गजेन्द्र मोक्ष



प्राचीन काल में त्रिकूट पर्वत की रमणीय वादियों में गजेंद्र नामक एक अत्यंत बलशाली, धर्मनिष्ठ और तेजस्वी गजराज निवास करता था। वह विशाल हाथी-समूह का राजा था तथा अपनी शक्ति, न्यायप्रियता और उदार स्वभाव के कारण समस्त वन्य जीवों में सम्मानित था। गजेंद्र भगवान विष्णु का परम भक्त था और प्रतिदिन श्रद्धा एवं भक्ति के साथ उनका स्मरण तथा पूजन करता था।



एक दिन गजेंद्र अपने विशाल हाथी-समूह के साथ एक मनोहर सरोवर के तट पर पहुँचा। वह सरोवर स्वच्छ जल, खिले हुए कमलों और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण था। गजेंद्र उस सरोवर में प्रवेश कर जलक्रीड़ा करने लगा। तभी अचानक जल के भीतर छिपे एक विशाल और बलवान मगरमच्छ ने उसका पैर दृढ़ता से पकड़ लिया। यह कोई साधारण मगरमच्छ नहीं था, बल्कि पूर्वजन्म का हूहू नामक गंधर्व था, जिसे एक महर्षि के श्रापवश मगरमच्छ योनि प्राप्त हुई थी।

गजेंद्र ने अपनी अपार शक्ति का प्रयोग करते हुए स्वयं को छुड़ाने का भरसक प्रयास किया। उसके साथी हाथियों ने भी उसकी सहायता करने का प्रयास किया, किन्तु मगरमच्छ की पकड़ अत्यंत सुदृढ़ थी। जल में रहने के कारण मगरमच्छ को बल मिलता गया, जबकि गजेंद्र की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी। यह संघर्ष केवल कुछ क्षणों या दिनों का नहीं, बल्कि दीर्घकाल तक चलता रहा।

अंततः जब गजेंद्र ने अनुभव किया कि सांसारिक बल, पराक्रम और साथियों की सहायता भी उसे इस संकट से नहीं बचा सकती, तब उसका मन पूर्णतः भगवान की शरण में चला गया। उसने अपनी सूंड में एक कमल पुष्प धारण किया और अत्यंत करुण भाव से भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए प्रार्थना की। उसका हृदय भक्ति, समर्पण और विश्वास से परिपूर्ण था।

अपने भक्त की करुण पुकार सुनते ही भगवान विष्णु वैकुण्ठ लोक से तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुए। भक्तवत्सल भगवान ने बिना विलंब किए अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया और मगरमच्छ का बंधन काटकर गजेंद्र को मुक्त कर दिया। उसी क्षण श्रापग्रस्त मगरमच्छ भी अपने पूर्व गंधर्व रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो गया और उसे भी श्राप से मुक्ति प्राप्त हुई।

भगवान विष्णु ने अपने अनन्य भक्त गजेंद्र को दिव्य कृपा प्रदान कर उसे मोक्ष का वरदान दिया तथा अपने पार्षदों में स्थान दिया। इस प्रकार गजेंद्र को सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त हुई।

गजेंद्र मोक्ष की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि जब मनुष्य अपने अहंकार, शक्ति और सांसारिक आश्रयों को त्यागकर पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण के साथ भगवान की शरण ग्रहण करता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा के लिए उपस्थित होते हैं। यह कथा भक्ति, विश्वास, समर्पण और भगवान की असीम करुणा का अमर प्रतीक है।

इस चित्र में भगवान विष्णु को गरुड़ पर आरूढ़ होकर अपने भक्त गजेंद्र की रक्षा हेतु आते हुए दर्शाया गया है। गजेंद्र अपनी सूंड में कमल पुष्प अर्पित किए भगवान का स्मरण कर रहा है, जो उसकी अटूट श्रद्धा, पूर्ण समर्पण और निष्कलुष भक्ति का प्रतीक है।



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श्री हरिहर मंदिर बनाम जामा मस्जिद विवाद: हाईकोर्ट ने वाद दायर करने और स्थल निरीक्षण की अनुमति को सही ठहराया




सांभल जामा मस्जिद विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद प्रबंधन समिति की पुनरीक्षण याचिका खारिज की

प्रमुख निर्णय:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Committee of Management, Jami Masjid Sambhal द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दीवानी वाद दर्ज करने की अनुमति तथा अधिवक्ता आयुक्त (Advocate Commissioner) की नियुक्ति को वैध ठहराया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

वादी हरि शंकर जैन एवं अन्य सात व्यक्तियों ने दावा किया कि सांभल स्थित जामा मस्जिद वास्तव में प्राचीन श्री हरिहर मंदिर है, जिसे वर्ष 1920 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। वादियों का कहना था कि मंदिर परिसर में हिंदू धार्मिक प्रतीकों एवं अवशेषों की उपस्थिति है और उन्हें वहां पूजा-अर्चना तथा प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए।

इस संबंध में वादियों ने पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजा, किन्तु अपेक्षित कार्रवाई न होने पर 19 नवंबर 2024 को दीवानी वाद संस्थित किया।

न्यायालय के समक्ष प्रमुख प्रश्न

1. क्या दो माह की नोटिस अवधि पूरी होने से पहले मुकदमा दायर किया जा सकता था?
मस्जिद प्रबंधन समिति ने तर्क दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80 के अनुसार सरकार के विरुद्ध वाद दायर करने से पूर्व दो माह का नोटिस अनिवार्य है। न्यायालय ने माना कि जहां तत्काल राहत की आवश्यकता हो, वहां धारा 80(2) के अंतर्गत न्यायालय की अनुमति से बिना प्रतीक्षा किए वाद दायर किया जा सकता है। न्यायालय ने पाया कि वादियों द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को देखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अनुमति विधिसम्मत थी।

2. क्या अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति उचित थी?
उच्च न्यायालय ने कहा कि विवादित स्थल की वास्तविक स्थिति और वहां मौजूद संरचनात्मक तथ्यों का प्रारंभिक आकलन करने के लिए स्थानीय निरीक्षण आवश्यक था। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त कर सर्वेक्षण कराने का आदेश न्यायोचित एवं प्रक्रिया-सम्मत था।

3. उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का प्रभाव
मस्जिद समिति ने तर्क दिया कि Places of Worship Act, 1991 के तहत किसी धार्मिक स्थल की स्थिति या पहचान को परिवर्तित करने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने इस स्तर पर यह टिप्पणी की कि मूल वाद में वादियों ने प्रवेश एवं पूजा-अधिकार से संबंधित राहत मांगी है, इसलिए इस प्रारंभिक चरण में केवल इसी आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता।

4. सरकारी पक्ष का रुख
राज्य सरकार, ASI तथा अन्य सरकारी प्रतिवादियों ने वाद की संस्थापन प्रक्रिया या नोटिस अवधि से छूट दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। न्यायालय ने इसे भी महत्वपूर्ण तथ्य माना।

न्यायालय का निष्कर्ष

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों एवं कानून के अनुरूप वाद दर्ज करने की अनुमति प्रदान की तथा अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति की। न्यायालय को इन आदेशों में कोई ऐसी विधिक त्रुटि या अधिकार क्षेत्र संबंधी कमी नहीं मिली, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।

साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 80 CPC के अंतर्गत नोटिस संबंधी आपत्ति मुख्यतः सरकारी पक्ष द्वारा उठाई जा सकती है; निजी पक्षकार इस आधार पर वाद की वैधता को चुनौती नहीं दे सकते।

मामले का विवरण:
केस: Committee of Management, Jami Masjid Sambhal Ahmed Marg Kot Sambhal vs. Hari Shankar Jain and Others
केस संख्या: Civil Revision No. 4 of 2025
निर्णय दिनांक: 19 मई 2025



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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: एनपीए घोषित खाते के खिलाफ दीवानी वाद नहीं, जाना होगा ऋण वसूली न्यायाधिकरण



NPA और SARFAESI कार्यवाही को दीवानी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

महत्वपूर्ण निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी ऋण खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया है और बैंक द्वारा SARFAESI Act, 2002 के तहत कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है, तो ऐसे विवादों की सुनवाई दीवानी न्यायालय में नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) ही विधि द्वारा निर्धारित सक्षम मंच है।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली तथा न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने यह टिप्पणी ओमनारायणश्री एग्रीफार्मर प्राइवेट लिमिटेड बनाम पंजाब नेशनल बैंक मामले में की।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक से व्यवसायिक प्रयोजनों के लिए नकद ऋण सीमा (Cash Credit Limit) तथा टर्म लोन प्राप्त किया था। ऋण अदायगी में लगातार चूक होने के कारण बैंक ने जुलाई 2024 में कंपनी के ऋण खाते को NPA घोषित कर दिया।

इसके उपरांत बैंक ने 6 अगस्त 2024 को SARFAESI अधिनियम की धारा 13(2) के अंतर्गत मांग नोटिस जारी किया तथा बाद में संपत्ति पर कब्जा एवं नीलामी की कार्यवाही प्रारंभ कर दी।

बैंक की इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए कंपनी ने वाणिज्यिक न्यायालय में वाद दायर किया और अंतरिम स्थगन आदेश (Stay Order) की मांग की। हालांकि वाणिज्यिक न्यायालय ने राहत देने से इंकार कर दिया, जिसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।

याचिकाकर्ता की दलील

कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि विवाद केवल SARFAESI अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई का नहीं, बल्कि खाते को NPA घोषित किए जाने की वैधता का है। चूंकि NPA घोषित करने का प्रश्न धारा 13(4) के अंतर्गत नहीं आता, इसलिए DRT का क्षेत्राधिकार लागू नहीं होगा और दीवानी न्यायालय में वाद विचारणीय है।


हाईकोर्ट का निर्णय

खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करने से इंकार करते हुए कहा कि SARFAESI अधिनियम की धारा 34 स्पष्ट रूप से दीवानी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है।

न्यायालय ने कहा कि जब बैंक SARFAESI अधिनियम के तहत कोई कार्रवाई प्रारंभ कर देता है, चाहे वह धारा 13(2) का नोटिस हो, धारा 13(4) के तहत कब्जा लेने की कार्रवाई हो अथवा संपत्ति की नीलामी, तब उस कार्यवाही की वैधता को चुनौती देने का अधिकार केवल DRT और उसके अपीलीय मंच DRAT को है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई पक्षकार केवल NPA घोषित किए जाने की वैधता का प्रश्न उठाकर दीवानी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को पुनर्जीवित नहीं कर सकता, यदि विवाद मूलतः SARFAESI अधिनियम के तहत की गई बैंक की कार्रवाई से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Mardia Chemicals Ltd. v. Union of India (2004) सहित अन्य निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि SARFAESI अधिनियम का उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ऋण वसूली के लिए एक विशेष एवं प्रभावी तंत्र उपलब्ध कराना है। इसलिए ऐसे मामलों में सामान्य दीवानी न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित और कानून द्वारा निषिद्ध है।

न्यायालय का निष्कर्ष

उच्च न्यायालय ने माना कि वाणिज्यिक न्यायालय द्वारा अंतरिम राहत देने से इंकार करना विधिसम्मत था। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि SARFAESI अधिनियम के अंतर्गत प्रारंभ की गई बैंकिंग कार्यवाहियों को चुनौती देने के लिए DRT ही प्रथम और प्रभावी वैधानिक उपाय है तथा दीवानी वाद के माध्यम से ऐसी कार्यवाहियों को चुनौती नहीं दी जा सकती।



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विधि तुच्छ बातो पर ध्यान नहीं देती



विधि का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है — "De Minimis Non Curat Lex", जिसका अर्थ है कि "कानून तुच्छ या नगण्य बातों पर ध्यान नहीं देता।"

समाज में रहते हुए अनेक ऐसे छोटे-छोटे कार्य अनजाने में हो जाते हैं जो तकनीकी रूप से किसी अपराध की परिभाषा में आ सकते हैं, किन्तु उनसे होने वाली हानि इतनी नगण्य होती है कि उनके लिए न्यायालयों का समय और संसाधन खर्च करना उचित नहीं माना जाता।

