहायक है तथा हृदय एवं फेफड़ों को भी सशक्त बनाता है। इससे शरीर में रक्तसंचार सुचारु रूप से होने लगता है। कमर के पीछे की ओर झुकाव के कारण उसकी शक्ति एवं लचीलापन बढ़ता है तथा कमर की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। इससे कमर-दर्द की रोकथाम होती है और तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) स्वस्थ बना रहता है। यह हर्निया की रोकथाम में भी सहायक माना जाता है।

हिंदी में नौकासन के फायदे

  • नौकासन पेट की चर्बी कम करने के लिए अत्यंत प्रभावी योगाभ्यास है। इसके नियमित अभ्यास से पेट की अतिरिक्त चर्बी कम की जा सकती है।

  • इसका नियमित अभ्यास केवल पेट की चर्बी ही नहीं घटाता, बल्कि पूरे शरीर के वजन को नियंत्रित करने में भी सहायक होता है।

  • यह किडनी को स्वस्थ रखने तथा उसके कार्यों को बेहतर बनाने में सहायता करता है।

  • नौकासन पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है तथा कब्ज, अम्लपित्त (एसिडिटी), गैस आदि समस्याओं में लाभ पहुँचाता है।

  • प्रारंभिक अभ्यास में कमर में हल्की असुविधा हो सकती है, किंतु नियमित अभ्यास से कमर मजबूत बनती है।

  • यह कब्ज को दूर करने में सहायक है तथा पाचन संबंधी एंजाइमों के स्राव को प्रोत्साहित करता है।

  • रीढ़ की हड्डी एवं मेरुदंड को लचीला बनाने में लाभकारी है।

  • हर्निया की रोकथाम में सहायक माना जाता है।

  • पूरे शरीर को सिर से पैर तक लाभ पहुँचाता है।

  • मधुमेह (डायबिटीज), मंद पाचन, शारीरिक शिथिलता तथा भूख की कमी जैसी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है।

  • फेफड़ों एवं श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाकर शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति में सहायता करता है।

  • शरीर के सभी अंगों में रक्तसंचार को बेहतर बनाता है, जिससे मांसपेशियाँ अधिक लचीली एवं सक्रिय रहती हैं।

  • यकृत (लिवर) एवं तिल्ली के विकारों में लाभ पहुँचाकर शारीरिक शक्ति बढ़ाने में सहायक है।

  • कमर एवं गर्दन के दर्द में लाभकारी माना जाता है।

Naukasana

नौकासन की विधि (Naukasana Ki Vidhi)

  1. सर्वप्रथम स्वच्छ स्थान पर चटाई या दरी बिछाकर पेट के बल लेट जाएँ।

  2. दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में जोड़कर सिर की सीध में आगे की ओर फैलाएँ।

  3. एड़ियों एवं पंजों को मिलाकर सीधा एवं तना हुआ रखें।

  4. अब गहरी श्वास लेते हुए धीरे-धीरे पैरों तथा शरीर के अगले भाग को यथासंभव ऊपर उठाएँ (लगभग 30 डिग्री तक)।

  5. शरीर को इस प्रकार उठाएँ कि उसका संतुलन नाभि के आसपास बना रहे तथा सिर और पैर ऊपर की ओर उठे रहें।

  6. इस अवस्था में शरीर की आकृति नाव के समान दिखाई देनी चाहिए।

  7. इसके बाद हाथों और पैरों में हल्का कंपन या गति उत्पन्न करें, किंतु शरीर की नाव जैसी आकृति बनाए रखें।

  8. अपनी क्षमता के अनुसार श्वास रोककर कुछ समय तक इस स्थिति में बने रहें।

  9. फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए शरीर को वापस सामान्य अवस्था में ले आएँ और पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दें।

  10. इस प्रक्रिया को लगभग तीन बार दोहराएँ।


नौकासन करते समय सावधानियाँ (Naukasana Ki Savdhaniyan)

  • कमर में तीव्र दर्द होने पर नौकासन नहीं करना चाहिए।

  • हर्निया के रोगियों को यह आसन किसी योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

  • रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या होने पर इस आसन से बचना चाहिए।

  • नौकासन के बाद भुजंगासन का अभ्यास करना लाभकारी माना जाता है।

  • अल्सर तथा कोलाइटिस से पीड़ित व्यक्तियों को इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

  • प्रारंभिक अवस्था में शरीर को पूर्ण रूप से ऊपर उठाना कठिन हो सकता है, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही अभ्यास करें।

  • गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए।

  • किसी भी प्रकार की शारीरिक समस्या होने पर योग विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।







नौकासन क्या है ?
नौकासन पीठ के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों में एक महत्वपूर्ण योगासन है। इस आसन के अभ्यास के समय व्यक्ति का आकार नाव के समान हो जाता है, इसलिए इसे नौकासन (Naukasana) कहते हैं। इस आसन के अभ्यास से नाभि पर बल अधिक पड़ता है तथा शरीर का पूरा भार नाभि पर रहता है। इसको नावासन के नाम से भी जाना जाता है। इसके फायदे अद्भुत हैं। यह पेट की चर्बी को कम करने के लिए बहुत ही प्रवभाशाली योगाभ्यास है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है और साथ ही साथ सिर से लेकर पैर की अंगुली तक फायदा पहुँचाता है। इसके जितने भी लाभ गिनाये जाए कम है। इसलिए चाहिए कि हर योग साधक नियमित रूप से इस योगासन का अभ्यास करना चाहिए।

लाभ - Benefits
इस आसन में शरीर की आकृति नाव के समान हो जाती है। इसलिए इसे नौकासन कहा जाता है। इस आसन में पूरे शरीर का भार पेट पर आ जाता है। बाकी शरीर आगे-पीछे से ऊपर उठ जाता है, जिससे पेट की मांसपेशियों की ताकत बढ़ती है व पाचन संस्थान स्वस्थ व बलिष्ठ हो जाता है। आमाशय, लिवर, आंतें, पेडू़, पेन्क्रियाज व किडनी को बल मिलता है। यह जठराग्नि को तीव्र करने में सहायक है। इससे हृदय व फेफड़ों को बल मिलता है। शरीर में रक्त का संचार सुचारू रूप से होने लगता है। कमर पीछे की ओर मोड़ने के कारण उसकी शक्ति व लचीलापन बढ़ता है और कमर की मांसपेशियों को बल मिलता है। कमर दर्द की रोकथाम होती है व नर्वस सिस्टम स्वस्थ बना रहता है। यह अभ्यास हनिर्या की रोकथाम में भी मददगार है।

हिंदी में नौकासन के फायदे : Naukasana Ke Fayde in Hindi
  1. नौकासन पेट की चर्बी को कम करने के लिए बहुत ही उम्दा योगाभ्यास है। इसका नियमित रूप से अभ्यास किया जाये तो बहुत जल्द पेट की चर्बी से निज़ात पाया जा सकता है।
  2. नौकासन का नियमित अभ्यास करने से पेट की चर्बी ही कम नहीं होती बल्कि पुरे शरीर का वजन घटता है और आप मोटापा को कंट्रोल कर सकते हैं।
  3. नौकासन ऐसा योग है जो किडनी को लाभ पहुंचाता है, नियमित रूप से इस आसन को करने से किडनी स्वस्थ रहता है और साथ ही साथ शरीर का यह अंग बेहतर तरीके से काम करता है।
  4. नौकासन योगाभ्यास आपके पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और पाचन से संबंधित रोग जैसे कब्ज, एसिडिटी, गैस आदि से छुटकारा दिलाता है।
  5. नौकासन का आरंभिक अभ्यास पहले कमर में थोड़ी बहुत परेशानी हो सकती है लेकिन धीरे धीरे यह आपके कमर को मजबूत बनाता है।
  6. नौकासन कब्ज को कम करने में बहुत मददगार है क्योंकि एंजाइम के स्राव में बड़ी भूमिका निभाता है।
  7. नौकासन रीढ़ की हड्डी के लिए यह बहुत लाभकारी है। यह आपके मेरुदंड को लचीला बनाता है।
  8. नौकासन हर्निया के लिए बहुत ही लाभदायक है।
  9. नौकासन पूरे शरीर को सिर से लेकर पैर तक फायदा पहुंचाता है।
  10. नौकासन मधुमेह (डायबटीज) दूर करने, पाचनक्रिया को ठीक करने, शरीर में स्फूर्ति लाने तथा भूख को बढ़ाने में भी यह आसन लाभकारी है।
  11. नौकासन फेफड़े व सांस से सम्बन्धित बीमारियों को दूर कर फेफड़ों में शुद्ध ऑक्सीजन को पहुंचाता है।
  12. नौकासन शरीर के सभी अंगों में खून के बहाव को तेज करता है, जिससे मांसपेशियां लचीली बनती है।
  13. नौकासन जिगर व तिल्ली के दोषों को दूर कर शारीरिक शक्ति को बढ़ाता है।
  14. नौकासन से कमर व गर्दन का दर्द ठीक होता है।

