Breaking News : हैंडग्रेनेड और एके 47 का जखीरा मुसलमान के घर में
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हम भी बन गये चर्चित चिट्ठाकार
जैसा की आपने पढ़ा ही होगा कि मैने कुछ दिनों पूर्व मेरी और श्री आलोक जी के मध्य इलाहाबाद जक्ंशन पर एक लघु मुलाकात हुई थी जिसकी पोस्ट मैने लिखी और आपने पढ़ी थी। अब यही से हिन्दी फिल्मो की तरह रोमांचक मोड़ आ जाता है। बहुत दिनों बाद जंग खाये ब्लाग राईटर का उपयोग कर पोस्ट लिख रहा था। उसमें महाशक्ति के दो एकान्ट लिख रहे थे, पहला वो जिस पर मै नियमित लिखता हूँ दूसरा वो जिस पर मै टेम्पलेट आदि का टेस्ट करता हूँ। भूल वश वह दूसरे खाते चली गई और प्रकाशित भी हो गई। सबसे बड़ी बात ये कि ये भी भी पढ़ी गई और टिप्प्णी भी बटोरे में सफल रही है। ये सब कुछ हो रहा था और मुझे इसका पता ही नही चला और मै बाट के बटोही महाशक्ति पर की पोस्ट पर टिप्पडियों की बाट जोह रहा था।
मुझे अपनी इस पोस्ट की जानकारी आज चिट्ठाचर्चा के जरिये हुई। जब चिट्ठाचर्चा पर गया तो नये चिट्ठाकार के रूप में महाशक्ति का एक और नाम पाया। आश्चर्य हुआ की हमारी ब्लाग के हेडर पर लिखी पंचलाईन पढ़ने के बाद भी हमसे टकराने की हिम्मत कौन कर रहा है। मन कह रहा था कि शेर बूढ़ा क्या हुआ, सियारो की लोय लग गई। चिट्ठाचर्चा से लिंक खोला लिंक काम नही कर रहा था। और भी सस्पेस जागृत हुआ कि लेख लिखा गया और डीलिट भी होगा गया, और हमें पता नही। लिंक में सुधार किया तो पता चला कि ये तो हम ही है। खोदा पहाड़ निकला चूहिया।
काफी दिनो बाद चिट्ठाचर्चा में अपनी चर्चा होते देख चर्चित होने का भी अनुभव प्राप्त कर लिया। मुझे खेद है कि उस नये ब्लाग पर आई प्रतिक्रियाओं का जवाब नही दे सका। चिट्ठाचर्चा का भी आभार की मुझे मेरे ही लेख की सूचना दी। :)
चलते चलते : आज किसी ब्लाग पर पढ़ा की हमारे श्री समीर लाल जी के सु्पुत्र का शुभ विवाह आगामी हफ्ते में है। हमारी तरफ से बहुत बहुत शुभ कामनाऍं।
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हिन्दी के प्रथम चिट्ठाकार से मुलाकात
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अल्लाह ने दिये अबाध बिजली अपूर्ति की गांरटी
यहां तो 10 बजे बिजली कटनी चाहिए थी अभी तक 10.30 तक कटी नहीं, क्या आपकी सरकारो ने भी ऐसी कोई मांग अल्लाह मियां से की हो जो टिप्पणी के माध्यम से जरूर सूचित कीजिए। काश हमारे भगवान के पास भी कोई अतिरिक्त जनरेटर होता, तो हमारे भी त्यौहार उजाले में मनाये जाते।
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श्रद्धांजली - अमर शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन

भारत माता को भी नाज होगा कि उसके रक्षा की खतिर देश में सपूतों की कमी नही है, उन्ही में से एक है मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जो मुम्बई हमले मे देश की रक्षा करते हुयेबीर गति को प्राप्त हुये। धन्य होगी वह मॉं की कोख और पिता की गोद जिसने इस महान सपूत को जन्म दिया और पाला होगा। भले ही आज मेजर हमारे बीच नही है किन्तु उनका जज्बा और यादे हमारे बीच जरूर है।
मेजर आज भी हमारे बीच है, एक प्रेरणा स्त्रोत के रूप में, आतंकवाद की लड़ाई में प्रखर योद्धा के रूप में। उनके परिवार को उन नाज होगा कि उनका पुत्र देश के लिये शहीद हुआ किन्तु उनके शहीद होने से माता पिता ने अपना पुत्र, बहन-भाईयों ने भाई, पत्नि ने पति और पुत्र-पुत्रियों ने अपना पिता खोया है। अमर शहीद से बना शून्य ताजिन्दगी उनके परिवार वालो को उनकी याद दिलाता रहेगा।
इस राष्ट्रीय दुख की घड़ी में हम सब यही प्रार्थना कर सकते है कि उनके परिवार जनो को इस आपर छति से लड़ने का साहस प्रदान करें।
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हे भगवान जी हमारी नानी को वापस बुला लो'
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कामोत्तजक पुरूष और अम्बूमणि रामदौस
खैर शेष फिर .................
जॉब सम्बन्धी महत्वपूर्ण सूचना
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय : छात्रसंघ पर प्रतिबन्ध अनुचित
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इलाहाबाद का यश चला बनारस
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साध्वी पर षड़यंत्र
"एक बात और जिस समय मालेगांव में विस्फोट हुआ उसी समय गुजरात के मोडासा में भी विस्फोट हुआ। खुफिया एजेंसियों का तब कहना था कि इन दोनों विस्फोटों के पीछे एक ही आतंकवादी संगठन का हाथ है। जब साफ है कि मालेगांव में हुए दोनों विस्फोटों के पीछे उद्देश्य और विस्फोट करने का तरीका एक ही है तो फिर सीबीआई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से पूछताछ करने की कोशिश क्यों नहीं कर रही है? ये बड़ा सवाल है और इस सवाल का जवाब ढूंढने में ही साध्वी की गिरफ्तारी और कथित हिंदू आतंकवाद के खुलासे के पीछे छुपे राजनीतिक छल-प्रपंच का भंडाफोड़ हो पाएगा। फिलहाल साध्वी सभी वैज्ञानिक जांच में बेदाग निकल गई हैं और अब एटीएस (एंटी टेररिस्ट स्क्वाड) साध्वी के खिलाफ मिले सबूतों और उसकी ब्रेन मैपिंग व नार्कों टेस्ट के नतीजों को सार्वजनिक करने के बजाय अब साध्वी की साधना की आड़ लेकर अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश कर रहा है। इस मामले में बुरी तरह फंस चुकी एटीएस इसे साध्वी की साधना का कमाल बता रही है और दोबारा से परीक्षण की बात कह रहा है।"
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मुस्लिम सेक्यूलर और हिन्दू सम्प्रदायिक क्यो ?