उदाहरण के लिए, भीड़भाड़ वाली सड़क पर चलते समय किसी व्यक्ति का हल्का-सा धक्का लग जाना, अनजाने में किसी के पैर पर पैर पड़ जाना, किसी की कलम का क्षणिक उपयोग कर लेना अथवा अन्य ऐसी मामूली घटनाएँ, जिनसे कोई वास्तविक या गंभीर हानि नहीं होती, सामान्यतः कानून की दृष्टि में अपराध नहीं मानी जातीं।

इसी सिद्धांत को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 95 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में भी समान अवधारणा) में मान्यता दी गई थी। धारा 95 के अनुसार—

"कोई कार्य केवल इस कारण अपराध नहीं होगा कि उससे कुछ हानि हुई है या हानि पहुँचाने का आशय अथवा संभावना थी, यदि वह हानि इतनी तुच्छ हो कि साधारण समझ और स्वभाव वाला कोई व्यक्ति उसकी शिकायत करना उचित न समझे।"

धारा 95 के लागू होने की आवश्यक शर्तें

  1. संबंधित कार्य तकनीकी रूप से अपराध की श्रेणी में आता हो।

  2. उससे हुई हानि इतनी नगण्य या तुच्छ हो कि एक सामान्य एवं समझदार व्यक्ति उसकी शिकायत करना उचित न समझे।

प्रसिद्ध विधि-विशेषज्ञ हुदा ने इस प्रावधान पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति तुच्छ बातों को लेकर न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाता। भीड़भाड़ वाले स्थानों पर चलते समय किसी को हल्का धक्का लग जाना या किसी के पैर पर पैर पड़ जाना सामान्य सामाजिक जीवन का हिस्सा है। यदि ऐसी प्रत्येक घटना को अपराध मान लिया जाए तो सामाजिक जीवन का संचालन ही कठिन हो जाएगा।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर छोटा कार्य तुच्छ नहीं होता। किसी कार्य को तुच्छ माना जाएगा या नहीं, यह उसकी प्रकृति, परिस्थितियों, उसके पीछे की मंशा तथा उससे हुई वास्तविक हानि पर निर्भर करेगा।

अतः यह सिद्धांत न्याय व्यवस्था को अनावश्यक मुकदमों से बचाने तथा न्यायालयों का ध्यान वास्तव में गंभीर और महत्वपूर्ण मामलों पर केंद्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



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चुरायी हुई सम्पत्ति प्राप्त करना - Receiving of stolen property



चुराई हुई संपत्ति एवं उसे बेईमानी से प्राप्त करने का अपराध

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 410 "चुराई हुई संपत्ति" (Stolen Property) की परिभाषा प्रदान करती है। इस धारा के अनुसार, वह संपत्ति चुराई हुई संपत्ति कहलाती है जिसका कब्जा चोरी, उद्यापन (Extortion), लूट (Robbery) अथवा डकैती जैसे अपराधों द्वारा प्राप्त किया गया हो, या जिसका आपराधिक दुर्विनियोग (Criminal Misappropriation) अथवा आपराधिक न्यास-भंग (Criminal Breach of Trust) किया गया हो।

यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि उक्त अपराध भारत के बाहर भी किए गए हों, तब भी संबंधित संपत्ति "चुराई हुई संपत्ति" मानी जाएगी। अर्थात अपराध का स्थान नहीं, बल्कि संपत्ति की अवैध प्राप्ति महत्वपूर्ण है।

हालाँकि, यदि बाद में वही संपत्ति ऐसे व्यक्ति के कब्जे में पहुँच जाती है जो उस पर वैध अधिकार रखता है, तो वह संपत्ति "चुराई हुई संपत्ति" नहीं रह जाती।

न्यायिक दृष्टिकोण

चान्द मल बनाम राजस्थान राज्य (1976 Cr.L.J. 679) के मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "चुराई हुई संपत्ति" की श्रेणी में केवल वही संपत्ति आएगी जिसका कब्जा चोरी, उद्यापन, लूट, आपराधिक दुर्विनियोग अथवा आपराधिक न्यास-भंग जैसे अपराधों के माध्यम से प्राप्त किया गया हो।

चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना (धारा 411)

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 411 उस व्यक्ति को दंडित करती है जो किसी चुराई हुई संपत्ति को यह जानते हुए, अथवा यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण रखते हुए कि वह चुराई हुई संपत्ति है, बेईमानी से प्राप्त करता है या अपने पास रखता है।

इस अपराध के लिए अभियोजन पक्ष को सामान्यतः निम्नलिखित तत्व सिद्ध करने होते हैं—

  1. संबंधित संपत्ति वास्तव में चुराई हुई संपत्ति हो।

  2. अभियुक्त ने उस संपत्ति को प्राप्त किया हो या अपने कब्जे में रखा हो।

  3. संपत्ति प्राप्त करते समय अभियुक्त को यह जानकारी हो, अथवा विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो कि वह चुराई हुई संपत्ति है।

  4. संपत्ति का प्राप्त करना या रखना बेईमानी (Dishonestly) से किया गया हो।

दंड

धारा 411 के अंतर्गत दोषसिद्धि होने पर अभियुक्त को—

  • तीन वर्ष तक का कारावास, या

  • जुर्माना, या

  • कारावास एवं जुर्माना दोनों

से दंडित किया जा सकता है।

उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति बाजार मूल्य से अत्यंत कम कीमत पर किसी अज्ञात व्यक्ति से महंगा मोबाइल फोन खरीद लेता है और परिस्थितियाँ यह संकेत करती हैं कि वह चोरी का माल हो सकता है, तो ऐसे व्यक्ति पर धारा 411 के अंतर्गत अभियोग चलाया जा सकता है, यदि यह सिद्ध हो जाए कि उसे संपत्ति के चोरी की होने का ज्ञान था या ऐसा विश्वास करने का पर्याप्त कारण था।

इस प्रकार धारा 411 का उद्देश्य केवल चोर को दंडित करना नहीं, बल्कि चोरी के माल की खरीद-फरोख्त और उसके अवैध बाजार को भी हतोत्साहित करना है। यदि चोरी की संपत्ति खरीदने वाले लोगों को दंडित न किया जाए, तो चोरी जैसे अपराधों को बढ़ावा मिलेगा।



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राजद्रोह - Sedition



धारा 124-क के अनुसार- "जो कोई बोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयास करेगा या अप्रीति उत्पन्न करने का प्रयास करेगा, वह आजीवन कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुमनि से दण्डित किया जायेगा।" संक्षेप में राजद्रोह के अपराध के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं-

  1. अभियुक्त का आशय राज्य सरकार के प्रति घृणा या अवमान फैलाना,
  2. विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध घृणा, उपेक्षा उत्पन्न करना या द्वेष उत्तेजित करना या उसका प्रयास करना,
  3. ऐसा कार्य वोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा, संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा किया जाये।

धारा के साथ तीन स्पष्टीकरण भी दिये गए हैं, जिनके अनुसार द्वेष से तात्पर्य गैर भक्ति और शत्रुता की भावना भी सम्मिलित है। उपर्युक्त प्रकार के कार्य किये बिना सरकार के प्रति असहमति प्रकट करना या आलोचना करना अपराध नहीं है।




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द्विविवाह - Bigamy



भा० द० सं० की धारा 494 ऐसे विवाह को दण्डनीय बनाती है जो विवाह के पक्षकार की पति अथवा पत्नी के जीवित रहने के कारण शून्य है। इस प्रकार के विवाह को अंग्रेजी विधि में द्विविवाह (Bigamy) कहा जाता है। धारा 494 के अनुसार- "जो कोई पति अथवा पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण से शून्य है कि वह ऐसे पति अथवा पत्नी के जीवन काल में होता है वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा।" इस धारा के लागू होने के लिए आवश्यक है कि विवाह करने वाले पक्षकारों के बीच पहले ही वैध रूप से विवाह सम्बन्ध विद्यमान हो तथा उसके बाद उसने किसी अन्य से विवाह कर लिया हो।

गोपाल बनाम राजस्थान राज्य, (1979) 3 S.C.C. 170 के मामले में यह कहा गया है कि यदि किसी विवाह को इस आधार पर शून्य घोषित किया जा सकता है कि उसके किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह किया है तो इस प्रकार विवाह शून्य बनाते ही धारा 494 का प्रवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि-

  1. अभियुक्त व्यक्ति पहले से विवाहित हो,
  2. जिस व्यक्ति से अभियुक्त का विवाह हुआ था वह जीवित हो,
  3. अभियुक्त ने दूसरे व्यक्ति से पुनर्विवाह किया हो,
  4. पुनःविवाह पहली पत्नी अथवा पति के जीवन काल में किये जाने के कारण शून्य हो।

लिंगेरी ओबुलासा बनाम आई० वेंकट रेड्डी (क्रि० ला० रि० 1979 एस० सी० 439)


विवाह की वैधानिकता-धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षकारों के बीच हुआ पहला ही वैध विवाह अस्तित्व में हो अर्थात् वैध विवाह के होते हुए पति अथवा पत्नी के जीवन काल में पुनर्विवाह करने पर ही धारा 494 लागू होगी। अपवाद-धारा 494 द्वारा स्पष्ट रूप से दो अपवादों का उल्लेख किया गया है-

  1. यदि सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय ने किसी विवाह को शून्य घोषित कर दिया हो तो पक्षकारों द्वारा पति अथवा पत्नी के जीवित रहते विवाह करना अपराध नहीं है।
  2. यदि विवाह के किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के बारे में निरन्तर सात साल से कुछ भी नहीं सुना हो अर्थात् उसे उसके बारे में कुछ भी सूचना नहीं मिली हो तो ऐसे व्यक्ति द्वारा पुनः विवाह करना अपराध नहीं है।

राधिका समीना बनाम शोहबीव नगर पुलिस स्टेशन हैदराबाद (1977 Cr. L.J. 1655) के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि यदि मुस्लिम पुरुष का विवाह विशिष्ट विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत हुआ और यदि वह दूसरा विवाह करता है तो उसे इस धारा के तहत दोषी सिद्ध किया जा सकता है।



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पत्नी पर होने वाली निर्दयता के विरुद्ध उपबंध - Provisions against the cruelty towards wife




भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्था माना जाता है, किन्तु अनेक मामलों में विवाहिता महिलाओं को पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से दहेज की मांग को लेकर महिलाओं के साथ की जाने वाली प्रताड़ना को रोकने तथा उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में धारा 498A का प्रावधान किया गया था।

धारा 498A के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति, जो किसी स्त्री का पति है अथवा पति का रिश्तेदार (Relative) है, उस स्त्री के साथ क्रूरता (Cruelty) का व्यवहार करता है, तो वह दण्ड का भागी होगा। इस अपराध के लिए तीन वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।

इस धारा के अंतर्गत “क्रूरता” का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसा कोई भी आचरण इसमें सम्मिलित है जिससे महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित होने की स्थिति उत्पन्न हो जाए या उसके जीवन, अंग अथवा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचे। दहेज की अवैध मांग को लेकर की जाने वाली प्रताड़ना भी इसी श्रेणी में आती है।

इस संबंध में वजीर चन्द्र बनाम हरियाणा राज्य (AIR 1989 SC 378) का निर्णय उल्लेखनीय है। इस मामले में नवविवाहिता से उसके पति, सास और ससुर द्वारा बार-बार दहेज एवं अन्य वस्तुओं की मांग की जाती थी तथा उसे प्रताड़ित किया जाता था। उच्चतम न्यायालय ने इसे धारा 498A के अंतर्गत क्रूरता माना और अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

दूसरी ओर, बालकृष्ण नायडू बनाम राज्य (AIR 1992 SC 1581) के मामले में यह प्रश्न उठा कि संतान न होने के कारण पत्नी को परेशान करना क्या धारा 498A के अंतर्गत आएगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रकार का वैवाहिक विवाद स्वतः धारा 498A के अंतर्गत नहीं आता। यदि परिस्थितियाँ दहेज या विधिक रूप से परिभाषित क्रूरता से संबंधित नहीं हैं, तो मामला अन्य उपयुक्त धाराओं, जैसे धारा 304 या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के अंतर्गत विचारणीय हो सकता है।

अतः धारा 498A का मूल उद्देश्य विवाहिता महिलाओं को दहेज-उत्पीड़न एवं वैवाहिक क्रूरता से संरक्षण प्रदान करना है। यह प्रावधान महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए भारतीय दण्ड कानून का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले अन्याय को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



