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गजेन्द्र मोक्ष
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श्री हरिहर मंदिर बनाम जामा मस्जिद विवाद: हाईकोर्ट ने वाद दायर करने और स्थल निरीक्षण की अनुमति को सही ठहराया
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: एनपीए घोषित खाते के खिलाफ दीवानी वाद नहीं, जाना होगा ऋण वसूली न्यायाधिकरण
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विधि तुच्छ बातो पर ध्यान नहीं देती
"विधि तुच्छ बातो पर ध्यान नहीं देती"
("Law gives no importance to trifles" De mini mis non curat lex) इस कहावत का अर्थ है कि विधि उन बातों पर ध्यान नहीं देती जो अपने शाब्दिक अर्थ में तो अपराध की श्रेणी में जाते हैं परन्तु उनमें क्षति नाममात्र की होती है जिसके लिए अपराध का संज्ञान करना भी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। उदाहरणतः दूसरे व्यक्ति की दवात में कलम डुबोना, चोरी करना होगा, किसी के पापड़ के टुकड़े करना रिष्टि होगी, दूसरों के पास से घोड़ा दौड़ा कर निकालना और धूल से ढक देना हमला होगा, गाड़ी में चढ़ते हुए को धक्का देना चोट होगी। इसी प्रकार के अनेक कार्य हैं जिनको किये विना व्यक्ति समाज में रह ही नहीं सकता।
धारा 95 के अनुसार- "कोई बात इस कारण से अपराध नहीं है कि उससे कोई हानि पहुँचती है या पहुँचाने का आशय किया गया है या पहुँचाने की सम्भावना का ज्ञान है, यदि वह इतनी तुच्छ है कि मामूली समझ और स्वभाव वाला कोई व्यक्ति उसकी शिकायत नहीं करेगा।"
धारा 95 के लागू होने के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक है-
- विचाराधीन कार्य अपराध होना चाहिए, तथा
- वह इतना तुच्छ हो कि साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति भी उसकी शिकायत न करे।
( इस उपवन्ध पर टिप्पणी करते हुए हुदा का कथन है कि "कोई भी समझदार व्यक्ति तुच्छ बातों की शिकायत नहीं करना चता। कोई व्यक्ति भीड़ से भरी सड़कों पर किसी अन्य के अँगूठों को दवाये विना अथवा किसी को धक्का दिये बिना नहीं चल सकता और कोई समझदार व्यक्ति इन तुच्छ बातों की शिकायत भी नहीं करेगा। इस प्रकार यदि देखा जाये तो यह उपबन्ध साधारण व्यक्तियों के लिए अनावश्यक ही है। परन्तु कुछ सनकी होते हैं जिनकी सनकों के संरक्षण के लिए यह औपचारिक उपवन्ध करना पड़ता है। प्रत्येक छोटा कार्य तुच्छ नहीं होता। कोई कार्य तुच्छ है अथवा नहीं यह उसकी प्रकृति तथा किये जाने पर निर्भर करता है।
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चुरायी हुई सम्पत्ति प्राप्त करना - Receiving of stolen property
भा० द० सं० की धारा 410 चुराई हुई संपत्ति की परिभाषा प्रस्तुत करती है जिसके अनुसार - "वह संपत्ति जिसका कब्जा चोरी द्वारा या उद्यापन द्वारा या लूट द्वारा अंतरित किया गया है और वह संपत्ति जिसका आपराधिक दुर्विनियोग किया गया है या जिसके विषय में आपराधिक न्यास-भंग किया गया है, "चुराई हुई संपत्ति" कहलायेगी, चाहे वह अंतरण या वह दुर्विनियोग या न्यास-भंग भारत के भीतर किया गया हो या बाहर । किन्तु यदि ऐसी संपत्ति इसके पश्चात ऐसे व्यक्ति के कब्जे में पहुँच जाती है जो कब्जे के लिए वैध रूप से हकदार है तो यह चुरायी हुई संपत्ति नहीं रह जाती।
चान्द मल वनाम राजस्थान राज्य (1976, Cr. L.J.679) के मामले में यह मत व्यक्त किया गया है कि चुरायी हुई संपत्ति के अन्तर्गत केवल ऐसी सम्पत्ति आती है जिसका कब्जा चोरी द्वारा या उद्यापन द्वारा या लूट द्वारा या आपराधिक दुर्विनियोग द्वारा हस्तांतरण हुआ हो।"
चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना -धारा 411 के अनुसार- "जो कोई किसी चुराई हुई संपत्ति को यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह चुरायी हुई सम्पत्ति है, बेईमानी से प्राप्त करेगा या रखेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जायेगा।"
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राजद्रोह - Sedition
धारा 124-क के अनुसार- "जो कोई बोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयास करेगा या अप्रीति उत्पन्न करने का प्रयास करेगा, वह आजीवन कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुमनि से दण्डित किया जायेगा।" संक्षेप में राजद्रोह के अपराध के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं-
- अभियुक्त का आशय राज्य सरकार के प्रति घृणा या अवमान फैलाना,
- विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध घृणा, उपेक्षा उत्पन्न करना या द्वेष उत्तेजित करना या उसका प्रयास करना,