नौकासन की विधि : Naukasana Ki Vidhi
  1. नौकासन के अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जमीन पर चटाई या दरी बिछाकर पेट के बल लेट जाएं।
  2. इसके पश्चात् अपने दोनों हाथों को आपस में नमस्कार की स्थिति में जोड़कर सिर की सीध में आगे की ओर करके रखें और एड़ियों व पंजों को मिलाकर व तानकर रखे।
  3. फिर सांस लेते हुए धीरे-धीरे पैर तथा शरीर के अगले हिस्से को जितना संभव हो ऊपर उठाएं। (लगभग 30 डिग्री)
  4. इस तरह शरीर को इतना उठाएं कि शरीर का पूरा भार नाभि पर रहें तथा पैर व सिर ऊपर की ओर रखें। इस स्थिति में शरीर का आकार ऐसा हो जाना चाहिए, जैसे किसी नाव का आकार होता है।
  5. इसके बाद पहले हाथों को हिलाएं फिर पैरों को भी हिलाएं। परंतु शरीर का आकार नाव की तरह ही बनाएं रखें। सांस को जितनी देर तक अंदर रोक सकते हैं, रोक कर इस स्थिति में रहे और फिर शरीर को धीरे-धीरे नीचे सामान्य स्थिति में लाकर सांस को छोड़ते हुए पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। इस तरह से इस क्रिया को 3 बार करें।
नौकासन की सावधानियां : Naukasana Ki Savdhaniya
  1. जब कमर में दर्द हो तो नौकासन नहीं करनी चाहिए।
  2. हर्निया के रोगियों को यह आसन किसी विशेषज्ञ के निगरानी में करनी चाहिए।
  3. रीढ़ की हड्डी में कोई समस्या हो तो इस आसन को करने से बचें।
  4. नौकासन करने के बाद भुजंगासन करनी चाहिए।
  5. इस आसन का अभ्यास अल्सर, कोलाइटिस वाले रोगियों को नहीं करना चाहिए।
  6. शुरुआत में शरीर को पूर्ण रूप से ऊपर उठाने में कठिनाई हो सकती है इसलिए शुरू में अपनी क्षमता के अनुसार ही शरीर को ऊपर की ओर उठाएं।

नौकासन के प्रकार

1. सुप्त नौकासन (Supine Boat Pose)

इसमें पीठ के बल लेटकर शरीर को नाव के आकार में उठाया जाता है। आधुनिक योग में इसे अधिक प्रचलित रूप से नौकासन कहा जाता है।

2. उदर नौकासन (Prone Boat Pose)

इसमें पेट के बल लेटकर हाथ और पैरों को ऊपर उठाया जाता है। कुछ योग ग्रंथों में इसे भी नौकासन का एक रूप माना गया है।

नौकासन का वैज्ञानिक महत्व

नौकासन के दौरान पेट की मांसपेशियाँ, रीढ़, जांघें, कंधे तथा कूल्हों की मांसपेशियाँ एक साथ सक्रिय होती हैं। इससे—

  • कोर मसल्स (Core Muscles) मजबूत होती हैं।

  • पेट की चर्बी कम करने में सहायता मिलती है।

  • शरीर का संतुलन बेहतर होता है।

  • मांसपेशियों की सहनशक्ति बढ़ती है।

  • शरीर की मुद्रा (Posture) में सुधार होता है।

नौकासन का मानसिक लाभ

नियमित अभ्यास से—

  • मानसिक तनाव कम होता है।

  • एकाग्रता बढ़ती है।

  • आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

  • मन में स्थिरता आती है।

  • चिंता एवं बेचैनी कम होती है।

नौकासन में श्वास का महत्व

  • शरीर को ऊपर उठाते समय गहरी श्वास लें।

  • स्थिति बनाए रखते समय सामान्य श्वास लेते रहें।

  • नीचे आते समय धीरे-धीरे श्वास छोड़ें।

श्वास का सही समन्वय आसन के लाभों को बढ़ाता है।

नौकासन करने का उपयुक्त समय

  • प्रातःकाल खाली पेट।

  • भोजन के कम से कम 4–5 घंटे बाद।

  • योगाभ्यास के मध्य या अंत में।

नौकासन कितनी देर करना चाहिए?

स्तरअवधि
प्रारंभिक10–15 सेकंड
मध्यम20–30 सेकंड
उन्नत45–60 सेकंड

शुरुआत में 3 बार तथा बाद में 5–7 बार तक अभ्यास किया जा सकता है।

नौकासन से प्रभावित प्रमुख अंग

  • पेट की मांसपेशियाँ

  • अग्न्याशय (Pancreas)

  • यकृत (Liver)

  • गुर्दे (Kidneys)

  • आँतें

  • रीढ़ की हड्डी

  • जांघ एवं कूल्हे

  • फेफड़े

मधुमेह में नौकासन

नौकासन अग्न्याशय को सक्रिय करने वाला आसन माना जाता है। नियमित अभ्यास से इंसुलिन स्राव को संतुलित करने में सहायता मिल सकती है। इसलिए मधुमेह रोगियों के लिए यह लाभकारी योगासनों में गिना जाता है।

नौकासन के बाद किए जाने वाले आसन

नौकासन के बाद निम्न आसन करने से शरीर को संतुलन मिलता है—

  • भुजंगासन

  • मकरासन

  • शशांकासन

  • पवनमुक्तासन

सामान्य गलतियाँ

नौकासन करते समय लोग प्रायः निम्न गलतियाँ करते हैं—

  • झटके से शरीर उठाना।

  • गर्दन पर अधिक तनाव डालना।

  • श्वास रोक लेना।

  • घुटनों को मोड़ लेना।

  • कमर पर अत्यधिक दबाव डालना।

इन गलतियों से बचना चाहिए।

किन लोगों को नौकासन नहीं करना चाहिए?

  • गर्भवती महिलाएँ

  • हाल ही में ऑपरेशन करवाने वाले व्यक्ति

  • गंभीर स्लिप-डिस्क के रोगी

  • तीव्र कमर दर्द वाले व्यक्ति

  • उच्च रक्तचाप के गंभीर रोगी (चिकित्सकीय सलाह के बिना)

  • हृदय रोगी (विशेषज्ञ की सलाह से ही)

आध्यात्मिक महत्व

योग दर्शन के अनुसार नौकासन मणिपुर चक्र को सक्रिय करने वाला आसन माना जाता है। मणिपुर चक्र आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति, साहस तथा आंतरिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। इसलिए इस आसन के नियमित अभ्यास से व्यक्ति में उत्साह, सकारात्मकता तथा आत्मबल की वृद्धि होती है।

निष्कर्ष

नौकासन एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली योगासन है। यह पेट की चर्बी कम करने, पाचन शक्ति बढ़ाने, रीढ़ को मजबूत बनाने, मधुमेह नियंत्रण में सहायता करने तथा मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में लाभकारी माना जाता है। नियमित एवं सही विधि से किया गया नौकासन शरीर को स्वस्थ, संतुलित, सुदृढ़ एवं ऊर्जावान बनाता है।

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महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी एवं निबंध




महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी एवं निबंध;
Biography and Essay of Mahamana Madan Mohan Malaviya
भारत माता आदिकाल से ही महान आत्माओं को जन्म दे रही है और न जाने कितने कर्मवीरों और तपस्वियों को इसने जन्म देकर अपने आदर्श, चरित्र, त्याग और सेवा से संसार का मार्गदर्शन किया तथा उन्हें अंधकार से निकालकर ज्ञान का दीपक दिखाया है। भारत के ऐसे ही देव पुत्रों में से एक पत्रकार समाज सुधारक, देशभक्त, धार्मिक नेता और शिक्षाविद पं. मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर 1861 ई. को सूर्य कुण्ड या लालडिंग के कूंचा सांवल-दास मोहल्ले में बृजनाथ जी के घर संध्या को 6 बजकर 54 मिनट पर प्रयाग में हुआ। इनकी माता भूना देवी थी। बी.जे. अकद के कथानुसार - "यह भारत माता के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षण था, जब 25 दिसम्बर 1861 को इलाहाबाद में पं. बृजनाथ के घर एक नन्हें से बच्चे ने जन्म लिया था।" कौन जानता था कि वह छोटा-सा निर्बल बालक एक दिन देश की स्वतन्त्रता और आत्मनिर्भरता के लिए सिंह गर्जना करेगा। बचपन से ही इनके माता-पिता को ऐसा प्रतीत होता था कि भविष्य में यह बालक बहुत ही होनहार होगा। एक कहावत भी चरितार्थ है कि "होनहार बिखान के होत चिकने पात" मालवीय जी ने इस कहावत को अपने जीवन में चरितार्थ किया था। पाँच वर्ष की आयु से ही उनकी शिक्षा आरम्भ हुई थी। उस समय प्रयाग में अहिपापुर मौहल्ले में कोई पाठशाला न थी। लाला मनोहर दास रईस की कोठी के चबूतरे पर, जो तीन सवा तीन फीट चैड़ा और दस पन्द्रह फीट लम्बा था, उसी पर टाट बिछा कर एक गुरु जी लड़कों को पढ़ाया करते थे। उन्हें वहां से हरदेव जी की पाठशाला जिसका नाम धर्मोपदेश पाठशाला था। जहाँ से स्थायी रूप से मदन मोहन मालवीय जी ने अपना विद्याध्ययन शुरू किया था। मदन मोहन मालवीय जी ने संस्कृत काव्य, गीता एवं अन्य धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया था। इनमें से मालवीय जी को संस्कृत काव्य ने अधिक प्रभावित किया था। यह उनकी अमूल्य निधि थी।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का एक सामाजिक-राजनीतिक सुधारक के रूप में ऐसे समय उदय हुआ जब पूरा देश विकट परिस्थितियों में गुजर रहा था। युगपुरुष महामना मदनमोहन मालवीय का जीवन अत्यंत उतार-चढ़ाव भरा रहा। गरीबी झेलते हुए उन्होंने न सिर्फ ज्ञानार्जन किया, बल्कि स्वयं को शिखर पर पहुंचाया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि, शिक्षक, पत्रकार, वकील के रूप में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, कि हर कोई आज भी उससे प्रेरणा ले रहा है। 15वीं सदी में वे उत्तर प्रदेश चले आए। मालवा का होने के कारण वे लोग मल्लई कहलाते थे, जो बाद में मालवीय हो गया। मालवीय जी की आरंभिक शिक्षा इलाहाबाद में पूरी हुई। उन्होंने मकरंद के नाम से 15 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था और सोलह सत्तरह वर्ष की आयु में उन्होंने एंट्रेंस की परीक्षा पास की। ऐंट्रस पास करने के बाद मालवीय जी म्योर सेंट्रल कालेज में पढ़ने लगे। परिवार के लिए कालेज की पढ़ाई का आर्थिक बोझ वहन करना कठिन था, पर माता ने कठिनाई सहकर, अपने जेवर गिरवी रखकर अपने बच्चे को पढ़ाने का निश्चय किया। प्रिंसीपल हैरिसन ने उन्हें एक मासिक वजीफा दिया। फिर भी मदनमोहन मालवीय को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चाहे मालवीय जी के शिक्षा क्षेत्र में कितनी भी कठिनाई क्यों न आई हो, उन्होंने बैरिस्टर तक की शिक्षा ग्रहण की। विनोद: कालेज में एक बार आर्यनाटक मण्डली की ओर से 'शकुंतला' नाटक का अभिनय हुआ, इसमें मदन मोहन मालवीय को शकुन्तला का पार्ट दिया गया। परदा उठने पर प्रियम्वदा और अनुसूया सखियों के साथ शकुन्तला हाथ में घड़ा लिए रंगमंच पर आयी, तब दर्शक दंग रह गये। शृंगार और करुणा दोनों रसों के हाव-भाव दिखला कर शकुंतला के अभिनेता ने दर्शकों को मुग्ध कर दिया।
मालवीय जी का विवाह 16 वर्ष की आयु में उनके चाचा पंडित गजाधर प्रसाद जी के माध्यम से मिर्जापुर के पंडित नन्दलाल जी की कन्या कुनन देवी से हुआ। वे माता-पिता के दुलार में पली थी। लड़कपन में उन्हें किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं था। ससुराल की आर्थिक दशा ने उन्हें बड़े धैर्य और साहस से निर्धनता के कष्ट सहन करने को बाध्य किया। उन्हें आधा पेट खा कर संतोष करना पड़ता था। फटी धोतियों सी कर पहननी पड़ती थी। एक दिन बहुत वर्षों बाद मालवीय जी ने उनसे पूछा, तुमने अपनी सास से कभी खाने-पीने पहनने की शिकायत नहीं की? इस पर देवी जी ने उत्तर दिया, 'शिकायत करके क्या करती? वे कहाँ से देती? घर का कोना-कोना जितना वे जानती थी, उतना मैं भी जानती थी। मेरा दुख सुनकर वे रो देती और क्या करती?' देवी जी को धैर्य के साथ-साथ पतिदेव का स्नेह तथा भगवद्भक्ति के प्रति अनुराग भी प्राप्त था। जैसा कि मालवीय जी ने पंडित रामनरेश त्रिपाठी को बताया, पति पत्नी दोनों वैवाहिक जीवन के प्रारम्भ से ही रामकृष्ण के उपासक थे। दोनों कोई भी काम करते, चाहे दूध पीते, चाहे पानी पीते, रामकृष्ण का स्मरण किए बिना नहीं करते। पतिदेव की तरह पतिव्रता साध्वी ने भी भगवान की भक्ति में कई दोहे कहे थे, वे कहती थी- 'ऐसा कोई घर नहीं, जहां न मेरा राम।'
वर्ष 1868 में उन्होंने प्रयाग सरकारी हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की। इसके उपरान्त उन्होंने मायर सेंट्रल कालेज में प्रवेश लिया। कालेज में पढ़ाई करते हुए वर्ष 1880 में उन्होंने अपने गुरु पं॰ आदित्यराम भट्टाचार्य के नेतृत्व में हिंदू समाज नामक सामाजिक सेवा संघ स्थापित किया। वे स्कूल के साथ-साथ कालेज में भी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते रहे। उन्होंने लिखा है, "मैं एक गरीब ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। इसलिए पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए एक सेठ के छोटे बच्चे को पढ़ाने जाता था। धार्मिक भावों के प्रति मेरा रुझान बचपन से था। स्कूल जाने के पहले मैं रोज हनुमान जी के दर्शन करने जाता था।" वे भारतीय विद्यार्थी के मार्ग में आने वाली भावी मुसीबतों को जानते थे। उनका कहना था, "छात्रों की सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भूभाग में उन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"