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दहेज मृत्यु - Dowry Death



दहेज से मृत्यु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 ख के अन्तर्गत दहेज से मृत्यु के सम्बन्ध में प्रावधान है। यह प्रावधान दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 की धारा 10 द्वारा भारतीय दण्ड संहिता में निविष्ट किया गया है। यह धारा यह प्रावधान करती है-

धारा 304 (ख). जहाँ किसी, स्त्री की मृत्यु-उसके विवाह होने के सात वर्ष के अन्दर जलने या किसी शारीरिक क्षति होने अथवा सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत जैसी मृत्यु होती है, उससे अन्यथा प्रकार से होती है और यह दिखाया जाता है कि अपनी मृत्यु के तुरंत पूर्व वह अपने पति या अपने पति के किसी संबंधी की निर्दयता या प्रताड़ना का शिकार बनी थी अथवा ऐसी मृत्यु दहेज की किसी मांग के सम्बन्ध में हुई थी तो ऐसी मृत्यु दहेज से मृत्यु ऐसे पति या सम्बन्धी द्वारा कारित हुई समझी जाएगी।

रविन्द्र त्रिम्बक बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1996) 4 S.C.C. 148] के मामले में 25,000 रु० की दहेज मांग पूरी न होने पर पत्नी को मार डाला। उच्चतम न्यायालय ने भी निर्धारित किया कि यह दहेज मृत्यु है, इस पर रोक लगने के लिए कठोर सजा देनी चाहिए। क्योंकि यह समाज में घृणित अपराध है।




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नमामि शमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं - शिव रुद्राष्टकम



Shiv Rudrashtkam - Namami Shamishan

शिव रुद्राष्टकम
नमामि शमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोहं॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्मधारी॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शम्भो ॥8॥

" रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥ "


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श्री गणेश स्तुति एवं भगवान गणपति के मंत्र




वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ॥

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

मूषिकवाहन मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।
वामनरूप महेस्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥




ॐ गं गणपतये नमः ।
ऐसा शास्त्रोक्त वचन हैं कि गणेश जी का यह मंत्र चमत्कारिक और तत्काल फल देने वाला मंत्र हैं। इस मंत्र का पूर्ण भक्तिपूर्वक जप करने से समस्त बाधाएं दूर होती हैं। षडाक्षरी का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि दायक है।

ॐ वक्रतुण्डाय हुम् ।
 किसी के द्वारा की गई तांत्रिक क्रिया को नष्ट करने के लिए, विविध कामनाओं कि शीघ्र पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति की साधना कि जाती हैं। उच्छिष्ट गणपति के मंत्र का जाप अक्षय भंडार प्रदान करने वाला है ।

ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपे ।

ॐ गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:।
मंत्र जाप से कर्म बंधन, रोग निवारण, कुबुद्धि, कुसंगति, दुर्भाग्य, से मुक्ति होती हैं। समस्त विघ्न दूर होकर धन, आध्यात्मिक चेतना के विकास एवं आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्र जपे ।

ॐ गूं नम:।
रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक समृद्धि प्राप्त होकर सुख सौभाग्य प्राप्त होता है।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरदे नमः
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात।

लक्ष्मी प्राप्ति एवं व्यवसाय बाधाएं दूर करने हेतु उत्तम माना गया है ।

ॐ गीः गूं गणपतये नमः स्वाहा।
इस मंत्र के जाप से समस्त प्रकार के विघ्नों एवं संकटों का नाश होता है।

ॐ श्री गं सौभाग्य गणपत्ये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा।
विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने वालों को त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र विवाह व अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है ।

ॐ वक्रतुण्डेक द्रष्टाय क्लींहीं श्रीं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मं दशमानय स्वाहा ।
इस मंत्रों के अतिरिक्त गणपति अथर्वशीर्ष संकटनाशक, गणेश स्त्रोत, गणेश कवच, संतान गणपति स्तोत्र, ऋणहर्ता गणपति स्त्रोत मयूरेश स्त्रोत, गणेश चालीसा का पाठ करने से गणेश जी की शीघ्र कृपा प्राप्त होती है ।

ॐ वर वरदाय विजय गणपतये नमः।
इस मंत्र के जाप से मुकदमे में सफलता प्राप्त होती हैं।

ॐ गं गणपतये सर्वविघ्न हराय सर्वाय सर्वगुरवे लम्बोदराय ह्रीं गं नमः।
वाद-विवाद, कोर्ट कचहरी में विजय प्राप्ति, शत्रु भय से छुटकारा पाने हेतु उत्तम।

ॐ नमःसिद्धिविनायकाय सर्वकार्यकर्त्रे सर्वविघ्न प्रशमनाय सर्व राज्य वश्यकारनाय सर्वजन सर्व स्त्री पुरुषाकर्षणाय श्री ॐ स्वाहा।
इस मंत्र के जाप को यात्रा में सफलता प्राप्ति हेतु प्रयोग किया जाता हैं।

ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रा गणपत्ये वरद वरद सर्वजन हृदये स्तम्भय स्वाहा।
यह हरिद्रा गणेश साधना का चमत्कारी मंत्र हैं।

ॐ ग्लौं गं गणपतये नमः।
गृह कलेश निवारण एवं घर में सुखशान्ति कि प्राप्ति हेतु।

ॐ गं लक्ष्म्यौ आगच्छ आगच्छ फट्।
इस मंत्र के जाप से दरिद्रता का नाश होकर, धन प्राप्ति के प्रबल योग बनने लगते हैं।

ॐ गणेश महालक्ष्म्यै नमः।
व्यापार से सम्बन्धित बाधाएं एवं परेशानियां निवारण एवं व्यापर में निरंतर उन्नति हेतु।

ॐ गं रोग मुक्तये फट्।
भयानक असाध्य रोगों से परेशानी होने पर उचित ईलाज कराने पर भी लाभ प्राप्त नहीं हो रहा हो, तो पूर्ण विश्वास सें मंत्र का जाप करने से या जानकार व्यक्ति से जाप करवाने से धीरे-धीरे रोगी को रोग से छुटकारा मिलता हैं।

ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा।
इस मंत्र के जाप से मनोकामना पूर्ति के अवसर प्राप्त होने लगते हैं।

गं गणपत्ये पुत्र वरदाय नमः।
इस मंत्र के जाप से उत्तम संतान कि प्राप्ति होती हैं।

ॐ वर वरदाय विजय गणपतये नमः।
इस मंत्र के जाप से मुकदमे में सफलता प्राप्त होती हैं।

ॐ श्री गणेश ऋण छिन्धि वरेण्य हुं नमः फट ।
यह ऋण हर्ता मंत्र हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है और साधक का ऋण चुकता होता है। कहा जाता है कि जिसके घर में एक बार भी इस मंत्र का उच्चारण हो जाता है उसके घर में कभी भी ऋण या दरिद्रता नहीं आ सकती।

जप विधि- प्रात: स्नानादि शुद्ध होकर कुश या ऊन के आसन पर पूर्व की और मुख होकर बैठें। सामने गणेश जी का चित्र, यंत्र या मूर्ति स्थापित करें फिर षोडशोपचार या पंचोपचार से भगवान गजानन का पूजन कर प्रथम दिन संकल्प करें।

इसके बाद- भगवान गणेश का एकाग्रचित्त से ध्यान करें। नैवेद्य में यदि संभव हो तो बूंदी या बेसन के लड्डू का भोग लगाये नहीं तो गुड़ का भोग लगाये । साधक को गणेश जी के चित्र या मूर्ति के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं। रोज 108 माला का जाप करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती हैं। यदि एक दिन में 108 माला संभव न हो तो 54, 27, 18 या 9 मालाओं का भी जाप किया जा सकता है। मंत्र जाप करने में यदि आप असमर्थ हो, तो किसी ब्राह्मण को उचित दक्षिणा देकर उनसे जाप करवाया जा सकता हैं।


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ब्रह्मचर्य का नियम एवं शक्ति तथा ब्रह्मचर्य का पालन




ब्रह्मचर्य तो महान तप है , जो इसका पूर्ण पालन कर लेते है वे तो वह देव स्वरूप ही होता है ।
” न तपस्तप इत्याहुः ब्रह्मचर्य तपोत्तमम् ।
उर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवौ न तु मानुषः ॥”
लेकिन यह बहुत कठिन है क्योंकि पितामह ने सृष्टि के लिए प्रकृति की रचना करके सारे प्राणियों को मन व इन्द्रियों से युक्त कर रखा है तथा बुद्धि को त्रिगुण से युक्त कर के तब सृष्टि का रचना किया है। अतः हम रज तम से प्रवृत्त हो कर संकल्प से या लोभ वश काम आदि के वशीभूत हो जाते है । काम को वश में करने का एक ही उपाय है , संकल्प का नाश । तथा सभी प्रकृति के प्रतिनिधियों (स्त्री जाति) को सृष्टि के लिए सहायक समझना होगा, भोग्य दृष्टि से नहीं देखना चाहिए तथा अविवाहित पुरुषों को तो किसी को गलत दृष्टि से देखना भी नहीं चाहिए। ब्रह्मचर्य में अनंत गुण है। 
आयुस्तेजो बलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महदयशः ।
पुण्यं च हरि प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ॥