- ऐसा कार्य वोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा, संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा किया जाये।
धारा के साथ तीन स्पष्टीकरण भी दिये गए हैं, जिनके अनुसार द्वेष से तात्पर्य गैर भक्ति और शत्रुता की भावना भी सम्मिलित है। उपर्युक्त प्रकार के कार्य किये बिना सरकार के प्रति असहमति प्रकट करना या आलोचना करना अपराध नहीं है।
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द्विविवाह - Bigamy
भा० द० सं० की धारा 494 ऐसे विवाह को दण्डनीय बनाती है जो विवाह के पक्षकार की पति अथवा पत्नी के जीवित रहने के कारण शून्य है। इस प्रकार के विवाह को अंग्रेजी विधि में द्विविवाह (Bigamy) कहा जाता है। धारा 494 के अनुसार- "जो कोई पति अथवा पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण से शून्य है कि वह ऐसे पति अथवा पत्नी के जीवन काल में होता है वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा।" इस धारा के लागू होने के लिए आवश्यक है कि विवाह करने वाले पक्षकारों के बीच पहले ही वैध रूप से विवाह सम्बन्ध विद्यमान हो तथा उसके बाद उसने किसी अन्य से विवाह कर लिया हो।
गोपाल बनाम राजस्थान राज्य, (1979) 3 S.C.C. 170 के मामले में यह कहा गया है कि यदि किसी विवाह को इस आधार पर शून्य घोषित किया जा सकता है कि उसके किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह किया है तो इस प्रकार विवाह शून्य बनाते ही धारा 494 का प्रवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि-
- अभियुक्त व्यक्ति पहले से विवाहित हो,
- जिस व्यक्ति से अभियुक्त का विवाह हुआ था वह जीवित हो,
- अभियुक्त ने दूसरे व्यक्ति से पुनर्विवाह किया हो,
- पुनःविवाह पहली पत्नी अथवा पति के जीवन काल में किये जाने के कारण शून्य हो।
लिंगेरी ओबुलासा बनाम आई० वेंकट रेड्डी (क्रि० ला० रि० 1979 एस० सी० 439)
विवाह की वैधानिकता-धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षकारों के बीच हुआ पहला ही वैध विवाह अस्तित्व में हो अर्थात् वैध विवाह के होते हुए पति अथवा पत्नी के जीवन काल में पुनर्विवाह करने पर ही धारा 494 लागू होगी। अपवाद-धारा 494 द्वारा स्पष्ट रूप से दो अपवादों का उल्लेख किया गया है-
- यदि सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय ने किसी विवाह को शून्य घोषित कर दिया हो तो पक्षकारों द्वारा पति अथवा पत्नी के जीवित रहते विवाह करना अपराध नहीं है।
- यदि विवाह के किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के बारे में निरन्तर सात साल से कुछ भी नहीं सुना हो अर्थात् उसे उसके बारे में कुछ भी सूचना नहीं मिली हो तो ऐसे व्यक्ति द्वारा पुनः विवाह करना अपराध नहीं है।
राधिका समीना बनाम शोहबीव नगर पुलिस स्टेशन हैदराबाद (1977 Cr. L.J. 1655) के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि यदि मुस्लिम पुरुष का विवाह विशिष्ट विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत हुआ और यदि वह दूसरा विवाह करता है तो उसे इस धारा के तहत दोषी सिद्ध किया जा सकता है।
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पत्नी पर होने वाली निर्दयता के विरुद्ध उपबंध - Provisions against the cruelty towards wife
पत्नी पर होने वाली निर्दयता जो कि पति द्वारा या उसके नातेदार (Relatives) द्वारा होती थी, को रोकने के लिए धारा 498A में प्रावधान किये गये हैं। जिसके अनुसार जो कोई किसी स्त्री का पति अथवा पति का नातेदार होते हुए उस स्त्री के साथ निर्दयतापूर्वक व्यवहार करेगा उसे तीन वर्ष तक की अवधि के कारावास से दण्डित किया जा सकेगा और वह जुर्माना के लिए भी दायी होगा।
वजीर चन्द्र बनाम हरियाणा राज्य (AIR 1989 S.C. 378) के मामले में नववधू के पति, सास, ससुर, द्वारा कार-बार दहेज की वस्तुओं की मांग की जाने लगी। उच्चतम न्यायालय ने उन्हें उपर्युक्त धारा के तहत दोषी ठहराया।
परन्तु बालकृष्ण नायडू बनाम राज्य (AIR 1992 S.C. 1581) के मामले में पत्नी के संतान नहीं होने के कारण यदि उसे परेशान किया जाता है तो मामला इस धारा की परिधि में नहीं आकर धारा 304 या अन्य किसी संबंधित धारा में आयेगा।
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दहेज मृत्यु - Dowry Death
दहेज से मृत्यु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 ख के अन्तर्गत दहेज से मृत्यु के सम्बन्ध में प्रावधान है। यह प्रावधान दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 की धारा 10 द्वारा भारतीय दण्ड संहिता में निविष्ट किया गया है। यह धारा यह प्रावधान करती है-