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अखंड भारत के असली नायक पुष्यमित्र शुंग
एक दिन मौर्य नरेश बृहद्रथ जंगल में घूमने को निकला। अचानक वहां उसके सामने शेर आ गया। शेर सम्राट की तरफ झपटा। शेर सम्राट तक पहुंचने ही वाला था कि अचानक एक लम्बा चैड़ा बलशाली भीमसेन जैसा बलवान युवा शेर के सामने आ गया। उसने अपनी मजबूत भुजाओं में उस मौत को जकड़ लिया। शेर को बीच में से फाड़ दिया और सम्राट को कहा कि अब आप सुरक्षित हैं। अशोक के बाद मगध साम्राज्य कायर हो चुका था। यवन लगातार मगध पर आक्रमण कर रहे थे। सम्राट ने ऐसा बहादुर जीवन में ना देखा था। सम्राट ने पूछा ” कौन हो तुम”। जवाब आया ”ब्राह्मण हूँ महाराज”। सम्राट ने कहा “सेनापति बनोगे”? पुष्यमित्र ने आकाश की तरफ देखा, माथे पर रक्त तिलक करते हुए बोला “मातृभूमि को जीवन समर्पित है”। उसी वक्त सम्राट ने उसे मगध का उपसेनापति घोषित कर दिया। जल्दी ही अपने शौर्य और बहादुरी के बल पर वो सेनापति बन गया। शांति का पाठ अधिक पढ़ने के कारण मगध साम्राज्य कायर हो चुका था। पुष्यमित्र के अंदर की ज्वाला अभी भी जल रही थी। वो रक्त से स्नान करने और तलवार से बात करने में यकीन रखता था। पुष्यमित्र एक निष्ठावान हिन्दू था और भारत को पुनः हिन्दू देश बनाना उसका स्वप्न था।
आखिर वो दिन भी आ गया। यवनों की लाखों की फौज ने मगध पर आक्रमण कर दिया। पुष्यमित्र समझ गया कि अब मगध विदेशी गुलाम बनने जा रहा है। बौद्ध राजा युद्ध के पक्ष में नहीं था। पर पुष्यमित्र ने बिना सम्राट की आज्ञा लिए सेना को जंग के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। उसने कहा कि इससे पहले दुश्मन के पाँव हमारी मातृभूमि पर पडे़ हम उसका शीश उड़ा देंगे। यह नीति तत्कालीन मौर्य साम्राज्य के धार्मिक विचारों के खिलाफ थी। सम्राट पुष्यमित्र के पास गया। गुस्से से बोला ”यह किसके आदेश से सेना को तैयार कर रहे हो”। पुष्यमित्र का पारा चढ़ गया। उसका हाथ उसके तलवार की मूंठ पर था। तलवार निकालते ही बिजली की गति से सम्राट बृहद्रथ का सर धड़ से अलग कर दिया और बोला ”ब्राह्मण किसी की आज्ञा नही लेता”। हजारों की सेना सब देख रही थी। पुष्यमित्र ने लाल आँखों से सम्राट के रक्त से तिलक किया और सेना की तरफ देखा और बोला “ना बृहद्रथ महत्वपूर्ण था, ना पुष्यमित्र, महत्वपूर्ण है तो मगध, महत्वपूर्ण है तो मातृभूमि, क्या तुम रक्त बहाने को तैयार हो?” उसकी शेर सी गरजती आवाज से सेना जोश में आ गयी। सेनानायक आगे बढ़ कर बोला “हाँ सम्राट पुष्यमित्र। हम तैयार हैं”। पुष्यमित्र ने कहा” आज मैं सेनापति ही हूँ। चलो काट दो यवनों को।”
जो यवन मगध पर अपनी पताका फहराने का सपना पाले थे वो युद्ध में गाजर मूली की तरह काट दिए गए। एक सेना जो कल तक दबी रहती थी आज युद्ध में जय महाकाल के नारों से दुश्मन को थर्रा रही थी। मगध तो दूर यवनों ने अपना राज्य भी खो दिया। पुष्यमित्र ने हर यवन को कह दिया कि अब तुम्हें भारत भूमि से वफादारी करनी होगी नहीं तो काट दिए जाओगे। यवनों को मध्य देश से निकालकर सिन्धु के किनारे तक खदेड़ दिया और पुष्यमित्र के हाथों सेनापति एवं राजा के रूप में उन्हें पराजित होना पड़ा। यह पुष्यमित्र के काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद पुष्यमित्र का राज्यभिषेक हुआ। उसने सम्राट बनने के बाद घोषणा कि अब कोई मगध में बौद्ध धर्म को नहीं मानेगा। हिन्दू ही राज धर्म होगा। उसने साथ ही कहा “जिसके माथे पर तिलक ना दिखा वो सर धड़ से अलग कर दिया जायेगा”।
उसके बाद पुष्यमित्र ने वो किया जिससे आज भारत कम्बोडिया नहीं है। उसने लाखों ‘देशद्रोही’ बौद्धों को मरवा दिया। मगध साम्राज्य के केन्द्रीय भाग की विदेशियों से रक्षा की तथा मध्य भारत में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना कर विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति को कुछ समय तक रोके रखा। मौर्य साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर उन्होंने वैदिक संस्कृति के आदर्शों की प्रतिष्ठा की।
बुद्ध मन्दिर जो हिन्दू मन्दिर गिरा कर बनाये गए थे, उन्हें ध्वस्त कर दिया। बुद्ध मठों को तबाह कर दिया। चाणक्य काल की वापसी की घोषणा हुई और तक्षशिला विश्विद्यालय का सनातन शौर्य पुनः बहाल हुआ। शुंग वंशावली ने कई सदियों तक भारत पर हुकूमत की। पुष्यमित्र ने उनका साम्राज्य पंजाब तक फैला लिया। इनके पुत्र सम्राट अग्निमित्र शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैला लिया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वह बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी अग्निमित्र से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंगवंश नाम ही लिखते हैं।
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पिपिहरी तो नही मिली, भोपा लिया था
14 अक्टूबर को भाई अभिषेक ओझा ने कहा कि - मेला में पिपिहरी ख़रीदे की नहीं? उस पर एक और टिप्पणी सोने पर सुहागा साबित हुई और मै इस लेख को लिखने पर विवश हो गया। दूसरी टिप्णी सम्माननीय भाई योगेन्द्र मौदगिल ने कहा कि - अभिषेक जी ने जो पूछा है उसका जवाब कब दे रहे हो प्यारे। भाई Anil Pusadkar, श्री अनूप शुक्ल जी,श्री डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर तथा प्रखर हिन्दुत्व का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। उसी के आगे थोड़ा वर्णन और सही ........
इसके आगे से ......... गॉंव से लौट कर मै बिल्कुल थक चुका था, 5 अक्टूबर की थकावट बदस्तूर कई दिनों तक जारी भी रही, चलिये उसका वर्णन भी कर ही देता हूँ, हमेशा हम मित्र मंडली बना कर दशहरा चौक का मेला घूमते थे, किन्तु इस बार गांव से लौटते ही बहुत तेज बुखार पकड़ लिया, जो एकादशी तक जारी रहा, मित्र शिव को पहले ही मै मना कर चुका था कि अब कोई मेला नही जायेगे, रात्रि को सभी लोग चले गये। हम तो बेड रेस्ट करते हुए फिल्म गोल देख रहे थे। रात्रि पौने 12 बजे गोल खत्म होते ही मैंने सभी को दशहरे की बधाई देने के लिए फोन किया। सभी तो प्रसन्न थे किन्तु मेरे न जाने से सभी निराश भी थे। अगले दिन एकादशी को प्रयाग के चौक में बहुत धांसू रोशनी का पर्व होता है, उसका आमंत्रण भी मिला किन्तु मै अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहता क्योंकि मुझे 12 अक्टूबर को परीक्षा भी देना था। इस तरह तो मेरा दशहरा का मेला रसहीन ही बीता। जिसका मुझे मलाल रहेगा, क्योंकि साथियों के साथ घूमने का अपना ही मजा होता है।
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दशहरे का मेला और हमारी नींद
शेष फिर
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क्योकि भगवान बिजली पैदा नही करते
ऐसा तो है नहीं कि ईद और मुहर्रम में खुदा बिजली पैदा करने की इकाई लगा देते है, और जहां दीपावली, होली और दशहरा आता है भगवान जी बिजली पैदा करने की इकाई बंद हो जाती है। सरकार की इस सेक्युलर छवि की हमें चिंता करनी चाहिये। आखिर हिन्दू पर्वों पर ही बिजली क्यों काटती है ?