ब्रह्मचर्य क्या है?
ब्रह्मचर्य (Brahmacharya ) अर्थात् मन-वचन-काया के द्वारा किसी भी प्रकार के विषय-विकार में हिस्सा नहीं लेना या उसे प्रोत्साहन नहीं देना। आप विवाहित हैं या नहीं उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो यह समझना और सीखना चाहते हैं कि ब्रह्मचर्य का पालन कैसे किया जाये, उनके लिए ज्ञानी पुरुष की यह अद्वितीय नई दृष्टि एकमात्र पुख्ता उपाय है। ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना। ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह 25 वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरूरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरूरी ब्रह्मचर्य है। आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आए हैं क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुखो की प्राप्ति कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य वो अवस्था है जिसमे व्यक्ति का दिल और दिमाग ईश्वर भक्ति में लीन रहता है। जिस व्यक्ति का अपनी सभी इन्द्रियों पर सम्पूर्ण रूप से कण्ट्रोल है वही ब्रह्मचर्य का सही तरीके से पालन कर रहा है। इसका पालन करने वालो के लिए भौतिक सुख सुविधा और सम्भोग मायने नहीं रखता। मायने रखता है ईश्वर में उनका ध्यान और आत्म संतुष्टि। ऐसे व्यक्ति दूसरी स्त्रियों को गलत नजर से नहीं देखते हैं। जो सत्य को जान ले और वेदों का अध्ययन करे वो ब्रह्मचारी है।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में ब्रह्मचर्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। जिसमें सनातन धर्म के ऋषियों ने आध्यात्मिक यात्रा के लिये ब्रह्मचर्य को महत्वपूर्ण बताया है। लेकिन जिस ब्रह्मचर्य की बात ऋषियों ने की थी, उसको आज ज्यादातर गलत तरीके से लोगों के सामने पेश किया जा रहा है। जिसमें यह कहा जा रहा है कि अगर आप मात्र 30 दिनों तक ब्रह्मचर्य (वीर्य को रोकना) का पालन करते हो तो आपको असाधारण शक्ति शक्ति की प्राप्ति हो जायेगी। आप कभी बीमार नहीं होंगे और आप अपने जीवन में जो भी भौतिक सुख सुविधायें पाना चाहते है, उसको बहुत ही आसानी से प्राप्त कर लेंगे। ऐसे ही लुभाने वाली बातें आज कल वीडियो में बताई जाती है। जिससे लोगों का समय बर्बाद होता है और वो ब्रह्मचर्य को सही तरीके से कभी जान ही नहीं पाते है। वैसे इंटरनेट की दुनिया में ज्यादातर लोगों का मकसद होता है पैसा कमाना वो फिर चाहे लोगों को गलत जानकारी देकर ही क्यों न कमाया जाये। इसलिये ब्रह्मचर्य को लेकर इतना झूठा प्रचार किया जा रहा है।
ब्रह्मचर्य का सीधा सा अर्थ यह होता है कि आपकी जीवनचर्या ब्रह्म की तरह हो जाना अर्थात जब मनुष्य का आचरण ब्रह्म के केंद्र से संचालित होने लगता है, तो उस मनुष्य को ब्रह्मचारी कहा जाता है। जब व्यक्ति ब्रह्मचर्य को प्राप्त होता है तो उसको इस जगत की बहुत सी भौतिक सुख सुविधाये, ब्रह्मचर्य के सुख से छोटी प्रतीत होने लगती है। इस जगत की बहुत सी भौतिक सुख सुविधाये में एक सुख जो पुरुष को स्त्री से और स्त्री को पुरुष मिलता है यानी संभोग का सुख वो भी मनुष्य को बहुत छोटा दिखाई देने लगता है और फिर ब्रह्मचर्य को प्राप्त होने वाला व्यक्ति इन सब छोटी-छोटी बातों में अपना समय व्यर्थ नही गंवाता है। लेकिन यहां इसका मतलब यह नहीं है कि ब्रह्मचारी व्यक्ति शादी नहीं कर सकता। ब्रह्मचर्य का विवाह से कोई संबंध नही होता है और ना ही वीर्य से कोई मतलब होता है। कुछ लोग अपने अहंकार को बढ़ावा देने के लिये वीर्य को बहुत अशुद्ध बता देते है, जबकि वो यह भूल जाते है कि जिस शरीर को वह धारण किये हुये है वह भी एक वीर्य का विस्तृत रूप है और वीर्य तो मनुष्य का प्राकृतिक गुण है, यह गुण मनुष्य का ही नही अपितु समस्त प्राणी जगत के जीवों का है। इसलिये वीर्य को ब्रह्मचर्य के लिये अशुद्ध मानना गलत है। एक बात यहां ध्यान देने वाली यह कि जिस ब्रह्मचर्य की परिभाषा, आज के लोगो द्वारा गढी जा रही है, उसका केंद्र काम ही है। इस बात को आप इस तरह समझे कि जो व्यक्ति संभोग करता है वो कामी और जो व्यक्ति काम को त्याग दे वो ब्रह्मचारी। इसलिये मनुष्य काम के साथ चले या फिर काम के विपरीत कुल मिलाकर बात एक ही होती है। जबकि ब्रह्मचर्य का इन सब छोटी-छोटी बातो से कोई लेना देना नही होता है। हां ब्रह्मचर्य में एक बात जरूरी होती है कि जब व्यक्ति ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होता है तो वो हर किसी से एक स्वस्थ्य सम्बंध बनाता है। जैसे कि ब्रह्मचारी व्यक्ति हर किसी महिला को काम भरी निगाहों से नही देखता है। कुल मिलाकर ब्रह्मचर्य का अर्थ है सत्य को जान लेना। इस प्रकार अब आप समझ गये होगे कि ब्रह्मचर्य क्या है। ब्रह्मचर्य में इतनी शक्ति है कि व्यक्ति इससे अपने आप को पा लेता है और उसे असाधारण ज्ञान भी प्राप्त होता है। सालों पहले हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तप करते थे जिसके फलस्वरूप वो एक लम्बी आयु जीते थे और सेहतमंद जीवन जीते हुए सर्व सुख प्राप्त करते थे। उनके सुखी जीवन को देखकर ये बात साबित होती है कि ब्रह्मचर्य के फायदे बहुत सारे और मूल्यवान हैं।

ब्रह्मचर्य की प्रचण्ड शक्ति
ब्रह्मचर्य में उतरने से मनुष्य के अंदर प्रचण्ड शक्ति का उद्गम होता है। ब्रह्मचर्य की शक्ति इतनी प्रचण्ड होती है कि मनुष्य अपने इन्द्रियों का राजा हो जाता है। ब्रह्मचर्य की शक्ति से मनुष्य के मन में इतनी संकल्प शक्ति पैदा होती है कि मनुष्य उस संकल्प शक्ति से ब्रह्मांड में विचरण कर सकता है। और वो पंचभूत का महारथी बन जाता है। जिससे वो किसी भी प्रकार की शरीर को धारण कर सकता है। ब्रह्मचर्य की शक्ति असीम है, इसको शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है।

ब्रह्मचारी के लक्षण
ब्रह्मचारी एक वृक्ष की तरह होता है, जिसमें सहनशीलता कोई सीमा नहीं होती है। ब्रह्मचारी, मनुष्य जाति को बिना किसी स्वार्थ के एक खुशहाल जीवन जीने का रास्ता दिखाता है। ब्रह्मचारी हमेशा निष्काम भाव से जीता है। इसलिये जिसके जीवन में कोई इच्छा ना बची हो उसे ही ब्रह्मचारी कहते है।
ब्रह्मचर्य का पालन कैसे करें
वैसे तो ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिये कोई विशेष नियम नहीं होता है, क्योंकि ब्रह्मचर्य कोई शारीरिक क्रिया नहीं है, जिसे आप कर सके। लेकिन यदि आप ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होना चाहते है तो आप ध्यान में बैठना शुरू करें। जैसे-जैसे आपका ध्यान गहरा होता जायेगा वैसे-वैसे आपका अपनी इंद्रियों में कंट्रोल होता जायेगा और आप धीरे-धीर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होते जायेंगे। ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए आंतरिक भावना होनी चाहिए और उसके लिए भगवान से मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य का पालन करने की शक्ति मांगनी चाहिए। मन को कंट्रोल करने के बजाय उन कारणों को ढूँढ निकाले जिससे मन विषय-विकार में फंस जाता है और तुरंत ही वह लिंक तोड़ डालें। ब्रह्मचर्य के पालन से होने वाले फायदे और विषय-विकार से होने वाले नुकसान का आकलन करें। विवाहित लोगों के लिए, आपसी सहमति से ब्रह्मचर्य व्रत लेना या फिर एक दूसरे के प्रति वफादार रहना, वही इस काल में ब्रह्मचर्य पालन करने के समान है।

ब्रह्मचर्य के नियम
  • आप अपने आहार-विहार को सही रखें।
  • ईश्वर पर पूरा भरोसा करें।
  • कुछ समय प्रकृति में बिताए और अपने आस पास के खूबसूरत प्राकृतिक को अपने अन्दर आत्मसात कर ले।
  • गलत लोगों की संगति से दूर रहे।
  • जो भी काम करे उसको होशपूर्ण करें।
  • जो भी काम करें उसे पूरे होशोहवास और एकाग्र होकर करें।
  • दिन में कुछ समय मौन अर्थात चुप रहने की कोशिश करें।
  • दिन में कुछ समय मौन रहें।
  • दुष्ट और दुराचारी लोगों से दूर रहे।
  • दूसरों की निंदा करने से बचें।
  • दूसरों की बुराइयां करना और गलतियाँ गिनाना बंद करें।
  • दैनिक जीवन का कुछ समय प्रकृति के साथ बिताये।
  • बिना वजह फालतू की बातें न करें।
  • बेवजह किसी से बात ना करें।
  • भगवान पर पूर्ण भरोसा रखें।
  • मन में हमेशा अच्छे विचारों को जगह दें।
  • हमेशा हल्का फुल्का सात्विक भोजन करें।

ब्रह्मचर्य का पालन कैसे करें
  • अच्छी धार्मिक पुस्तकें पढ़ा करें जैसे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण आदि।
  • अपने मन को मजबूत करें और ये मान ले की काम वासना से आपको सुख नहीं मिलेगा। जब आप इस धारणा को मन में जगह दे देंगे तो तब आप अच्छी तरह और तन्मयता से ब्रह्मचर्य का पालन कर पाएंगे।
  • जब भी किसी चीज को देखकर आपका मन भटकने लगे तो मन को तुरंत समझा दें कि आपके सामने जो है वो बस एक हाड़ मांस का पुतला है।
  • जिनसे आपको आकर्षण हो सकता है उनसे दूर रहे। ध्यान करे और अपने मन को अच्छी और भक्तिमय चीजों पर लगाने का प्रयत्न करें। रोज़ अगर ये प्रयास करेंगे तो आप पूरी तरह से अपने मन पर काबू कर पाएंगे।
  • दिन भर का कुछ समय सत्संग और भक्ति के लिए निकाले। सत्संग आपको ईश्वर के करीब ले जाएगा और आपका मन कामुकता की और नहीं जाएगा। गुरु के उपदेश आपको जीवन में अच्छी बातें सिखाएंगे जो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करने में मदद करेंगे।
  • नित्य क्रिया से निपटने के बाद अपने हाथों और पैरो को ज़रुर साफ़ करे।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना सीखने में गुरु बहुत मदद कर सकते है और आप उनके बताए नियमों और संस्कारों पर चलकर सख़्ती से अपने ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते है।
  • ब्रह्मचारी का पालन करने वालो को सिनेमा का त्याग करना चाहिए क्योंकि आजकल के सिनेमा में अश्लीलता और भड़काऊ चीजे दिखाई जाती हैं।
  • रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त में उठने की आदत डाले और रात को हाथ पैर धोकर साफ़ कपड़े पहनकर सोए। सोने से पहले और उठने के बाद ईश्वर का स्मरण करें।
  • रोज़ योग और प्राणायाम करने की आदत डाले। सुबह साफ़ और शुद्ध वातावरण में और शांत वातावरण में एक्सरसाइज करें।
  • सुबह शाम ईश्वर की पूजा में मन और उनका मंत्र जाप करे, इससे मन एकाग्र होगा। उनसे प्रार्थना करें कि वो आपका मन भटकने न दे और ब्रह्मचर्य का पालन करने में आपकी मदद करें।
  • हफ्ते में एक बार सख़्ती से उपवास जरूर करें क्योंकि उपवास हमें अपने आप पर कंट्रोल करना सिखाता है,साथ ही संकल्प शक्ति को स्ट्रांग करना सिखाता है।
  • हमेशा अच्छे और ब्रह्मचर्य का पालन करने वालो की संगत में रहे। दुष्ट लोगो से दूर रहे क्योंकि उनके गलत विचार आप पर बुरा असर डाल सकते है।
  • हमेशा सात्विक भोजन करे और सडा हुआ, तेज मसालेदार, नॉन वेज आदि गरिष्ट भोजन न करे। हमेशा ईमानदारी से कमाए पैसे से ख़रीदा हुआ भोजन खाए।
  • हमेशा साफ़ सुथरे और हल्के कपड़े पहने।
गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन कैसे करें
यह सवाल हर शादी शुदा स्त्री पुरुष के मन में रहता है कि गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन कैसे करें। ब्रह्मचर्य का विवाह से कोई संबंध नहीं होता है। आप जिस भी अवस्था में है, सिर्फ ध्यान करना शुरू कर दीजिए। ब्रह्मचर्य के लिये किसी अवस्था का होना मायने नहीं रखता है। इसलिये आप जीवन की किसी भी स्थिति में रहकर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकते है।
ब्रह्मचर्य के फायदे
  • अगर आप मन, वाणी व बुद्धि को शुद्ध रखना चाहते है तो आप को ब्रह्मचर्य पालन करना बहुत जरूरी है आयुर्वेद का भी यही कहना है कि अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया 3 महीने तक करते है तो आप को मनोबल, देहबल और वचनबल में परिवर्तन महसूस होगा , जीवन के ऊँचे से ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का जीवन मे होना बहुत जरूरी है।
  • अपने दिल और अपने मन को कंट्रोल करना सीख जाते हैं।
  • उनमें लोगों से अच्छे से बात करने की समझ और कुशलता आ जाती है।
  • उसे छोटी छोटी सी चीज भी ख़ुशी देती है।
  • ऐसा व्यक्ति तनाव भरे माहौल में भी संयम के साथ काम कर पाते है।
  • ब्रह्मचर्य करने वालों की सोच अच्छी और पवित्र होती है क्योंकि उनका उनकी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले जो भी काम करना शुरू करते हैं वो खत्म करने के बाद ही छोड़ते हैं।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के अन्दर ऊर्जा बनी रहती है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
  • ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता, मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।
  • ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।
  • ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।
  • ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है।
  • ब्रह्मचर्य से व्यक्ति का आत्मविश्वास पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है।
  • ब्रह्मचर्य से व्यक्ति की एकाग्रता और याददाश्त बढ़ती है।
  • ब्रह्मचर्य से व्यक्ति के सांस लेने की प्रक्रिया सुधरती है।
  • ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रह कर उसका सामना कर सकता है।
  • ब्रह्मचारी  तनाव मुक्त रहते हैं।
  • ब्रह्मचारी स्वयं की नज़रों में ऊपर उठता है।
  • व्यक्ति अपने आपको पहले के मुकाबले अच्छे से प्रस्तुत करना और व्यक्त करना सीख जाता है।
  • व्यक्ति अपने काम पर ज्यादा ध्यान लगा पाता है।
  • व्यक्ति का अपने मन और अपने भावों पर पूर्ण नियंत्रण होगा।
  • व्यक्ति को अपने जीवन में मज़ा आने लगता है।
  • व्यक्ति टाइम मैनेजमेंट सीख जाता है इसलिए उसे ज्यादा फ्री टाइम मिलने लगता है।
  • व्यक्ति मानसिक रूप से सुदृढ़ होगा।
  • समाज में लोगों से जुड़ने और बात करने का डर खत्म हो जाता है।
ब्रह्मचर्य के नुकसान
वैसे तो ब्रह्मचर्य से कोई नुकसान नहीं होता है। लेकिन इतना जरूर है कि जो व्यक्ति रिश्तों के डोर में बंधा है, वो धीरे-धीरे रिश्तों के डोर से मुक्त होने लगता है और उसके मन से संग्रह करने की लालसा विसर्जित होने लगती है। जिससे शायद ही वो अपने सगे संबंधी के अनुरूप अपना जीवन बिता पाये। ब्रह्मचर्य में भौतिक सुख सुविधाओं की जरूरतें सीमित हो जाती है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों को ब्रह्मचर्य में नहीं उतरना चाहिये, जिनके मन में ब्रह्मचर्य का पालन करने से भौतिक सुख सुविधाओं की पूर्ति करनी हो। क्योंकि ब्रह्मचर्य से सदा उनको हानि ही होगी।