धारा 304 (ख). जहाँ किसी, स्त्री की मृत्यु-उसके विवाह होने के सात वर्ष के अन्दर जलने या किसी शारीरिक क्षति होने अथवा सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत जैसी मृत्यु होती है, उससे अन्यथा प्रकार से होती है और यह दिखाया जाता है कि अपनी मृत्यु के तुरंत पूर्व वह अपने पति या अपने पति के किसी संबंधी की निर्दयता या प्रताड़ना का शिकार बनी थी अथवा ऐसी मृत्यु दहेज की किसी मांग के सम्बन्ध में हुई थी तो ऐसी मृत्यु दहेज से मृत्यु ऐसे पति या सम्बन्धी द्वारा कारित हुई समझी जाएगी।
रविन्द्र त्रिम्बक बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1996) 4 S.C.C. 148] के मामले में 25,000 रु० की दहेज मांग पूरी न होने पर पत्नी को मार डाला। उच्चतम न्यायालय ने भी निर्धारित किया कि यह दहेज मृत्यु है, इस पर रोक लगने के लिए कठोर सजा देनी चाहिए। क्योंकि यह समाज में घृणित अपराध है।
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नमामि शमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं - शिव रुद्राष्टकम
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श्री गणेश स्तुति एवं भगवान गणपति के मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ।
ऐसा शास्त्रोक्त वचन हैं कि गणेश जी का यह मंत्र चमत्कारिक और तत्काल फल देने वाला मंत्र हैं। इस मंत्र का पूर्ण भक्तिपूर्वक जप करने से समस्त बाधाएं दूर होती हैं। षडाक्षरी का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि दायक है।
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपे ।
रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक समृद्धि प्राप्त होकर सुख सौभाग्य प्राप्त होता है।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात।
लक्ष्मी प्राप्ति एवं व्यवसाय बाधाएं दूर करने हेतु उत्तम माना गया है ।
विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने वालों को त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र विवाह व अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है ।
इस मंत्र के जाप से मुकदमे में सफलता प्राप्त होती हैं।
वाद-विवाद, कोर्ट कचहरी में विजय प्राप्ति, शत्रु भय से छुटकारा पाने हेतु उत्तम।
इस मंत्र के जाप को यात्रा में सफलता प्राप्ति हेतु प्रयोग किया जाता हैं।
यह हरिद्रा गणेश साधना का चमत्कारी मंत्र हैं।
गृह कलेश निवारण एवं घर में सुखशान्ति कि प्राप्ति हेतु।
इस मंत्र के जाप से दरिद्रता का नाश होकर, धन प्राप्ति के प्रबल योग बनने लगते हैं।
व्यापार से सम्बन्धित बाधाएं एवं परेशानियां निवारण एवं व्यापर में निरंतर उन्नति हेतु।
भयानक असाध्य रोगों से परेशानी होने पर उचित ईलाज कराने पर भी लाभ प्राप्त नहीं हो रहा हो, तो पूर्ण विश्वास सें मंत्र का जाप करने से या जानकार व्यक्ति से जाप करवाने से धीरे-धीरे रोगी को रोग से छुटकारा मिलता हैं।
इस मंत्र के जाप से मनोकामना पूर्ति के अवसर प्राप्त होने लगते हैं।
यह ऋण हर्ता मंत्र हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है और साधक का ऋण चुकता होता है। कहा जाता है कि जिसके घर में एक बार भी इस मंत्र का उच्चारण हो जाता है उसके घर में कभी भी ऋण या दरिद्रता नहीं आ सकती।
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ब्रह्मचर्य का नियम एवं शक्ति तथा ब्रह्मचर्य का पालन
पुण्यं च हरि प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ॥
- आप अपने आहार-विहार को सही रखें।
- ईश्वर पर पूरा भरोसा करें।
- कुछ समय प्रकृति में बिताए और अपने आस पास के खूबसूरत प्राकृतिक को अपने अन्दर आत्मसात कर ले।
- गलत लोगों की संगति से दूर रहे।
- जो भी काम करे उसको होशपूर्ण करें।
- जो भी काम करें उसे पूरे होशोहवास और एकाग्र होकर करें।
- दिन में कुछ समय मौन अर्थात चुप रहने की कोशिश करें।
- दिन में कुछ समय मौन रहें।
- दुष्ट और दुराचारी लोगों से दूर रहे।
- दूसरों की निंदा करने से बचें।
- दूसरों की बुराइयां करना और गलतियाँ गिनाना बंद करें।
- दैनिक जीवन का कुछ समय प्रकृति के साथ बिताये।
- बिना वजह फालतू की बातें न करें।
- बेवजह किसी से बात ना करें।
- भगवान पर पूर्ण भरोसा रखें।
- मन में हमेशा अच्छे विचारों को जगह दें।
- हमेशा हल्का फुल्का सात्विक भोजन करें।
- अच्छी धार्मिक पुस्तकें पढ़ा करें जैसे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण आदि।
- अपने मन को मजबूत करें और ये मान ले की काम वासना से आपको सुख नहीं मिलेगा। जब आप इस धारणा को मन में जगह दे देंगे तो तब आप अच्छी तरह और तन्मयता से ब्रह्मचर्य का पालन कर पाएंगे।