आज सरकार की यह दोहरी नीति हिन्दुओं को इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना रखा है, अमरनाथ में हिंदुओं को अपने विश्राम की भूमि नहीं मिल सकती है, रामसेतु को सिर्फ इसलिये तोड़ने का प्रयास किया गया क्योंकि यह हिंदुओं के आराध्य श्री राम का स्मृति चिन्ह है। आज हिंदुओं को अपनी अस्तित्व की लड़ाई में चारों तरफ से संघर्ष करना पड़ रहा है।आखिर कब तक यह चलता रहेगा, कब तक हिन्दुओं के की अस्मिता को ललकारा जायेगा ?
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इलाहाबाद जनपद के औद्योगिक विकास की सम्भावनाऍं एवं समस्याऍं : एक आलोचनात्मक अध्ययन
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भोजशाला का इतिहास और सच्चाई
परमार वंश का शासक राजा भोज का 1000 से 1055 तक प्रभाव रहा। म.प्र. के धार जिला में राजा भोज का मंदिर है। राजा भोज मां सरस्वती के उपासक थे, फलस्वरूप राजा भोज ने मां सरस्वती का विशाल मंदिर और एक महाविद्यालय की स्थापना की, जो भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ। उन दिनों राजा भोज की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी, मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और ओड़ीशा में ज्ञानार्जन करने हेतु आते थे। उनका प्रभाव अधिक था। भोजशाला के महाविद्यालय में देश- विदेश से विद्यार्थी अपनी राजा भोज की कृपा से विद्यार्थी वेद, योग, सांख्य, न्याय, ज्योतिष, धर्म, वस्तुशास्त्र, औषधि विज्ञान, राज व्यवहार शास्त्र सहित कई शास्त्रों का अध्ययन करते थे। हजारों की संख्या में विद्यार्थी यहाँ के विद्धानों, आचार्यों के सानिन्ध्य में आलोकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। इन आचार्यों में भवभूति, माघ, वाणभट्ट, कालिदास, मानतुंग, भास्करभट, धनपाल, बौद्ध संत बन्सवाल, समुद्रघोष आदि विश्व विख्यात हैं। कहने का तात्पर्य यह महाविद्यालय बहुत बड़ा शिक्षा का केन्द्र था। जहाँ सभी विषयों का अध्ययन अध्यापन होता था। भोजशाला में माँ सरस्वती की आराधना के साथ-साथ विशाल हवन कुंड में हवन एवं वेद मंत्रों के उच्चारण से भोजशाला गूंजता था। भोजशाला एक खुले प्रांगण में बना है। जिसमें विशाल स्तम्भों की श्रंखला है-जिसके पीछे एक विशाल प्रार्थना घर है। नक्काशीदार स्तम्भ तथा नक्काशीदार छत भोजशाला की पहचान है। राजा भोज सरस्वती के उपासक थे इसलिए उन्होंने वाग्देवी का विशाल मंदिर बनवाया था, जिसमें राजा भोज द्वारा आराधना की जाती थी। 1902 में लार्ड कर्जन के शासन काल में वाग्देवी की प्रतिमा लंदन ले जाया गया। आज भी लंदन के संग्रहालय में वाग्देवी की प्रतिमा मौजूद है।
राजा भोज के शासन के पश्चात् 200 वर्षों तक भोजशाला में अध्ययन- अध्यापन का कार्य भोज के शासनकाल की भांति निरन्तर जारी रहा जैसे राजा में था। हजारों की संख्या में दूर दराज से विद्यार्थी अध्ययन-अध्यापन का कार्य करते थे। 1305 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला पर आक्रमण कर माँ वाग्देवी की प्रतिमा को खंडित कर दिया। इसके अलावा उसने भोजशाला के कुछ भाग को ध्वस्त कर करीब 1200 आचार्यों एवं विद्यार्थियों की हत्या कर हवन कुंड में डाल दिया। कहा जाय तो भोजशाला का बहुत सा भाग ध्वस्त कर दिया। उस समय वहाँ का शासक मेदनी मौलाना कमालुद्दीन का मकबरा और दरगाह का निर्माण करवाया क्योंकि खिलजी शासकों के समय में मौलाना कमालुद्दीन बहुत प्रसिद्ध था। मौलाना कमालुद्दीन हिन्दुओं का धर्मान्तरण कर इस्लाम कुबुल करवाता था। इस्लाम न कुबुल करने पर हिन्दुओं का कत्ल करवा देता। इसलिए कमालुद्दीन खिलजी शासकों का प्रिय मौलाना था। महमू खिलजी द्वारा कमालुद्दीन का मकबरा और दरगाह बनने के बाद भोजशाला पर मुस्लिमों का अधिकार हो गया। भोजशाला में नमाज अदा होने लगी। माँ सरस्वती की पूजा के लिए हिन्दुओं को बहुत संघर्ष करना पड़ा। अभी भी माँ सरस्वती की पूजा संघर्ष चल है।
1935 में म.प्र. के धार स्टेट का दीवान नाडकार ने भोजशाला को कमाल मौलाना का मस्जिद बताते हुए सिर्फ मुस्लिमों को नमाज अदा करने की अनुमति दे दिया। तथा हिन्दुओं को माँ सरस्वती की आराधना का अधिकार समाप्त कर दिया। 1997 में म.प्र. के कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो हिन्दुओं का भोजशाला में प्रवेश ही बंद करवा दिया। उसी वर्ष बहुत संघर्ष के बाद 12 मई 1997 को कलेक्टर द्वारा हिन्दुओं को बसंत पंचमी पर पूजा करने की अनुमति मिली। 2002 में शुक्रवार को बसंत पंचमी और कमाल मौलाना का जन्मदिन एक साथ पड़ा। उस दिन बहुत हंगामा हुआ। सरकारी आज्ञानुसार सुबह से 12 बजे तक सरस्वती पूजा एवं 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा करने की अनुमति मिली। उस दिन 12 बजते ही पूजा बंद करवा दी गयी, हवन कुंड में पानी डाल कर मंदिर परिसर खाली करा दिया गया। मंदिर परिसर खाली करते समय थोड़ा विलम्ब होने पर पुलिस ने लाठियां बरसाना शुरु कर दिया। पथराव होने लगा। बच्चे महिलाओं सहित 1400 लोग घायल हुए, 2 दर्जन गम्भीर रूप से घायल हुए। सारा फसाद राजनैतिक कुटिलता और तुष्टीकरण की प्रवित्ति के कारण हुआ।
इससे स्पष्ट होता है कि मस्जिद और दरगाह भोजशाला को तोड़कर ही बनाया गया है। राजाभोज के भोजशाला में अगर नमाज अदा की जाती है इसपर तर्क संगत विचार होना चाहिए। सही इतिहास पर चर्चा होना चाहिए। लेकिन आज सम्प्रदाय विशेष की तुष्टीकरण के लिए ही सही इतिहास छुपाने की परम्परा चल गयी है। मंदिर एवं स्थलों पर, जहाँ पूजा और नमाज अदा की जाती है, उसे एकता का मिसाल कह कर सेक्यूलरिस्ट अपना पल्ला झाड़ते हैं। एकता का मिसाल जब माना जाता जब आज नवनिर्मित मस्जिदों में भी एक छोटा से ही पूजा स्थल बना दिया जाता, तब हम गर्व से कहते कि भारत के मंदिरों में मस्जिद होना एकता की मिसाल है।
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सम्पूर्ण शिव तांडव स्त्रोत और इसकी रचना कैसे हुई
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रामधारी सिंह ''दिनकर''