भारतीय स्वातंत्रय आन्दोलन के इतिहास में महामना का व्यक्तित्व स्वतः साक्ष्य रूप में प्रत्येक आन्दोलन से संबंधित रहा है चाहे राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रश्न रहा हो अथवा अछूतोद्धार या दलित वर्ग की समस्या रही हो या हिन्दू-मुस्लिम एकता की। चाहे औद्योगिक, आर्थिक अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विषय रहा हो या राष्ट्रीय शिक्षा के उन्नयन का अथवा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का। इन सभी क्षेत्रों में महामना एक सच्चे सिपाही की भाँति अग्रणी रहे हैं। पंडित मदन मोहन मालवीय महापुरुष और श्रेष्ठ आत्मा थे। उन्होंने समर्पित जीवन व्यतीत किया तथा धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आदि बहुत से क्षेत्रों में अपने लोगों की उत्कृष्ट सेवाएं की। धमकियों से निडर और प्रलोभनों से अनाकृर्षित उन्होंने अन्याय और क्ररताओं से संघर्ष किया तथा साहस और दृढ़तापूर्वक अपने उद्देश्य की नैतिकता पर दृढ़विश्वास के साथ अपने देशवासियों के सामूहिक हित और उत्कर्ष के लिए 50 वर्ष से अधिक काम किया निःसंदेह उनका व्यक्तित्व उनकी महान् उपलब्धियों से कहीं अधिक प्रतिष्ठित था। वे आध्यात्मिक सद्गुणों नैतिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष के असाधारण संश्लेषण थे।
मदनमोहन मालवीय जी का पूरा जीवन भले ही गरीबी में बीता हो लेकिन उसने कभी भी अपने मन में हीन भावना नहीं आने दी और सदा राजा कर्ण जैसी दानवीर की सोच रखी। अपने आप में यह बहुत बड़ी बात है कि अगर किसी के पास धन हो तो वह दान कर सकता है। उसमें कोई बड़ी बात नहीं लेकिन जो आदमी अपने परिवार को तीनों समय का भोजन भी पूर्णरूपेण न दे सके और वह आदमी फिर भी दानवीर की सोच रखता हो, यह सबसे बड़ी बात है। मालवीय जी ने चाहे विद्या का दान हो, चाहे किसी गरीब आदमी की मदद की बात हो, समाज उत्थान की बात हो, समाज की कुरीतियों की बात हो, किसी भी क्षेत्र में वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने जी भरकर लोगों की मदद की।
मदन मोहन मालवीय को महामना की उपाधि किसने दी
महात्मा गाँधी का महामना के लिए बहुत आदर था और मदनमोहन का हृदय से सम्मान करते थे वह उनकी कोई बात नहीं टालते थे। उन्होंने ही मदनमोहन मालवीय को 'महामना' की उपाधि दी।। उन्होंने महामना के लिए लिखा- 'जब मैं अपने देश में कर्म करने के लिए आया तो पहले लोकमान्य तिलक के पास गया। वे मुझे हिमालय से ऊँचे लगे। मैंने सोचा हिमालय पर चढ़ना मेरे लिए संभव नहीं और मैं लौट आया। पिफर मैं गोखले के पास गया। वे मुझे सागर के समान गंभीर लगे। मैंने देखा कि मेरे लिया इतने गहराई में पैठना संभव नहीं और मैं लौट आया। अंत में मैं महामना मालवीय के पास गया। मुझे वे गंगा की धारा के समान पारदर्शी निर्मल लगे। मैंने देखा इस पवित्र धारा में स्नान करना मेरे लिये असंभव नहीं है। मालवीय ऐसे व्यक्तित्व की ही, मैं तलाश कर रहा था।'
मालवीय जी अहिंसा के प्रबल समर्थक महात्मा गांधी के श्रद्धा पात्र एवं नियम विधान के पाबंद थे। मालवीय जी उन चंद महापुरुषों में से थे, जिनके गांधी जी चरण स्पर्श करते थे। दोनों ही अपने सिद्धांतों पर अटल रहा करते थे और कभी-कभी इसके चलते उनमें वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न हो जाते थे। परन्तु परस्पर सम्मान पर कायम उनके संबंधों में यह भी बाधक नहीं बना।
महामना ने अपनी वेशभूषा, व्यक्तित्व विचारों और अपने संपूर्ण जीवन से भारतीय संस्कृति और धर्म का जो आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उसका अनुसरण करना तो दूर रहा, आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम ठीक उसकी विपरीत दिशा में पागलों की तरह भागकर अर्द्ध पतित हुए चले जा रहे हैं, जिसमें महामना द्वारा प्रतिपादित नैतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को कोई स्थान नहीं है। महामना राष्ट्र की स्वतंत्रता के अडिग पुजारी, शिक्षा के अनन्य सेवक, कुशल पत्रकार एवं विधिवेत्ता तथा समस्त भारतीय समाज में चेतना का स्पफुर्लिंग प्रज्वलित करने वालों में प्रमुख कर्णधार थे। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने महामना के प्रति अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है कि 'भारत को अभिमान तुम्हारा, तुम भारत के अभिमानी।' महामना ने भारतीय राजनीति के नीलाकाश पर अपने शुभ्र धवल व्यक्तित्व की पुनीत आभा से विराट भास्कर की भाँति दिप्ती बिखेरी थी। धर्म, समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में अजातशत्रु महामना का व्यक्तित्व निष्कलंक था। वे जब तक जिये मनसा, वाचा, कर्मणा जनता की सेवा की। 'सागरः सागरोयम' भाँति उनका व्यक्तित्व अनुपमेय था। 28 दिसम्बर 1886 को कलकत्ता के टाउन हाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता ब्रिटिश संसद के प्रथम भारतीय सांसद दादा भाई नैरोजी ने की। महामना की आयु तब केवल 25 वर्ष की थी और इस अधिवेशन में अपने प्रथम भाषण में उन्हेांने अपने श्रोताओं को मंत्रामुग्ध कर दिया। उनके भाषण के बारे में कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ.ह्यूम ने 1886 की रिपोर्ट में लिखा, 'जिस भाषण को श्रोताओं ने अत्यन्त उत्साह से सुना, संभवतः वह भाषण पं. मदन मोहन मालवीय का था जो एक उच्च जातीय ब्राह्माण थे और जिनके मोहक सुकुमार और गौर वर्ण व्यक्तित्व तथा विद्वतापूर्ण संबोधन ने सभी को आकर्षित किया।' दादा भाई का कहना था, 'भारत माता की आवाज इस युवक की आवाज में स्वयं प्रतिध्वनित हो गई है।' सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कहा, 'यह भाषण मेरे सुने गये भाषणों में सर्वश्रेष्ठ है।'