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उदय प्रकाश का जीवन परिचय एवं रचना



उदय प्रकाश : जीवन परिचय

उदय प्रकाश समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रमुख कथाकार, कवि, निबंधकार तथा पत्रकार हैं। उनका जन्म 1 जनवरी 1952 को मध्य प्रदेश के तत्कालीन शहडोल जिले (वर्तमान अनूपपुर जिला) के सीतापुर ग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ। यह क्षेत्र सोन और नर्मदा नदियों के निकट स्थित है तथा अपनी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं के लिए प्रसिद्ध है। ग्रामीण एवं आदिवासी परिवेश में बीता उनका बचपन आगे चलकर उनकी रचनात्मक चेतना का महत्वपूर्ण आधार बना।

उदय प्रकाश ने स्वयं अपने ग्राम्य परिवेश का उल्लेख करते हुए कहा है कि नर्मदा और सोन दोनों नदियाँ उनके गाँव के निकट से प्रवाहित होती हैं तथा उसी प्राकृतिक वातावरण ने उनके संवेदनशील व्यक्तित्व को आकार दिया। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उनकी प्रारम्भिक शिक्षा और जीवनानुभव ऐसे क्षेत्र में हुए जहाँ गोंड, कोल तथा अन्य आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी निवास करती थी। इस परिवेश ने उनके साहित्य को व्यापक सामाजिक दृष्टि प्रदान की।

उदय प्रकाश का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता श्री प्रेम कुमार सिंह साहित्यिक अभिरुचि वाले व्यक्ति थे तथा माता श्रीमती गंगा देवी धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों से सम्पन्न थीं। परिवार में साहित्यिक वातावरण विद्यमान था। घर में नियमित रूप से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं, जबकि उनकी बुआ लोकगायन एवं भजन-लेखन में रुचि रखती थीं। इस प्रकार साहित्य, लोकसंस्कृति और अध्यात्म का प्रभाव उन्हें बचपन से ही प्राप्त हुआ।

उदय प्रकाश के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का विशेष योगदान रहा। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि कविता और चित्रकला के प्रति उनकी रुचि का स्रोत उनकी माता थीं। माता के पास एक नोटबुक थी, जिसमें भोजपुरी लोकगीतों, कजरी, सोहर, चैती, फगुआ, विरहा और विदेसिया जैसे लोकगीतों के साथ-साथ पक्षियों और फूलों के चित्र भी अंकित थे। इन लोकगीतों और चित्रों ने बालक उदय प्रकाश की कल्पनाशक्ति को गहराई से प्रभावित किया।

किन्तु उनका जीवन प्रारम्भ से ही संघर्षों से भरा रहा। मात्र दस वर्ष की आयु में उनकी माता का कैंसर के कारण निधन हो गया। इस घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। बाद में सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया। माता-पिता की असामयिक मृत्यु ने उनके जीवन को गहरे दुःख और असुरक्षा से भर दिया। इन त्रासद अनुभवों का प्रभाव उनकी अनेक कहानियों और आत्मकथात्मक लेखों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इन परिस्थितियों के बावजूद उदय प्रकाश ने अद्भुत साहस और संघर्षशीलता का परिचय दिया। व्यक्तिगत दुःखों, आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक तनावों से जूझते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की तथा साहित्य को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। यही संघर्ष, संवेदना और जीवनानुभव आगे चलकर उनके कथा-साहित्य की प्रमुख शक्ति बने।


शिक्षा-दीक्षा

उदय प्रकाश की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पैतृक ग्राम सीतापुर में सम्पन्न हुई। प्राथमिक स्तर की शिक्षा उन्होंने स्थानीय प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद छठी से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई अनूपपुर स्थित दामोदर बहुउद्देशीय माध्यमिक विद्यालय में हुई। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा उन्होंने शहडोल के शिक्षण संस्थानों से प्राप्त की।

पारिवारिक परिस्थितियों तथा व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा निरंतर जारी रखी। पिता के निधन के पश्चात उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से विज्ञान संकाय में स्नातक (बी.एससी.) की शिक्षा प्राप्त की। इसके उपरान्त साहित्य के प्रति अपनी गहरी रुचि के कारण उन्होंने हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर अध्ययन किया और वर्ष 1974 में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रतिष्ठित आचार्य नंददुलारे वाजपेयी स्वर्ण पदक से सम्मानित हुए।

छात्र जीवन में ही उनकी वैचारिक चेतना विकसित हो चुकी थी। वे सामाजिक एवं वैचारिक आंदोलनों, विशेषकर वामपंथी विचारधारा से प्रभावित रहे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से वे दिल्ली आए और वर्ष 1975 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.) में शोधकार्य हेतु प्रवेश लिया। इसी काल में उनका संपर्क देश के प्रमुख साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक चिंतकों से हुआ, जिसने उनकी साहित्यिक दृष्टि को व्यापक बनाया।

पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन

उदय प्रकाश का विवाह 9 जुलाई 1977 को गोरखपुर निवासी कुमकुम सिंह के साथ हुआ। यह प्रेम-विवाह था। श्रीमती कुमकुम सिंह उच्च शिक्षित हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से फ्रांसीसी एवं स्पेनिश भाषाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा इंडोनेशियाई भाषा में डिप्लोमा किया।

उदय प्रकाश के रचनात्मक जीवन में उनकी पत्नी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया, बल्कि साहित्यिक गतिविधियों में भी निरंतर सहयोग प्रदान किया। उदय प्रकाश के लेखन, प्रकाशन तथा साहित्यिक उपलब्धियों के पीछे कुमकुम सिंह का प्रेरणादायी योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।

उनके दो पुत्र हैं—सिद्धार्थ और शांतनु। दोनों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। उदय प्रकाश सदैव शिक्षा, बौद्धिक विकास और सांस्कृतिक मूल्यों को पारिवारिक जीवन का आधार मानते रहे हैं।

वर्तमान में वे अपनी पत्नी के साथ गाजियाबाद स्थित वैशाली क्षेत्र में निवास करते हुए साहित्य, पत्रकारिता, व्याख्यान तथा स्वतंत्र लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। साहित्य और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी पूर्ववत बनी हुई है।


आर्थिक पृष्ठभूमि

उदय प्रकाश का जीवन निरंतर संघर्ष और आत्मनिर्भरता का उदाहरण रहा है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने तथा हिन्दी साहित्य में स्वर्ण पदक अर्जित करने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक स्थायी रोजगार प्राप्त नहीं हो सका। परिणामस्वरूप उन्हें विभिन्न संस्थानों और माध्यमों में अस्थायी रूप से कार्य करना पड़ा।

वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य किया। इसके पश्चात 1980 से 1982 तक मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। इसी अवधि में उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका पूर्वग्रह के सहायक संपादक का दायित्व भी संभाला।

वर्ष 1982 से 1990 तक वे दिनमान समाचार-पत्रिका के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने पत्रकारिता, संपादन और सामाजिक विश्लेषण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीच में वर्ष 1987 में उन्होंने टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन के स्कूल ऑफ सोशल जर्नलिज्म में अध्यापन कार्य भी किया।

उदय प्रकाश ने दूरदर्शन, वृत्तचित्र निर्माण, पटकथा लेखन तथा स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कार्य किया। आर्थिक अस्थिरता और रोजगार की अनिश्चितता के बावजूद उन्होंने लेखन को कभी नहीं छोड़ा। उनका मानना था कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व का निर्वहन भी है।

उन्हें व्यापक साहित्यिक पहचान उनकी चर्चित कहानी "पीली छतरी वाली लड़की" से प्राप्त हुई। इस रचना ने न केवल उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई, बल्कि आर्थिक रूप से भी एक नया आधार प्रदान किया। इसके बाद उनकी रचनाओं का विभिन्न भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और वे समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में गिने जाने लगे।

विचारधारा

उदय प्रकाश की विचारधारा उनके जीवनानुभवों, सामाजिक सरोकारों और साहित्यिक दृष्टि से निर्मित हुई है। उनका साहित्य समाज के हाशिए पर खड़े लोगों, वंचित वर्गों, श्रमिकों, आदिवासियों तथा शोषित समुदायों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देता है।

बाल्यकाल से ही आदिवासी और ग्रामीण परिवेश में रहने के कारण उन्होंने समाज की असमानताओं को निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी रचनाओं का आधार बने। उनके साहित्य में सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना, लोकतांत्रिक मूल्यों और सत्ता-विरोधी चेतना का स्पष्ट स्वर दिखाई देता है।

उदय प्रकाश पर मार्क्सवादी चिंतन का प्रभाव स्वीकार किया जाता है, किन्तु वे किसी राजनीतिक दल विशेष के समर्थक लेखक नहीं हैं। वे स्वतंत्र वैचारिक दृष्टि के पक्षधर हैं। उनका साहित्य पूंजीवाद, बाजारवाद, वैश्वीकरण, सामाजिक विषमता और राजनीतिक अवसरवाद की आलोचना करता है।

साहित्यिक दृष्टि से वे कबीर, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, निर्मल वर्मा तथा विश्व साहित्य के अनेक रचनाकारों से प्रभावित रहे हैं। चेखव, गाब्रिएल गार्सिया मार्केस, पाब्लो नेरूदा, जेम्स जॉयस तथा बुल्गाकोव जैसे साहित्यकारों के प्रभाव की झलक भी उनके लेखन में देखी जा सकती है।

उनका मानना है कि साहित्य समाज की सामूहिक स्मृति और चेतना का संवाहक है। इसलिए साहित्यकार का दायित्व केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्ति देना भी है।

उदय प्रकाश की प्रमुख रचनाएँ

कहानी-संग्रह एवं चर्चित कहानियाँ

  • दरियाई घोड़ा

  • तिरिछ

  • और अंत में प्रार्थना

  • पॉल गोमरा का स्कूटर

  • पीली छतरी वाली लड़की

  • दत्तात्रेय के दुःख

  • अरेबा-परेबा

  • मोहनदास

  • मेंगोसिल

काव्य-संग्रह

  • सुनो कारीगर

  • अबूतर-कबूतर

  • रात में हारमोनियम

निबंध

  • ईश्वर की आँख

अनुवाद

  • अनुभव

  • इंदिरा गाँधी की आखिरी लड़ाई

  • लाल घास पर नीले घोड़े

  • रोम्याँ रोलाँ का भारत

उपसंहार

उदय प्रकाश समकालीन हिन्दी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं जिनके साहित्य में जीवन-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और वैचारिक प्रतिबद्धता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। व्यक्तिगत त्रासदियों, आर्थिक संघर्षों और सामाजिक विषमताओं का सामना करते हुए उन्होंने साहित्य को जनसरोकारों से जोड़ा। इसी कारण उनका साहित्य केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने समय का एक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज भी है।