दिनकर जी को सरकार के विरोधी रूप के लिये भी जाना जाता है, भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इनकी गद्य की प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृत के चार अध्याय के लिये साहित्य अकादमी तथा उर्वशी के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। 24 अप्रैल 1974 को उन्होंने अपने आपको अपनी कविताओं में हमारे बीच जीवित रखकर सदा सदा के लिए अमर हो गये।
दिनकर जी विभिन्न सकरकारी सेवाओं में होने के बावजूद उनके अंदर उग्र रूप प्रत्यक्ष देखा जा सकता था। शायद उस समय की व्यवस्था के नजदीक होने के कारण भारत की तत्कालीन दर्द को समक्ष रहे थे। तभी वे कहते है –
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पंगेबाज जी महाशक्ति के शहर में
रात्रि 9.30 बजे मैने बात किया और यात्रा का सम्पूर्ण विवरण लिया, पता लगा कि प्रातः 7.00 से 10.00 तक उनका कोई अपना कार्यक्रम नही था तो मैने उस समय को अपने लिये देने का अनुरोध किया, जैसा कि उन्होंने बात की दौरान यह बताया था कि शायद पूरे दिन उनके पास समय नहीं रहेगा। उन्होने मेरे अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उनके इतनी बात के बाद मुझे रात्रि में ठीक से नीद नही आयी और सोने में करीब 11.30 बज गये किन्तु रोज की बात प्रात: 4.30 पर जगना हो गया। प्रात: काल सबसे पहले उठ कर ईमेल चेक करने बैठ गया शायद कोई अपडेट हो किन्तु ऐसा नही था, फिर मैने अपने विश्वविद्यालय की साईट देखी तो खुशी का ठिकाना न रहा, क्योकि मै परास्नतक की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका था, इसे सज्जन के चरणो का इलाहाबाद में आने का प्रभाव कहा जा सकता था। 10 मिनट की देरी के साथ प्रयागराज राईट टाईम थी, और मै स्टेशन पर 6.45 पर पहुँच चुका था, सवा सात बजे तक हम लोग घर पहुँच चुके थे, थोडा चाय पानी के पश्चात मैने स्नान की बात कही, तो अरूण जी और उनके मित्र ने हामी भरी, स्नान के प्रति उत्साह को देखते हुये मैने स्नान के आगे गंगा शब्द और जोड़ दिया तो अरूण जी के मित्र का उत्साह देखते ही बन रहा था, इसी के साथ गंगा स्नान का कार्यक्रम थी बन गया।
8.30 बजे तक हम संगम पहुँच चुके थे, और 9.30 बजे तक स्नान हो गया, नाव के द्वारा गंगाजी और यमुना जी के धाराओ को एक होते देखा जो एक अद्भुत दृश्य था। 10.10 तक हम लोग घर पर आ गये, और ड्राइवर पापाजी को उच्च न्यायालय छोड़ कर आ चुका था, मैने कहा कि आपको आपके गंतव्य तक छोड़ आएगा, जब पुन: कहेंगे तो तो वह आप को ले भी आयेगा किंतु भोजन के बाद अरुण जी ने हमें अपने साथ हमें चलने को कहा तो मुझे काफी अच्छा लगा किन्तु मै और भैया उस समय तक भोजन नहीं किए थे, जल्दी जल्दी में भोजन किया और सामान्य घरेलू वेश मै और मेरे भइया, अरुण जी और उनके मित्र करीब 11 बजे चल दिये।
गन्तव्य पर पहुँच कर इतनी बड़ी बड़ी मशीनों को नजदीक से देखने का अच्छा अनुभव था, उक्त स्थान का निरीक्षण करते करते हमें 4.30 बज गये थे जबकि श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने मिलने का सर्वोत्तम समय 3 से 5 बजे के मध्य था तो अचानक ही उनसे मिलने का कार्यक्रम बनाना पड़ा, समय और परिस्थिति के अनुसार हम जैसे थे वैसे ही वहां पहुँच गये। श्रीज्ञान जी के साथ मेरी दूसरी भेंट थी, उन्होने बड़ी गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया। श्रीज्ञान जी ने पूर्व ही तैयारी कर रखी थी, उनकी पत्नी जी ने श्री अरूण जी के स्वागत के लिये सेवई और ढोकला भेजा था, इससे तो हम जान ही सकते है श्रीमती जी भी प्रत्यक्ष और परोक्ष चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों में रूचि रखती है। निश्चित रूप से पाडेय जी से मिलना एक अच्छा अनुभव रहा। जिस समय हमने श्री ज्ञानजी से अनुमति ली, घड़ी 5.25 बजा रही थी, अर्थात उन्होने अपने बेस्ट समय से अतिरिक्त समय दिया, क्योकि 5.30 बजे पर उनकी नियमित मिटिग होती है। प्रणाम, हस्तमिलन व अलिंगन के साथ हमने पाड़ेय जी की चम्बल विहार से विदा लिये, तथा श्री अरूण जी ने श्री पाड़ेय जी को दिल्ली यात्रा के दौरान अपने यहॉं आने का निमंत्रण भी दिया।
जिस काम के लिये हम सुबह से निकल थे, उसे सम्पन करने के बाद हम घर की ओर प्रस्थान कर दिये, और इधर-उघर की करना प्रारम्भ कर दिया। करीब 6.50 पर हम घर पर थे, सर्वप्रथम मैने चाय के लिये पूछा अरूण जी ने मना कर दिया, किन्तु उनके मित्र ने पीने की इच्छा जाहिर की, फिर मैने अरूण जी की इच्छा की टोह ली तो उन्होने कम दूध की चाय की इच्छा जाहिर की। मैने डरते हुये ब्लैक टी के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि इससे अच्छा हो ही क्या सकता है।
वहां से लौटने के बाद से ही, अरुण जी मेरे घर से जल्दी प्रस्थान की इच्छा जाहिर कर रहे थे, जबकि मै उन्हे रात्रि 9 बजे भोजन के उपरान्त जाने को कह रहा था किन्तु उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए, प्रस्थान करने की बात मुझसे मनवा ही ली। 7.15 मिनट के आस-पास हमने घर छोड़ दिया, घर छोड़ने से पूर्व अरुण जी मेरे पिताजी से मिले और दिल्ली आने पर मिलने निमंत्रण दिया। हमारे चलने के बाद अरुण जी ने स्टेशन पर ही रुकने और कुछ देर घूमने की बात कही। इस पर मैंने कहा कि स्टेशन पर आपको घूमने के लिये कुछ नही मिलेगा सिवाय गंदगी के,और आप चाहे तो सिविल लाइंस छोड़ देता हूँ आप अपने आगे के 2 घंटे काफी अच्छी तरीके से घूम सकते है। उन्हें भी यह बात जच गई और मैंने उन्हें काफी हाऊस पर छोड़ कर प्रयाग में अंतिम प्रणाम लेकर अपने गंतव्य पर चल पड़ा।
सिविल लाइन्स में उन्हें छोड़ने के बाद, मेरा भी वहां से जाने का मन नही कर रहा था, इसे पिछले 12 घंटे के साथ-साथ रहने का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। अत्मीयता अपने आप ही हो जाती है। काफी अधूरे मन से मै वहॉ से चल दिया। रात्रि करीब 9.25 पर मैंने अरुण जी के पास फोन किया, कि आप स्टेशन पहुँच गये है कि नहीं ? उन्होंने बताया कि मै स्टेशन पहुँच गया हूँ और इस समय ट्रेन में विश्राम कर रहा हूँ। कुशलता के साथ स्टेशन पहुँचने की खबर पाकर मन अति प्रसन्न हुआ। रात्रि बीत गई पता ही नहीं चला, सुबह करीब 6.45 पर मैंने हाल लेने की सोची किन्तु किसी कारणवश नहीं कर सका, करीब 9 बजे अरुण जी ने मुझे फोन कर बताया कि मै दिल्ली पहुँच गया हूँ।