पंडित मदन मोहन मालवीय के महान योगदान
देश की दशा, प्रारम्भिक जीवन, राजनीतिक जागृति
19वीं सदी में भारतीय सभ्यता के मूल मूल्यों का पतन हो रहा था और अज्ञानता के कारण देश में अन्धविश्वास, कन्या वध, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवाओं की दयनीय दशा, नर बली, छुआछूत सरीखी कुप्रथाएँ समाज को खोखला किए जा रही थी। 1857 के पश्चात् तो भारत में जैसे उथल-पुथल-सी मच गई थी। आतंक और दमन के बादल आकाश में मंडराए हुए थे। अंग्रेजों का विचार था अब भारत में सिर उठाने वाला कोई नहीं रहा। उनका ऐसा सोचना किसी सीमा तक उचित भी था, क्योंकि उन्होंने देश भक्तों को जिस प्रकार से कुचला, फांसी पर लटकाया और खून की नदियाँ बहाई उसका उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। फिर भी ब्रिटिश सरकार के न चाहते हुए भी बदलती परिस्थितियों के फलस्वरूप भारतवासियों के रहन-सहन, वेशभूषा और विचारधारा में काफी परिवर्तन आ गया था। ऐसे समय में पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ।
मालवीय जी का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में मालवीय जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में रहा। मालवीय जी के अनुसार जनता की बदहाली का कारण अशिक्षा है। 20वीं सदी के पहले दशक में उन्होंने विशेष रूप से हिंदुओं के लिए तथा सामान्य रूप से सभी के लिए एक ऐसा हिंदु विश्वविद्यालय बनाने का निर्णय लिया जहां हिंदु धर्म और संस्कृति के अलावा प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान की उच्च शिक्षा प्रदान की जा सके और जो भारत की प्राचीन गुरुकुल पद्धति को आधुनिक रूप से आगे बढ़ाए। इसके लिए उन्होंने स्वयं ही धन एकत्रित करने का बीड़ा उठाया। विश्वविद्यालय के लिए हिंदुओं की आस्था नगरी वाराणसी को चुना गया। वाराणसी के तत्कालीन नरेश ने इस कार्य के लिए 1,300 एकड़ भूमि उन्हें दान में दी। मालवीय जी भारत के कोने-कोने में घूम कर विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्रित करते रहे। इसलिए उन्हें भारत का भिक्षु सम्राट कहा जाने लगा। उनके अथक परिश्रम के कारण 04 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी के दिन बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर भवन की नींव तत्कालीन भारत के वाइस राय लार्ड हार्डिंग द्वारा रखी गई। विश्वविद्यालय का नाम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय रखा गया। लगभग तीन दशक तक कुलपति के रूप में उन्होंने विश्वविद्यालय का मार्गदर्शन किया। मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदु विश्वविद्यालय के रूप में देश में पहली बार एक पूर्ण आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना की पहल की। जिस तरह से नालंदा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करता है। इसके एक ही परिसर में कला, विज्ञान, वाणिज्य, कृषि विज्ञान, तकनीकी, संगीत और ललित कलाओं की पढ़ाई संभव हुई।
मालवीय जी का उदार हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय का विरोधी नहीं था। हिंदू जागरण के अग्रणी नायक के रूप में उनका नाम प्रसिद्ध है। लेकिन वह सभी धर्मों और समुदायों की अधिकार रक्षा के प्रति सजग भी रहे। हिंदू महासभा से जुड़े होने पर भी वे मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी भाग लेते थे। हिंदुओं की जाति-वर्ण संबंधी रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने दलितों को मंत्र दीक्षा देने का ऐतिहासिक कार्य भी किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की। मालवीय जी का उदार हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय का विरोधी नहीं था। हिंदू जागरण के अग्रणी नायक के रूप में उनका नाम प्रसिद्ध है। लेकिन वह सभी धर्मों और समुदायों की अधिकार रक्षा के प्रति सजग भी रहे। हिंदू महासभा से जुड़े होने पर भी वे मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी भाग लेते थे। हिंदुओं की जाति-वर्ण संबंधी रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने दलितों को मंत्र दीक्षा देने का ऐतिहासिक कार्य भी किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की।
मालवीय जी ने संस्कृत में एम.ए. की परीक्षा पास करके अपने पिता की तरह धर्म प्रचार में अपना जीवन लगा देना चाहते थे ओर इसलिए उन्होंने अपने चचेरे भाई जय गोविन्द जी के आग्रह पर भी गवर्नमैंट स्कूल में अध्यापक का काम करने से इन्कार कर दिया। पर जब उनकी माता को इसका पता चला और वे उनसे कहने आई, तब उनकी सभी कल्पनाएँ माँ के आँसुओं में डूब गई ओर वे नौकरी करने के लिए राजी हो गए। 40 रुपए के मासिक वेतन पर उन्होंने गवर्नमैंट हाई स्कूल में, जहां उन्होंने पढ़ा था, अध्यापक की नौकरी कर ली। बाद में उनका मासिक वेतन 60 रुपए हो गया। इस आमदनी का अधिकांश भाग वे अपनी माता को परिवार के भरणपोषण के लिए दे देते थे। दो रुपए मासिक वे अपनी धर्मपत्नी को उसके निजी खर्च के लिए देते थे और बाकी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में तथा सार्वजनिक कार्यों के लिए खर्च कर देते थे।
मालवीय जी का कहना था कि पुरुषों की शिक्षा से स्त्रियों की शिक्षा कहीं अधिक अर्थवान है। उन्होंने कहा था, "स्त्रियां हमारे भावी राजनीतिज्ञों, विद्वानों, तत्वज्ञानियों, व्यापार तथा कला-कौशल के नेताओं की प्रथम शिक्षिका है। उनकी शिक्षा का प्रभाव भारत के भावी नागरिकों की शिक्षा पर विशेष रूप से पड़ेगा।" उनका मानना था कि पुरुषों की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण स्त्रियों की शिक्षा है, क्योंकि वे ही देश की भावी संतानों की माताएं हैं।
मालवीय जी सफल अध्यापक सिद्ध हुए। वे अपने पठनीय विषय को भली-भांति तैयार करके उसे बहुत रोचक ढंग से पढ़ाते थे तथा सदा विद्यार्थियों के प्रति स्नेह-भावना बनाए रखते थे। उनके एक प्रसिद्ध नागरिक छात्र का कहना है कि छात्रों के ऊपर उनकी स्नेहपूर्ण कृपा का, कोमल व्यवहार का, वाणी कि माधुर्य का तथा उनके आकर्षक व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव था। सभी उनका सम्मान करते थे।
सार्वजनिक कार्य
प्रोफेसर आदित्य राम भट्टाचार्य के प्रोत्साहन से मालवीय जी ने सन 1880 में ही सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय योगदान करना प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने अपने गुरु के आदेश पर 'प्रयाग हिन्दू समाज' नाम की संस्था के संचालन में काफी काम किया। पंडित बालकृष्ण भट्ट के सम्पादकत्व में प्रकाशित होने वाले पत्र में मालवीय जी ने धार्मिक और सामाजिक विषयों पर लेख लिखने प्रारम्भ किए। उन्होंने सन् 1882 में स्वयं स्वदेशी का व्रत लेकर उसका प्रचार करना शुरू कर दिया। इसी समय उनके कतिपय मित्रों ने देशी तिजारत कम्पनी खोली, जो कई वर्ष तक चलती रही। इस काम में वे अपने मित्रों को यथासम्भव परामर्श और सहयोग देते रहे। सन् 1884 में पंडित आदित्यराम भट्टाचार्य ने 'इडियन युनियन' के नाम से अंग्रेजी में एक साप्ताहिक निकालना प्रारम्भ किया। इसके सम्पादक का सारा भार उन्हें ही वहन करना पड़ता था। इसे देखकर उनके आदेश पर मालवीय जी ने उसके सम्पादन का बहुत कुछ भार अपने ऊपर ले लिया।
नागरी लिपि हिंदी के अथक साधक