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विद्यापति का जीवन परिचय एवं उनकी साहित्यिक विशेषताएं



मैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेममैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेम

विद्यापति : जीवन-परिचय

मैथिली साहित्य के अमर कवि तथा "कवि कोकिल" के नाम से विख्यात विद्यापति का पूरा नाम विद्यापति ठाकुर था। वे बिसइवार वंश के विष्णु ठाकुर की आठवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर तथा माता का नाम गंगा देवी था। कुछ विद्वान, विशेषकर रामवृक्ष बेनीपुरी, उनकी माता का नाम हांसिनी देवी बताते हैं, किंतु विद्यापति के पदों की भनिता से स्पष्ट होता है कि हांसिनी देवी महाराज देवसिंह की पत्नी थीं, न कि विद्यापति की माता।

जनश्रुति के अनुसार, गणपति ठाकुर ने कपिलेश्वर महादेव की कठोर आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें विद्यापति जैसे प्रतिभाशाली पुत्र की प्राप्ति हुई। कपिलेश्वर महादेव का यह प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान बिहार के मधुबनी जिले में स्थित है।

विद्यापति के जन्म-स्थान को लेकर लंबे समय तक विवाद बना रहा। कुछ विद्वानों ने उन्हें बंगाल का कवि सिद्ध करने का प्रयास किया। इसका मुख्य कारण उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली की अत्यधिक लोकप्रियता थी, जो मिथिला से निकलकर बंगाल तक पहुँच गई थी। उन दिनों बंगाल के अनेक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने हेतु मिथिला आते थे। इसी क्रम में विद्यापति के पद बंगाल पहुँचे और महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु उनके काव्य से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने विद्यापति के पदों का कीर्तन के रूप में व्यापक प्रचार किया। फलस्वरूप बंगाल में भी विद्यापति की ख्याति अत्यधिक बढ़ गई।

बाद में कुछ लोगों ने इस आधार पर उन्हें बंगाली कवि सिद्ध करने का प्रयास किया, किंतु महा-महोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र, नगेन्द्रनाथ गुप्त तथा डॉ. जॉर्ज एब्राहम ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया कि विद्यापति मिथिला के निवासी थे और उनकी भाषा मैथिली थी।

विद्यापति का जन्म बिहार के वर्तमान मधुबनी जिले के बिस्फी ग्राम में हुआ था। यह गाँव बाद में मिथिला के राजा शिवसिंह द्वारा उन्हें दानस्वरूप प्रदान किया गया था। उनके जन्मकाल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, तथापि सामान्यतः उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है।

विद्यापति बचपन से ही अत्यंत मेधावी, प्रतिभाशाली तथा साहित्य-प्रेमी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा प्रसिद्ध विद्वान महामहोपाध्याय हरि मिश्र के निर्देशन में हुई। हरि मिश्र के भतीजे तथा सुप्रसिद्ध दार्शनिक पक्षधर मिश्र उनके सहपाठी थे। अल्पायु से ही वे अपने पिता के साथ राजदरबारों में जाने लगे थे, जिससे उन्हें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को निकट से देखने का अवसर मिला।

उनकी प्रारम्भिक रचना ‘कीर्तिलता’ मानी जाती है, जिसमें चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मिथिला की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण मिलता है। इस कृति में कवि का आत्मविश्वास, भाषा पर अधिकार तथा साहित्यिक प्रतिभा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

विद्यापति के पारिवारिक जीवन के संबंध में उनके पदों से जानकारी प्राप्त होती है। उनके एक पद— "भनइ विद्यापति सुनु मंदाकिनि"— से ज्ञात होता है कि उनकी पत्नी का नाम मंदाकिनी था। इसी प्रकार "दुल्लहि तोहर कतए छथि माए" पद से उनकी पुत्री दुल्लहि का उल्लेख मिलता है। उनके पुत्र का नाम हरपति तथा पुत्रवधू का नाम चंद्रकला था।

विद्यापति का जीवन साहित्य, भक्ति और लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण था। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली तीनों भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उनकी राधा-कृष्ण विषयक पदावली ने उन्हें अमर बना दिया। उनकी काव्यधारा में श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

सामान्यतः माना जाता है कि महाकवि विद्यापति का निधन लगभग 1448 ईस्वी के आसपास हुआ। उनके निधन से संबंधित अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनके दाह-संस्कार स्थल पर शिवलिंग प्रकट हुआ था, जहाँ आज भी एक मंदिर स्थित है और प्रतिवर्ष श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भारतीय साहित्य के इतिहास में विद्यापति का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। उन्होंने मैथिली भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की तथा अपनी काव्य-प्रतिभा से सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। इसी कारण उन्हें मैथिली साहित्य का शिरोमणि तथा "कवि कोकिल" कहा जाता है।


विद्यापति भारतीय साहित्यक भक्ति परंपरा क प्रमुख स्तंभ म सँ एकटा आओर मैथिली के सर्वोपरि कवि क रूप म जानल जैत अछि

विद्यापति का समय और रचना-संसार

महाकवि विद्यापति का युग न केवल मिथिला, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत संक्रमणशील और उथल-पुथल भरा काल था। उस समय देश निरंतर विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहा था। दिल्ली से लेकर बंगाल तक का विस्तृत भूभाग सत्ता-संघर्ष, विजय-पराजय और राजनीतिक अस्थिरता का साक्षी बन रहा था। इन परिस्थितियों का प्रतिकूल प्रभाव सामान्य जनजीवन पर भी पड़ता था। युद्धों और आक्रमणों के कारण जनता सदैव भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में जीवन व्यतीत करती थी।

उस काल में विभिन्न राजवंशों, सामंतों और शासकों के बीच सत्ता एवं वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। जाति-व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक कठोर होती जा रही थी, किन्तु सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन के संकेत भी दिखाई देने लगे थे। हिंदू और मुस्लिम समाजों के बीच आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संपर्क बढ़ रहे थे। परिणामस्वरूप परस्पर समझ, सहअस्तित्व और संवाद की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। ऐसे समय में साहित्य, कला और संस्कृति ने समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

विद्यापति की रचनाओं ने इस ऐतिहासिक आवश्यकता की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से उनकी ‘पदावली’ ने प्रेम, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाज में सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। उनकी भाषा की मधुरता, पदों की गेयता, भावों की सहजता और काव्य की सरसता ने विभिन्न भाषाओं, प्रदेशों, सम्प्रदायों तथा सामाजिक वर्गों के लोगों को समान रूप से आकर्षित किया। परिणामस्वरूप उनके पद मिथिला की सीमाओं से निकलकर बंगाल, उड़ीसा, असम और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में लोकप्रिय हो गए।

विद्यापति के पदों का प्रभाव इतना व्यापक था कि महान वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु भी उनके पदों का गायन करते समय भाव-विभोर हो जाते थे। विद्यापति के श्रृंगारिक पदों में भी भक्ति और आध्यात्मिकता का ऐसा अद्भुत समन्वय मिलता है कि वे केवल लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति न रहकर दिव्य प्रेम का प्रतीक बन जाते हैं।

विद्यापति ने ओइनवार (ओइनेवार) वंश के अनेक राजाओं के दरबार में रहते हुए शासन-व्यवस्था, राजनीति और समाज को निकट से देखा था। वे दरबारी कवि अवश्य थे, किन्तु मात्र प्रशस्ति-गायक नहीं थे। उन्होंने अपने युग की सामाजिक समस्याओं, जनजीवन की पीड़ाओं तथा मानवीय भावनाओं को गहराई से समझा और उन्हें अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति प्रदान की।

विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से उत्पन्न भय तथा निराशा के वातावरण में उन्होंने प्रेम, सौंदर्य और भक्ति को अपनी रचनात्मक साधना का केंद्र बनाया। उनका विश्वास था कि समाज को जोड़ने और मनुष्य के भीतर आशा तथा संवेदना को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम प्रेम है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रेम और भक्ति का अत्यंत मार्मिक तथा कलात्मक चित्रण मिलता है।

विद्यापति संस्कृत, अवहट्ट तथा मैथिली भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्हें धर्मशास्त्र, दर्शन, न्यायशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, संगीतशास्त्र तथा लोकजीवन का व्यापक ज्ञान था। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर श्रृंगार और भक्ति के सूक्ष्म भावों का चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर राजनीति, नीति, धर्म, समाज और लोकाचार से संबंधित महत्वपूर्ण विचार भी व्यक्त हुए हैं। उनके साहित्य में शास्त्रीय ज्ञान और लोकानुभव का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

विद्यापति की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

साहित्यिक कृतियाँ

  • कीर्तिलता

  • कीर्तिपताका

  • भूपरिक्रमा

  • पुरुष परीक्षा

  • लिखनावली

  • गोरक्ष विजय

  • मणिमंजरी नाटिका

  • पदावली

धर्मशास्त्रीय कृतियाँ

  • शैवसर्वस्वसार

  • शैवसर्वस्वसार-प्रमाणभूत संग्रह

  • गंगावाक्यावली

  • विभागसार

  • दानवाक्यावली

  • दुर्गाभक्तितरंगिणी

  • वर्षकृत्य

  • गयापत्तालक

इन सभी कृतियों में ‘पदावली’ को सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली रचना माना जाता है। इस कृति ने विद्यापति को अमर ख्याति प्रदान की। उनकी पदावली में राधा-कृष्ण प्रेम, भक्ति, श्रृंगार, विरह तथा मानवीय संवेदनाओं का ऐसा कलात्मक और मधुर चित्रण मिलता है, जो आज भी पाठकों और श्रोताओं को समान रूप से आकर्षित करता है।

इस प्रकार विद्यापति केवल मैथिली साहित्य के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक कवि हैं, जिन्होंने अपने युग की सांस्कृतिक चेतना को स्वर प्रदान किया और प्रेम, भक्ति तथा मानवता के शाश्वत मूल्यों को साहित्य के माध्यम से प्रतिष्ठित किया।

मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार

विद्यापति की 'पदावली' के पद दो तरह के हैं—श्रृंगारिक पद और भक्ति-पद। इसके अलावा कुछ ऐसे पद भी हैं, जिनमें प्रकृति, समाज, नीति, संगीत आदि जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है। श्रृंगारिक पदों में वयःसंधि, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन, मिलन-अभिसार, मान-मनुहार, संयोग-वियोग, विरह-प्रवास आदि का विलक्षण चित्र उकेरा गया है। ऐसे पदों की संख्या साढ़े सात सौ से अधिक है। उल्लेखनीय है कि अपने प्रिय सखा राजा शिवसिंह के तिरोधान (1406 ई.) के बाद से विद्यापति ने कोई श्रृंगारिक पद नहीं रचा; बाद के समय की उनकी सारी ही रचनाएँ भक्ति-प्रधान पद हैं, या फिर नीति, शास्त्र, धर्म और आचार से संबंधित विचार। भक्ति-प्रधान पदों की संख्या लगभग अस्सी है, जिसमें शिव-पार्वती लीला, नचारी, राम-वंदना, कृष्ण-वंदना, दुर्गा, काली, भैरवी, भवानी, जानकी तथा गंगा-वंदना आदि शामिल हैं। शेष पदों में ऋतु-वर्णन, बेमेल विवाह, सामाजिक जीवन-प्रसंग, रीति-नीति, संभाषण और शिक्षा आदि रेखांकित हैं।

उनके श्रृंगारिक पदों के प्रेम और सौंदर्य-विवेचन का आधार राधा-कृष्ण विषयक पद हैं। गौरतलब है कि पूरे भारतीय वाङ्मय में राधा-कृष्ण की उपस्थिति पौराणिक गरिमा और विष्णु के अवतार कृष्ण की अलौकिक शक्ति एवं लीला के साथ है। परंतु विद्यापति के राधा-कृष्ण अलौकिक नहीं हैं, वे पूरी तरह लौकिक हैं। उनके प्रेम-व्यापार के सारे प्रसंग सामान्य नागरिक की तरह हैं। पूरी 'पदावली' में प्रेम और सौंदर्य-वर्णन के किसी बिंदु पर वे आत्मलीन नहीं दिखाई देते। हर पद में रसज्ञ और रसभोक्ता के रूप में किसी न किसी राजा या सुलतान की दुहाई देते हैं अथवा नायक-नायिका को प्रबोधन और उपदेश देते हैं।