इस दौरान जिन चिट्ठाकारों की चर्चा हुई उनके नाम निम्न है - श्री अनूप शुक्ल जी, श्री समीर लाल जी, श्री अफलातून जी, श्री ज्ञान दत्त पांडेय जी, श्री संतोष कुमार पांडेय जी, श्री अभय जी, श्री रामचन्द्र शुक्ल जी, श्री उन्मुक्त जी तथा बहुत से अन्य ब्लॉग तथा सम्मानित ब्लॉगरों के बारे में चर्चा हुई। अरुण जी की इस यात्रा के सम्बन्ध में काफी कुछ और भी लिखा जा सकता है, जल्द ही फिर लिखूँगा।
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हमारे नेट कनेक्शन पर शनि की छाया
अभी इंटरनेट को चले 4 दिन भी नहीं हुए थे कि चोरों की कृपा हमारे तार पर फिर हो गई, इस बार हमारी लाइन ही नहीं करीब 1500 फोन लाइन पर व्यापक दृष्टिपात किया गया। इस बार टेलीफोन बाक्स के नीचे आग लगाकर कॉपर के तार को चोरी करने का प्रयास किया गया। चोर तो कामयाब न हुये किन्तु 1500 फोन का बंटाधार हो ही गया। मैंने स्वयं उस बक्से को देखा तो करीब जिसमें 5 किलो कॉपर के तार निकल सकते थे। जो कुछ भी हो 5 किलो तारे के लिये लगभग 1500 लोगों को लाखों रुपये नुकसान सहना पड़ रहा है। कल पुन: एस.डी. ओ से मिला तो उन्होंने इसे ठीक करने में दो हफ्तें का समय लगेगा यह जानकारी दी। जैसा भी हो आज देश में बेकारी इतनी हो गई है कि लोगों के पास छोटी-छोटी घटनाएं करना कोई बड़ी बात नही रह गई है। किन्तु यह छोटी छोटी घटनाएं किसी किसी पर बहुत भारी पड़ जाती है। जैसे हम पर ही, इस समय मोबाइल से नेट का उपयोग किया जा रहा है न स्पीड है न संतोष किन्तु जो पैसे लग रहे है अलग।
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गूगल एडसेंस - दो साल में अर्श से फर्श तक
हमारे दो भुगतानों को न मिलने से हमें बहुत निराशा हुई, क्योंकि यह अब पांच अंकों में कमाई का का मामला हो चुका था। मई जून मिला कर पुन: हमने 183 डालर अर्जित कर लिया था, पिछले भुगतान हमें न प्राप्त होने पर हमने गूगल से सम्पर्क किया और अपने पुराने भुगतानों को न प्राप्त होने की बात कहीं, और पिछले भुगतान को कैंसिल कर नये भुगतान में जोड़ कर कोरियर सर्विस द्वारा भेजने को कहा, और हमें सकारात्मक उत्तर मिला। और उन्होने जून तक का भुगतान 455 डालर में से कोरियर का 25 डालर काट कर 430 डालर हमें 27 अगस्त को भेज दिया है। अभी तक मुझे यह राशि भी प्राप्त नही हुई है, चूकिं 25 डालर देने के बाद आशा करता हूँ कि यह मुझे मिल जायेगे।
इस समय सबसे बड़ी समस्या यह आ गई है कि जून तक का भुगतान लेने के बाद जुलाई के मध्य से विज्ञापन दिखना बंद हो गया, जब तक एडसेंस चल रहा था मैने 48 डालर अर्जित कर चुकें थे, 15 जुलाई से लेकर आज तक 48 से 53 डालर ही हो सका है, और सही गति रही हो 100 डालर की सीमा में पहूँचने में करीब एक-ढ़ेड़ साल लग जायेगे। मुझे दुख हो रहा है कि मैने अपने पैसे मगवाने में जल्दी कर दिया, काश एक माह रूक गया होता तो मेरा 53 डालर भी क्लीयर हो गया होते। वाह री किसमत, इसे ही कहेगे कि 3 महीने में मात्र 5 डाल ही मिले, जबकि हमने दो सालों में करीब आधा दर्जन बार हमने एक दिन में 5 डालर तक प्राप्त किये थे।
जो होता है अच्छा ही होता है, यही मान के चल रहा हूँ, कि बिज्ञापन फिर से शुरू होगे और 100 डालर तक जल्दी पहुँचेगा। अभी तो मेरी गूगल के फोकट के विज्ञापन दिखाने के कोई इच्छा नहीं है, वैसे भी जब गूगल ने हमारा ध्यान नहीं रखा तो हम क्यों उसके फोकट के विज्ञापन दिखाएं। जब तक विज्ञापन नही दिखते है, तब तक के लिये मै गूगल एडसेंस को अलविदा कर रहा हूँ। चूंकि इसका कारण भी है कि जहाँ ऐड लगा होता है वहाँ ऐड की अनुपलब्धता के कारण रिक्तता आ जाती है, जिससे ब्लाग की शोभा ही बिगड़ती है।
गूगल के विज्ञापन हटने के बाद थोड़ा लेखन से भी रुझान कम हुआ, किन्तु जब मै आया था तो पैसे की सोच कर लिखने नही आया था। लिखना मेरी रूचि और स्वभाव था। मुझे उसे नही बदलना चाहिये। पैसे तो हम कमाते रहेंगे, क्योंकि कमाने के लिये तो पूरी ज़िन्दगी ही पड़ी है। मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मेरी लेखन में निरंतरता बनी रहे। मेरे कुछ नियमित पाठक मुझसे लगातार मुझे मेल करके राष्ट्रवादी विचारधारा के लेखकों को मांग करते है। मै अपने पाठको को नाराज नही करना चाहूंगा, जिस चीज के लिये महाशक्ति जानी जाती थी, आने वाले कुछ दिनों में आपको महाशक्ति उसी रूप में मिलेगी।
खैर अब तक तो मै अपने दो सालो की ब्लाग अर्निंग 430 डालर (18770 रूपये) की आशा कर ही सकता हूँ जो मुझे एक हफ्ते में मिल ही सकते है, इलाहाबादी बन्धु पार्टी के लिये तैयार रहे।
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क्यों परेशां हो बदलने को धर्म दूसरों का?
व्याकरण-शुद्ध रूप
पोप ने उड़ीसा में हुई हिंसा पर दुःख व्यक्त किया और उसकी निंदा की, किन्तु उनका यह दुःख और निंदा केवल अपने ईसाई भाई-बहनों के लिए था। हिंदू भाई-बहनों के प्रति न तो उनके पास संवेदना दिखाई दी और न ही समय। जो ईसाई इस हिंसा में मारे गए, उनके लिए पोप ने शोक व्यक्त किया, परन्तु स्वामीजी और उनके चार शिष्यों के लिए न उनके पास आँसू थे और न ही सहानुभूति के शब्द।
प्रश्न यह है कि हिंसा की शुरुआत किसने की? स्वामीजी और उनके चार शिष्यों की हत्या क्यों की गई? क्या यह भी धर्म के नाम पर की गई हिंसा नहीं थी? क्या उन लोगों की हत्या करने वालों ने यह सोचा था कि हिंदुओं को इससे दुःख नहीं होगा? क्या हिंदू समुदाय कभी मुस्लिम आतंकवादियों और कभी ईसाई उग्रवादियों के हाथों अपने लोगों को खोता रहे और फिर भी मौन बना रहे? क्या हिंदुओं को पीड़ा नहीं होती? क्या उनकी धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुँचने पर उनका हृदय आहत नहीं होता? इन प्रश्नों का उत्तर कौन देगा?
आज भी जब किसी मुसलमान या ईसाई के साथ अन्याय होता है, तब अनेक संगठन, बुद्धिजीवी और सामाजिक समूह खुलकर आवाज़ उठाते हैं। अनेक बार हिंदुओं और उनके संगठनों की आलोचना की जाती है तथा भारतीय लोकतंत्र पर भी प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं। किन्तु जब हिंदुओं के साथ अन्याय होता है, तब प्रायः वही वर्ग मौन दिखाई देता है। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के समय कितनों ने मुखर होकर विरोध किया? जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में मारे गए हिंदुओं के लिए कितनों ने समान संवेदना व्यक्त की?