- जब भी किसी चीज को देखकर आपका मन भटकने लगे तो मन को तुरंत समझा दें कि आपके सामने जो है वो बस एक हाड़ मांस का पुतला है।
- जिनसे आपको आकर्षण हो सकता है उनसे दूर रहे। ध्यान करे और अपने मन को अच्छी और भक्तिमय चीजों पर लगाने का प्रयत्न करें। रोज़ अगर ये प्रयास करेंगे तो आप पूरी तरह से अपने मन पर काबू कर पाएंगे।
- दिन भर का कुछ समय सत्संग और भक्ति के लिए निकाले। सत्संग आपको ईश्वर के करीब ले जाएगा और आपका मन कामुकता की और नहीं जाएगा। गुरु के उपदेश आपको जीवन में अच्छी बातें सिखाएंगे जो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करने में मदद करेंगे।
- नित्य क्रिया से निपटने के बाद अपने हाथों और पैरो को ज़रुर साफ़ करे।
- ब्रह्मचर्य का पालन करना सीखने में गुरु बहुत मदद कर सकते है और आप उनके बताए नियमों और संस्कारों पर चलकर सख़्ती से अपने ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते है।
- ब्रह्मचारी का पालन करने वालो को सिनेमा का त्याग करना चाहिए क्योंकि आजकल के सिनेमा में अश्लीलता और भड़काऊ चीजे दिखाई जाती हैं।
- रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त में उठने की आदत डाले और रात को हाथ पैर धोकर साफ़ कपड़े पहनकर सोए। सोने से पहले और उठने के बाद ईश्वर का स्मरण करें।
- रोज़ योग और प्राणायाम करने की आदत डाले। सुबह साफ़ और शुद्ध वातावरण में और शांत वातावरण में एक्सरसाइज करें।
- सुबह शाम ईश्वर की पूजा में मन और उनका मंत्र जाप करे, इससे मन एकाग्र होगा। उनसे प्रार्थना करें कि वो आपका मन भटकने न दे और ब्रह्मचर्य का पालन करने में आपकी मदद करें।
- हफ्ते में एक बार सख़्ती से उपवास जरूर करें क्योंकि उपवास हमें अपने आप पर कंट्रोल करना सिखाता है,साथ ही संकल्प शक्ति को स्ट्रांग करना सिखाता है।
- हमेशा अच्छे और ब्रह्मचर्य का पालन करने वालो की संगत में रहे। दुष्ट लोगो से दूर रहे क्योंकि उनके गलत विचार आप पर बुरा असर डाल सकते है।
- हमेशा सात्विक भोजन करे और सडा हुआ, तेज मसालेदार, नॉन वेज आदि गरिष्ट भोजन न करे। हमेशा ईमानदारी से कमाए पैसे से ख़रीदा हुआ भोजन खाए।
- हमेशा साफ़ सुथरे और हल्के कपड़े पहने।
- अगर आप मन, वाणी व बुद्धि को शुद्ध रखना चाहते है तो आप को ब्रह्मचर्य पालन करना बहुत जरूरी है आयुर्वेद का भी यही कहना है कि अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया 3 महीने तक करते है तो आप को मनोबल, देहबल और वचनबल में परिवर्तन महसूस होगा , जीवन के ऊँचे से ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का जीवन मे होना बहुत जरूरी है।
- अपने दिल और अपने मन को कंट्रोल करना सीख जाते हैं।
- उनमें लोगों से अच्छे से बात करने की समझ और कुशलता आ जाती है।
- उसे छोटी छोटी सी चीज भी ख़ुशी देती है।
- ऐसा व्यक्ति तनाव भरे माहौल में भी संयम के साथ काम कर पाते है।
- ब्रह्मचर्य करने वालों की सोच अच्छी और पवित्र होती है क्योंकि उनका उनकी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले जो भी काम करना शुरू करते हैं वो खत्म करने के बाद ही छोड़ते हैं।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के अन्दर ऊर्जा बनी रहती है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
- ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता, मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।
- ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।
- ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।
- ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है।
- ब्रह्मचर्य से व्यक्ति का आत्मविश्वास पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है।
- ब्रह्मचर्य से व्यक्ति की एकाग्रता और याददाश्त बढ़ती है।
- ब्रह्मचर्य से व्यक्ति के सांस लेने की प्रक्रिया सुधरती है।
- ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रह कर उसका सामना कर सकता है।
- ब्रह्मचारी तनाव मुक्त रहते हैं।
- ब्रह्मचारी स्वयं की नज़रों में ऊपर उठता है।
- व्यक्ति अपने आपको पहले के मुकाबले अच्छे से प्रस्तुत करना और व्यक्त करना सीख जाता है।
- व्यक्ति अपने काम पर ज्यादा ध्यान लगा पाता है।
- व्यक्ति का अपने मन और अपने भावों पर पूर्ण नियंत्रण होगा।
- व्यक्ति को अपने जीवन में मज़ा आने लगता है।
- व्यक्ति टाइम मैनेजमेंट सीख जाता है इसलिए उसे ज्यादा फ्री टाइम मिलने लगता है।
- व्यक्ति मानसिक रूप से सुदृढ़ होगा।
- समाज में लोगों से जुड़ने और बात करने का डर खत्म हो जाता है।
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उदय प्रकाश का जीवन परिचय एवं रचना