मालवीय जी ने हिंदी साहित्य की भी सेवा की। तब वे मकरंद और झक्कड़ सिंह उपनाम से लिखते थे। उनका कथन था कि "जहां लोग हिंदी जानते हैं वहां आपस में हिंदी में वार्तालाप न करना देशद्रोह के समान अपराध है।" आधुनिक काल में हिंदी के निर्माण और विकास का सर्वाधिक श्रेय स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी और मदनमोहन मालवीय को दिया जाता है। मालवीय जी की मातृभाषा हिंदी थी। देश की एकता के लिए उन्होंने प्राचीन वैदिक संस्कृति और आर्य भाषा हिंदी को सम्बल दिया। वर्ष 1919 में मुम्बई में राष्ट्रभाषा के संबंध में उन्होंने कहा था, "वह कौन-सी भाषा है, जो वृन्दावन, बद्रीनारायण, द्वारका, जगन्नाथपुरी इत्यादि चारों धामों तक एक समान धार्मिक यात्रियों को सहायता देती है? वह एक हिंदी भाषा है। लिंग्वा फ्रेंका, लिंग्वा फ्रेंका ही क्यों लिंग्वा इंडिका है। गुरु नानकजी लंका, तिब्बत, मक्का और मदीना, चीन इत्यादि सब देशों में गये। वहां उन्होंने किस भाषा में उपदेश दिया था? यही हिंदी भाषा थी। इससे जान पड़ता है कि उस समय भी हिंदी भाषा राष्ट्रभाषा थी, और उसका सार्वजनिक प्रचार था।" मालवीय जी हिंदु और मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनका कहना था, "हम दोनों में जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी, उतने ही हम दुर्बल रहेंगे। इसीलिए जो जाति इन्हें परस्पर लड़ाने का प्रयत्न करती है, वह देश की शत्रु है।" उनका कहना था, "हिंदु और मुसलमान दोनों ही साम्प्रदायिकता से दूर रहें और अपने धर्म के साथ-साथ देश की उपासना करें।"
उन्होंने अनेक संगठनों की स्थापना की तथा सनातन धर्म के हिंदू विचारों को प्रोत्साहन देने तथा भारत को सशक्त और दुनिया का विकसित देश बनाने के लिए उच्च स्तर की पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने प्रयाग हिंदू समाज की स्थापना की और समकालीन मुद्दों और देश की समस्याओं पर अनेक लेख लिखे। वर्ष 1884 में "हिंदी-उद्धारिणी-प्रतिनिधि-मध्य-सभा" प्रयाग में खुली। इसका उद्देश्य नागरिकों को उसका अधिकार दिलाया था। मालवीय जी ने इसमें दिल खोलकर काम किया, व्याख्यान दिये, लेख लिखे और अपने मित्रों को भी इस काम में भाग लेने के लिए उत्प्रेरित किया। मालवीय जी ने अपने ही देश में विदेशी भाषाओं के स्थान पर नागरी को समुचित स्थान दिलाने का प्रयास में हिंदी का प्रचलन अपने ही प्रदेश में आरंभ किया।
मालवीय जी के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान वर्ष 1886 में कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे वार्षिक अधिवेशन से हुई। वहां उन्होंने जो भाषण दिया, उससे कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह प्रभावित हुए। वे 'हिन्दुस्तान' नामक एक साप्ताहिक समाचार पत्र निकालते थे। इसे वे दैनिक बनाना चाहते थे। उन्होंने मालवीय जी से इसका संपादक बनने का प्रस्ताव रखा। मालवीय जी बेहद स्वाभिमानी थे और अपने सिद्धांत के साथ समझौता नहीं करते थे। उन्होंने अपनी कुछ शर्तों सहित इसे स्वीकार किया।
वे एक प्रखर पत्रकार थे और हिंदी पत्रकारिता करते हुए उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम किया। मालवीय जी को हिंदी के अखबारों का जनक कहना भी अतिशयोक्ति न होगी। कालाकांकर के हिंदुस्तान का संपादन करने के बाद प्रयाग से वर्ष 1907 में प्रकाशित "अभ्युदय" व उसके बाद "मर्यादा" ने अपने समाचार पत्र संपादकीय से जो अतिशय सफलता पाई वह बाद में प्रकाशित होने वाले अन्य समाचार पत्रों के लिए मार्गदर्शक बनी। वर्ष 1909 में उन्होंने 'लीडर" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया और वर्ष 1924 से 1946 तक दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स से भी संबद्ध रहे। साथ ही "किसान" और "मर्यादा" नामक पत्रों का संपादन किया। "लीडर" के हिंदी संस्करण "भारत" और "हिन्दुस्तान टाइम्स" का हिंदी संस्करण "हिन्दुस्तान" निकला।
राष्ट्रभाषा हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रति उनका अटूट प्रेम था। मालवीय जी के प्रयास से सन् 1896 में सर एण्टनी मेकडानल ने प्रान्तीय सरकार की सन् 1877 की वह आज्ञा वापस ले ली, जिसने सरकारी दफ्तर में दस रुपए या उससे अधिक की नौकरी पाने के लिए उर्दू या फारसी में एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल परीक्षा पास करना अनिवार्य बना दिया था। मालवीय जी के प्रयास से 2 मार्च सन् 1898 को अयोध्या नरेश महाराज प्रताप नारायण सिंह, माण्डा के राजा राम प्रताप सिंह, आवागढ़ के राजा बलवंत सिंह, पंडित सुन्दरलाल तथा मालवीय जी का एक डेपूटेशन सर एण्टोनी मेकडसलसे, जो उस समय उनके प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, मिले और मालवीय जी ने उसकी ओर से नागरी लिपि के संबंध में प्रार्थना पत्र उन्हें पेश किया। सर एण्टोनी ने प्रार्थना पत्र पर विचार करने का वादा किया और 14 अप्रेल सन् 1900 ई. को अदालतों में फारसी लिपि के साथ नागरी लिपि के भी चलन की आज्ञा जारी कर दी। वे हिंदी में भाषण दिया करते थे। मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे अंतिम क्षणों तक इसका मार्ग दर्शन करते रहे। वर्ष 1910 में मालवीय के सहयोग से इलाहाबाद में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की नींव पड़ी। वे अखिलभारतीय सनातन धर्म महासभा के संस्थापक व आजीवन अध्यक्ष रहे। उन्होंने संगीत विद्या को भी कोठे की चारदिवारियों से बाहर निकाल कर पहली बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठापित किया। वर्ष 1919 में, प्रयाग में कुंभ के पावन अवसर पर उन्होंने श्रद्धालुओं की सेवा के लिए प्रयाग सेवा समिति की शुरुआत की। मालवीय जी स्वदेशी आंदोलन की भी नींव डालने वालों में अग्रणी थे। वर्ष 1881 में उन्होंने देशी तिजारत कंपनी का गठन किया। इसके बाद 1907 में उन्होंने इंडियन इंडस्ट्रियल कांफ्रेंस का भी आयोजन किया।
इस दशक में उनका महत्त्वपूर्ण कार्य अदालतों में देवनागरी लिपि के प्रयोग को सरकार द्वारा स्वीकृत कराना था। इसके लिए उन्हें लगातार तीन वर्ष तक कठिन परिश्रम करके एक प्रार्थना पत्र तैयार करना पड़ा। इस प्रार्थना पत्र में उन्होंने बहुत से विद्वानों और प्रकाशकों के विचारों तथा बहुत से तथ्यों के आधार पर नागरी लिपि के दावों को सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उन्होंने बताया कि प्रोफेसर मोनिपर विलियम्स, सर आइजैक पिटमैन, चीफ जस्टिस अर्सकिन पेरी जैसे विद्वान नागरी लिपि की सर्वांगपूर्णता स्वीकार करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि इन अक्षरों की मनोहरता, सुन्दरता, स्पष्टता, पूर्णता और शुद्धता निर्विवाद है। प्रार्थना पत्र में यह भी बताया गया कि 'यदि यह भी मान लिया जाए कि फारसी में अधिक शीघ्रता से काम चलता है' तो भी नागरी के गुणों तथा स्वत्वों को भुलाया नहीं जा सकता। बहुत से प्रमाणों से हिन्दी भाषा की व्यापकता को सिद्ध करते हुए प्रार्थनापत्र में कहा गया कि हिन्दी ही उत्तर भारत की भाषा है और नागरी अक्षरों का प्रचार पश्चिम तौर प्रान्त और अवध (मौजूदा उत्तर प्रदेश) में शिक्षा के प्रसार के लिए नितान्त आवश्यक है।
भारती भवन पुस्तकालय, प्रयाग म्यूनिस्पैलिटी छात्रावास का निर्माण आदि में मालवीय जी का भरपूर सहयोग रहा। मुसलमानों ने सरकार की आज्ञा का विरोध करते हुए मालवीय जी पर साम्प्रदायिकता का दोष लगाया और नागरी लिपि तथा हिन्दी की तरह-तरह से हिजो की। पर एक दिन मालवीय जी ने एक अरबी की नजीर नागरी लिपि में लिख कर हाइकोर्ट में पढकरर इस तरह ठीक-ठीक सुनाई कि मौलवी जामिन अला, जो कि मशहूर वकील थे, मुकदमा खत्म होने पर उनसे कोर्ट के बरामदे में मिले और उनका हाथ पकड़कर कहने लगे- "पंडित साहब, आज मैं नागरी अक्षरों की उमदगी का कायल हो गया, लेकिन मैं पब्लिक में यह नहीं कहूँगा।"