मेरा मानना है कि किसी भी समुदाय से यह अपेक्षा करना कि वह सदैव दूसरे समुदाय की पीड़ा को उसी दृष्टि से देखे, व्यावहारिक नहीं है। किन्तु यह आवश्यक है कि हिंदू, हिंदुओं के प्रति अनावश्यक वैमनस्य और कटुता का भाव त्यागें। जब कोई व्यक्ति अपने ही समाज को अपमानित करता है, तो उससे सामाजिक विभाजन और अधिक गहरा होता है। यदि सभी समुदाय एक-दूसरे की आस्थाओं, भावनाओं और अधिकारों का सम्मान करें, तो धार्मिक तनाव और संघर्ष स्वतः कम हो सकते हैं।
हिंदुओं का संगठित होना किसी समुदाय के विरोध के लिए नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, न्याय और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है। भारत की बहुलतावादी संस्कृति का आधार यही है कि सभी समुदाय मिल-जुलकर रहें और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें। इसी में सबकी भलाई है।
न हिंदू बुरा है,
न मुसलमान बुरा है,
करता है जो नफ़रत,
वह इंसान बुरा है।
पोप के लिए एक निवेदन :
क्यों परेशान हो
दूसरों का धर्म बदलने को?
ईश्वर का कोई धर्म नहीं होता।
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मेरा नेट कई दिनों से ख़राब है ppp
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पंगेबाज की कंडोलेंस डायरी - पेज नं 302
मुझे पंगेबाज की अंत्येष्टि कार्यक्रम में डोम कार्य का दायित्व माननीय सुरेश जी के सानिध्य में सौंपा गया था, उस कड़ी में जारी है पंगेबाज की कंडोलेंस डायरी का पेज नं 302
पंगेबाज बहुत अच्छे आदमी थे, मुझे तो उनके लेखों में आत्मीयता झलकती थी। उनके सारे लेखों पर मैने ''अच्छा, बहुत अच्छा और सारगर्भित की ही टिप्पणी की।अत्यंत दुख के साथ कहना पड़ना रहा है कि पंगेबाज के जाने से मेरे लिये टिप्पणी करने का एक ब्लाग कम हो गया। अब वो स्थान कैसे भरेगा ? पंगेबाज भगवान तुम्हारी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।
आपको सदा याद करने वाला
तुम्हारा
समीर
''सही है'' जिसे आना है जायेगा, जिसे आना होगा आयेगा। हिन्दी ब्लागिंग में पंगेबाज बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। ये बात भी सत्य है कि पंगेबाज के जाने के बाद पंगेबाजी खत्म होने वाली है। तुम्हारी रंगों में बह रहा खून, एक ब्लागर का खूर था, और पंगेबाजी तो हर ब्लागर के नस नस में रची बसी है। मुझे दुख है कि मेरे ब्लाग की एक टिप्पणी कम हो गई, मै अपने ब्लाग पर आये इस एक टिप्पणी के शुन्य को खोज रहा हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके एकाध प्रतिस्पर्धी को भी अपने पास बुला ले ताकि पंगेबाज की आत्मा पंगेबाजी के लिये उद्वलित करे, तो स्वर्ग में सुविधा उपलब्ध हो जाये, उनकी आत्मा को धरती की ओर रूख न करना पडे़।
तुम्हारा
फुरसतिया
उड़ी बाबा, पोगेबाज चोला गया! , कोय को गया ? , ओब मी केसे लोड़ाई कोरबो ? ओब मेरी सोंड वाली फोस्टिंग के कोरेगा ? मेरे लिखे पर के खुरपैच निकोलेगा ? अब मेरे स्वादिष्ट पुस्तचिन्ह को कौन खोयेगा ? उड़ी भोगवान हम ओब क्या कोरेगा ? किसके ब्लोग पर एनिनोमिस टिप्पोनी कोरेबे ? हे भोगवान, तेरे ओगे किसी की नही चोलने का, जो हुआ ठीक हुआ, प्लीज गोड जी एक कोम कोरने का, एक नेट कोनेक्सन लोगवा लो, हम पंगेबोज से स्वर्ग से ही पोंगा कोरेगा।
तुम्हारा
(पोगेबाज होमको जोनता है, हम ओपना नाम नही लिखेगा।)
बड़ा अच्छा आदमिवा रहा ई पंगेबजवा। हम राजनेतवन का ई शब्दवा तो हम मरै वाले आदमी के बदै कहै कर पड़ता है, तबै तो हमरे पेशे का नेतागीरी कहा जात है। देखा हरकिशन के मरै पर हर नेता पहुँचा रहै कंडोलेंस करै, कि ई बहुत बड़ा और अच्छा नेतावा रहै।
अब पंगेबाजवा के मरै पर तो हमरै फर्ज रहै कि ई काम हमहु काम करी, कहै कि हर आदमी का अपने भविष्य के चिन्ता होत है। हे ईश्वरवा एक ठो ई आत्मा जात अहै एका शान्ति दिहो, काहे कि अब एकरे पहुँचे के बाद तोहका शान्ति न मिली।
तोहार परम मित्तर,
अफलातून
आप भी पंगेबाज को अपनी शोक संवेदना देना चाहते है तो [email protected] पर अपना संदेश और नाम ईमेल करें। आज हम बहुत दुखी है इसलिये स्माईली नहीं लगा रहे है।
द्वारा
प्रमेन्द्र प्रताप सिंह
क्रिया कर्म विशेषज्ञ पगेबाज,
क्रमश: जारी ...........