10 वर्ष की आयु में उनकी मां का देहांत कैंसर के कारण हो गया। ‘नेलकटर’ कहानी में रचनाकार ने इस प्रसंग की भावुक अभिव्यक्ति की है। माँ के निधन के पश्चात् उनके परिवार में बिखराव शुरू हो गया। मानो मौत का ताण्डव मच गया हो। उनकी मृत्यु के बाद उनके पिताजी का भी स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उदय प्रकाश मात्र 17 वर्ष की आयु में ही अनाथ हो गये। इस त्रासद घटना का वर्णन वे अपनी कहानियों में करते हुए लिखते हैं-‘‘बचपन से ही मैंने मृत्यु को अपनी आँखों से देखा है। बारह या तेरह वर्ष का था जब माँ की मृत्यु हुई थी। उस वर्ष उनकी उम्र सैंतीस वर्ष की थी। उन्हें श्वासनली का कैंसर था (नेलकटर)। सत्रह वर्ष का था जब पिता की मृत्यु हुई। उन्हें दाढ़ और गाल का कैंसर था। (दरियाई घोड़ा) यह एक विचित्र संयोग है, जो कई बार मुझे नियति के हाथों लिखी गयी हमारी वंशावली की तरह लगता है कि पिछली कई पीढ़ियों से हमारे परिवार ने छियालीस वर्ष की आयु रेखा पार नहीं किया। मेरे पितामह की मृत्यु भी पैंतालीस की उम्र में हो गयी थी और यह एक तथ्य है (या शायद संयोग) कि सभी की मृत्यु कैंसर से हुई।’’
माता-पिता को खो देने की पीड़ा उदय प्रकाश सहन न कर सके और ‘स्क्रीजोफ्रेनिया’ नामक रोग से पीड़ित हो गये। इसे मनोविदलता कहते हैं यह एक मानसिक विकार है। जिसमें मनुष्य असामान्य व्यवहार तथा वास्तविकता को पहचान पाने में असमर्थ होता हैं ‘स्क्रिीजोफ्रेनिया’ का शाब्दिक अर्थ है ‘मन का टूटना’। इस मानसिक अवस्था का चित्रण उनके एक आत्मकथ्य में मिलता है, ‘‘जब माँ की मृत्यु हुई मैं इस शून्य को सह पाने की स्थिति में नहीं था। दुबला-पतला था, चिड़चिड़ा था और सम्भवतः बहुत अधिक संवेदनशील था। लेकिन मैंने अपने से छः वर्ष छोटी बहन को देखा। वह इतनी छोटी थी कि माँ की अर्थी ले जाते समय फैंके जाने वाले तांबे के सिक्कों को बीन रही थी और बताशे खा रही थी। मुझे लगता है कि कई वर्षों तक अपनी छोटी बहन को अकेला न होने देने के लिए जीवित रहा। बाद में पिता के न रह जाने पर लगभग एक वर्ष तक ‘स्क्रीझोफ्रेनिया’ का इलाज चला। उदय प्रकाश ने जीवन में काफी संघर्षों का सामना किया है। इतनी बाधाओं के बाद भी प्रखर प्रतिभा के धनी वे जीवन-पथ पर अग्रसर रहे, उन्होंने हार को भी पराजित कर दिया।
शिक्षा-दीक्षा - उदय प्रकाश की प्रारम्भिक शिक्षा माता-पिता की देखरेख में सीतापुर में ही हुई। उनकी प्राथमिक स्तर की शिक्षा सीतापुर प्राथमिक पाठशाला में हुई व छठी, सातवीं तथा आठवीं तक की पढ़ाई उन्होंने ‘अनूपपुर दामोदर बहुउद्देशीय माध्यमिक पाठशाला’ में की, जो अब ‘अनूपपुर कन्या महाविद्यालय’ के नाम से जाना जाता है। कक्षा नवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई उदय प्रकाश ने ‘शहडोल शासकीय महाविद्यालय’ से तथा ‘रघुराज हायर सेकेंडरी स्कूल’ से की है। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से बी0एस0सी0 की पढ़ाई की। स्नातकोत्तर की पढ़ाई उन्होंने 1974 ई0 में हिंदी विषय से की जिसमें उन्हें ‘नंददुलारे वाजपेयी स्वर्ण पदक’ प्राप्त हुआ। पढ़ाई में अध्ययन के साथ वह ‘साम्यवादी मूवमेण्ट’ से जुड़े रहे। आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे दिल्ली चले गए और 1975 ई0 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पी.एच0डी0 में प्रवेश ले लिया और अध्यापन कार्य में रत रहें।
परिवार एवं दाम्पत्य जीवन - उदय प्रकाश का प्रेम विवाह हुआ है। उनका विवाह 9 जुलाई 1977 ई0 को गोरखपुर निवासी कुमकुम सिंह के साथ हुआ। श्रीमती कुमकुम सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से फ्रेंच भाषा व स्पेनिश भाषा में एम.ए. के साथ इंडोनेशिया भाषा में डिप्लोमा किया था। उनका सम्पूर्ण परिवार शिक्षित है। कुमकुम जी अब दिल्ली के ही एक विद्यालय में कार्यरत हैं। कुमकुम जी उदय प्रकाश के रचनात्मक कार्यकलापों में सक्रिय सहयोग एवं प्रेरणा देती रही हैं। देशभर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनकी चर्चाएं एवं लेख संबंधी सामग्री को जुटाना उनकी दिनचर्या का नितांत हिस्सा है। उन्होंने उदय प्रकाश के साथ जीवन के धूप छाँव में सदैव साथ निभाया है।
उदय प्रकाश के दो पुत्र हैं सिद्धार्थ और शांततु जिनकी आयु क्रमशः 32 एवं 30 वर्ष है। उदय प्रकाश के दोनों पुत्र उच्च पदों पर कार्यरत हैं। बड़ा बेटा सिद्धार्थ अपनी प्रखर बुद्धि के बल पर छात्रवृत्ति प्राप्त कर जर्मन में कार्यरत है। सिद्धार्थ ने फ्रांसीसी लड़की से शादी की है। उनका छोटा बेटा बैंक में कार्यरत है। वर्तमान में उदय प्रकाश गाज़ियाबाद के वैशाली, सेक्टर 9 में स्थित अपने आवास में रहते हुए अपनी पत्नी श्रीमती कुमकुम सिंह के साथ साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न हैं।