प्रयाग के सांस्कृतिक जीवन की अभिवृद्धि के लिए मालवीय जी ने बाबू पुरुषोत्तमदास टण्डन को हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय को प्रयाग में स्थापित कर उसका संचालन करने को प्रोत्साहित किया। ठण्डन जी से मालवीय जी के बहुत ही मधुर संबंध थे। वे तो एक प्रकार से टण्डन जी के राजनीतिक गुरु थे। उन्हीं से टण्डन जी ने विद्यार्थी जीवन में सार्वजनिक सेवा की प्रथम प्रेरणा प्राप्त की थी। टण्डन जी संयमी, दृढ़प्रतिज्ञ, कर्तव्य परायण, निस्पृही राष्ट्रसेवी थे। किसानों के प्रति उनकी विशेष सहानुभूति थी। वे स्वतन्त्रता संग्राम के वीर सेनानी और नायक थे। जमींदारों की लूटखसोट के प्रतिरोध के लिए किसानों का संगठन तथा किसान आन्दोलन का नेतृत्व उनके राजनीतिक क्रियाकलापों का महत्त्वपूर्ण अंग था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तो वे प्राण ही थे। वे ही उसके प्रमुख कर्ता-धर्ता थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
भारतीय समाज एवं दलित
मालवीय जी दलितों के मंदिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के विरोध में संपूर्ण राष्ट्र में आंदोलन चलाया। 1 अगस्त, 1936 को काशी में महात्मा गांधी के एक वर्षीय हरिजनोद्धार कार्यक्रम के समापन पर आयोजित सभा में मालवीय जी ने एक रूढ़िवादी विद्वान के भाषण के जवाब में अपने भाषण में कहा, "मेरी समझ में नहीं आता कि करोड़ो गरीब हिंदुओं को धर्माचरण और देवदर्शन से वंचित रखना कौन-सा धर्म है। यह वही काशी नगरी है, जहां रैदास और कबीर जैसे भक्त हुए हैं, जहां स्वयं शंकर भगवान ने चांडाल का वेष धरकर भगवान शंकराचार्य को सब जीवों की एकता का उपदेश दिया। उस नगरी में एक विद्वान धर्माचार्य कैसे इतने बड़े अधर्म की बात कहता है? कैसे वह भगवान को भक्त से दूर रखने का साहस करता है। कैसे वह छुआछूत के नाम पर पवित्र राम-नाम और शिव का नाम लेने से उन्हें रोकता है, जिसके उच्चारण से उन्हें मुक्ति मिलती है?"
दलित अर्थात "जिसका दमन किया गया हो" जातियों की श्रेणी में वे जातियाँ आती है जो वर्ण व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर थी तथा जिनका विभिन्न प्रकार से सामाजिक, आर्थिक शोषण सदियों से होता चला आ रहा है। संवैधानिक भाषा में इन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। भारत की जनसंख्या में 16 प्रतिशत दलित है। पिछले 6-7 दशको में दलित पद का अर्थ काफी बदल गया है। विभिन्न समाज सुधारकों व नेताओं के प्रयास एवं आन्दोलनों के पश्चात् यह शब्द हिन्दू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित हजारों वर्षो से अस्पृश्य समझी जाने वाली तमाम जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग होता है। अपनी सभ्यता के इतिहास में भारत ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने विचारों को आचरण में उतार कर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया इन्हीं महापुरुषों के श्रेणी में एक अतुल्यनीय नाम श्री महामना मदन मोहन मालवीय जी का भी है जिन्होंने सामाजिक शोषण, दलितों की समाज में स्थिति तथा उनके उत्थान के विषयों में कई प्रयास कियें। इस प्रपत्र के माध्यम से मालवीय जी के द्वारा दलित उत्थान में किये प्रयासों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
दलित से अभिप्राय, उन लोगों से है जिन्हें जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण सदियों से स्वस्थ एवं समुन्नत सामाजिक जीवन से वंचित, तिरस्कृत और समाज के हाशिये पर रखकर अपेक्षित जीवन जीने के लिए विवश रखा गया है। इतिहास के पन्ने को पलटने से यह साफ पता चलता है कि भारतीय सभ्यता के निर्माता वैदिक जन थे, वैदिक काल में समस्त मानव जीवन को एक व्यवस्था में सुन्दर समाज में बांधने के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गयी इन्हीं चार आश्रमों की तरह चार वर्णों को भी बांटा गया-
  1. ब्राह्मण - समाज को शिक्षा प्रदान करे।
  2. क्षत्रिय - समाज की रक्षा करे।
  3. वैश्य - व्यापार तथा वस्तु की पूर्ति।
  4. शूद्र - सेवा का कार्य।
वेदकाल से ही जाति तथा प्रथा जैसी बुराई का प्रारम्भ हो चुका था जो मनुस्मृति काल में पनपकर विकसित हो गया। मनुस्मृति में सभी शूद्रों - अछूत जातियों के साथ पशुवत व्यवहार करने की व्यवस्था की गयी है। हिन्दू समाज व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था के उल्लंघन पर निम्न वर्ण के लोगों के लिए हिन्दू मानस दण्ड का विधान मनुस्मृति में है। आज भी वह विधान गाँवों में हिन्दुओं के निजी कानून के रूप में व्यवहार में है जो कि कितने हिंसक और क्रुरतम आदेश है। वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज का सबसे बड़ा अभिशाप रहा इसके क्रम में दलितों का जो स्थान था, वह पशु से भी गया गुजरा था। दलित जीवन की भयावह पीड़ा ने प्राचीन काल से ही अकांक्षी और संवेदन शील समाज सुधारकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, राजा राममोहन राय, महात्मा ज्योतिबा फूले, नारायण गुरू, महात्मा गाँधी एवं डा0 बाबा साहब अम्बेडकर आदि ने अछूतों की स्थितों को समझ्ाने की कोशिश की और उसे बदलने का भी संघर्ष किया।
दलित समाज का उत्थान
प्राचीन काल में कार्य अनुसार वर्ण व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ, यह व्यवस्था केवल कार्य विभाजन पर आधारित थी किन्तु जनसंख्या विस्फोट औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की तीव्र होती प्रक्रिया के पश्चात कार्य विभाजन के सिद्धांत में अनवरत परिवर्तन परिलक्षित हो रहे है।
हम शनैः शनैः वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल और अब तक का लम्बा सफर तय कर आये है परन्तु अभी तक रूढ़िवादी प्राचीन परम्पराओं को अपने से दूर नहीं कर पाये। न तो इसमें अपेक्षित परिवर्तन मध्यकाल में आया और न ही आधुनिक काल, जबकि इस अन्तराल में अनेक महान सामाजिक चिन्तन वादियों का उदय हुआ, फिर भी इस समस्या को जिस सीमा तक दूर करना चाहिए था, दूर नहीं कर पाये। अपवादों को छोड़कर चिन्तनवादी परिवर्तन करने की दिशा में असफल रहें। भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण के समय देश के कमजोर अथवा दलित वर्ग का विशेष ध्यान रखा और उनके विकास और उत्थान के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किये।
मालवीय जी एवं दलित चिंतन
आचरण का उपदेश वचनों के आदेश से अधिक प्रभावशाली होता है, अपने एक गीता प्रवचन में पूज्य महामना ने यह बात कही थी; सन्दर्भ भगवान श्री कृष्ण थे, जिनका पृथ्वी पर अवतार अपने आचरण का उपदेश देने के लिए हुआ था। अपने सभ्यता- इतिहास में भारत ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने विचारों को आचरण में उतार कर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किये। मालवीय जी को महामना की उपाधि उनके विराट हृदय और मानवीय संवेदना युक्त आचरण के लिए मिला था, उनके हृदय में दलित, स्त्री और समाज के कमजोर तबके इंसानों के प्रति अपार करुणा थी।
हिन्दू समाज की सनातन वर्ण व्यवस्था के अनुयायी होते हुए भी उनका साफ मानना था कि अस्पृश्यता हिन्दू समाज व्यवस्था का अंग नहीं है और जाति व्यवस्था और छुआछूत दोनो अलग-अलग बातें है। ऐसी कुरीति प्राचीन भारत में कभी नहीं रही इस समस्या के मूल में धर्म की रूढ़िवादी व्याख्या और अहंकारी सामंती प्रवृत्ति को जिम्मेदार ठहराते हुए उनका साफ मानना था कि जब तक दलितों की सामाजिक स्तर पर स्वीकार्यता नहीं होगी तब तक छुआछूत की समस्या दूर नहीं हो सकती। वे अस्पृश्यता को शास्त्रविध घोषित करते हुए आजीवन रूढ़िवादी विद्वानों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते रहें और उनके बताये गये धर्मग्रन्थों से ही श्लोकों, उक्तियों, प्रमाणों, वचनों आदि को उद्धृत करके उन्हें निरुत्तर करते रहें। मालवीय जी अपने वचनों में कहते थे- " शुद्ध स्त्री और निर्बल, ईश्वर के हृदय में बसते है जबकी अन्य धार्मिक उनकी कृपा के पात्र होते है।"