पूरी 'पदावली' में प्रेम-व्यापार के हर उपक्रम—विभाव, अनुभाव, दर्शन, श्रवण, अनुरक्ति, संभाषण, स्मरण, अभिसार, विरह, सुरति-वेदना, मिलन, उल्लास, सुरति-चर्चा, बाधा, आशा-निराशा—या फिर सौंदर्य-वर्णन के हर स्वरूप—नायिका-भेद, वयःसंधि, सद्यःस्नाता, कामदग्धा, नवयौवना, प्रगल्भा, आरूढ़ा, स्वकीया, परकीया आदि—को रेखांकित करते हुए विद्यापति सतत तटस्थ ही दिखते हैं। पूरी 'पदावली' में विद्यापति भगवद्गीता-उपदेशक कृष्ण की तरह लिप्त होकर भी निर्लिप्त प्रतीत होते हैं।

हर समय वे अपने नायक-नायिका के मनोभावों को रेखांकित कर एक संदेश देते हुए दिखाई देते हैं। जीवन में सौंदर्य और प्रेम के शिखरस्थ स्वरूप को रेखांकित करते हुए वे सभी पदों में जीवन-मूल्य का संदेश देते प्रतीत होते हैं। नागरिक मन से हताशा मिटाने और राजाओं-सुलतानों के हृदय में मानवीय कोमलता भरने का इससे बेहतर उपाय संभवतः उस दौर में और कुछ नहीं हो सकता था। इसलिए विद्यापति रचित 'पदावली' के अनुशीलन की पद्धति उसमें चित्रित प्रेम-प्रसंगों और सौंदर्य-निरूपण में कामुकता से पराङ्मुख होकर जीवन-मूल्यों की तलाश करनी चाहिए।

आम नागरिक की तरह उनकी नायिका विरह में व्यथित-व्याकुल होती है और नायक का स्मरण करती है। उन्हें पाने का उद्यम करती है। किसी प्रकार की अलौकिकता उनके प्रेम को छूती तक नहीं। उसे चंदन-लेप भी विष-बाण की तरह दाहक लगता है, गहने बोझ प्रतीत होते हैं, सपने में भी कृष्ण दर्शन नहीं देते और उसे अपने जीने की कोई स्थिति शेष नहीं दिखाई देती। अंत में कवि नायिका को गुणवती बताकर मिलन की सांत्वना के साथ प्रबोधन देते हैं।

मिलन की स्थिति में प्रेमातुर नायिका सभी प्रकार के सुख का अनुभव करती है। भावोल्लास से भरी नायिका अपने प्रियतम की उपस्थिति का सुख विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करती है—वह उसका रूप निहारती है, उसकी वाणी सुनती है, वसंत की मादक गंध का अनुभव करती है, यत्नपूर्वक क्रीड़ा-सुख में लीन होती है तथा रसिकजनों के रसभोग का अनुमान करती है।

जाहिर है कि योजनाबद्ध ढंग से अपनी रचनाशीलता में आगे बढ़ रहे कवि को अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु विलक्षण रूप से संपन्न भाषा के साथ-साथ अभिव्यक्ति के सभी अवयवों पर पूर्ण अधिकार था।

विद्यापति के काव्य में भक्ति

भक्ति और श्रृंगार—भले ही दो भाव हों, पर दोनों का मर्म एक ही है। दोनों का मूल अनुराग और समर्पण है। दोनों ही भाव व्यक्ति के मन में प्रेम से प्रारम्भ होते हैं। वैसे तो आज भी कुछ लोग मिल जाएँगे जो भक्ति और प्रेम को दो भिन्न दिशाओं का व्यापार मानते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक मनुष्य को ज्ञान नहीं होता, युवावस्था के उन्माद में वह स्त्री के रूप-जाल में मोहवश फँसा रहता है और भोग में लिप्त रहता है; जब उसकी आँखें खुलती हैं, ज्ञान-चक्षु जागृत होते हैं, तब वह भक्ति-भाव से ईश्वर की ओर मुड़ता है। परंतु ऐसा सोचना सर्वथा उचित नहीं है।

वास्तविक अर्थों में दोनों ही उपक्रमों का प्रस्थान-बिंदु एक ही है, उनका व्यापार-क्रम भी एक ही है। दोनों का क्रिया-व्यापार प्रेम के कारण ही होता है और दोनों में समर्पण तथा स्वीकार का भाव विद्यमान रहता है। प्रेम में प्रेमिका, प्रेमी के प्रति समर्पित होती है अथवा प्रेमी, प्रेमिका के प्रति; ठीक इसी प्रकार भक्ति में भक्त भगवान के प्रति समर्पित होता है। मीराबाई की काव्य-साधना का उदाहरण हमारे सामने है। उन्हें कृष्ण की प्रिया मानें अथवा कृष्ण की भक्त, संशय दोनों ही स्थितियों में बना रहेगा।

विद्यापति की 'पदावली' में भक्ति और श्रृंगार के बीच की विभाजक रेखा को समझना थोड़ा कठिन है। माधव की प्रार्थना— "तोहि जनमि पुनु तोहि समाओत, सागर लहरि समाना"— में भक्ति और श्रृंगार के इस सघन भाव को समझा जा सकता है। मूल में विलीन हो जाने का यह एकात्म भाव, आत्मा और परमात्मा की यह एकता, उनके यहाँ श्रृंगारिक पदों में बड़ी सहजता से मिलती है। अपने प्रेम-इष्ट के प्रति उपासिका का समर्पण भी इसी प्रकार का भक्तिपूर्ण समर्पण है।

भक्तिकालीन कवियों की भाँति विद्यापति के यहाँ न तो स्पष्ट एकेश्वरवाद दिखाई देता है और न ही अन्य श्रृंगारिक कवियों की तरह लोलुप भोगवाद। एक डूबे हुए काव्य-रसिक के इस समर्पण में ऐसी जीवनानुभूति है कि कहीं भक्ति श्रृंगार पर और अधिकांश स्थानों पर श्रृंगार भक्ति पर हावी दिखाई देता है। उनके यहाँ भक्ति और श्रृंगार की धाराएँ अनेक दिशाओं में प्रवाहित होकर उनके जीवनानुभव को विस्तृत करती हैं और कवि के विराट अनुभव-संसार को उद्घाटित करती हैं।

भक्ति और श्रृंगार के जो मानदंड आज के विद्वानों की दृष्टि में प्रचलित हैं, उनके आधार पर यदि महाकवि विद्यापति के काव्य-संसार का वर्गीकरण किया जाए, तो राधा-कृष्ण विषयक अधिकांश गीत श्रृंगारिक हैं। वहीं उनके प्रमुख भक्ति-गीतों में शिव-स्तुति, गंगा-स्तुति, काली-वंदना, कृष्ण-प्रार्थना आदि का विशेष स्थान है।

वस्तुतः भक्ति और श्रृंगार के विषय में हमने कुछ धारणाओं को रूढ़ रूप में स्वीकार कर लिया है। विद्यापति के नख-शिख वर्णनों के कारण कुछ लोगों को उनकी भक्ति-भावना पर संदेह होने लगता है। किंतु विद्यापति के काव्य को समझने के लिए तत्कालीन काव्य-परंपरा और उसकी मर्यादाओं को समझना आवश्यक है।

विद्यापति के यहाँ अनेक भक्तिपरक पदों में श्रृंगार और भक्ति का अंतर्द्वंद्व भी परिलक्षित होता है। श्रृंगारिक गीतों में सौंदर्य, समर्पण, रमण, विलास, विरह और मिलन के विविध पक्षों में तल्लीन रहने वाले विद्यापति, "कि यौवन पिय दूरे" जैसे पदों के रचयिता होकर भी भक्तिपरक गीतों में अत्यंत विनीत हो जाते हैं। वे पूर्व में किए गए रमण-विलास को निरर्थक बताते हुए "तोहे भजब कोन बेला" कहकर पश्चाताप व्यक्त करते हैं तथा "तातल सैकत वारि बिंदु सम सुत्त-मित-रमणि समाजे" कहकर सांसारिक आकर्षणों की क्षणभंगुरता का बोध कराते हैं।

श्रृंगारिक गीतों की नायिका के मनोवेगों को स्वर देने वाले विद्यापति उसी "रमणि" को तप्त बालू पर जल-बिंदु के समान क्षणिक बताकर भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। "अमृत त्यजि किए हलाहल पीउल" कहकर महाकवि स्वयं श्रृंगार और भक्ति के समस्त द्वैत को समाप्त कर देते हैं। यहाँ कवि की शालीनता और आध्यात्मिक परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती है।

दो भिन्न कालखंडों और दो भिन्न मनःस्थितियों में एक ही रचनाकार के इस भिन्न रचना-धर्म को कवि का पश्चाताप नहीं, बल्कि उसकी पूर्ण तल्लीनता माना जाना चाहिए। वह जहाँ भी है, जिस भाव में है, सम्पूर्णता के साथ उपस्थित है।

विद्यापति के काव्य में लोक-जीवन

विद्यापति का रचना-फलक अत्यंत बहुआयामी था। जीवन-व्यवहार के प्रत्येक पक्ष पर उनकी दृष्टि सजग और संवेदनशील थी। दरबार-संपोषित होने के बावजूद उनका कोई भी रचनात्मक उपक्रम चारण-धर्म तक सीमित नहीं रहा। प्रत्येक रचना में उन्होंने समकालीन चिंतक, सामाजिक अभिकर्ता और राजकीय सलाहकार की प्रखर नैतिकता का निर्वाह किया।

लोक-जीवन की व्यावहारिकता, लालित्यपूर्ण अर्थ-विस्तार तथा अद्भुत सांगीतिकता से युक्त उनके पद सामान्य जनजीवन में अत्यंत लोकप्रिय हुए। उनकी 'पदावली' में व्यक्ति के सामाजिक जीवन के अनेक प्रसंग—जन्म, नामकरण, मुंडन, उपनयन, विवाह, पूजा-पाठ, लोकोत्सव आदि—का सजीव चित्रण मिलता है।

आज भी मैथिल जनजीवन का कोई प्रमुख उत्सव विद्यापति के गीतों के बिना सम्पन्न नहीं होता। यद्यपि उनके पदों के रचनाकाल की सुनिश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तथापि यह कहा जा सकता है कि वे एक दीर्घ कालावधि में रचे गए हैं।

मिथिला सहित समूचे पूर्वांचल—बंगाल, असम और उड़ीसा—में वैष्णव साहित्य के विकास में विद्यापति की 'पदावली' का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाव-माधुर्य और भाषा-सौंदर्य के कारण उनके पद व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए। वैष्णव भक्तों के प्रयास से इन गीतों का प्रचार-प्रसार मथुरा और वृंदावन तक हुआ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उनके पदों की संख्या लगभग नौ सौ मानी जाती है। राजा शिवसिंह के तिरोधान के बाद उन्होंने नेपाल की तराई के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र राजबनौली में कई वर्षों तक निवास किया और वहीं रहकर अपने रचनाकर्म को आगे बढ़ाया।

विद्यापति की भाषा और काव्य-सौंदर्य

'पदावली' की भाषा मैथिली है, जबकि उनकी अन्य रचनाओं की भाषा संस्कृत एवं अवहट्ठ है। पदों का संकलन तीन भिन्न-भिन्न भाषिक समाजों—मिथिला, बंगाल और नेपाल—के लिखित एवं मौखिक स्रोतों से हुआ है। भाषिक संरचना के गुणसूत्रों से परिचित सभी लोग इस बात से सहमत होंगे कि रचनाकार से मुक्त हुई गेयधर्मी रचना लोक-कंठ में वास करती हुई अनचाहे में भी कुछ-न-कुछ अपने मूल स्वरूप से भिन्न हो जाती है और फिर संकलन तक आते-आते उसमें स्थानीयता के अनेक अपरिहार्य रंग चढ़ जाते हैं। लोक-कंठ से संकलित सामग्री का तो यह अनिवार्य विधान है। विद्यापति की 'पदावली' भी इसका अपवाद नहीं है।