आर्थिक पृष्ठभूमि - उदय प्रकाश शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकते रहे। उन्होंने सन् 1978 ई. से 1980 ई. तक जीविकोपार्जन हेतु ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ में सहायक प्रोफेसर के पद का अध्यापन का कार्य किया। इसके उपरांत सन् 1980 ई0 से 1982 ई. तक संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में रहे और इसी के साथ ‘पूर्वग्रह पत्रिका’ के सहायक संपादक का कार्य संभाला।
स्नातकोत्तर डिग्री में स्वर्णपदक प्राप्त करने के बाद एवं फ्रेंच, जर्मन भाषा में डिप्लोमाधारी एवं विशेषज्ञ उदय प्रकाश को कोई स्थायी नौकरी नहीं मिली। अपनी व्यथा का अंकन वे इस प्रकार करते हैं- ‘‘ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर करते हुए जो आचार्य नंददुलारे वाजपेयी स्वर्ण पदक मैंने हासिल किया था, उसे कमोड में डालकर बहा दूँ-या किसी मंत्री या अफ़सर के कुत्ते के गले में बाँधकर लटका दूँ। झूलते रहें आचार्य जी वहाँ।’’
उदय प्रकाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने जीवन में बहुत संघर्ष किया है। उन्होंने सन् 1982-1990 तक टाइम्स ऑफ इण्डिया के समाचार पाक्षिक ‘दिनमान’ के संपादक का कार्य संभाला था, जिसके जनरल एडिटर अशोक वाजपेयी जी थे। इसी दौरान बीच में एक वर्ष 1987 में ‘टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन’ के स्कूल आॅफ सोशल जर्नलिज्म में सहायक प्रोफेसर के रूप में अध्यापन का कार्य किया। उदय प्रकाश अस्थायीपन और आर्थिक तंगी से जूझते हुए वे एक वर्ष 1989 ई0 में वह इंडिया पेन्डेन्ट टेलीविजन के विचार और पटकथा लिखते रहे। उन्होंने कभी दूरदर्शन के लिए लिखा, तो कभी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई। उन्होंने जयपुर पर आधारित दस छोटी-छोटी फिल्में बनाई जो ‘विजयदान देथा’ की शॉर्ट-स्टोरी पर आधारित है। विजयदान देथा राजस्थान के प्रख्यात लेखक हैं।
इसके पश्चात दो वर्ष तक (1991-1992 ई0) में पी0टी0 आई और आई0टी0 वाई टेलीविजन में कार्यरत रहे। इससे उन्होंने एक सांस्कृतिक मैगजीन निकाली, जो बहुत चली और सफल रही। सन् 1990 में उदय प्रकाश कुछ समय तक दिल्ली से निकलने वाले ‘संडे मेल’ साप्ताहिक के वरिष्ठ सहायक संपादक रहे।
इसके पश्चात् अप्रैल 2000 ई0 तक उन्होंने ‘इमीनेन्स- नामक अँग्रेज़ी मासिक पत्रिका के सम्पादन का कार्यभार संभाला जो बैंगलोर से निकलती थी। स्वयं उदय प्रकाश अपनी भागदौड़ भरी जीवनशैली के संदर्भ में कहते हैं, ‘‘आप मेरी पत्नी और बच्चों से पूछें-इतना संघर्ष मैंने किया है, पिछले 17-18 साल से मेरे पास कोई नौकरी नहीं है और जितनी कठिन मेहनत की है हम सबने, बच्चों को पढ़ाया, उनकी फीस का इंतजाम, मकान का किराया देना, आप जानते हैं कि बिना नौकरी के ये चीजें आसान नहीं होती, उनके लिए भागना-दौड़ना पड़ता है। मेरे पास कोई कांटेक्ट भी नहीं थे कि मैं किसी बडे़ अखबार या पत्रिका का सम्पादक बन जाऊँ।’’
वे साहित्य रचनाएँ लिख रहे थे किंतु उसमें पर्याप्त पैसा कमाना मुश्किल था। उदय प्रकाश जी को साहित्यिक प्रसिद्धि ‘पीली छतरी वाली लड़की’ कहानी से मिली। उन्हें इस कहानी से बहुत बड़ी रकम राॅयल्टी के रूप में प्राप्त हुई। यही कहानी उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना। इसके बाद जब पेंगुइन बुक्स वालों ने उन्हें तीन पुस्तकों के लिए कहा, तब उदय प्रकाश जी को लगने लगा कि साहित्य में उनकी पहचान है। वर्तमान समय में वे पत्र-पत्रिकाओं और फिल्मों के लिए स्वतंत्र लेख और पटकथा लेखन का कार्य कर रहे हैं।
विचारधारा - एक साहित्यकार की विचारधारा उनके कृतित्व द्वारा प्रतिफलित होती है। साहित्यकार अत्यंत संवेदनशील होता है। उसकी संवेदनशीलता उनके कृतित्व को भी प्रभावित करती है और अभिव्यक्ति पाकर वह रचना के माध्यम से पाठकों के हृदय में समाहित रहती है। उदय प्रकाश का जीवन इन्हीं संवेदनाओं की पूँजी है। संवेदनाओं की सघनता उनकी रचनाओं का प्राणतत्त्व हैं।
उदय प्रकाश की साहित्यिक समझ और दृष्टि विशिष्ट है। उन्होंने बचपन से ही बहुत संघर्षों के साथ जीवन यापन किया है। यही इनके लेखन को प्रेरणा प्रदान करता है। उदय प्रकाश प्रसिद्ध कहानीकार के साथ एक कवि भी हैं। कविता के सन्दर्भ में उदय प्रकाश से एक साक्षात्कार में संजय अरोड़ा ने उनसे पूछा ‘‘बगैर एक कवि आप पर किसका प्रभाव अधिक रहा है? उदय प्रकाश-देखिए, किसी भी समय की कविता अपने से पहले की कविता से प्रभावित होती है। अब अगर उसमें कोई दावा करे कि इस काव्य की स्मृति में केदारनाथ सिंह कहीं नहीं हैं, सिर्फ रघुवीर सहाय हैं या रघुवीर सहाय नहीं विष्णु खरे हैं, तो ऐसी बहस का कोई मतलब नहीं होता। हम सभी लोग जो कुछ भी लिखते हैं, कविता हो या कहानी हो, उसमें हमसे पहले के सभी कहानीकारों एवं कवियों की जो सृजन स्मृतियाँ हैं वो हमारे चाहे या अनचाहे शामिल हो जाती है मैं तो इस पूरी मानसिकता के ही खिलाफ हूँ। मुझ पर तो संजय चतुर्वेदी की भी कविता का प्रभाव है और विष्णु खरे की भी कविता का प्रभाव है।’’