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जिम में हम
सुबह ही सुबह बुखार भी हो गया था, करीब 102 फारेनहाइट बता रहा था। अब तो जिम की हवा ही निकल चुकी थी। चूंकि हमारे जिम में जाने की खबर घर में किसी को नही थी, और यही कारण था कि सभी लोग आम बुखार समझ रहे थे। हम जान रहे थे कि हमारी क्या स्थिति उस समय रही होगी ? पर हम क्या कर ही सकते थे।
शाम को लौटने पर हालत और गंभीर हो चुकी थी, अब अगले दिन जाने की इच्छा नही कर रही थी, और गया भी नही। मुझे लग रहा था कि आज न गया तो मै ठीक हो जाऊँगा। यही बात साथियों को बताया किंतु नहीं माने पर मेरी बात के आगे उन्हें मानना ही पड़ा। एक दिन आराम किया काफी अच्छा महसूस होने लगा। फिर अगले दिन से सब कुछ नॉर्मल हो गया। और तो रोज जाते है। :)
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प्रयाग की एक और ब्लागर मीट
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आज का दिन जरा हट के
काफी दिनों से ब्लॉग की नजदीकियों से दूर था अपनी समस्याओं और समस्या के समाधान के निस्तारण के कारणों से, आज सूर्य ग्रहण भी दिखा, हमने आज वर्षा जी की महाशक्ति समूह पर आई पोस्ट के कारण हमने पूरे परिवार के साथ सूर्यग्रहण देखा, गोल्डन रिंग का विहंगम दृश्य का भी अवलोकन किया। चूँकि सूर्यग्रहण को धर्म से जोड़ कर देखा जाता है तो इस बीच में भक्ति भावना को भी कायम रखने का प्रयास किया गया। आज काफी दिनों बाद परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठे और राम चरित मानस के सस्वर पाठ का आनंद लिया।
सूर्य ग्रहण समाप्त हो गया है, अब नहाने जा रहा हूँ जल्द ही मिलूँगा, एक नई बात लेकर।
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अंतककियों का अगला निशाना भोपाल/शिमला तो नही
देश के भीतर पल रहे विषबीजों का काम है जो आने वाले चुनावों में भाजपा के शासन को कलंकित दिखाना चाहते है। जिस प्रकार की हरकत केन्द्र सरकार ने संसद में कि उससे तो यही लगता है कि सरकार सत्ता के लिये कुछ भी कर सकती है, अगर बम विस्फोट भी होते हैं तो इसमें कोई शक नहीं कि खुफिया तंत्र की विफलता के पीछे सरकार का ही हाथ होता है। राजनीति का स्तर सत्ता की भूख के लिये इतना गिरना नहीं चाहिये।
भगवान दोनों जगह हुए विस्फोट में शहीद हुए लोगों की आत्मा को शान्ति प्रदान करें।
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अन्तिम संस्कार Antim Sanskar
भारतीय संस्कृति में सस्कारों की प्रधानता है। संस्कारों में अन्तिम संस्कार अन्तेष्टि संस्कार को कहा जाता है जिसे अन्तिम संस्कार भी कहा जाता है। अन्त्येष्टि संस्कार को हम परिभाषित करने के लिये अन्तिम इष्टि या कर्म भी कह सकते है। यह मनुष्य के जीवन का सबसे अन्तिम कर्म होता है इसके पश्चात कोई अन्य कर्म या कार्य मनुष्य के लिये शेष नही होता है। अन्तिम संस्कार का उद्देश्य शरीर की भौतिक सत्ता को परमात्मा में विलीन करने की होती है। हिन्दु धर्म में मनुष्य की यह अन्तिम क्रिया शरीर को जलाने से शुरू होती है। इस बात की पुष्टि करते हुये यजुर्वेद कहता है- मास्मातं शरीरम्।
वैदिक धर्म में मनुष्य की आयु 100 वर्ष निधारित की गई है- जीवेम शरद: शतम्। इस धर्म में पुर्नजन्म की धारणा मिलती है जिसके कारण हम यह देखते है कि मनुष्य अपने जीवन काल में सभी अच्छे कामों को करना चाहता है ताकि उसे अगले जन्म उच्च कोटि का का जन्म मिले अथवा परमात्मा उसें अपने में अंगीकृत कर ले। विद्वान बौधायन कहते है कि मनुष्य जन्म और मृत्यु के पश्चात हये समस्त संस्कारों से परलोक को जीतता है।
आत्मा अजर और अमर होती है। श्रीमद् भगवतगीता कहती है कि -
शरीर की इस अंतिम क्रिया के लिये मत्स्य पुराण में शव को जलाने, गाड़ने तथा प्रवाह देने की बात कहीं गई है- य: संस्थित: पुरूषो दह्यते वा निखन्यते वाSपि निकृष्यते वा। सम्पूर्ण विश्व में शव को गाड़ने की प्रथा दिखती है किन्तु आज चीन समेत कई देश हिन्दू संस्कृति के दाह प्रथा को मान्यता दे रहे है। क्योंकि यह शरीर की अंतिम क्रिया का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। चीन सरकार ने 14 मार्च 1985 के आदेश में कुछ जाति के लोगें को छोड़कर शेष धर्म जाति के लोगों में शव के गाड़ने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है तथा पुरानी कब्र को पुनः जोतने का आदेश दे दिया है।
हिन्दू पद्धति में मृत्यु के बाद संस्कारों के आयोजन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हिन्दू धर्म में सम्बन्धियों के मध्य प्रेम के कारण ही वह मृतक के वियोग को सहन नहीं कर सकता है किन्तु मृत्यु के पश्चात होने वाले कर्मकाण्डों के फल स्वरूप वह मृत आत्मा की शान्ति के लिये लग जाता है इस व्यस्तता के कारण वह इस दुखद वेला को भूल जाता है। अन्त्येष्टि संस्कार में यह शोकापनयन की सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानकि औ व्यवहारिक प्रक्रिया है।
अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे ताकि संस्कारों की अगली श्रृंखला में सुधार कर सकूँ।
पिछली कडि़याँ - संस्कार:भारतीय दर्शन (Sanskar: Indian Philosophy) , हिन्दू विवाह
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हँसों जम के हँसो
1
वैलेंनटाईन डे के दिन एक प्रेमी जोड़ा एक बाग में मिलता है, प्रेमी जोड़ा पेड़ के तले बैठ जाता है. प्रेमिका की तारीफ करते हुए प्रेमी बोलता है, तुम्हारी आँखें बहुत प्यारी हैं, इनमें डूबने को मन करता है, इन आँखों में मुझे सारी दुनिया नजर आती है।
इतने में पेड़ से आवाज आती है, रे भाई कल शाम से मेरा गधा गुम है, हो सके तो देख बताओ ना कहां है।
2
बॉस गुस्से में कर्मचारी से बोला, तुमने कभी उल्लू देखा है।
कर्मचारी ने सिर झुकाते हुए कहा, नहीं सर।
बॉस ने जोर से डांटा, नीचे क्या देख रहे हो, मेरी तरफ देखो।
3
बॉस गुस्से में कर्मचारी से बोला, तुमने कभी उल्लू देखा है।
कर्मचारी ने सिर झुकाते हुए कहा, नहीं सर।
बॉस ने जोर से डांटा, नीचे क्या देख रहे हो, मेरी तरफ देखो।
4
संता बुदबुदाते हुए समाजशास्त्र के प्रश्न पत्र को हल कर रहा था, भारत में हर तीन मिनट बाद एक औरत एक बच्चे को जन्म देती है। आने वाली भयावह स्थिति पर किस प्रकार नियंत्रण पाया जा सकता है?
बंता पीछे से कहता है, पहले उस औरत को तलाश करना चाहिए।
5
शिक्षक (छात्र से) - बताओ फोर्ड क्या है?
छात्र (शिक्षक से) - गाड़ी।
शिक्षक - वेरी गुड, अब बताओ ऑक्सफोर्ड क्या है?
छात्र - बैलगाड़ी।
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जो मजा विरोध भरी टिप्पणी में है वो और कहाँ ?
इधर बहुत दिनों से कुछ गम्भीर लेखन नही हुआ, कुछ मजा नही आ रहा है। कहते है गर्म तावे पर पानी डालने पर जो आवाज निकलती है उसे सुन कर बड़ा मजा आता है। उसी गर्म तावे की भातिं मेरी भी स्थिति है, काफी दिनों से अन्दर ही अन्दर बहुत विषयों की का तावा बहुत गर्म हो गया है बस लिख कर पोस्ट करने की देर है, फिर देखिये आपके गर्मा गर्म टिप्पणी रूपी पानी क्या गुल खिलाता है। :)
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इन जयचन्द्रों का अंत कब होगा ?
इस मंदिर के महत्व में कहा जाता है कि यह हिंगलाज हिंदुओं के बावन शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर काफी दुर्गम स्थान पर स्थित है, पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव की पत्नी सती के पिता दक्ष ने जब शिवजी की आलोचना की तो सती सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने आत्मदाह कर लिया। माता सती के शरीर के 52 टुकड़े गिरे जिसमें से सिर गिरा हिंगलाज में। हिंगोल यानी सिंदूर, उसी से नाम पड़ा हिंगलाज। हिंगलाज सेवा मंडली के वेरसीमल के देवानी ने बीबीसी को बताया कि चूंकि माता सती का सिर हिंगलाज में गिरा था इसीलिए हिंगलाज के मंदिर का महत्व बहुत अधिक है।
जब किसी पवित्र खजू़र के पेड़ को बचाये जाने के लिये सड़क को मोड़ा जा सकता था तो 52 शक्ति पीठों में से एक हिंगलात माता के मन्दिर को क्यो नही बचाया जा सकता है। प्रान्तीय सरकार के सभी सदस्य इस मंदिर को बचाये जाने के पक्ष में है किन्तु हर जगह लालू-मुलायम जैसे सेक्यूलर नेता पाये जाते है। ऐसा ही उस प्रान्त भी है हिंदू समुदाय से संबंध रखने वाले एक विधायक ने मंदिर के पास बाँध के निर्माण की हिमायत की। बलूचिस्तान प्रांतीय असेंबली के सदस्य बसंत लाल गुलशन ने ज़ोर दे कर कहा है कि `धर्म को सामाजिक-आर्थिक विकास की राह में अवरोध बनाए बगैर' सरकार को इस परियोजना पर काम जारी रखना चाहिए।
हे भगवान इस धरा से इन जयचन्द्रों का अंत कब होगा ?