चौदहवीं से बीसवीं शताब्दी तक के लगभग छह सौ वर्षों की यात्रा में इन पदों में कब, कहाँ और किसके प्रयास से क्या जुड़ा और क्या छूटा, यह निश्चित रूप से जान पाना कठिन है। इसके अतिरिक्त एक तथ्य यह भी है कि इन पदों के प्रारंभिक संकलनकर्ताओं की मातृभाषा मैथिली नहीं थी। इसलिए ध्वनियों, शब्दों, पदों और संदर्भ-संकेतों को लिखित रूप में व्यक्त करते समय निश्चय ही कुछ परिवर्तन आ गए होंगे।

फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि विद्यापति के जीवनकाल में ही 'पदावली' की अनेक पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह लोकजीवन में प्रचलित हो गई थीं। जीवनोपयोगी विषयों तथा सांगीतिकता के अतिरिक्त 'पदावली' की लोकप्रियता में उसकी लोक-रंजक भाषा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके एक-एक पद अनेक रागों में गाए जाते हैं।

विद्यापति के सभी पद मात्रिक समछंदों में रचित हैं। अधिकांश पदों की रचना एक ही छंद में हुई है, किंतु अनेक पदों में मिश्रित छंदों का भी प्रयोग मिलता है। अर्थात् दो, तीन अथवा अधिक छंदों के चरणों का समन्वय किया गया है।

उन्होंने अहीर, लीला, महानुभाव, चंडिका, हाकलि, चौपई, चौपाई, चौबोला, पद्धरि, सुखदा, उल्लास, रूपमाला, नाग, सरसी, सार, मरहठा, माधवी, झूलना आदि छंदों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त अखंड, निधि, शशिवदना, मनोरम, कज्जल, रजनी, गीता, गीतिका, विष्णुपद, हरिगीतिका, ताटंक, वीर छंद तथा समान सवैया जैसे छंदों के चरणों को अन्य छंदों के साथ जोड़कर भी प्रयोग किया गया है।

उल्लेख मिलता है कि उल्लास, नाग, रंजनी तथा गीता छंद के प्रवर्तक स्वयं विद्यापति थे, क्योंकि उनसे पूर्व किसी रचनाकार के यहाँ इन चारों छंदों का प्रयोग उपलब्ध नहीं होता। यह तथ्य उनकी छंद-साधना और काव्य-कौशल का प्रमाण है।

इस प्रकार विद्यापति की भाषा में लोकजीवन की सहजता, माधुर्य और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी काव्य-भाषा भावों के अनुरूप, सरस, प्रवाहपूर्ण और अत्यंत प्रभावशाली है। यही कारण है कि उनकी 'पदावली' केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भाषिक और सांगीतिक दृष्टि से भी भारतीय काव्य-परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।



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आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा प्राप्त करने का मंत्र




आयु वृद्धि एवं रोग शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युंजय मंत्र को भगवान शिव का अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी मंत्र माना गया है। सनातन परंपरा में इसका जप स्वास्थ्य, मानसिक शांति, रोग निवारण, आयु वृद्धि तथा संकटों से रक्षा के लिए किया जाता है।

हवन विधि

मंत्र-जप की पूर्णता के पश्चात हवन करना शुभ माना गया है। सामान्य हवन सामग्री में निम्न वस्तुएँ सम्मिलित की जा सकती हैं—

  • बिल्व फल

  • तिल

  • चावल

  • चन्दन

  • पंचमेवा

  • जायफल

  • गुग्गुल

  • गुड़

  • सरसों

  • धूप

  • घी

इन सभी सामग्री को मिलाकर महामृत्युंजय मंत्र के साथ आहुति दें।

विभिन्न उद्देश्यों के लिए विशेष हवन सामग्री

रोग शांति हेतु

  • दूर्वा

  • गुडूची (गिलोय) का लगभग चार इंच का टुकड़ा

  • घी

श्री एवं समृद्धि प्राप्ति हेतु

  • बिल्व फल

  • कमल बीज

  • खीर

ज्वर शांति हेतु

  • अपामार्ग

मृत्यु-भय निवारण हेतु

  • जायफल एवं दही

शत्रु बाधा निवारण हेतु

  • पीली सरसों

पूर्णाहुति

हवन के अंत में सूखे नारियल में घी भरकर तथा खीर के साथ पूर्णाहुति प्रदान करें।

तर्पण एवं मार्जन

हवन के पश्चात तर्पण और मार्जन किया जाता है।

  • कांसे या पीतल के पात्र में जल और गौ-दूध मिलाएँ।

  • अंजलि द्वारा तर्पण करें।

  • तर्पण के समय मूल मंत्र के अंत में "तर्पयामि" जोड़ें।

  • मार्जन के समय मूल मंत्र के अंत में "मार्जयामि" जोड़ें।

दशांश नियम

शास्त्रीय विधान के अनुसार—

  • जप का दशांश हवन।

  • हवन का दशांश तर्पण।

  • तर्पण का दशांश मार्जन।

  • मार्जन का दशांश शिवभक्तों एवं ब्राह्मणों को भोजन।

ब्राह्मण एवं शिवभक्त भोजन

सामर्थ्य के अनुसार 1, 3, 5, 9 या 11 ब्राह्मणों अथवा शिवभक्तों को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना शुभ माना गया है।

विशेष टिप्पणी

महामृत्युंजय मंत्र के जप से पूर्व या नित्य रूप से महामृत्युंजय कवच का पाठ भी किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा, नियम और विश्वासपूर्वक किए गए मंत्र-जप एवं उपासना से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल तथा स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है।

नोट: रोग की स्थिति में मंत्र-जप एवं धार्मिक अनुष्ठान आध्यात्मिक सहारा प्रदान कर सकते हैं, किन्तु इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। उचित चिकित्सा और चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।



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यौन पहचान - Sexual Identity



पुरुष, महिला, दोनों अथवा दोनों के मिश्रित रूप के रूप में स्वयं के बारे में व्यक्ति की आंतरिक समझ को लिंग पहचान (Gender Identity) कहा जाता है। यह इस बात को व्यक्त करती है कि व्यक्ति स्वयं को किस रूप में समझता है और स्वयं को किस नाम या पहचान से संबोधित करता है। किसी व्यक्ति की लिंग पहचान जन्म के समय निर्धारित किए गए उसके लिंग के समान भी हो सकती है और उससे भिन्न भी।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से लिंग पहचान, लिंग अभिव्यक्ति, यौनिकता तथा रोमांटिक आकर्षण की अत्यंत विविध अवस्थाओं में पाए जाते हैं। फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों में लोगों को उनकी यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) और लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार तथा कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है।

अपनी यौन पहचान को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया से गुजर रहे युवाओं के लिए अपने माता-पिता या परिवार के सामने अपनी पहचान व्यक्त करना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होती है। दूसरी ओर, जिन लोगों की वे परवाह करते हैं, उनसे स्वीकृति और समर्थन प्राप्त होना उनके लिए राहत, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) से तात्पर्य उस भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण से है, जो किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के प्रति अनुभव होता है तथा जिनके साथ वह संबंध स्थापित करना चाहता है। यौन अभिविन्यास के प्रमुख रूपों में विषमलैंगिक (Heterosexual), समलैंगिक (Gay), लेस्बियन (Lesbian), उभयलिंगी (Bisexual) तथा अलैंगिक (Asexual) शामिल हैं।

Sexual Identity

विभिन्न यौन अभिविन्यास एवं पहचानें

समलैंगिकता (Homosexuality)

समलैंगिकता (Homosexuality) समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण के पैटर्न को दर्शाती है। Lesbian शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन महिलाओं के लिए किया जाता है जो अन्य महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं, जबकि Gay शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन पुरुषों के लिए किया जाता है जो अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षित होते हैं। यद्यपि कई संदर्भों में Gay शब्द का उपयोग समलैंगिक महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए भी किया जाता है।

उभयलैंगिकता (Bisexuality)

उभयलैंगिकता (Bisexuality) एक से अधिक लिंगों अथवा पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक या यौन आकर्षण को व्यक्त करती है। उभयलैंगिक पहचान का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति दोनों लिंगों के प्रति समान रूप से आकर्षित हो। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति, जिनकी किसी एक लिंग के प्रति विशेष लेकिन अनन्य (Exclusive) प्राथमिकता नहीं होती, स्वयं को उभयलैंगिक के रूप में पहचान सकते हैं।

अलैंगिकता (Asexuality)

अलैंगिकता (Asexuality) से तात्पर्य दूसरों के प्रति यौन आकर्षण की अनुपस्थिति अथवा यौन गतिविधियों में बहुत कम या बिल्कुल रुचि न होने से है। यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसके अंतर्गत अनेक उप-पहचानें आती हैं। अलैंगिकता को यौन संयम (Abstinence) या ब्रह्मचर्य (Celibacy) से अलग माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की यौन अभिविन्यास से संबंधित पहचान है, न कि कोई स्वैच्छिक जीवन-शैली।

अरोमांटिकता (Aromanticism)

अरोमांटिकता (Aromanticism) उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्ति दूसरों के प्रति बहुत कम या कोई रोमांटिक आकर्षण अनुभव नहीं करता। ऐसे व्यक्तियों में रोमांटिक संबंध बनाने की इच्छा या प्रवृत्ति अत्यंत सीमित अथवा अनुपस्थित हो सकती है।

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality)

पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality) किसी व्यक्ति के प्रति उसकी लिंग पहचान या जैविक लिंग की परवाह किए बिना आकर्षण को दर्शाती है। पैनसेक्सुअल व्यक्ति स्वयं को कभी-कभी "लिंग-अंधा" (Gender-blind) भी कहते हैं, अर्थात् उनके लिए किसी व्यक्ति का लिंग या सेक्स रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण का निर्णायक कारक नहीं होता। कुछ विद्वान पैनसेक्सुअलिटी को उभयलैंगिकता का विस्तृत रूप भी मानते हैं।

बहुलैंगिकता (Polysexuality)

बहुलैंगिकता (Polysexuality) का अर्थ कई, किंतु सभी नहीं, लिंगों के प्रति आकर्षण होना है। इस पहचान का उपयोग कुछ लोग उभयलैंगिकता (Bisexuality) के विकल्प के रूप में करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार "उभयलैंगिक" शब्द दो लिंगों की अवधारणा तक सीमित माना जा सकता है। बहुलैंगिक व्यक्ति अनेक लिंगों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि वे सभी लिंगों के प्रति आकर्षण अनुभव करें।

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality)

सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality) किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (Intelligence) के प्रति आकर्षण को दर्शाती है। इस शब्द का उपसर्ग Sapio- लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका संबंध ज्ञान और बुद्धि से है। सैपियोसेक्सुअल व्यक्ति समलैंगिक, विषमलैंगिक अथवा उभयलैंगिक भी हो सकते हैं। सामान्यतः इसे स्वतंत्र यौन अभिविन्यास के बजाय आकर्षण की एक विशेष प्रवृत्ति माना जाता है।

यह शब्द 2014 में व्यापक चर्चा में आया, जब डेटिंग वेबसाइट OkCupid ने इसे अपने उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध पहचान विकल्पों में शामिल किया। इसके बाद इस अवधारणा पर व्यापक बहस हुई। कुछ आलोचकों ने इसे अभिजात्यवादी (Elitist), भेदभावपूर्ण या दिखावटी भी बताया।

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy)

संबंध अराजकता (Relationship Anarchy) एक संबंध-दर्शन (Relationship Philosophy) है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और स्वैच्छिक संबंधों पर बल देता है। यह पारंपरिक संबंध संरचनाओं तथा पूर्वनिर्धारित सामाजिक अपेक्षाओं को चुनौती देता है। इसके अंतर्गत मित्रता और प्रेम-संबंधों के बीच कठोर पदानुक्रम को स्वीकार नहीं किया जाता तथा प्रत्येक संबंध को उसके प्रतिभागियों द्वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर विकसित होने दिया जाता है।

विषमलैंगिकता (Heterosexuality)

विषमलैंगिकता (Heterosexuality) विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक अथवा यौन आकर्षण को दर्शाती है। सामान्यतः Straight शब्द का प्रयोग विषमलैंगिक व्यक्तियों के लिए किया जाता है। विश्वभर में विषमलैंगिकता सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली यौन अभिविन्यास श्रेणी मानी जाती है।



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