निस्संदेह उदय प्रकाश पर किसी एक साहित्यकार का प्रभाव नहीं पड़ा है। इन पर भारतीय साहित्यकारों के साथ पाश्चात्य साहित्यकारों का भी बहुत प्रभाव रहा है। पाश्चात्य साहित्यकारों में चेखव, माक्र्वेज़, बुल्गाकोव, नेरूदा, रोजेविच, जेम्स ज्वायस आदि साहित्यकारों से प्रेरणा ली है।
कबीर, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन जैसे लेखकों की संघर्षशीलता उदय प्रकाश के साहित्य की प्रेरक शक्ति रही है। निर्मल वर्मा और मुक्तिबोध के संबंध में उदय प्रकाश साक्षात्कार में कहते हैं, ‘‘निर्मल वर्मा और मुक्तिबोध-ये दो लेवेल हैं। निर्मल वर्मा के अगर आप निबंध और उससे भी ज्यादा उनकी डायरीज और जर्नल्स पढ़ें और दूसरी ओर मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ तथा ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’ पढ़ें तो ये दो धु्रव हैं, जिनके बीच आपको लगातार ट्रैवल करना पड़ेगा। यदि आपको साहित्य को साधना है, तो इनके बीच ही आना-जाना पड़ेगा।’’ कथाकार उदय प्रकाश कहते हैं कि हर साहित्यकार अपने से पूर्व या अपने समकालीन साहित्यकार से प्रभावित जरूर होता है।
किसी साहित्यकार की विचारधारा के निर्माण में उसके समय की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक स्थिति एवं सांस्कृतिक दृष्टि का बहुत प्रभाव रहता है। कोई भी रचनाकार अपने समय में चल रहे आंदोलनों के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता, कथाकार उदय प्रकाश पर भी अपने समय की परिस्थितियों का व्यापक प्रभाव पड़ा। उनका स्वयं का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव से भरा है। उनका संघर्ष आदिवासी गाँवों से लेकर कस्बाई वीथियों से गुजरते हुए महानगर की चैड़ी सड़कों तक फैला हुआ है। उदय प्रकाश समय के अंतर्विरोध पर अपनी सूक्ष्म दृष्टि रखते हैं और साहित्य में समेट देते हैं।
कथाकार उदय प्रकाश की राजनीतिक दृष्टि बेजोड़ है। वह अपनी कविताओं, कहानी, निबंधों में राजनीतिक पार्टियों की कलई इस प्रकार खोलते हैं कि राजनीति के गुटबाजी खेमें, सत्ता के दलालों का असली रंग दिखाई देता है। उनका मानना हैं कि गैर राजनीतिक किसी राजकीय दल से मेरा कोई संबंध नहीं है। एक लेखक गैर राजनीतिक हो सकता है पर वह राजनीति से पूर्णतः अछूता नहीं रह सकता। उन्होंने भेदभाव को नकारकर अपनी कहानियों और कविताओं में हर उस व्यक्ति का ज़िक्र किया है जो शोषित है। उदय प्रकाश मानते हैं कि साहित्य वह आधार है जिसमें हम अपने समाज को सम्पूर्ण रूप में व्यक्त करते हैं। साहित्य ही मुक्ति का साधन है। जब हम अपनी बात संप्रेषित कर देते हैं तो हम दबाव से, बोझ से मुक्त हो जाते हैं।
पूंजीवादी समाज ने ब्रांड को विकसित करके मनुष्य की संवेदना को खरीद लिया है। उदय प्रकाश बदली हुई स्थिति का अवलोकन करते हुए कहते हैं-‘‘आपने देखा होगा कि 90 के बाद या भूमण्डलीकरण के बाद नवसाम्राज्य आ गया। हमारा पूरा संसाधन, पूरी अर्थ नीति, हमारी पूरी सत्ता वह लगभग गुलाम हो चुकी थी, वह नवऔपनिवेशक अधीनता को स्वीकार कर चुकी हैं, लगातार उसकी ओर बढ़ती जा रही है राष्ट्रवाद लगभग समाप्त या अंत हो चुका है।
कहानी : दरियाई घोड़ा, तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा-परेबा, मोहनदास, मेंगोसिल
कविता : सुनो कारीगर, अबूतर-कबूतर, रात में हारमोनियम
निबंध : ईश्वर की आँख निबंध
अनुवाद : अनुभव, इंदिरा गाँधी की आखिरी लड़ाई, लाल घास पर नीले घोड़े, रोम्याँ रोलाँ का भारत
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यौन पहचान - Sexual Identity
- होमोसेक्सुअलटी (Homosexuality) समान लिंग के अन्य व्यक्तियों के प्रति आकर्षण के पैटर्न का वर्णन करती है। Lesbian शब्द का उपयोग आमतौर पर समलैंगिक महिलाओं को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, और Gay शब्द का उपयोग आमतौर पर समलैंगिक पुरुषों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, हालांकि होमोसेक्सुअलटी का उपयोग कभी-कभी महिलाओं को संदर्भित करने के लिए भी किया जाता है।