एक बार एक सभा में मालवीय जी से "समाज में शूद्रों का स्थान" विषय पर सीधा प्रश्न हुआ तो उन्होंने उत्तर दिया कि यदि शूद्र प्रभु चरण से उत्पन्न है और हम उनके चरणों की पूजा करते है, चरणामृत लेते है, तो शूद्रों को तिरस्कृत व उपेक्षित करने का कोई औचित्य नहीं है। सभी वर्गों को अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। इससे सामंजस्य और सद्भाव बढ़ेगा।
वर्ण व्यवस्था एवं मालवीय जी
वर्ण के विषय में मालवीय जी का विचार स्पष्ट था। वह जन्म के आधार पर पैतृक कर्म या प्रकृति को वर्ण व्यवस्था का आधार मानते थे। उनके अनुसार यदि ब्राह्मण के गुण शूद्र में पाये जाये तो वह शूद्र नहीं है और यदि ब्राह्मण के गुण नहीं पाये जाये तो वह ब्राह्मण नहीं हैं अतः उदाहरण देते हुए मालवीय जी ने कर्म के आधार पर वर्णों के सामाजिक महत्व को स्वीकार किया है उनके अनुसार मनुष्य पुण्य कर्म से वर्ण के उत्कर्ष को तथा पाप कर्म से वर्ण के अपकर्ष को प्राप्त होता है। मालवीय जी वर्णों के गुण के अनुसार ऊपर उठना उच्च वर्ण में स्वीकार करते थे। मालवीय जी ने कहा था- "हमारे वेद पुकार-पुकार कर कहते है कि हमारी हिन्दू जाति के अन्दर सब जातियाँ अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र एक ही शरीर के अंग है अतः सबसे प्रेम करना चाहिए। मालवीय जी वर्णो में गतिशीलता-सिद्धांत के समर्थक थे। उन्होंने कहा था कि मैं मनुष्यता का पूजक हूँ। मनुष्यत्व के आगे मैं जात-पात को नहीं मानता। उनका कहना था कि गरीब की सेवा करनी चाहिए द्वेष नहीं। उनके अनुसार- शीलं प्रधानं पुरूषे अर्थात् शील ही मनुष्य में प्रधान है। शीलं परंभूषणम् अर्थात् शील ही मनुष्य का सबसे उत्तम आभूषण है। शील सम्पन्न मनुष्य ही अपने जीवन का समुचित उत्कर्ष तथा समाज की सेवा कर सकता है।
दलित हजारों वर्षों तक अस्पृश्य या अछूत समझे जाने वाली उन तमाम शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होता है जो कि हिन्दू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित है। आज दलितों को भारत में जो भी अधिकार मिले है उसकी पृष्ठभूमि इसी शासन की देन थी। भारत में दलितों के उद्धार के लिए कदम उठाने वालो में विभिन्न समाज सुधारकों का नाम आता है मालवीय जी का अपने मानवीय मूल्यों की वजह से समाज में अलग स्थान रखते है मालवीय जी ने समय समय पर दलितों के उत्थान के लिए विभिन्न आवश्यक कदम उठाये। शिक्षा, धर्म, अस्पृश्यता आदि क्षेत्र में दलितों की समस्या का कैसे निष्कारण हो इसका उचित प्रयास किया। इनके सार्थक प्रयासों से दलित के प्रति सामाजिक बुराइयों में अधिकाधिक सुधार द्रष्टव्य है।
मालवीय जी और स्वतन्त्रता आन्दोलन
भारत की स्वतन्त्रता के वीर सेनानियों एवं देश के निर्माताओं में मालवीय जी का स्थान बहुत ऊंचा रहेगा। वे भारत की स्वतन्त्रता के लिए लड़े और इस विश्वास के साथ लड़े कि उसे अपने जीवन में ही प्राप्त कर लेंगे। लेकिन अपने जीवन काल में प्राप्त नहीं कर सके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसे उनके महत्तम कार्यों में से एक समझा जाता है। वस्तुतः एक ऐसी अनुल्लंघनीय दीवार है, जो उनके विविध विषयों के व्यापक कार्य क्षेत्र पर दर्शकों की दृष्टि पड़ने नहीं देती। उनमें एक महापुरुष के व्यापक गुणों का अद्भुत एवं दुर्लभ सामंजस्य था। यह भी सही है कि ऊपर देखने पर भारतीय स्वतन्त्रता के भवन में मालवीय जी हाथ उतना अधिक प्रत्यक्ष नहीं दिखलाई पड़ता, जितना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या नेता जी सुभाष चंद्र बोस का, क्योंकि नींव तो किसी को दिखलायी नहीं देती, किन्तु बिना नींव के भवन की कल्पना भी तो असम्भव है। इसी बात को लक्ष्य कर नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने एक बार नवयुवकों को आह्वान करते हुए कहा था- "आज जिस अग्नि के चंदन की लकड़ी का काम किया है, इसे कभी मत भूलना। नेहरू जी ने लगभग इसी प्रकार के भाव व्यक्त किए थे- "भारतीय स्वतन्त्रता का जो शानदार भवन आज खड़ा हुआ है, नींव से लेकर ऊपर तक उसकी रचना मालवीय जी के हाथों हुई है। वर्ष-प्रतिवर्ष, ईंट पर ईंट, पत्थर पर पत्थर रखते हुए भारतीय स्वतन्त्रता के इस आधुनिक विशाल भवन का निर्माण उन्होंने किया था। वह असाधारण रूप से महापुरुष थे।
मालवीय जी कानून के भी अच्छे जानकार थे। वर्ष 1891 में वह बैरिस्टर बने और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ की। वकालत के दौरान उन्हें गरीबों का वकील कहा जाता था। वह झूठा मुकदमा नहीं लेते थे। इन दिनों उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुकदमों में पैरवी भी की। वर्ष 1913 में उन्होंने वकालत छोड़ दी थी लेकिन ब्रिटिश राज से आजादी के लिए राष्ट्र की सेवा करने का फैसला लिया। लेकिन जब गोरखपुर के ऐतिहासिक चैरीचैरा कांड में 170 लोगों को फांसी की सजा हुई तब इलाहाबाद हाइकोर्ट में मालवीय जी ने अपनी बहस से इनमें से 150 लोगों को फांसी के फंदे से बचा लिया।वे निःसंदेह अजातशत्रु थे।
मालवीय जी हिंदु और मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनका कहना था, "हम दोनों में जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी, उतने ही हम दुर्बल रहेंगे। इसीलिए जो जाति इन्हें परस्पर लड़ाने का प्रयत्न करती है, वह देश की शत्रु है।" उनका कहना था, "हिंदु और मुसलमान दोनों ही साम्प्रदायिकता से दूर रहें और अपने धर्म के साथ-साथ देश की उपासना करें।" स्वतंत्रता के कुछ माह पूर्व 12 नवम्बर, 1946 को मालवीय जी का निधन हो गया। उनकी मृत्यु को राष्ट्रीय क्षति बताते हुए महात्मा गांधी ने कहा, "मालवीय जी ने देश को अपनी महान सेवाएं प्रदान की। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदु विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी सबसे महान सेवा व उपलब्धि रही। यह कार्य उन्हें प्राणों से भी प्रिय था, जिसके लिए उन्होंने अथक प्रयास किए। सभी जानते हैं कि मालवीय जी को भिक्षु सम्राट के नाम से जाना जाता है। ईश्वर की कृपा से उन्होंने स्वयं के लिए कोई इच्छा नहीं की अतः उन्हें कभी किसी चीज का अभाव भी नहीं रहा। उक्त कार्य को उन्होंने अपना कर्तव्य माना और स्वेच्छा से भिक्षु भी बने। इसीलिए ईश्वर ने भी उनके पात्र को सदा जरूरत से ज्यादा भरे रखा।" इस दृष्टि से भारत के इस लोकतांत्रिक युग के लिए मालवीय जी का व्यक्तिक और सार्वजनिक जीवन लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए अवश्य ही अनुकरणीय है। उनकी तत्परता, दृढ़ता, भद्रता तितिक्षता और कर्तव्‍य-परायणता तथा निर्भीकता और निस्वार्थ सेवा भावना का अनुकरण अवश्य ही इस देश के लोकतांत्रिक जीवन को ऊँचा उठा सकता है। इस तरह मालवीय जी का जीवन आज भी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह स्वतन्त्रता से पहले था।


Madan Mohan Malaviya Slogans/मदन मोहन मालवीय जी के नारे
Hindi – सत्यमेव जयते. English – Satyameva Jayate.
Madan Mohan Malaviya Images/ मदन मोहन मालवीय जी के चित्र



महामना मदन मोहन मालवीय के दुर्लभ चित्र






















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