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फेडरर तुम हार गये पर दिल जीत लिया

नडाल ने रविवार को विंबलडन के इतिहास के सबसे लंबे फाइनल में 6-4, 6-4, 6-7, 6-7, 9-7 से जीत दर्ज करके फेडरर का लगातार छठा विंबलडन खिताब जीतने का सपना भी तोड़ दिया। नडाल ने चार बार फ्रेंच ओपन का खिताब जीता है जबकि यह उनका पहला विंबलडन खिताब है। विंबलडन में सेंटर कोर्ट पर हुये इस ऐतिहासिक मैच को मै आधा ही देख सका, जब तक मेरा फेडरर हारता रहा। :) क्योकि वर्षा बाधित मैंच का यही दौर था। फेडरर की बादशाहत अभी खत्म नही हुई है अभी वह नाडल से 500 एटीपी प्वाइंट लेखकर 231वें हफ्ते दुनिया के नंबर एक बने रहेंगे जबकि नडाल भी लगातार 155वें हफ्ते दुनिया के दूसरे खिलाड़ी रहेंगे।
राफएल नाडल, रोजर फेडरर के लिये कहते है कि मुझे पता है कि इस तरह का फाइनल हारना कितना मुश्किल होता है। वह महान चैंपियन हैं। वह हारे या जीते उनका दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहता है। हम करीबी मित्र नहीं हैं लेकिन मैं हमेशा उसका काफी सम्मान करता हूं। मैं अपने लिए काफी खुश हूं लेकिन उसके लिए दुखी भी हूं क्योंकि वह इस खिताब का भी हकदार था। हार से उनकी अहमियत कम नही होती है आल इंग्लैंड क्लब के बेताज बादशाह रहे रोजर फेडरर अब भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ टेनिस खिलाड़ी हैं।
नाडाल को खिताबी जीत पर मेंरी ओर से खिताब की बहुत बहुत बधाई। पर बच कर रहना अबकी बार फ्रेंच ओपन का विजेता फेडरर होगा। क्योंकि विंबलडन में मिथक टूटा है तो अगली बार रोलां गैरोस पर फेडरर ही जीतेंगे।
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फेडरर तुम हार गये पर दिल जीत लिया

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बहस - भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की न्यूनतम आयु कितनी है ?
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चिट्ठाकारी में महाशक्ति के दो साल
हुआ यो कि मै अपने पढ़ाई लिखाई, खेल कूद जैसे विषयों पर छुट्टी में ज्यादा व्यस्त था। और इन दिनों मुझे याद ही नही रहा कि मै कभी चिट्ठाकार भी हुआ करता था। :) आज अचानक गाहे बगाहे ही याद आ गया कि मेरे चिट्ठाकारी शुरू किये दो साल पूरे हो गये है। थोड़ा दुख भी हुआ कि उस दिन पोस्ट न डाल सका, क्योकि खास दिन की पोस्ट का कुछ खास ही महत्व होता है।
इधर चिट्ठाकारी और कम्प्यूटर से दूरी का मुझे सकारात्मक परिणाम देखने को भी मिला, 2006 के ग्रेजुएशन में मेरा अब तक का सबसे खराब शैक्षिक प्रदर्शन हुआ था, और मै मात्र 0.42 प्रतिशत अंक की कमी के कारण 50 प्रतिशत अंक भी नही पा पाया था, मुझे इसकी कसक आज तक है। कई ऐसी परीक्षाये आयोजित होती है जिसमें 50 प्रतिशत की मॉंग होती है और मै अयोग्य हो जाता हूँ और दिल पर सिर्फ और सिर्फ खीझ और सिर्फ निराशा ही हाथ आती है।
चूकिं मेरी इच्छा विधि की पढ़ाई की थी और 2006 की असफलता के ग्रहण के कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश न हो सका था। इच्छा के विपरीत साल न खराब हो इस लिये राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से एम ए का फार्म भर दिया था और फिर इस बार मैने पक्का इरादा किया था कि परास्नातक में अच्छा प्रर्दशन करूँगा। और इसी विश्वास के कारण अर्थशास्त्र परास्नातक में प्रथम सेमेस्टर में 58, द्वितीय में 65 तथा हफ्ते भर पूर्व घोषित तृतीय सेमेस्टर में 76 प्रतिशत अंक लाये थे। यह मेरी अब तक की दी गई किसी भी परीक्षा का सर्वोत्तम अंक है। निश्चित रूप से आशा के अनुरूप सफलता पर खुशी मिलती है।
2007 के शुरू होते ही विधि की पढ़ाई की प्रबल इच्छा फिर जाग गई, और असमजस में था कि एमए के साथ विधि कैसे होगा, किन्तु कुछ मित्रों ने बताया कि मुक्त विश्वविद्यालय की पढ़ाई के साथ किसी और विश्वविद्यालय से डिग्री कोर्श कर सकते है, मुक्त विश्वविद्यालय के गुरूजनों से सम्पर्क किया तो उन्होने भी ऐसा ही उत्तर दिया। अक्टूबर माह में मैने विधि में प्रवेश ले लिया और कम समय में पर्याप्त तैयारी के बोझ के साथ लग गया। फरवरी में एमए तीसरे सेमेस्टर की परीक्षा के बाद ही 15 अप्रेल से विधि के पर्चे भी प्रारम्भ हो गये। मेरी बहुत अच्छी तैयारी नही थी, किन्तु जहां चाह तहाँ राह की धारण सत्य हुई 2 जुलाई को मेरा विधि का परिणाम हुआ, रिजल्ट आशा के विवरीत हुआ, करीब 60 से 65 प्रतिशत की उम्मीद लगा कर बैठा था किन्तु 56 प्रतिशत पर आ कर रूक गया, तो भी परिणाम ठीक ही रहा। 7 और 9 जुलाई को मेरा एमए का अन्तिम सेमेस्टर होगा, और इस साल मेरे पास काफी समय होगा विधि के लिये और पूरी कोशिश करूँगा कि अगली परीक्षाऍं भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करूँ।
पिछले तीस जून 2007 का लेख - चिट्ठाकारी में महाशक्ति के एक साल
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इश्क
वफाओं का साथ मिला।
इश्क की गलियो में भटकते रहे,
घर आये तो बाबू जी का लात मिला।।
क्योकि यें अन्दर की बात थी।
पर इश्क का इन्ताहँ तब हुई जब,
गर्डेन में उसके भाई का हाथ पड़ा।।
जब हमारे बाबू जी ने उतारा था।
फिछली दीवाली में पर,
जूतों चप्पलों से हमारा भूत उतारा था।।
इश्क हमारी नस-नस में है।
बाबू की की धमकियों से हम नही डरेगें,
हम तो खुल्लम खुल्ला प्यार करेगें।।
चाहे साथ लेकर चला आये भौजाई।
इश्क किया है कोई चोरी नही की,
तुम्हारे बाप के सिवा किसी से सीना जोरी नही की।।
कई अरसें से कोई कविता नही लिखी, मित्र शिव ने कहा कि कुछ लिख डालों कुछ भाव नही मिल नही रहे थे किन्तु एक शब्द ने पूरी रचना तैयार कर दी, मै इसे कविता नही मानता हूँ, क्योकि यह कविता कोटि में नही है, आप चाहे जो कुछ भी इसे नाम दे सकतें है, यह बस किसी के मन को रखने के लिये लिखा गया।
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