- उभयलिंगीता (Bisexuality) पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति आकर्षण के एक पैटर्न का वर्णन करती है, या एक से अधिक सेक्स या लिंग के लिए। एक उभयलिंगी पहचान आवश्यक रूप से दोनों लिंगों के लिए समान यौन आकर्षण के बराबर नहीं है; आमतौर पर, जिन लोगों के पास एक लिंग के लिए दूसरे पर एक अलग लेकिन अनन्य यौन प्राथमिकता नहीं होती है, वे खुद को उभयलिंगी के रूप में भी पहचानते हैं।
- अलैंगिकता (Asexuality) दूसरों के प्रति यौन आकर्षण की कमी, या यौन गतिविधि में कम या अनुपस्थित रुचि या इच्छा है। इसे अलैंगिक उप-पहचान के व्यापक स्पेक्ट्रम को शामिल करने के लिए अधिक व्यापक रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है। अलैंगिकता यौन गतिविधि से दूर रहने और ब्रह्मचर्य से अलग है
- रोमांटिकतावाद (Aromanticism) को "दूसरों के प्रति बहुत कम या कोई रोमांटिक भावना नहीं होना: बहुत कम या कोई रोमांटिक इच्छा या आकर्षण का अनुभव करना" के रूप में परिभाषित किया गया है
- पैनसेक्सुअलिटी (Pansexuality) लोगों के प्रति आकर्षण का वर्णन करती है, चाहे उनकी सेक्स या लिंग पहचान कुछ भी हो। पैनसेक्सुअल लोग खुद को लिंग-अंधे के रूप में संदर्भित कर सकते हैं, यह कहते हुए कि लिंग और सेक्स दूसरों के लिए उनके रोमांटिक या यौन आकर्षण में कारक नहीं हैं। पैनसेक्सुअलिटी को कभी-कभी एक प्रकार की उभयलिंगीता माना जाता है।
- बहुलैंगिकता (Polysexuality) को "कई अलग-अलग प्रकार की कामुकता को शामिल करने या विशेषता रखने" के रूप में परिभाषित किया गया है, और कई, लेकिन सभी नहीं, लिंगों के लिए यौन आकर्षण के रूप में। जो लोग इस शब्द का उपयोग करते हैं, वे उभयलिंगी शब्द के प्रतिस्थापन के रूप में ऐसा कर सकते हैं, यह मानते हुए कि उभयलिंगी डिकोटोमी को पुनर्जीवित करता है। प्रमुख एकेश्वरवादी धर्म आम तौर पर बहुलैंगिक गतिविधि को प्रतिबंधित करते हैं, लेकिन कुछ धर्म इसे अपनी प्रथाओं में शामिल करते हैं। बहुलैंगिकता को उभयलिंगीता के लिए एक और शब्द भी माना जाता है, हालांकि उभयलिंगी के विपरीत, पॉलीसेक्सुअल आवश्यक रूप से एक ही लिंग के लोगों के प्रति आकर्षित नहीं होते हैं।
- सैपियोसेक्सुअलिटी (Sapiosexuality) किसी अन्य व्यक्ति की बुद्धि के प्रति आकर्षण का वर्णन करती है। उपसर्ग सैपियो- लैटिन से "मेरे पास स्वाद है" या "मेरे पास ज्ञान है" के लिए आता है और किसी व्यक्ति की प्राथमिकताओं, प्रवृत्तियों और सामान्य ज्ञान को संदर्भित करता है। सैपियोसेक्सुअल-पहचान करने वाले व्यक्ति समलैंगिक, सीधे या उभयलिंगी भी हो सकते हैं। यह यौन अभिविन्यास नहीं है। इसने पहली बार 2014 में मुख्यधारा का ध्यान आकर्षित किया जब डेटिंग वेबसाइट Ok Cupid ने इसे कई नए यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान विकल्पों में से एक के रूप में जोड़ा। लगभग 0.5% ओकेक्यूपिड उपयोगकर्ता सैपियोसेक्सुअल के रूप में पहचान करते हैं, और यह 31-40 वर्ष की आयु के लोगों में सबसे आम था। महिलाओं को पुरुषों की तुलना में सैपियोसेक्सुअल के रूप में पहचानने की अधिक संभावना है। आलोचकों ने जवाब दिया कि सैपियोसेक्सुअलिटी "संभ्रांतवादी," "भेदभावपूर्ण" और "दिखावटी" है।
- संबंध अराजकता (Relationship Anarchy) बहुपत्नी और अराजक सिद्धांतों को जोड़ती है। इसके अभ्यास में कोई मानदंड नहीं है, लेकिन पश्चिमी संबंध मानदंडों की आलोचना, भागीदारों पर मांगों और अपेक्षाओं की अनुपस्थिति, और दोस्ती और रोमांटिक रिश्तों के पदानुक्रमित मूल्य के बीच अंतर की कमी की ओर जाता है।
- विषमलैंगिकता (Heterosexuality) विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण के एक पैटर्न का वर्णन करती है। सीधे शब्द का उपयोग आमतौर पर विषमलैंगिकों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। विषमलैंगिक अब तक का सबसे बड़ा यौन पहचान समूह है।
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भीष्म द्वादशी महत्व, पूजन विधि एवं मंत्र
- भीष्म द्वादशी की सुबह स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
- भगवान की पूजा में केले के पत्ते व फल, पंच मृत, सुपारी, पान, तिल, मौली, रोली, कुमकुम, दूर्वा का उपयोग करें।
- पूजा के लिए दूध, शहद केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार कर प्रसाद बनाएं व इसका भोग भगवान को लगाएं।
- इसके बाद भीष्म द्वादशी की कथा सुनें।
- देवी लक्ष्मी समेत अन्य देवों की स्तुति करें तथा पूजा समाप्त होने पर चरणामृत एवं प्रसाद का वितरण करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं व दक्षिणा दें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करें और सम्पूर्ण घर-परिवार सहित अपने कल्याण धर्म, अर्थ, मोक्ष की कामना करें।
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